Tuesday, March 13, 2007

आइए रचें हिंदी का मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र

इधर चिट्ठाकार मित्रों में अलग अलग अनुपात में एक आचार संहिता के लिए उत्‍साह देखने में आया है। कुछ मित्र मसलन सृजन, अमिताभ आदि मिशनरी रूप से इसके पक्षधर हैं तो कुछ असमंजस में ही सोच रहे हैं कि मोहल्‍ला प्रकरण के आलोक में शायद ये जरूरी है। चूँकि मौन को स्‍वीकृति मानने की नाजायज सी परंपरा सागर शुरू कर चुके हैं इसलिए मुझे लगा कि जो मानसिक कवायद हमने की है उसे साझा किया जाए। अविनाश और अन्‍य लोगों से जो छुटपुट चर्चा रविवार को हुई थी उसमें और अन्‍यथा भी मुझे अक्‍सर लगा है कि हिंदी चिट्ठाकारी के लोग स्‍वयं को चिट्ठाशास्‍त्र (ब्‍लॉग थ्‍योरी) से अलगा कर एक नई दुनिया बना रहे हैं।



यह ठीक है कि उपलब्‍ध चिट्ठाशास्‍त्रीय प्रतिमान हिंदी चिट्ठाकारी की प्रवृत्ति का पूरा ढाँचा व्‍याख्‍यायित करने में असमर्थ हैं किंतु इसका समाधान अपना मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र गढ़ना है न कि उससे निरपेक्ष हो जाना। ऐसा करना सारे चिट्ठा जगत को गिफ्टरैप कर बरास्‍ता अविनाश इलैक्‍ट्रानिक मीडिया को भेंट कर देने जैसा होगा। हम कितना भी नकारें हमें मानना होगा कि कि चिट्ठाजगत को बाकी मीडिया वाले चिट्ठा उद्योग की तरह देखते हैं अत: उससे दो दो हा‍थ करने के लिए हमें अपना चिट्ठाशास्‍त्र चाहिए ठीक वैसे ही जैसे कि साहित्‍य को अपना स्‍वरूप निश्चित करने के लिए साहित्‍यशास्‍त्र चहिए होता है।

ऐसा तुरंत क्‍यों जरूरी है ?
इसलिए कि चिट्ठाकारी को ‘एक तरह की डायरी’, मीडिया ऐक्‍सटेंशन, छपास रोगियों का अभयारण्‍य आदि प्रचारित कर इसके स्‍वतंत्र रूप पर प्रश्‍नचिह्न लगाने की कवायद खूब आसानी से दिखाई दे रही है। ‘लो चलो हम सिखाते हैं’ के भाव से लोग टीवी की दुनिया से आ रहे हैं और महमूद फारूकी जैसे मित्र जाने अनजाने इस ‘बेचारे’ चिट्ठाजगत पर जो कृपा कर रहे हैं बिना इसे जाने समझे वे ऐसा इसलिए कर पा रहे हैं कि वे आँखों में आँखें डाल कह पा रहे हैं कि हिंदी चिट्ठाकारी क्‍या है यह खुद हिंदी चिट्ठाकारी को ही नहीं पता। वे इसलिए ऐसा कर पा रहे हैं कि अपने जैविक विकास में चिट्ठाकारी ने जो अपना विशिष्‍ट रूप हासिल किया है वह खुद को उस सैद्धांतिकी से नहीं जोड़ पाया है जो ब्‍लॉगिं‍ग ने पिछले दस वर्षों में खड़ी की है। ब्‍लॉग शोध की प्रवृत्ति शायद ऐसा करने की दिशा में एक सही कदम हो पर अभी तो एक ‘शायद’ मुँह बाए खड़ा है।

क्‍या सैद्धांतिकी इस औपनिवेशिक सोच को रोक पाएगी जिससे खतरा झांक रहा है ?

हाँ, जरूर। एक बार दम भर इस ओर देखें आप पाएंगे कि चिट्ठाशास्‍त्र मुख्‍यधारा हिंदी जगत का मातहत या छोटा भाई नहीं है। वह खुद एक मुकम्‍मल संरचना है। यह बोध चमत्‍कार करने में समर्थ है।

चलिए मान लिया कि चिट्ठाशास्‍त्र जरूरी है पर कौन रचेगा इसे, समय की तो कमी है ही साथ ही हम साइबर कैफै चलाने वाले हैं, ऐकाउटेंट हैं, साफ्टवेयर वाले हैं ये सैद्धांतिकी का काम हम कैसे करें?

इसी लिए जरूरी है कि ये काम हम करें, कोई सुधीश पचौरी, कोई नामवर, कोई राजेंद्र यादव इसे करने बैठ जाए इससे पहले जरूरी है कि हम इसे निष्‍पादित करें। क्‍योंकि हम जो है उसके जैविक विकास से इसके सिद्धांत निकालेंगे, कृत्रिमता से मुक्‍त। विश्‍वविद्यालयी एप्रोच से चिटठाकारी का भला संभव नहीं, ये अपने अनुभव से कह रहा हूँ मान लीजिए। बाकी रही आचार संहिता की बात तो कितनी भी बना लो ये तो नूह्हें चाल्‍लेगी।

Sunday, March 11, 2007

दिल्‍ली की मीट यानि हरी घास में दम भर

इधर हिंदी का चिट्ठाजगत एक किस्‍म की बेचैनी साफ दिखाई देती है, क्राइसिस है कि नहीं कहना कठिन है पर इतना तय है कि बदलाव के मुहाने पर तो हैं ही हम। दिल्‍ली की आज की ब्‍लॉगर मीट में भी इस बदलाव की छाया और स्‍वर दोनों थे। पहला बदलाव तो यह था कि मेजबान नदारद थे, और जिनके जैसे तेसे पहुँच जाने भर की उम्‍मीद थी वे बैठे हर मेज पर जाकर कुरेद कुरेदकर पूछ रहे थे कि भाईसाहब क्‍या आप वो हिंदी ब्‍लॉगर....., फिर हमारा साक्षात्‍कार एक आपत्तिसूचक नकार से होता था। हमें लगा कि ये ब्‍लॉगर मीटिंग कहीं ब्‍लॉगर डेंटिंग में न बदल जाए (जी साहब ब्‍लॉग शोधार्थी थीं ही वहाँ) पर खैर होनी को कौन टाल सकता है। धीरे धीरे ये लोग पहुँच गए-
(किसी नाम के आगे ‘जी’ नहीं लगाया गया है, हमारी संघ-आयु मात्र दो घंटे है....)





मैं
नीलिमा
नोटपैड
अमिताभ
सृजनशिल्‍पी
जगदीश
अमित
अविनाश
व मुक्‍ता
भूपेन



वैसे पता चला कि मैथिली मिल न पाने के कारण उल्‍टे पाँव लौट गए थे और अमित काफी पहले से ही किसी और कॉफी डे में कॉफी सुढ़क रहे थे।

खैर चर्चा शुरू हुई (बाद में खत्‍म भी हुई इसी बात पर कि) ये.....ये माजरा क्‍या है ? अविनाश से तो हमने सीधे पूछा कि बताएं कि आपके इरादे क्‍या हैं- उन्‍होंने राष्‍ट्र के नाम संदेश नुमा कुछ बताया और अंत तक उसी पर कायम रहे। (शायद नौकरी का सवाल हो...) हमे लगा कि शायद अविनाश का निजी एंजेंडा तो कुछ न हो पर वैसे इलैक्‍ट्रानिक मीडिया के मोहल्‍ले में कुछ पक रहा है......वे आ रहे हैं। हमारी राय में कल की चिट्ठाचर्चा के कयासों में दम था। खैर चर्चा चली, कॉफी चली.....चर्चा गर्म हुई, काफी ठंडी हुई।
लोकमंच बनाम मोहल्‍ला हुआ, पर तू-तू मैं-मैं नहीं हुई, सद्भाव कायम रहा। और बात...किस किस पर बात नहीं गई, महमूद फारुकी, इरफान, जितेंद्र, अनूप, नारद, घुघुती, प्रत्‍यक्षा, ...
कैफे कॉफी डे के बाद ‘हरी घास में दमभर’ बैठे और भूखे पेट चिट्ठाकारी को आसमान पर जा ले बैठाया। हम तो इसी मेल मिलाप के लिए गए थे सो बतला दिया। सृजनशिल्‍पी जरूर किसी तयशुदा ऐजेंडा से थे सो बताएंगे ही। हमारे लिए काम के मिनट्स ये हैं।


कैफे कॉफी डे के टायलेट में पानी नहीं था।
अविनाश के सेलफोन पर जब मनीषा का फोन आता है, तो वो सबको सुनाते हैं
हमें मुफ्त में कैफे की शक्‍कर तक मिले ये तक नीलिमा से बर्दाश्‍त नहीं
नोटपैड को ‘boys will be boys’ से परहेज है
पहली हिंदी टीन को जगदीशजी चिट्ठाकारी में लाने वाले हैं
लोकमंच पर लाल सलाम होगा- मोहल्‍ले में नमस्‍ते सदा वत्‍सले...
आयरिश एक तरह की कॉफी होती है जिसे 90+(वजन, उम्र नहीं) के ब्‍लॉगर पी सकते हैं
अमित खजुराहो हो आए हैं, यानि केवल वयस्‍कों के लिए पोस्‍ट आने वाली है

दोनों तस्‍वीरें नोट पैड के सौजन्‍य से हैं

इति श्री मीट कथा

Friday, March 09, 2007

....क्‍योंकि भाषा भी एक फ्रैक्‍टल है

मेरे एक साथी अध्‍यापक हैं डा. साहा। वे एक वरिष्‍ठ व प्रसिद्ध गणितज्ञ हैं जिन्‍हें गैर रेखीय गणित का विद्वान माना जाता है। उनका एक प्रस्‍तुतीकरण था, हमें भी होने का अवसर मिला। अब था तो निखट्ट गँवारों के बीच, मतलब डिग्रियॉं तो उनमें से शायद ही किसी के पास हम से कम हो पर वही समस्‍या जो हमारी शिक्षा पद्धति की है यानि ज्ञान तो शायद कम देती है पर ज्ञान का दंभ ज्‍यादा भर देती है। खैर उस प्रस्‍तुतीकरण को विशेष सराहना न मिल सकी किंतु मैं उसपर वाकई मुग्‍ध था। क्‍यों...यह अभी बताता हूँ।

जब तक गणित पढ़ा मेरा प्रिय विषय था और ऐसा इसलिए कि यह अमूतर्न को जिस माहिर अंदाज से साधता है खुद धर्म और दर्शन भी उसके सामने पानी भरते नजर आते हैं। हॉं तो डा. साहा की प्रस्‍तुति का विषय था ‘आर्डर एंड केओस’, गणितीय तो नहीं किंतु भाषा में इस विषय पर मैं लगातार सोचता रहता हूँ। शायद इसी वजह से यह संभाषण मुझे पसंद आया हो।
नीचे कही गई बातें उसी व्‍याख्‍यान का या तो अंश थीं या बाद में काफी सुढ़कते हुए उनसे हुई बातचीत के आधार पर लिखी गई हैं-


हम प्रकृति को जानना चाहते हैं, इसलिए नहीं कि वह उपयोगी है वरन इसलिए कि वह खूबसूरत है।
प्रकृति खूबसूरत है क्‍योंकि वह लीनीयर नहीं है, वह व्‍यवस्‍था व गैर व्‍यवस्‍था (केओस) का मिला जुला रूप है। मसलन एक बागीचे में कतार से लगे पौधों में व्‍यवस्‍था है पर इन पौधों की विविधता एक प्रकार के केओस से उपजती है।

हर व्‍यवस्‍था को रेखीय समीकरण में बदला जा सकता है इसलिए वह इन समीकरणों के आधार पर व्‍याख्‍यायीत की जा सकती
हैं। किंतु गैर रेखीय समीकरणों के साथ ऐसा नहीं है, वे जिन भी वैरिएबलों (चरों) पर निर्भर करते हैं उनमें जरा सा बदलाव अंत में बहुत ही बड़ा अंतर ला देते हैं। पृथ्‍वी पर जीवन का उदय होना, पेड़ की पत्तियाँ, आदि आदि की व्‍याख्‍या इससे की जा सकती है। दरअसल कम से कम तकनीकी तौर यह संभव है कि पूरे ब्रह्मांड के जन्‍म या मृत्‍यु की व्‍याख्‍या की जा सके बशर्ते हम इतनी गणनाएं कर पाएं। कुछ सरल गणनाएं करना अब कंप्‍यूटर से संभव हो गया है। और उसका उदाहरण फैक्‍टल होते हैं। (मुझे याद है कि इस चिट्ठे पर मैनें कुछ फ्रैक्‍टल पोस्‍ट किए थे....वे यहॉं, यहॉं, यहॉं और यहॉं हैं।) और भी कुछ खूबसूरत व्‍याख्‍याएं थीं और यह भी कि गणित ने ये सब बातें 1886 में ही कह दी थीं और सैद्धांतिक तौर पर ये आईंस्‍टाइन के सिद्धांत का विरोध करती हैं।


मुझे सबसे रोचक लगता है जब मैं इसे भाषा पर लागू करता हूँ, सोचिए जरा कि एक आम व्‍यक्ति भाषा में चंद ही शब्‍दों का इस्‍तेमाल करता है (शायद आधारभूत शब्‍दावली के शब्‍द 2000 से कम होंगे) पर इनसे इतने संवाद बन जाते हैं कि न केवल कोई भी अपने जीवन में कभी कोई भाषिक संवाद नहीं पूरी तरह दोहराता वरन मानव सभ्‍यता में ही कोई भाषिक संवाद जस का तस आज तक नहीं दोहराया गया। (शब्‍द, वाक्‍य, क्रम,वक्‍ता, श्रोता, प्रभाव, आदि के स्‍तर पर कोई न कोई अंतर अवश्‍य आ जाएगा चाहे आप स्‍वयं ऐसा जानबूझकर ही क्‍यों न करने की कोशिश करें) हॉं लिपि इस केओस में व्‍यवस्‍था लाने का प्रयास करती है और खूबसूरती से स्‍वयं केओस का शिकार हो जाती है।
लंबी बोझिल पोस्‍ट के लिए क्षमा मुझे डर था कि कहीं मैं बाद में लिखूंगा तो वह यह नहीं होगा जो अब है। पोस्‍ट के फ्रैक्‍टल मेरे पुराने बनाए हुए हैं। आप भी कोई टूल डाउनलोड कर कोशिश करें। ये बिल्‍कुल आसान है।

ट्रांसलिटरेशन औजार की परख

ट्रांसलिटरेशन से लिखने की आदत तो नहीं पर इतना शर्तिया कहा जा सकता है यह औजार कई लोगों को हिंदी ओर आकर्षित करने में समर्थ है। यह पोस्ट केवल इस औजार को टेस्ट करने के लिए लिखी गयी है। केवल ऐडिटिंग में दिक्‍कत हो रही है पर खुद शब्‍द सुझा सकने की इसकी बुद्धि आमतौर पर सही ही है। अच्‍छा दिन है। तो अब हिंदी में न लिखने का एक और बहाना कम हुआ लोगों का।
इसे टेस्‍ट पोस्‍ट भर माना जाए।

Thursday, March 08, 2007

एक उजड्ड हिंदीवाले की ब्‍लॉग दिक्‍कतें

कंप्‍यूटर हम उस जमाने से इस्‍तेमाल कर रहे हैं जब वह 8088 प्रोसेसर से चला करता था और PC-XT और PC-AT ही इसके वर्गीकरण थे। डिस्‍क में 20 एमबी की हार्ड डिस्‍क होती थी। MSDOS में मजे से काम करते थे, मतलब ये कि टेक्‍नॉल्‍जी से फोबिया कभी नहीं था। पर वह हमें हमेशा साधन ही लगती थी- साध्‍य नहीं। इसलिए टेकीज में हमारी गिनती कभी नहीं हुई। सबसे पहले हिंदी टाईप शायद वर्डस्‍टार (वर्जन III plus) जैसे एक वर्डप्रोसेसर ‘अक्षर’ में की फिर विंडोज आया और पेजमेकर व वेंचुरा का समय आया। इस सारी यात्रा में कंप्‍यूटर केवल प्रिटिंग की दुनिया की सहायता भर कर रहा था। हम कोने पर खड़े देख रहे थे भोग रहे थे।
अब मामला काफी अलग है। कंप्‍यूटर बाकायदा एक संचार माध्‍यम है और बहु ऐंद्रिय है- टेक्‍स्‍ट, आडियो, वीडियो की गुंजाइश के साथ है। यह भाषा को उसकी आखिरी सीमा तक ले जाकर परखता है और फिर उसका बाकायदा अतिक्रमण करता है। ब्‍लॉग यही कर रहा है। हिंदी की दुनिया का व्‍यक्ति हूँ किंतु यहॉं देखता हूँ कि टेकीज लोग ई पंडित, रवि, अनूप, आलोक सब उसी दुनिया के हैं ये अलग बात हे कि हिंदी की विषय वस्‍तु के भी माहिर ही हैं। हमें कई बातें बेचैन करती हैं उनमें से कुछ आपको हमारी अल्‍पज्ञता का प्रमाण लगें तो उन्‍हें सहेजें नहीं क्‍योंकि हम ऐसे ही बता देते हैं कि बुड़बक आदमी हैं- प्रभुजी मेरे अवगुण चित्‍त न धरौ...
कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि हिंदी और इंटरनेट अलग चीजें हैं और हिंदी पढ़ने ओर लिखने के लिए ज्‍यादा मेहनत करनी पढ़ती है। पता नहीं मुझे तो अतुल की यह टिप्‍पणी जायज जान पड़ती है-

‘जीतू भाई , यह बात स्वामी की पोस्ट पर भी लिख चुका हूँ, मेरी नजर में वह हिंदीभाषी
लोग जिनकी रोजी रोटी कंप्यूटर की बदौलत है या जिनका पाला आये दिन कंप्यूटर से पड़ता
है, अपने ब्लाग पर आकर अगर फोन्ट का रोना रोते हैं “कि बाक्स दिखता है” उनसे बड़ा
ढकोसलेबाज , बहानेबाज और लुच्चा कोई इंसान नही हो सकता। जिस शख्स ने माँ को पुकारना
भी हिंदी मे सीखा हो आज अगर कंप्यूटर पर बैठे बैठे पाँच दस साल निकाल चुका है और
उसने एक भी हिंदी साईट नही देखी तो इससे बढा झूठ क्या होगा? कोई जरूरत नही ऐसे
बहानेबाजो को स्पूनफीडिंग कराने की। मैने शुरू में बहुतो को आपकी तरह पकड़ पकड़ कर
पढाया, अब नहि करता। पढना है तो खुद ढूढों फोंट और पड़ लो वरना देखते रहो कटिंग
चाय।‘

हॉं गैर हिंदी या गैर कंप्‍यूटर के लोगों के साथ फिर भी थोड़ी रियायत की जा सकती है।
सही कहें तो अब सिवाय चंद्रबिंदु (ँ ) के कोई विशेष परेशानी आती। मतलब यदि मैं Indic IME ही इस्‍तेमाल करना चाहूँ और रेमिंगटन कीबोर्ड इसतेमाल करूँ तो किसी किसी जगह चंद्रबिंदु ँ की जगह कॉं की तरह दिखती है लेकिन चूँकि मैं उतना शुद्धतावादी हूँ नही इसलिए काम चला लेता हूँ ।
मेरी असल दिक्‍कतें विषय वस्‍तु को ले‍कर ज्‍यादा हैं। क्‍यों हम लोग दुनिया जहान के विषयों पर नहीं लिख पा रहे हैं। मसलन आज आशीष नंदी को सुना उन्‍होंने डा. गिरींद्रनाथ का उल्‍लेख किया। ये भारत में मनोविज्ञान के पिता कहे जाते हैं। लेकिन जिस बात से मैं ज्‍यादा आकर्षित हुआ वह यह कि ये बंगाली और अंग्रेजी दोनों में मनोविज्ञान पर लिखते थे लेकिन मजेदार बात यह है कि इनका लेखन जो बंगाली में है वह अधिक प्रामाणिक है, साहसी है मौलिक है और आज प्रासंगिक है। काश हुगली के किनारे पर बैठा कोई पुरबिया उनके लेखन को हिंदी में ब्‍लॉगरों के लिए लिखता। हो सकता है उसे आज पढ़ने वाले चंद लोग ही हो पर चिट्ठा तो यहॉं हमेशा के लिए है। कोई लिखो तब तक वर्तनी जॉंचने का काम मैं देख लेता हूँ कोई गलती हो भी गई तो आप आकर सुधार देना।

Sunday, March 04, 2007

वे तीन साथ-साथ थे

कविताएं मैं कम लिखता हूँ। ये भी एक पुरानी कविता है। यूनीकोड में बदलकर देखा, बदल गई। सोचा बॉंटा जाए। पेश है-

कविता

वे तीन
साथ-साथ थे
सड़क साफ थी
अचानक
सामने से धूल भरी आंधी का
एक जबरदस्त झोंका आया
दरअसल तूफान आने वाला था
एक ने झट से उसकी और पीठ कर ली
दूसरे ने मींच लीं आखें
तीसरे ने आखें फाड़ धूल के पार
देखने की चेष्टा की,
वैसे दिखाई उसे भी कुछ खास न दिया
आखें उसकी
रेत से भर गईं
आखें मलते
उसके मुंह से निकला
बड़ी तेज आंधी है, शायद तूफान...
:
:
वह
आंधी लाने के षडयंत्र में
धर लिया गया
उसके दोनों साथी
बने चश्मदीद गवाह।

Friday, March 02, 2007

मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ? ----- ओपन सोर्स में

इस पोस्‍ट का सोर्सकोड यह है ...
मंटो का वक्‍तव्‍य 'मैं अफसाना क्‍यों लिखता हूँ' लिया। फाइंड-रिपलेस कमांड से अफसाना की जगह चिट्ठा चेपा। तदनुसार कागज-कलम की जगह कंप्‍यूटर के शब्‍द रखे। .....पोस्‍ट कर दिया। कॉपराईट या तो मंटो का माना जाए या ओपनसोर्स में माना जाए। हाजिर है-
मुझसे कहा गया कि मैं यह बताऊँ कि मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ? यह 'क्यों कर' मेरी समझ में नहीं आया. 'क्यों कर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है - कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं चिट्ठा क्योंकर लिखता हूँ. यह बड़ी उलझन की बात है. अगर में "किस तरह" को पेशनज़र रखूं को यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में कुर्सी पर बैठ जाता हूँ. कीबोर्ड पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके चिट्ठा लिखना शुरू कर देता हूँ. मेरे तीन बच्‍चे शोर मचा रहे होती हैं. मैं उनसे बातें भी करता हूँ. उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए "सलाद" भी तैयार करता हूँ. अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर चिट्ठा लिखे जाता हूँ.
अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफ़साने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ.
अगर यह पूछा जाए कि मैं चिट्ठा 'क्यों' लिखता हूँ तो इसका जवाब हाज़िर है.
मैं चिट्ठा अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे चिट्ठा लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है.
मैं चिट्ठा न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी.
मैं चिट्ठा नहीं लिखता, हकीकत यह है कि चिट्ठा मुझे लिखता है. मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ. यूँ तो मैने किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे चिट्ठे लिखे हैं, जिन पर आए दिन विवाद चलते रहते हैं.
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ़ कखग होता हूँ जिसे हिंदी आती है न संस्‍कृत, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी.
चिट्ठा मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती. मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई चिट्ठा निकल आए. कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर चिट्ठा दिमाग से बाहर नहीं निकलता है. आख़िर थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ.
अनलिखे चिट्ठे की घोषणा वसूल कर चुका होता हूँ. इसलिए बड़ी कोफ़्त होती है. करवटें बदलता हूँ. उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ. बच्चों का झूला झुलाता हूँ. घर का कूड़ा-करकट साफ़ करता हूँ. जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-जहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ. मगर कम्बख़्त चिट्ठा जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे ज़हन में नहीं उतरता-और मैं तिलमिलाता रहता हूँ.
जब बहुत ज़्यादा कोफ़्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता.
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है. मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता. लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं ब्‍लॉगिस्‍तान का बहुत बड़ा चिट्ठाकार हूँ.
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफ़हमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ. उन पर कोई जादू कर रहा हूँ.

माफ़ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया. किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाज़िर-नाज़िर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ.
अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई उसने मुझसे यह कहा है, "आप सोचिए नहीं, कीबोर्ड पीटिए और लिखना शुरू कर दीजिए."
मैं इसके कहने पर कीबोर्ड पर अंगुलियॉं चलाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल ख़ाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई चिट्ठा उछलकर बाहर आ जाता है.
मैं खुद को इस दृष्टि से चिट्ठाकार नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ-मुझ जैसा भी बेवकूफ़ दुनिया में कोई और होगा?

Thursday, March 01, 2007

.......सच बड़ा मजा आए

यूँ तो बार बार पीछे मुड़ के देखना ओर हाय हमारा अतीत....हाय वे मोहक दिन.....वो पीली छतरी वाली लड़की.....वो काले छाते वाले मास्‍टरजी......वो सफेद टोपी वाले इरफान साहब......वो बड़े छाते वाली यूनीवर्सिटी स्‍टाल......वगैरह वगैरह ये पीछे मुड़ मुड़ के देखना, ये अपना डोमेन नहीं है। अविनाश, इरफान, जितेंद्र वगैरह इसे अच्‍छा कर पाते हैं हालांकि इसकी चैंपियन फिर भी प्रत्‍यक्षा ही हैं ;) पर थोड़ा बहुत होली की पिनक में हम भी बहक गए थे। पर सच मानिए अपने ही पॉंवों पर खड़े हैं और 'मैं कुछ हूँ' की खामख्‍याली अब छोड़ चुके हैं। इसलिए उन अतीत की फाइलों को रहने ही देते हैं जिसके यूनीकोड में परिवर्तन के बाद साझा करने का आदेश (था तो सुझाव ही पर हम उसे भी आदेश की तरह ही लेते हैं) हमें रविजी, श्रीशजी और अनूपजी ने दिया। इसलिए कि मुझे लगता है कि डींगें और शौर्यगाथाएं तब गाएंगे जब जंग जीत लेंगे अभी तो लड़ाई जारी है। इसलिए पीछे नहीं चलिए आगे देखें। और बॉंटनी ही हैं तो मोहक अतीत की बजाय चलिए अपने सपने बॉटूं, मोहक सपने भी होते हैं लेकिन उनके साथ एक जिम्‍मेदारी भी होती है कि या तो उन्‍हें पूरा करो नहीं तो कम से कम ऐसा पत्‍थर तो बन ही जाएं जिसपर होकर भविष्‍य के अद्यतन लोग उसे पूरा करने निकलेंगे।

मैं टाफलर नहीं न ही जो मैं भविष्‍य के रूप में देख रहा हँ वह कोई प्रो़द्योगिकीय अनुमान है मैं तो केवल सपने की तरह इसे देख रहा हँ पर अलौकिक व अवास्‍तविक की गुंजाइश पैंतीस साल की उम्र में बहुत नहीं रह जाती है। हिंदी चिट्ठाकारिता को लेकर जिस बात की मैं सबसे पहले कामना करता हँ वह यह है कि ये पिता की अपने पिता से बात करने भर की भाषा न हो वरन अपने बच्‍चों से बात करने की भाषा हो। मेरा मतलब है मैं इस चिट्ठा समुदाय को किशोर किशोरियों से भरा देखना चाहता हूँ जो कभी कभी किसी गुरू गंभीर विषय पर र्भी बात कर लें तो मुझे कोई हर्ज नहीं लेकिन आम तौर पर वे आपसी छेड़छाड़, इश्‍क मोहब्‍बत, हम बड़ों की बुराइयॉं, कूल, हैंगिंग आउट, पढ़ाई .....ये सब बातें करते ही दिखें ( न कि हमेशा किसी गुरूभार में दबे कि ये सब वे अपनी भाषा के संरक्षण या बढ़ावे वगैरह के लिए कर रहे हैं) कुछ ऐसे चिट्ठाकार बिरादरियॉं हों जहॉं देशी विदेशी गीत-संगीत नाच आदि की बातें होती हों और तीस साल से बड़े लोगों को वहॉं मुँह न लगाया जाता हो। मतलब हिंदी की चिट्ठाकारिता सॉंस लेने की हद तक स्‍वाभाविक हो कोई महत कार्य न रह जाए, न तो तकनीकी तौर पर ना सांस्‍कृतिक तौर पर। वैसे तकनीकी तौर पर तो ये बस एक कदम भर दूर है आज एक अच्‍छा हिंदी स्‍पीच रेकगिनिशन औजार आया जो हिंदी में बोले को झट यूनीकोड में बदल दे बस फिर क्‍या है....सांस्‍कृतिक तौर पर जरूर एक लंबी लड़ाई है। यानि हमें चाहिए हिंदीटीन (हिंदी के किशोर)। वैसे ये ना समझें कि हमें रैप-रॉक पसंद हैं अरे हम तो बस इतना चाहते हें कि ये हिंदी की दुनिया इतनी बड़ी हो जाए कि भले बुरे सब करम होने लगें इसमें।

चिट्ठाकारिता का दूसरा सपना जरूर ऐलिस इन वंडरलैंड किस्‍म का है। जाहिर है चिट्ठाकारिता की दुनिया विशाल होती जाएगी ओर फिर गूगलदेव के नित नवीन अवतारों के आते जाने के बाद भी कितना मजा आए कि ऐसे ही तफरीह करते हुए हम बाहर निकलें और कोलम्‍बस की तरह हमें कोई नया अमरीका मिल जाए। यानि चिट्ठाकारिता की एकदम अनदेखी दुनिया जिससे हम अब तक अपरिचित थे। किस्‍से कहानी जैसी बात है पर सबकुछ संभव है। नए आबाद ग्रह मिलना अगर स्‍वीकृत सपना है तो दस-बीस नारद क्‍यों नहीं मिल सकते......चलते चलते जमीन पर ऑंखें गढ़ाकर चलता था बचपन में कि शायद कोई सिक्‍का पड़ा मिल जाए। सच बड़ा मजा आए।

Tuesday, February 27, 2007

हमार का करिबै नीलिमा......जबाब फागु की पिचकारी से

बालमुकुंद जब शिवशम्‍भु के चिट्ठे लिख रहे थे तो हिंदी पत्रकारिता की स्थिति कुछ कुछ वैसी ही थी जैसी आजकल हमारी चिट्ठाकारिता की है। उनके शिवशम्‍भु शिवबूटी छानकर अइसे मगन होते थे कि फिर काहे के लाटसाहब और काहे के कोई और। हम भी कुछ ऐसी ही पिनक में होते हैं बसंत में। और अइसा भी नहीं कि नीलिमा नहीं जानतीं कि हम अइसे हैं। भई आपके लिए होंगी नई हम तो तबसे जानते हैं जब नारी उत्‍थान मार्के की कविताई किया करती थीं, हमें लगत है कोई चौदह बरस हुई गए हुंगे.....नहीं नीलिमाजी। अरे भूल गईं ....वहीं बिट्स पिलानी ही तो रहा उ उ उ ओएसिस 1993। आप आईं अपनी कविताए लेकर और हम निकालत रही उ एक पत्रिका (कंपटीशन था भई)....। तो मतलब ई कि आप जानत तो थीं ही कि होली पर इसे नहीं छेड़ना है पर फिर भी आप नहीं मानीं। दे ही मारी पिचकारी सवालों की। अब भुगतो ....। देखि बुरा नहीं मानने का है ....वो क्‍या है होली है। और होली की उमंग हमसे बरजास्‍त नहीं होती।
पाठक लोग पहला सवाल की धार है
आपकी चिट्ठाकारी का भविष्य क्या है ( आप अपने मुंह मियां मिट्ठू बन लें कोई एतराज नहीं)
अब आप तो जानती हैं आपसे भी पैसे कई बार उधार लिए हैं हम। ये हिंदी कमबख्‍त हमारी माशूक है पीछा ही नहीं छोड़ती। सुनील दीपक जी पूछत रही कि इंजीनियरिंग काहे छोड़ दिए। अरे खब्‍ती रहे और क्‍या, और फिर छोड़े कब। इंजीनियरिंग में थे तो हिंदी हिंदी किया करते थे अब हिंदी में कंप्‍यूटर कंप्‍यूटर चिल्‍लाते हैं। ...हॉं तो क्‍या कह रहे थे। हॉं हिंदी... तो याद तो होगा ही आपको कि जब यूनिकोड ससुरा पईदा नहीं हुआ था तबहीं मैगजीन निकाले रहे हिंदी में ऊसका नाम रहिन 'ईत्रिका' और नारद उ ह तो ससुर हमार फांट का नाम रहि। फ्रीसर्वर पर थी बाद में डोमेन भी लिया पर का करिं बेरोजगारी अइसन पकरी कि अबहिं तक ना छोडि़। तो उह इत्रिका ओर उससे पहले xoom पर साहित्‍य, (इत्रिका के टाइटिल पर लिखा होता था हिंदी की पहली इंटरनेट पत्रिका) (ह ह ह जवानी में विश्‍व, सवसे पहले, ....कितना महत्‍व रखती हैं।) तो हम कहि रह हैं कि चिट्ठाकारी तो है ही वो चीज जिसके लिए हम हैं और तबसे इसके साथ हें जब ये होती ही नहीं थी पर सही वक्‍त पर सही जगह पर अनूपजी, जीतू भैया थे वे वो सब कर गए...अच्‍छा किया। हम भी अपना भर करेंगे...भारतेंदु वो ही सही हम शिवशम्‍भू ही सही। कभी कभी कंप्‍यूटर की पुरानी इत्रिका उत्रिका की फाइलें खोलकर देख लेते हैं...खुश होते हैं जो सोचा था कोई तो कर रहा है। और रही चिट्ठाकारी के भविष्‍य की तो सुनो वोह तो है आपके हाथ। मतबल ई कि नए लोगल को लाओ भविष्‍य बनाओ।
आपके पसंदीदा टिप्‍पणीकार।
आपहीं हैं और कौन। और किसी की तस्‍वीर में उह बात नहीं। वैसे एक प्रियंकर भैया रहिन पर ऊ रूसे हुए हैं। लजा लो लजा लो पर बुरा मानने की बात नहीं है्....होली है न।
तीसरा सवाल किसी एक चिट्ठाकार से उसकी कौन सी अंतरंग बात जानना चाहेंगे?
सभी व्‍यसनी चिट्ठाकारों से पूछन का है कि भैयन हमार तो चलो कोई बात एक तो हम सनके हुए हैं और घर-उर में सब लोगन को पहिले ही से ये मालूम रही फिर हमार जो घरआली हैं वो भी समझों कि इसे कैटेगरी की हैं जो जिआदा बुरा-उरा नहीं मानती। पर भैया लोग आप जो जी जान लगाकर खून फुंकर रहि हो...बहुत उमीद वुमीद तो नहीं रखे हो न। सवाल इह है कि कइसे मनाते हो भैया हमार भौजी लोग को..।


वह बहुत मामूली बात जो आपको बहुत परेशान किए देती है?
लो कल्‍लो बात। ससुरी बड़ी बात की तो औकात नहीं कि हम परेशान हों। अब नीलिमा की सादी हुई ...हुए हम परेशान...। बाजा आदमी होता तो बजीराबाद के पुल से छलांग लगा देता परेशानी में। नहीं भाई लोग हम परेशान नहींए होते। (हम तो पहिले ही कहे थे मान जाओ होली पर पंगा मत लो नहीं मानी...अब पता नहीं क्‍या क्‍या राज खुलेंगे आज।
आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत झूठ?
अरे ससुर की नाती...हमार जिंदगी ही हईगी खूबसूरत झूठ। सोचत हैं किरांति करेंगे....पता है झूठ है पर खुद ही खुद कहते हैं कि हमें यकीन है। तो ई रहा खूबसूरत झूठ।
अब देखो बुरा लगा होई तो होली पर हमारी गुंझिया भी खुदहिं खा लहीं। ओर हमार का करिबै।

Sunday, February 25, 2007

ब्‍लॉग मंडी में हमारा भाव......फर्जी है भई फर्जी है

भोला भाई ने बड़े भोलेपन से सुझाया कि हम जाकर मंडी में अपना बाजार भाव पता करके आएं। हम भी उसी भोलेपन से चले गए। और लीजिए जबाब हाजिर है।





ठीक है हम हिंदी वाले हैं और सारी दुनिया ऐसे सनकी लोगों को चंपक समझती है पर इतने भी नहीं हैं कि मात्र 12 लाख 130 डालर में बिक जाएं हुए ही कितने 48 रुपए से लगाएं तो 5 करोड़ 76 लाख......भई हमें अंडरवैल्‍यू किया जा रहा है। एक और साईट पर गए उनका कहना ये था

तो हमारा फैसला......फरजी है भाई सब फरजी है।