Sunday, April 08, 2007

....लोग भूल गए हैं

आज यानि 8 अपैल 2007 को जनसत्‍ता में ओम थानवी का एक संस्‍मरणात्‍मक लेख 'लोग भूल गए हैं' प्रकाशित हुआ है। विश्‍वकप से पहले गयाना देश की उनकी यात्रा के संस्‍मरण हैं, यदि यह अखबार उपलब्‍ध हो तो जरूर पढि़ए। लेख बड़ी तल्‍लीनता से उन्‍नीसवीं सदी में भारत से गए गिरमिटियों की जिंदगी पर नजर डालता है ओर इस बहाने ओम थानवी कुछ इन सवालों को खड़ा करते हैं-


क्‍या मैं उनके बर्ताव में भारतीयता खोज रहा हूँ ? भारतवंशियों को पराई जमीन पर किस चीज ने बांधे रखा ? कोई गयानी या सूरीनामी रहते हुए भी भारतीय हो सकता है ? चंद भारतीय मूल्‍यों का संवाहक। भारतीय मूल्‍य क्‍या हैं ? राष्‍ट्रीयता का जीवन मुल्‍यों से क्‍या संबंध है ? अमेरिका, कनाडा,अफ्रीका, यूरोप में बस गए भारतीय वहॉं के जीवन मुल्‍यों से ज्‍यादा जुड़ाव महसूस करते हैं या भारतीय संस्‍कृति से ?
जाहिर है जिन सवालों को ओम थानवी पूछ रहे हैं वे केवल उन्‍नीसवीं सदी के गिरमिटियों के सवाल नहीं हैं आज के प्रवासियों के भी सवाल हैं- जितेंद्र के, समीर के , सुनील दीपक, राकेश खंडेलवाल, पंकज और उन तमाम भारतीयों के भी जिन्‍होंनें अभी हिंदी चिट्ठाकारी को नहीं अपनाया है। मेरा सलाम इन सब को जो सात समन्‍दर दूर भारत रच रहे हैं।


डर्बन पहुँचे भारतीय मजदूरों का एक जत्‍था

Friday, April 06, 2007

हिंदी चिट्ठाकारी का अगला युग

इधर हिंदी चिट्ठाजगत में कुछ वैसा हो रहा है जैसा कि छायावाद के समय हिंदी साहित्‍य में हुआ, यानि अस्तित्‍व के सवाल से मुक्‍त होकर भविष्‍य के लिए निर्द्वंद्व रचनाधर्मिता शुरू हुई। द्विवेदीयुग वाली यह चिंता कि पता नहीं हिंदी (खड़ी बोली) रहेगी कि नहीं, रहेगी तो क्‍या स्‍वरूप रहेगा। इस तरह के सवाल अक्‍सर द्विवेदी युगीन कर्णधारों को दुखी करते थे पर छायावाद जो इन चिंताओं से तैयार जमीन पर ही खड़ा था पर इनसे अप्रभावित व अकुंठ था। उसने भाषा और संवेदना दोनों ही स्‍तर पर स्‍वतंत्रता का परिचय दिया। अब समकालीन हिंदी चिट्ठाकारिता पर सोचें- वह अपना एक निश्चित रूप ग्रहण करती चल रही है और नए चिट्ठाकार इस आशंका से ग्रस्‍त नहीं है कि कल हम हों न हों..। वे पहली दूसरी पोस्‍ट से ही विवादों में हाथ डालते हैं, जमे अधजमे लोगों पर अकुंठ टिप्‍पणी करते हैं, व्‍यंग्‍य करते हैं, पंगा लेते हैं, सवाल उठाते हैं, सफाई माँगते हैं। अच्‍छे संबंध से उन्‍‍हें गुरेज नहीं पर वे इसके लिए वे अतिरिक्‍त प्रयास करते नहीं दिखाई देते न ही उन्‍हें धमकी या धमकावलियों से कोई खास चिंता नहीं होती भाषा के स्‍तर पर भी वे अकुंठ हैं- जूते, जूतियाते हैं, चूतियापा करते हैं, गदा चलाते हैं, पीठ खुजाने, खुजवाने स्‍तर की दैहिकता भी आ ही गई है। कर्णधार भी अब अपना ऐतिहासिक महत्‍व स्‍वीकारते हुए इतिहास वर्णन की ओर अग्रसर हुए हैं। मतलब साफ है कि यदि संकेतों की ओर ऑंखें मूंदने के स्‍थान पर उन पर विचार किया जाए तो कुछ सवाल दिखाई दे रहे हैं -

1- क्‍या हिदीं चिट्ठाकारिता में युग परिवर्तन का समय आ गया है ?
2- नए युग की नई चुनौतियाँ क्‍या हैं ? पुराने चिट्ठाकारों ओर स्‍थापित संरचनाओं के लिए बदलाव से कौन सी नई चुनौतियाँ हाजिर हुई हैं?
3- और सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल यह है कि क्‍या हम इस नए बदलाव के लिए तैयार हैं- प्रौद्योगिकीय रूप से, भाषिक रूप से और चिट्ठासमाज की दृष्टि से?

ऊपर के पहले सवाल का जबाव इतना कठिन नहीं, बदलाव के चिह्न इतने स्‍पष्‍ट हैं कि
उनकी अवहेलना करना आसान नहीं। मसलन पिछले सप्‍ताह ही मुक्‍तक समारोह को इसलिए
स्‍थगित करना पड़ा कि सामग्री कि इस अधिकता के लिए हमारा नारद तैयार नहीं था, यूँ
भी रोज पचासेक नई पोस्‍ट के लिहाज से पहले पृष्‍ट पर बना रहना एक संघर्ष हो गया है,
जनसंख्‍या तेजी से बढ़ रही है जाहिर है अहं के टकराव भी बढ़ रहे हैं। बदलाव केवल
संख्‍या का ही नहीं है विषय भी बदले हैं, विवादमूलक विषय से परहेज समाप्‍त हुआ है।

अगर पुराने चिट्ठों के पुरालेख खंगाले जाएं तो हमें विवादों को लेकर अलग दृष्टि दिखाई देती है, अब विवाद श्रृंखलाबद्ध होते जा रहे हैं तथा एक ऐसेट की तरह देखे जाते हैं। विवादों को छोड़ भी दें तो भी राजनैतिक या अन्‍य विषयों पर तीखी
चिट्ठाकारी खूब दिख रही है। अभी भी महत्‍व तो व्‍यंग्‍य विधा का खूब बना हुआ है पर इसके विषयों में भी वैविध्‍य आ रहा है। शिल्‍प के स्‍तर पर बदलावों की आहट तो और भी स्‍पष्‍ट है- आडियो, वीडियो का पठ्य से योग बढ़ रहा है जो चिट्ठाकारिता की प्रकृति पर अपनी छाप छोड़ने के लिए आतुर है।

मुक्‍तक समारोह का स्‍थगन वह पहली चुनौती है जो नए युग की चिट्ठाकारिता के सामने आई है। यूँ भी कविता अब चिट्ठाकारिता की अहम विधा नहीं रह गई है। हमारे संसाधनों की सीमितता नारद के सामने हैव्‍स और हैव नॉट्स के सृजित हो जाने की चुनौती पेश कर रही है। पहले रेटिंग की जरूरत नहीं थी पर अब उसके बिना काम नहीं चल पा रहा, शायद अभी लेवल आदि के आधार पर कई सारे (उप)मुखपृष्‍ठ बनाकर इस समस्‍या को कुछ दिन तक सुलझाया जा सकता है यानि कविताओं का नारद, आपबीती का नारद, व्‍यंग्‍य का नारद और समाचार का नारद आदि पर अंतत: नारद को इस विशाल आकार के आगे संपादकीय भूमिका में आना पड़ेगा और यकीन जानिए वही घटना प्रीफेस टू लिरीकल बैलेड्स या पल्‍लव की भूमिका बनेगी या कहें युगांतरकारी होगी।
संपादकीय विवेक के आने का मतलब होगा कुछ पोस्‍टों को अन्‍यों की तुलना में चुनना वैसे मुझे लगता है कि इस स्थिति के लिए अनुमानत: 1000 चिट्ठों की जरूरत होगी लेकिन 1 से 500 में जितना समय लगा है 500 से 1000 में शायद उसका 10% ही लगेगा यानि से आसन्‍न स्थिति है दूरस्‍‍थ नहीं। चुनौतियॉं केवल स्‍थापित संरचनाओं यानि नारद, परिचर्चा आदि के ही सामने नहीं पुराने चिट्ठाकारों के भी सामने हैं- अब हर नए चिट्ठाकार के पास पहुँच उसे शाबासी के लिए पहुँचना संभव नहीं रह पाएगा उलटे संपादकीय विवेक की कैंची (जो कम से कम शुरूआती दिनों में इन पुराने चिट्ठाकारों के हाथ में ही रहने वाली है) से घाव करने पड़ेंगे। दूसरा प्रभाव विवाद शमन भूमिका पर पड़ने वाला है। नए चिट्ठाकार जिन्‍हें विवाद सफलता की सीढ़ी दिखते हैं उन्‍हें सलाहें नागवार गुजरेंगीं और एकाध बार अंगुलियाँ जलाने के बाद वरिष्‍ठ अंगुलिया विवादों के ताप से दूर रहने लगेंगी यूँ भी संपादकीय गमों से कम ही अवकाश होगा इनके पास।

अब सवाल रहा तैयारी का, संभव है अपरिवक्‍व सोच हो मेरी पर मुझे लगता है कि हम उतना तैयार नहीं हैं। तैयारी की अकेली कवायद जो मुझे दिखी वह है नए लोगों को जोड़ने की कोशिश- श्रीश सवर्ज्ञ देख रहें हैं कुछ नए चर्चाकार भी जुड़े हैं पर माफ कीजिए जब ‘ज्ञान’ की आँधी आएगी तो ये प्रयास मोह के तंबू के समान सिद्ध होंगे।
पहली आशंका तो यह है कि चिट्ठाकारी में मात्रात्‍मक विस्‍फोट होगा शनै: शनै: होने वाला बदलाव नहीं होगा। उदाहरण के लिए हिंदी प्रचार के एक छोटे से समूह से मैं जुड़ा हूँ और हमारी पहलकदमी से अगले सत्र में यानि अगस्‍त में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रचनात्‍मक लेखन, हिंदी कंप्‍यूटिंग और हिंदी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उनके कॉलेज में ही
कार्यशालाएं लगाकर हिदी ब्‍लॉग बनवाने की योजना है यानि एक-दो सप्‍ताह में 150-200 नए हिंदी ब्‍लॉग।

दूसरी ओर जरा एक अप्रैल वाले मजाक में छिपे खतरे पर विचार करें, उस पोस्‍ट की टिप्‍पणियों में ओर खुद पोस्‍ट में ही निहित है कि हम खतरे को महसूस करते हैं जब कोई साधन संपन्‍न यहाँ कब्‍जे की नीयत से आएगा तो हम अपना लाव लश्‍कर संभालेंगे तब तो लड़ लिए। मुझे लगता है कि हम अपनी नारद की अव्‍यवसायिकता के प्रण में थोड़ी लोच लानी चाहिए और नारद खुद ना सही पर एक मातहत
कंपनी लांच कर संसाधनों को जुटाना शुरू कर सकता है, अंतत: चिट्ठाकारी बाजार में घट रही परिघटना है। ‘सरस्‍वती’ की भूमिका से उसे निकल आना चाहिए और कुछ कुछ ‘हँस’ की भूमिका में आना चाहिए। ये विचार बेहद कच्‍चे और अस्‍वीकार्य हो सकते हैं पर कम से कम इतना तो रेखंकित करते ही हैं कि इन्‍हें खारिज कर इनके स्‍थान पर इनसे बेहतर विचार रखने की जरूरत है।

Monday, April 02, 2007

प्रत्‍यक्षा की रसोई और कालिखजीवी की कुरूपता

पिछले कुछ अरसे में कई हार्ड डिस्‍क क्रैश हुईं, विन्‍डोज बदलीं, रीइंस्‍टाल की, कंप्‍यूटर अपग्रेड किया, ओपेरा व एक्‍सप्‍लोरर के बीच दोलन किया, और इन सब बदलावों के बीच बहुत सा डाटा पाया-खोया पर अगर नहीं बदला तो हमारे बुकमार्क या फेवरेट की सूची के दो नाम एक लाल्‍टू और दूसरा प्रत्‍यक्षा। दोनों का ही लेखन ताजगी भरा है हालांकि खुद मेरी ही तरह यह अनियमित किस्‍म का लेखन है! लाल्‍टू घोषित तौर पर बदलाव का लेखन करते हैं प्रत्‍यक्षा ऐसी किसी घोषणा के पचड़े तक मे नही पड़तीं, एकाध बार उनके अतीतमोह आदि पर हमने टिप्‍पणी की भी है पर कुल मिलाकर ईमानदारी वह चीज है उनकी चिट्ठाकारी की विशेषता है। यह भूमिका इसलिए कि मेरे शायद अतिउत्‍साह के कारण हाल की एक चिट्ठाई हिलोर के चपेटे में वे आ गईं।
यह अति उत्‍साह उपजा दो पोस्‍टों से। एक तो मनीषा ने सुंदरता के कीड़े का विमर्श मोहल्‍ले मे प्रस्‍तुत किया दूसरा नोटपैड ने अपने चिट्ठे पर रसोई की शोषणमंडनकारी संरचना पर विचार प्रस्‍तुत किए। बाद में एक प्रतिक्रियात्‍मक पोस्‍ट निर्मलआनंद पर अभय ने प्रस्‍तुत की। थोड़ा बहुत टिप्‍पणी द्वंद्व दोनों जगह पर हुआ मुझे अपने पक्ष के लिए बाकायदा कालिखजीवी घोषित किया और इस टिप्‍पणी को अभय ने निर्मल आनंदमयता के साथ इस जगह रहने दिया। खैर ये सब आश्‍चर्यजनक नहीं और मेरा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं कि सृजनशिल्‍पी ऐसा कर करा रहे होंगे पर विचार और व्‍यक्तिगत की रेखा को लुप्‍त करने जो जिद उन्‍होंने पाली, विचार के स्‍थान पर व्‍यक्तिगत के संवाद का केंद्र बनने का कारण वही है और यह आचार संहिंताओं से नहीं थमता, अब लीजिए यहाँ तो आचार संहिता के वकील ही ऐसा करने पर उतारू हैं।

अस्‍तु, वास्‍तविक जगत में भी जब भी मैने सुंदरता और रसोई को गैर बराबरी की संरचनाओं के रूप में देखे जाने के पक्ष में कहा है, उसे अतिवादी या उपहास योग्‍य ही माना गया है। विश्‍वविद्यालय में ‘कुरूपता के इतिहास’ का गुमटी-विमर्श पेटेंट मेरे नाम माना जाता है। हमें सदैव दिखाई दिया है कि जैसे जैसे शोषण संश्लिष्‍ट होता जाता है उसका स्‍वरूप सूक्ष्‍म होता जाता है और उसका स्‍थायित्‍व बढ़ता जाता है और
परिणति इस बात में होती है कि शोषण्‍कारी व्‍यवस्‍था इतनी संस्‍थाईकृत हो जाती है कि पीडित इसमें गौरवान्वित महसूस करना आरंभ करता है।

सौदर्य पर विचार करें। मेरी पत्‍नी कॉलेज शिक्षिका बनने से पहले दिल्‍ली एक बहुत प्रतिष्ठित स्‍कूल में शिक्षिका थीं जो एयरफोर्स वाईव्‍स ऐसोसिएशन द्वारा संचालित था और उसके कार्यक्रमों में हैरानी होती थी कि इन अधिकारियों की पत्नियाँ‍ लगभग सदैव इतनी ‘सुंदर’ क्‍यों होती हैं फिर अनुभव ने बताया कि IAS, IPS ही नहीं वरन हर किस्‍म के सामर्थ्‍यवान के पहलू में सुंदर बसता है, मनीषा ने इसकी और व्‍याख्‍या और उदाहरण पेश किए हैं कारण समझने के लिए किसी जहीनता की जरूरत नहीं है, शक्तिशाली चुनने की स्थिति में होता है और वह ‘सुंदर’ को चुनता है इस बात को पुनर्बलित करते हुए कि सौंदर्य स्‍त्रीत्‍व का वह गुण है जो जिसका मूल्‍य काफी ऊंचा है। यह समाजीकरण होते होते समाज का स्‍थाई मूल्‍य बन गया है। इसीलिए सामान्‍यत ऐसे कहा जाता सुनाई देता है कि सुंदर दिखने की इच्‍छा तो स्‍वाभाविक है। अब यूँ तो समाज महिलाओं को सत्‍ता पाने ही कितनी देता है पर जो कुछ उसके हिस्‍से में आता है उसका उनमें वितरण जिन आधारों पर होता है उनमें सबसे प्रमुख है सौंदर्य। जो लोग सौंदर्य के कथित बाहरी और आंतरिक होने की डाक्ट्रिन को प्रतिपादित करते हैं वे इस सत्‍ता संरचना का अतिक्रमण नहीं कर रहे होते वरन उलटे इसे और संश्लिष्‍ट बना रहे होते हैं, और सूक्ष्‍म और स्‍थाई।

दूसरी अपेक्षाकृत अधिक मूर्त संरचना वह है जिसका उल्‍लेख नोटपैड ने किया- यानि रसोई। पर पहले बेनाम शिल्‍पी महोदय समझें और फिर से अपने डाटा पर नजर डालें नोटपैड मेरी पत्‍नी नहीं हैं और न ही उनके अंतरजालीय व्‍यवहार पर मैं नजर गड़ाए रहता हूँ, वे जब स्‍कूली बच्‍ची थीं तब से उनसे इस और इस तरह के अन्‍य विषयों पर चर्चा होती रही है और अब इस विषय पर शोध करने के बाद हमसे कहीं अधिक समझ चुकने के बाद हमें सीधे-टेढ़े रास्‍ते से समझा देती हैं।
अस्‍तु, रसोई कार्य विभाजन का एकदम मूर्त ढांचा है, जिस प्रकार बृहत स्‍तर पर सत्‍ता का वितरण सौदर्य के आधार पर होता रहा है उसी प्रकार एक परिवार में यह सत्‍ता समेटकर रसोई तक सीमित हो जाती है इसीलिए जब एक से अधिक महिलाएं एक घर में हों तो उनका समस्‍त संघर्ष रसोई पर अधिकार को लेकर होता है और जिन परिवारिक मूल्‍यों को कई मित्र इतना पवित्र मानते हैं, उनमें भी रसोई का बंटवारा ही घर का बंटवारा माना जाता है। पहले वर्णित संश्‍लेषण और सूक्ष्‍मीकरण की प्रक्रिया से गुजरकर इसके साथ जोड़े जाते हैं संतुष्टि और गरिमा के मूल्‍य। अभय को इसमें कोई महक, सृजनशीलता...आदि दीखती है तो इसमें उन्‍हें दोष नहीं दिया जा सकता क्‍योंकि इस संरचना में विद्यमान शोषण के स्‍थायित्‍व का स्रोत यही आत्‍मसातीकरण ही तो है। फिर भी प्रत्‍यक्षा को जब यह रचनात्‍मकता की कसौटी दिखाई पड़ता है तो त्रासद तो है ही। इतना कहने के बाद भी व्‍यक्तिगत तौर पर मुझे प्रत्‍यक्षा के इस तर्क की सराहना करनी पड़ेगी कि एक पुरुष किसी स्‍त्री पसंद को शोषण की किस्‍म बताए यह (मेल शोवेनिज्‍म़) अनुचित है ठीक शायद वैसे ही जैसे सुनील दीपक की एक पोस्‍ट में बुरके को अन्‍यों द्वारा शोषण का प्रतीक बताते हुए उन्‍हें हटाने पर विवश करने को अनुचित मानने का संकेत किया गया था। रसोई हो सकता है आपको शोषण संरचना न लगती हो पर रचनात्‍मकता, गंध, संतुष्टि, गरिमा, स्‍त्रीत्‍व जैसे वायवीय तर्क मत दीजिए । और हाँ- संतोष ने पूरी बनाई, अभय ने सब्‍जी गर्म की या मसिजीवी ने सालन छौंका इनकी वर्णनयोग्‍यता ही यह तय कर देती है ये इस संरचना का अतिक्रमण नहीं, केवल पुष्टिकरण है।

Monday, March 26, 2007

विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन 2007 : छा जाओ चिट्ठाकारो

एक मित्र मिले, पत्रकार हैं हमारे अनुजवत् हैं उन्‍होंने हमें सूचना दी कि अगला विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन न्‍यूयार्क में 13-15 जुलाई को हो रहा है और वे सरकारी प्रतिनिधि की हैसियत से उसमें भागीदारी करेंगे। सम्‍मेलन भारतीय विद्या भवन और अन्‍य कई संस्‍थाओं के सहयोग से विदेश मंत्रालय कराता है और जुगाड़-सेटिंग वगैरह वगैरह की सारी कलाबाजियॉं इसमें होती है और हम पहले से भी इससे खासे वाकिफ़ हैं लेकिन अभी इतने सिनीकल नहीं हो पाएं हैं कि कोई आशा ही न रखें।
तो भैया लोग हम तो इसे हिंदी चिट्ठाकारी के लिए सही मौके की तरह देख रहे हैं।
अमरीका और कनाडा के वे चिट्ठाकार जो 13-15 जुलाई के बीच 27वीं स्‍ट्रीट 7वाँ ऐवेन्‍यू न्‍यू यार्क पहुचने की जहमत और खर्चा उठा सकते हों (या सरकारी खर्चे का जुगाड़ कर सकते हों) कृपया करें। और जोर शोर से हिंदी चिट्ठाकारी की बात वहाँ उठाएं। हमने पिछले दिनों एक नेशनल कांफ्रेंस में हिंदी चिट्ठाकारी पर परचा पढ़ा था इसलिए काफी सामग्री इसके सिद्धांत, पहचान और भाषा वगैरह पर तैयार है और भी परिश्रम कर आपके मतलब की सामग्री आपको देने के लिए तैयार हैं। इन मित्र को तो हम खैर पूरी तरह तैयार करके भेजेंगे ही। जितने हो सकें चिट्ठाकार वहाँ रहें और संभव हो तो एकाध सत्र या परचा इस विषय पर जुटा लें, हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अच्‍छा रहेगा। और भी योजनाएं बनाई जा सकती हैं।पत्रकार-चिट्ठाकार भी काफी सहयोग कर सकते हैं।तो अविनाश, मिर्ची सेठ, समीर भाई और अन्‍य चिट्ठाकारो गाड़ दो झंडे....

Sunday, March 25, 2007

निठारी के बाल-बोटी कबाब और मेरी बिटिया का चिकेन

कहा गया कि मसिजीवी व्‍यक्तिगत स्‍वतंत्रता के पक्षकार हैं, मुझे खुद भी यही लगता रहा है कि अपने व्‍यवहार को तय करने की आजादी हर शख्‍स को होनी चाहिए और अपने क्रियाकलापों की जिम्‍मेदारी भी उसकी ही होती है। इसलिए लोगों की खानपान, साफ-सफाई, वेशभूषा आदि पर टिप्‍पणी करने और नाक-भौं सिकोड़ने से यथासंभव बचता हूँ। और अपने विषय में ऐसे ही व्‍यवहार की उम्‍मीद भी करता रहा हूँ। दरअसल हमने तो एक ब्‍लागर की प्रोफाइल में ‘पत्‍नी द्वारा बाथरूम में वाइपर लगाने के लिए विवश किए जाने’ से व्‍यक्‍त परेशानी अपनी श्रीमतीजी को दिखाकर बताया कि देखो हम ही ऐसे नही हैं- इस तरह की टोका टोकी से परेशान और भी हैं।


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कोई मुर्गा खाए कि मछली या सूअर यह उसका चयन है और होना चाहिए। जाहिर है यही मानकर बड़े हुए, खुद भी शाकाहारी हैं तो सिर्फ इसलिए हुए कि ये हमारे घर का डिफाल्‍ट डिसीजन था, और जब इतने बड़े हुए कि खानपान को बदल सकें तब तक आदत पड़ चुकी थी। इतना जरूर रहा कि माँस खाना या न खाना श्रेष्‍ठता या हीनता का बोधक नहीं लगा। जब वीर सांघवी ने जोर देकर बताया कि कोबे बीफ एक लजीजदार व्‍यंजन है तब भी हम कतई आहत नहीं हुए ऐसे ही जब एक मुस्लिम मित्र ने जब सहज ही गौमाँस के अपने अनुभव बताए तो उन्‍हें कतई यह नहीं लगा कि हम इससे आहत हो सकते हैं...हम हुए भी नहीं।
किंतु क्‍या हमें माँस हमें कोई एक और अन्‍य भोज्‍य पदार्थ लगता है...सच यह है कि नहीं। शायद कोई भी शाकाहारी यदि ईमानदार है तो मानेगा कि माँस न खाने का निर्णय बैंगन पसंद न होने के निर्णय से अलग है। इसमें छिपी अनछिपी नैतिकता शामिल है। भले ही आदमी हम जैसा खुदा निरपेक्ष ही क्‍यों न हो।


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हमारे एक मित्र कहीं अधिक ‘मिलीटैंट शाकाहारी’ हैं पेशे से एक प्रसिद्ध दर्शनशास्‍त्र अध्‍यापक हैं और व्‍यवहार से लोकतांत्रिक। अब ये हुआ डैडली मिक्‍स। हमने जब बताया कि बच्‍चों की प्रोटीन आवश्‍यकता की पूर्ति के लिए हम एकाध बार के. एफ.सी. ले जा चुके हैं तो वे लगभग तुरंत ही चिंहुक उठे। हमने कहा भई वे खुद निर्णय लेंगें मैं तो केवल विकल्‍प उपलब्‍ध करा रहा हूँ। फिर उन्‍हें इस्‍लाम के प्रकृति के मनुष्‍य के लिए होने के का भी वास्‍ता दिया...थोड़ी ही चर्चा के बाद मैनें अचानक अनुभव किया कि मैं तो अपने बच्‍चों के माँस का निवाला निगलने की कुछ कुछ सफाई सा देने लगा था...क्‍यों भला ?


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दर्शन में एंथ्रोपोसेंट्रि शाखा वह मानी जाती है जिसमें चिंतन के केंद्र में मनुष्‍य होता है तथा एक तरह से मनुष्‍य की अन्‍य प्राणी जगत पर श्रेष्‍ठता को न्‍यायोचित माना जाता है। बकौल हमारे दार्शनिक मित्र, इस दर्शन शाखा का पिछले दो-तीन दशकों से बैंड बजा हुआ है। मनुष्‍य को चिंतन के केंद्र से हटाने के बाद ही वन्‍य प्राणी संरक्षण, पशुओं पर अत्‍याचार का विरोध, मानवाधिकार और जाहिर है शाकाहार को चिंतन की जमीन मिल पाती है।.....पड़ोसी मुर्गा खाए-उसका पैसा है और उसकी ही नैतिकता....पर चूंकि हमारा तादात्‍मय मुर्गे की चीख से होता है इसलिए हमें असहज होना चाहिए। वरना निठारी में सुरेंद्र कोली और पंढेर के हाथों बच्‍चों की बोटियों के कबाब बनाकर खाने को भी हमें उनका ‘व्‍यक्तिगत खानपान’ और अपराध का सवाल मानकर छोड़ देना चाहिए (इस तर्क ने मुझे क्रोध और तार्किक असहायता की स्थिति में ले जा खड़ा किया क्‍योंकि वाकई हम केवल मनुष्‍य के माँस को लेकर ही ऐसी वितृष्‍णा क्‍यों अनुभव करते हैं ? ...सिर्फ एंथ्रोपोसेंट्रिज्‍म ही तो है)। बच्‍चों ने माँस केवल चखा है अभी, पसंद नहीं करना शुरू किया, थामूँ तो थम सकते हैं....थाम लूँ क्‍या।

Saturday, March 24, 2007

ढीली अदवायन की खाट और खचेढ़ू चाचा

लीजिए जब मिला है तो छप्‍पर फाड़ के मिला है। मतलब वक्‍त...। कहॉं लोग काम न होने के मानसिक तनाव में जी रहे थे और हम बेतरह सुलग रहे थे क्‍योंकि काम के बोझ में दबे थे अब देखिए कैसा वक्‍त बदला है, एक तो देश की टीम ने कृपा की, समीर के तमाम दिलासों के दरकिनार कर घर वापस आ रही है अपने जीवित कोच के साथ। यानि कि अब हमारी रात अपनी है...ऑंखे फोड़ मैच देखने से बचे। दूसरा 23 तारीख आकर गई हमने विद्यार्थियों के एसाइनमेंट्स को अंकम् पुष्‍पं प्रदान कर दफ्तर दाखिल कर दिया है और अब तीन महीने तकरीबन छुट्टी है, तकरीबन इसलिए कि परीक्षा के ढक्‍कन किस्‍म के काम अभी भी करने होंगे पर वे न तो ज्‍यादा समय लेते हैं न ही किसी किस्‍म मानसिक शिरकत की उम्‍मीद ही रखते हैं, परीक्षा देते अपने ही विद्यार्थियों की चौकीदारी है....हो जाएगी।
हमारा वक्‍त बीतेगा खचेढ़ू चाचा के साथ। अब जब वक्‍त है ही तो क्‍यों न आपकी भेंट खचेढ़ू चाचा से करा दी जाए...न न मेरे चाचा नहीं हैं या कहें कि वे सिर्फ मेरे चाचा नहीं हैं वरन वे तो मेरे चाचा के भी, मेरे भी और बच्‍चों के भी चाचा हैं यानि वे दरअसल जगतचाचा हैं। अगर आप खचेढ़ू चाचा को नही जानते तो ये दुर्भाग्‍य है और भगवती चरण वर्मा के हीरोजी की तर्ज पर कहें तो दुर्भाग्‍य खचेढ़ू चाचा का भी है कि वे एक और अपने मुरीद से मिलने से वंचित रह गए।
खचेढ़ू चाचा दिल्‍ली के गॉंव गढ़ी मेंडू (दिल्‍ली के निवासी ध्‍यान दें कि यह गॉंव यमुना खादर में बजीरावाद के दूसरे किनारे पर स्थित है) के बाशिंदें हैं और हर चीज नाचीज़ पर वे अपनी मुख्‍तलिफ राय रखते हैं मसलन कल उन्‍होंने ढीली अदवायन की खाट पर धँसे धँसे ये राय व्‍यक्‍त कीं-
बाबरी मस्जिद मामले में दरअसल गॉंधी परिवार ही शामिल है। ये जो कहते हैं कि बाबरी मस्जिद ढहा दी , निरे बाबले हैं। अरे वह तो सोनिया गॉंधी ने चुपचाप एक जहाज पर लदवाकर दिल्‍ली मँगवा ली थी और गढ़ी गाँव के पास छुपाई हुई है। वो तो लोग ज्‍यादा बोलने लगे तो बचवा राहुल को कहना पड़ा कि उनका कुनबा ही तारनहार है। .....
ओर भी काफी कुछ कहा उन्‍होंनें ..पता नहीं सच कि झूठ, अब हम क्‍या करें हम तो रोज ही खचेढ़ू चाचा से मिलेंगें...मजबूरी है।

Sunday, March 18, 2007

कमबख्‍त 23 तारीख भी नहीं आती.....

रवि रतलामी जी ने कहीं मर्फी के नियम गिनाए थे उनमें ही यह भी जोड़ लेना चाहिए कि दुनिया मे तभी सबकुछ घट रहा होता है जबकि आपको दम मारने की भी फुरसत न हो।
अब देखिए न रात काली कर अपनी टीम को कमजोर पड़ोसी से दुरदुराया जाता देखें कि उन एसाइनमेंट को जॉंचे जिनका पहाड़ सर पर खड़ा है। ऊपर से इस चिट्ठाजगत मे मार लगी हुई है। मुखौटों तक से डर व्‍याप्‍त है, आचार संहिता बनी, अखबार मे छपास हुई, कुछ छपा कुछ नहीं, और तो और अविनाश ने घोषणा की कि उनकी नौकरी ही खतरे में पड़ गई है। लगता है NDTV ने ‘ऐसाइनमेंट’ पूरा करने की जो डेडलाइन दी थी वो निकली जा रही है और कुछ खास हो नहीं पा रहा है, वैसे उनका तो कहना है कि कोई एसाइनमेंट नही है भैया । इधर कमबख्‍त 23 तारीख भी नहीं आती.....23 इसलिए कि ये विश्‍वविद्यालय का अंतिम शिक्षण दिवस होता है फिर अनूपजी की भाषा में कहें तो हम भी खूब मौज ले पाएंगे। तब तक आप मौज लीजिए हम भी जब तब झांक लेंगे।

Friday, March 16, 2007

मुड़ के देखें Y2K को, उर्फ मिलना पुरानी प्रेमिका से

चूंकि मुखौटेबाजी काफी हो चुकी तो सोचा क्‍यों न देखा जाए कि कुछ पहले जब भविष्‍य की चिंता करते थे तो कैसा होता था। ये लेख मैंने नवम्‍बर 1998 में लिखा था और यह इत्रिका के प्रवेशांक (जनवरी 1999) का संपादकीय बना था। उस समय Y2K की संमस्‍या पर खूब चर्चा होती थी। मित्रो इत्रिका इंटरनेट पर पत्रिका निकालने का मेरा प्रयास था। उस समय यूनीकोड नहीं था और यह लेख भी अमर फांट में था इसे रूपांतर की मदद से यूनीकोड किया गया है।


'वाई २ के साहित्य' समस्या ....

२१वीं सदी का आरंभ केलेंडर बदलने भर से कुछ अलग है। नई सहस्त्राब्दी का आरंभ मानव सभ्यता के लिए एक अत्यंत चुनौतीपूर्ण क्षण है। कंप्यूटर जगत की सबसे ज्वलंत समस्या तो २१वीं सदी का पहला क्षण स्वयं है। समझा जाता है कि यह क्षण इस क्षेत्र विशेष की प्रगति के समक्ष विशालतम चुनौती है इसे वे वाई २के समस्या कहते हैं । हमारे वर्तमान प्रधानमंत्री ने इसी संदर्भ में वाई २ के पी.ई. समस्या का उल्लेख किया है अर्थात वर्घ् २००० राजनैतिक-आर्थिक समस्या। आशय है कि नई सहस्त्राब्दी के आगमन को मानव सभ्यता का प्रत्येक क्षेत्र एक संकट के रूप में देखता है। कला विशेषकर साहित्य भी इससे अछूता नहीं है। आशय यह है कि वाई २-के साहित्य एक यथार्थ है और इससे आखें मूँदी नहीं जा सकती।
वैसे तो साहित्य जगत चिंता प्रधान लागों का जमावडा ही होता है उसे वर्तमान और भविष्य की कमीज, पैंट, चाय-कॉफी, खांसी-जुकाम सभी में विघटन के संकेत दिखते हैं लेकिन इधर कुछ दिनों से साहित्य पर मंडरा रहे संकट की बात कुछ अधिक ही की जा रही है। साहित्य की गरिमा, शुचिता, स्वरूप पर मंडरा रहे इस संकट को उत्‍तरआधुनिकता, बाज़ारवाद अपसंस्कृति की शब्दावली में पहचाना जाता है। पर इसे नकारा भी नहीं जा सकता की कुछ बदलाव अवश्य हो रहे हैं यह बात दीगर है कि इसे संकट माना जाए या अवसर।
साहित्य की परंपरा का आरंभ श्रुति परंपरा से होता है फिर लिपि का अविष्कार उसमें एक महत्वपूर्ण मोड़ रहा है । हमारे साहित्य की दृष्टि से एक अत्यंत क्रांतिकारी मोड़ उन्नीसवीं सदी में आया जब छापेखाने का अवतरण हुआ। यह परिवर्तन एक प्रौद्योगिक घटना मात्र नहीं था यह एक बड़ी साहित्यिक घटना भी थी वह इस मायने में कि प्रेस ने साहित्य को प्रसार दिया और इस प्रसार ने लेखक को मुक्ति प्रदान की। सामंत पर उसकी निर्भरता समाप्त हुई और जन से जुड़ाव शुरू हुआ। साहित्य के इस सार्वजनीकरण ने साहित्य को संवेदना और रूप दोनों स्तर पर प्रभावित किया । जहाँ नए-नए विषयों पर रचना प्रारंभ हुई वहीं उपन्यास,कहानी, नाटक आदि नई-नई विधाएं साहित्य जगत में उभरीं । आशय यह है कि छापेखाने का अवतरण स्वयं में एक प्रौद्योगिक घटना होते हुए भी साहित्य जगत के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ था। इसने पाठक, लेखक परंपरा के रूप में साहित्य को एक नया आयाम प्रदान किया। शब्द की शक्ति खुल कर सामने आई। बीसवीं सदी का अंत साहित्य जगत में एसे ही एक अन्य मोड़ पर है।
राज्य के स्थान पर बाज़ार का केन्द्रिय नियमनकारी शक्ति हो जाना एक राजनैतिक आर्थिक घटना हो सकती है सूचना, संचार और मीडिया के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति एक प्रोद्यौगिक घटना है अवश्य मध्यमवर्ग का विशालतम वर्ग होना एक सामाजिक प्रवृघि है किंतु ये आर्थिक, राजनैतिक सामाजिक और प्रौद्यौगिक परिवर्तन साहित्य से असंपृक्त नहीं है मीडिया के चलते सृजन का सार्वजनिकरण हुआ है। और यह प्रैस द्वारा किए गए सार्वजनिकरण से कहीं अधिक है। आशय यह है कि नई सदी की प्रौद्योगिक, राजनैतिक, आर्थिक स्थितियों में साहित्य को एक नई वाई-२के स्थिति में ला खड़ा किया है। अंतर यह है कि यह परिवर्तन प्रैस की तुलना में अधिक औचक है, सिर पर एकदम सवार है और साहित्य जगत कम से कम हिंदी साहित्य जगत इसके लिए तैयार नहीं है। इसलिए उसे परिवर्तन, यह अवसर संकट जान पड़ता है। चूंकि उघरआधुनिकता का फ़ज़ी लॉज़िक उसे जंजाल जान पड़ता है और और साहित्य का नया सलीका उसे बेतुका जान पड़ता है। शब्द के साथ दृश्य व श्रव्य का जुडाव़ उसे अपसंस्कृति जान पड़ती है । यानि कुल मिलाकर सारा आंगन ही टेढ़ा है ।
वाई २के साहित्य अन्य क्षेत्र की वाई२के समस्या की भांति किसी संधि या संक्रमण काल की सुविधा नहीं देता अत: साहित्य के सुधी कर्मियों को गंभीरता से यह विचार करना कोगा कि प्रलाप एवं विलाप यदि आवश्यक है तो उसे समानांतर चलने दें किंतु उससे भी अधिक आवश्यक है साहित्य जगत को तैयार करना ,बदलती स्थितियों से अनुकूलित करना, और उसमें वह जिजीविषा व प्राणवायु फूंकना जिससे वह ४० चैनलों के दूरदर्शन पर साहित्य की गुंजाइश को खोज सकें इंटरनेट के महासमुंद्र में साहित्य का लाइट-हाउस को चिन्हित कर सकें ताकि साहित्य की यह परंपरा अगली पीढी को संग्रहालयों में नहीं जीवंत एवं अधिक विकसित रूप में मिले जहां वे इस विकास को अपने इतिहास में प्रैस की ही भांति एक अवसर के रूप में जाने समझें जिसका पूरा लाभ हमारी पूरी पीढ़ी ने उठाया

Thursday, March 15, 2007

....मुझे मुखौटा आजाद करता है

चिट्ठाकारी में कविताएं खूब चलती हैं, कई बार तो चिट्ठाचर्चा तक कविताई में हो जाती है....कारण कोई बहुत गंभीर नहीं सिर्फ इतना है कि उसमें टाईप कम करना पड़ता है। खैर हम आज आपको कहानी सुनाएंगे।

ये कहानी एक अलग दुनिया की है। ये दुनिया रीयल तो नहीं है लेकिन विश्‍वास करें रीयली यह दुनिया है। इस दुनिया के बहुत से दरवाजे हैं और हर दरवाजे का एक अंधकारमय रास्‍ता है, वह इसलिए कि जब आप इस अंधकारमय रास्‍ते से गुजरें तो आप कोई एक मुखौटा पहन लें। ये आप अपनी मर्जी से चुन सकते हैं और पसंद न आए तो बदल भी सकते हैं, मुखौटों के चेहरे पर लगते ही आप बस एक मुखौटा हो जाते हैं। लोग इस दुनिया में इसलिए जाते हैं कि ये मुखौटे इस दुनिया के वासियों को आजाद करते हैं। आप इन मुखौटों को पहनकर वह सब कर सकते हैं जो करना चाहते थे पर कर नहीं पाते थे और अक्‍सर दिखाते थे कि आप ऐसी कोई चाहत नहीं रखते, मसलन चलते चलते आपका अक्‍सर मन करता था कि चीख कर कहें कि आप खुश नहीं हैं, आपका पति आपको पीटता है...या आप अपनी पत्‍नी को पीटते है...लेकिन जाहिर है ऐसा नहीं कर पाते थे। यह नई दुनिया खूब पसंद की गई, लोग इसमें आते घंटों घूमते मन भर की बातें हरकतें करते...बाद में मुखौटा उतारकर घर चले जाते। वे खुश थे....दुनिया खुश थी।

फिर कुछ ऐसा हुआ कि एक दिन एक मुखौटाधारी को इस दुनिया के, मतलब मुखौटों की दुनिया के ब्रह्मा के खिलाफ कुछ कहते सुना गया। पता नहीं किसने कहा था, मुखौटे के कारण पहचाना नहीं जा सका, क्‍या किया जाए। ब्रह्माजी गुस्‍सा पीकर रह गए। पर उन्‍होंने एक बड़े लाउडस्‍पीकर पर चिल्‍ला चिल्‍लाकर कहा कि खबरदार किसी ने यह सब कहा तो...नहीं चलेगा। आखिर हमने इतनी मेहनत से ये दुनिया बनाई है..ऐसा नही कहो। दुनिया के कई पुराने बाशिंदे जो हमेशा एक ही मुखौटा लगाते थे तुरंत मान गए। पर अब ऐसी घटनाएं बढ़नी लगीं.....ब्रह्मा और कई उनके चेले चपाटे इस बात से दुखी हो गए कि कोई उनकी खड़ी की गई दुनिया में आए और जो मन में आए वह बोले ये तो ठीक नहीं....
इलाज पहले तो ये निकाला गया कि ये लोग जिस तिस के पास जाते और मुखौटे को उठाकर चेहरा देखते ताकीद करते, धमकाते।

लेकिन इसका उलटा असर हुआ...जिनके चेहरे से मुखैटा हटाया जाते उन्‍हें बुरा लगता....वे या तो इस दुनिया में आना बंद कर देते। या अगली बार मुखौटा बदल देते।
दुनिया के उजाड़ होने का भी खतरा था पर यहॉं तो कुछ नया ही हुआ कि....दुनिया के सभी दरवाजों पर एक बोर्ड लगाया गया कि अब से 'इस दुनिया में मुखौटा लगाकर प्रवेश वर्जित है'।

मित्रो, कहानी यहीं समाप्‍त हो जाती है। पर दुनिया जारी रहती है। मैं चिट्ठाशास्‍त्र की बात इतनी शिद्दत से इसीलिए कर रहा था इतने दिनों से। कृपया इस बात का सम्‍मान कीजिए कि यहाँ इस चिट्ठाकारी की दुनिया का दस्‍तूर ही है कि यहाँ मुखौटा लगाकर रहा जाता है...मुखौटा यहाँ का अजूबा नहीं है। इसलिए इस पोस्‍ट को अवश्‍य पढ़ें



‘भाया, अगर नकाब पहनकर कुछ भी कहना है तो बहुत आसान है। पर्दे के पीछे अगर आप किसी को गाली भी दोगे तो कोई भी आपका कुछ नही बिगाड़ सकेगा। इसलिए जो कहना है, सामने आकर कहो। ये परिवार सबकी सुनता है, सारे निर्णय सामूहिक होते है।‘
इन अभिव्‍यक्तियों में दिक्‍कत है। जिसे नोटपैड (.....मुझे लगता है परिवार वाली अवधारणा मे ही दिक्कत है. पहले हम परिवार बनाएगे फिर सास-ससुर,जेठ-जेठानी,ननद-बहनोई भी पैदा होगे ही.तब तो हमारा यह परिवार बन जाएगा" कहानी घर घर की"....!! ) व अनुपम ने दर्ज किया है और ठीक किया है।
ध्‍यान दें कि खतरा यह है कि यदि आप इसे वाकई मुखौटों से मुक्‍त दुनिया बना देंगें तो ये दुनिया बाहर की ‘रीयल’ दुनिया जैसी ही बन जाएगी – नकली और पाखंड से भरी। आलोचक, धुरविरोधी, मसिजीवी ही नहीं वे भी जो अपने नामों से चिट्ठाकारी करते हैं एक झीना मुखौटा पहनते हैं जो चिट्ठाकारी की जान है। उसे मत नोचो---ये हमें मुक्‍त करता है।


और हाँ मेरी बेटी की एक्टिविटी बुक में कई सारे मुखौटे बने हैं, जिन्‍हें रंग करना, पहनना उसे बेहद पसंद है। देखिए मेरा फैमिली फोटो




(ये समुद्री डाकू मैं हूँ, शेरनी स्‍वाभाविक है श्रीमतीजी हैं, सुदर राजकुमारी हमारी बिटिया श्रे... है और डोनाल्‍ड हमारा बेटा प्र... रास्‍ते में मिले तो पुचकार देना...कहना आप उसके पापा के दोस्‍त हैं।)

Wednesday, March 14, 2007

....क्‍योंकि हर पाठ उत्‍पाद है।

मैं इस कथन के निहितार्थ और चिट्ठाकार मित्रों की संभावित प्रतिक्रिया से वाकिफ हूँ। आप पढ़ेंगे और हँसेंगे- अमाँ ये मसिजीवी बिला शक अहमक है, पूछों कि पाठ उत्‍पाद कब नहीं था। तुलसी कबीर की ग्रंथावलियां बिकती हैं और राजकमल के महेश्‍वरी लाला मानें या न मानें पर ठीक ठाक बिकती हैं। स्‍कूल के पाठ और पाठ्यपुस्‍तक बिकती हैं। अरे जनाब पाठशालाएं तक बिक जाती हैं ऐसे में पाठ का उत्‍पाद होना कौन सी नई बात है। भैये मसिजीवी, इतनी छोटी समझदानी के ही बूते मौलिक चिट्ठाशास्‍त्र की बातें करने चले थे ?
इन सब प्रतिक्रियाओं की आशंका के बावजूद मैं कहूँगा कि हम इसे समझें इस पर विचार करें.....फिर भले ही फालतू लगे तो इस पर कुछ न करें।
शिल्‍पा ने इशारा किया है। वैसे भी पहले से ही यह दिखाई दे रहा था कि भारतीय भाषाओं की सामग्री की माँग लगातार बढ़ने वाली है और उसके अनुपात में सामग्री का सृजन नहीं हो रहा है। चिट्ठाकार पेशेवर होने की दिशा में इसलिए नहीं सोच पा रहे हैं कि वे मानते हैं कि पर्याप्‍त पाठक नहीं हैं इसलिए ब्‍लॉग को मोनेटाइज करने यानि उस पर एड चेपने से कोई खास फायदा होने वाला नहीं। इसलिए इंतजार करो और मजे लो (वेट एंड वाच)। लेकिन ठहरिए ये इंतजार खुद हिंदी के लिए बेहद नुकसानदेह हो सकता है। वो इसलिए कि यदि पर्याप्‍त सामग्री के अभाव को हिंदी का सच स्‍वीकार कर लिया गया तो हम उस ‘कटेंट एक्‍सप्‍लोजन’ से वंचित रह जाएंगे जिसके मुहाने पर हम खड़े हैं। याहू, गूगल दोनों को सामग्री चाहिए वो उन्‍हें मिल नहीं रही। आप खुद ही जरा काम की सामग्री हिंदी में खोजने की कोशिश कर देखिए। मुझे रोमन में Linguistic Identity के लिए परिणाम मिला




जबकि देवनागरी में जो 116 पृष्‍ठ मिले भी उसमें से भी अधिकतर हिंदी के न होकर मराठी के थे। यहॉं तुलना करना न उद्देश्‍य है न उससे कुछ हासिल होने वाला है। यहॉं कहना सिर्फ इतना है कि जो भी सामग्री हम तैयार कर रहे हैं उसे और अधिक प्रासंगिक बनाएं। साथ ही यह भी समझें कि ऐसा करना केवल हिंदी की सेवा जैसा पुनीत रिटोरिक ही नहीं है बल्कि ऐसा करने में पेशेवर समझदारी है। क्‍योंकि यदि माँग है और आपूर्ति पर्याप्‍त नहीं तो फिर कम से कम अर्थशास्‍त्र के नियमों के अनुसार तो कीमत बढ़नी चाहिए। पर अविनाश बेहतर जानते हैं कि अर्थशास्‍त्र के नियम जो ‘आम’ का भला करते हों अक्‍सर काम करते नहीं दिखाई देते (वरना मँहगाई का लाभ किसानों को मिलता दिखना चाहिए था)। पर तय यह ही है कि माँग व पूर्ति के इस अंतर का लाभ उठाना जरूरी है इसलिए भी कि इससे हिंदी की बढ़ोतरी भी होगी।
यह सोचने पर कि ये कैसे किया जा सकता है मुझे लगता है कि रेवेन्‍यू जनरेशन के भिन्‍न मॉडल की परिकल्‍पना की जानी चाहिए। यानि बजाए उस मॉडल के जो गूगल एडसेंस साईट मालिकों से वयवहार में लाता है हमें चाहिए कि सामूहिक रूप से अपनी सामग्री उस मॉडल के आधार पर ऑफर करें जो गूगल एडसेंस अपने विज्ञापनदाताओं से काम में लाता है। मैंने इस पर थोड़ा बहुत सोचा और नोटपैड खुरचा है पर याहू/गूगल वालों तक अपनी पहँच नहीं। नारद की व्‍यवसायिकता को लेकर एक साझी समझ है इसलिए उससे पहल के लिए कहना कठिन है वरना नारद एक अलग कंपनी लांच कर ऐसा कर सकता था। कुल मिलाकर ये कि हम जी तोड़ कोशिश करें कि नए सर्विस प्रदाताओं को पर्याप्‍त सामग्री मिलती रहे और हिंदी के सामग्री रचियताओं को बाजिव कीमत।