Monday, June 18, 2007
ई-स्वामी जी मेरी एक और फिकर का जिकर सुनें
चिट्ठाजगत में मारकाट है और जैसा प्रत्यक्षा ने कहा कि टुमारो भी कुछ खास बेटर प्रतीत नही हो रहा। पर समय तो आगे की ही ओर चलेगा...इसलिए आगे की ओर ही देखें। पहले बार बार कहा जा रहा था कि मेल भेजकर दिखाओ अब आशंका हो रही है कि लोग मेल भेज भेजकर न कहने लगे कि हमें हटाओ....तब क्या होगा...उस पर ही विचार करने का इरादा है।
मिश्राजी ने पोस्ट लिखकर समझाया बाते पहले से पता थीं- ये भी कि ये ऐसे कही भी जाएंगी, उस पर भी आएंगे फिर कभी, पर फिलहाल उस बात को लें जो सबसे जरूरी है और ये कही अनामदासजी के चिट्ठे पर ई-स्वामी ने, मेरी आज की पोस्ट की प्रेरणा वहीं से है। खुद को वे कोडिंग-प्रोग्रामिंग से कमाने खाने वाला कहते हैं और इशारा करते हैं कि तकनीकी मामला हो तो हम निपट लें पर ये तर्क-कुतर्क-विरोध-प्रतिरोध-राजनीति-भावना-भाषा के पचड़े निपटाने में दूसरों को पहल करनी चाहिए। अच्छा लगा ई स्वामीजी कि आपने यह कहा। तकनीकी-गैर तकनीकी के घालमेल ने इस मामले का संभालने के कई अवसर गंवाने पर विवश किया ऐसा मुझे लगता है। पर चूंकि पीछे नही आगे देखना है इसलिए उस सब को याद नहीं करूंगा, कुछ और याद करूंगा। दो महीने हुए एक पोस्ट लिखी थी जिसपर संजयजी व ई-स्वामी ने (काम मत कर/काम की फिकर कर/फिकर का जिकर कर) जैसी राय दी थी, उस पोस्ट में कहा था-
.... संपादकीय विवेक की कैंची (जो कम से कम शुरूआती दिनों में इन पुराने चिट्ठाकारों के हाथ में ही रहने वाली है) से घाव करने पड़ेंगे। दूसरा प्रभाव विवाद शमन भूमिका पर पड़ने वाला है। नए चिट्ठाकार जिन्हें विवाद सफलता की सीढ़ी दिखते हैं उन्हें सलाहें नागवार गुजरेंगीं और एकाध बार अंगुलियाँ जलाने के बाद वरिष्ठ अंगुलिया विवादों के ताप से दूर रहने लगेंगी यूँ भी संपादकीय गमों से कम ही अवकाश होगा इनके पास।
कल्पना कुछ बाद के लिए की थी लेकिन जल्दी हो गया और कतई खुश नही हूँ कि मेरी आशंका (या फिकर का जिकर) सही साबित हुआ।
कारण कुछ कुछ ई स्वामी पहचान रहे हैं अब चुनौतियॉं जितनी तकनीकी हैं उससे अधिक गैर तकनीकी, भाषा, या संपादकीय विवेक की हैं- मसलन कल की चुनौती है (शायद आज ही की है) कि उन चिट्ठों का भी एग्रीगेशन किया जाए जिनकी कोई रूचि नहीं है कि नारद में वे रहें कि हटा दिए जाएं, या जो ईमेल भेज चुके हैं- अपनी तो स्पष्ट राय है कि नारद को पंजीकरण की आवश्यकता पर पुनर्विचार करना चाहिए- यानि नारद खुद उन चिट्ठों का भी एग्रीगेशन शुरू करे जिन्होंने कोई आवेदन नहीं दिया है। ऐसा क्यों- इसलिए कि अगर वैचारिक असहमति, व्यावसायिक कारण, जानकारी के अभाव, आलस्य, जिद, राजनीति या कोई अन्य कारण से किसी चिट्ठाकार को यह लगता है कि उसे नारद की जरूरत नहीं है तो इससे स्वमेव यह सिद्ध नहीं होता कि नारद या हिंदी चिट्ठाकारी को भी उस चिट्ठे की जरूरत नही है। हो सकता है कि इस बेरूखी के बाद भी फीड लिए जाने से चिट्ठाकार को नागवार गुजरे पर इस पक्ष को साफ समझ लिया जाए कि सार्वजनिक चिट्ठे की फीड किसी की बपौती नहीं हैं- खुद चिट्ठाकार की भी नहीं। चिट्ठे पर क्या लिखा जाए यह तो चिट्ठाकार ही तय करेगा लेकिन यदि चिट्ठा सार्वजनिक है (यानि यदि वह पासवर्ड सुरक्षा के साथ केवल परिजनों व मित्रों के लिए नहीं लिखा गया है) तो उसे कौन पढ़े इसे तय करने का अधिकार चिट्ठाकार को नहीं है। चिट्ठापाठक होने के नाते हर सार्वजनिक फीड पर सर्वजन का अधिकार है। इससे एग्रीगेटर इनक्लूसिव बनेगा। यदि सुनो नारद पर कुछ मेल आ गई हैं तो उन पर तैश में आकर स्वीकृति देने से पहले जिम्मेदार लोग कृपया फॉर बेटर टुमारो उन्हें झट तथास्तु न कर दें तकनीकी मजबूरी हो तो अलग बात है पर संभव हो तो कोडिंग/प्रोग्रमिंग वाले उस तकनीकी मजबूरी को भी सुलट लें :)
Saturday, June 16, 2007
पंडितजी, ऐसे नारद की कल्पना त्रासद है
श्रीश द्वारा अपना मत लिखने पर अविनाश की टिप्पणी है कि ये बकवास है, मुझे ऐसा नहीं लगता- मुझे इस मुद्दे पर आप लोगों से संवाद की उतनी ही जरूरत लगती है जितनी राहुल, संजय या अविनाश से।
तकनीकी तौर पर आपकी बातें सही हैं- एक तो यह कि आपको हटाए गए ब्लॉग की सामग्री आपत्तिजनक लगी (मुझे भी लगी), दूसरा यह कि नारद को यह अधिकार है कि वह किसे ऐग्रीगेट करेगा किसे नहीं- इन दोनों सहमतियों के बावजूद हम लगातार इस कार्रवाई पर पुनर्विचार का अनुरोध कर रहे हैं नारद से, आपसे, संजय से और सबसे...क्यों
इसलिए नहीं कि हम सभी आतंकवादी, नक्सलवादी, नस्लवादी, नस्ल, गैंग वगैरह हैं वरन ठीक इसके विपरीत कारणों से।
पहले तो वजह वही जो आपने (श्रीश ने) कही नारद सिर्फ एक एग्रीगेटर नहीं है वह व्यवसाय नहीं है...वह प्रतीक अधिक है तकनीकी चीज बाद में है इसलिए इस प्रतीक में हर मत की साझीदारी जरूरी है- मेरी भी और मुझसे विरोधी की भी इसीलिए मेरे लिए ऐसे नारद की कल्पना त्रासद है जिसमें राहुल को हटा दिया जाए, सागर खुद हट जाएं, धुरविरोधी, नसीर, इरफान, मसिजीवी, अफलातून, अविनाश आदि को उकसाया जाए कि वे खुद हटने की मेल भेजें और जैसा आपने कहा कि बहुत से इसलिए चुप हो जाएं कि उन्हें डर है कि वे अपने मन की बात कहेंगे तो लोग उनपर टूट पड़ेंगे। और फिर इन विवश चुप्पियों की व्याख्या समर्थन के रूप में की जाएगी।
यानि यदि आप भी मेरी तरह नारद को एक प्रतीक मानते हैं जिसमें इतना परिश्रम और स्वप्नों का निवेश हुआ है तो जरूरी है कि आप इसे सेग्रीगेशन का औजार बनने से आहत महसूस करें।
दूसरी बात इससे ज्यादा जरूरी है जैसा श्रीश ने कहा -
‘इन चिट्ठाकारों के इस प्रकार के लेखन का एक अन्य उद्देश्य है - अपनी विचारधारा का प्रचार।इन चिट्ठाकारों में से बहुसंख्यक वामपंथी/माओवादी/नक्सली विचारधारा के हैं। अब वामपंथ तक तो सही है लेकिन नक्सली आदि खतरनाक विचारधारा का ये लोग खुलेआम समर्थन करते हैं। अब सभ्य तरीके से अपनी विचारधारा के बारे में लिखने की बजाय ये इसके लिए हिंसक किस्म के लेखन का सहारा ले रहे हैं। जो इनसे सहमत होता है ठीक वरना उसके खिलाफ ये मोर्चा खोल देते हैं‘मुझे ये धारणाएं घातक प्रतीत होती हैं। अभी हाल में किसी ने संघ के पदाधिकारी का गुणगान करती पोस्ट लिखी थी, ओक की ‘इतिहास दृष्टि’ वाली पोस्ट भी आई- आने दो वैसे ही – ‘आज नक्सली आए हैं कल उल्फा, बोडो और काश्मीरी आतंकवादी भी नारद पर आ धमकेंगे, वे भी 'अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता' की बात करेंगे, तुम्हें भय होगा श्रीश, इस दिन का मुझे तो इंतजार है- अगर इतने भिन्न मत रखने वाले और इतने अतिवादी मत रखने वाले हिंदी में, चिट्ठाकारी में, नारद में, संवाद में आस्था रखने लगेंगे तो फिर और क्या चाहिए। मुझे नहीं पता कि इन सबके विषय में आप कितना जानते व पढ़तें हैं पर मैं तो इनके विषय में और जानना चाहूँगा। और फिर हम सब जानते हैं कि राज्य इन सभी संस्थाओं की तुलना में अधिक क्रूर, अनैतिक व अतिवादी है- पर हम यह भी जानते हैं कि ज्ञानदत्त, अनूप आदि उसी सरकार के ही अधिकारी है अनूप तो इसी आतताई राज्य के गोला बारूद बनाते हैं जो किन किन के खिलाफ इस्तेमाल होता है उसपर उनका कोई वश नहीं। पर क्या इससे वे सरकार की तमाम ज्यादतियों में शामिल हो गए। इसलिए इस आधार पर समर्थन विरोध करना अनुचित है कि कार्रवाई किसके खिलाफ हुई है, वह संघी है कि नक्सली। मैं, आप या देश ही से दूर बैठे संचालक कैसे इसकी चौकीदारी करेंगे और क्यों करेंगे और जब करने लगेंगे तो क्यों उनका विरोध नहीं किया जाना चाहिए।
किया जाना चाहिए इसीलिए किया जा रहा है। और हॉं नारद संचालक मंडल के सदस्यों ने इतना परिश्रम किया है इसे खड़ा किया है कम से कम वे उस खीजे बच्चे की तरह व्यवहार न ही करें जो अपने बनाए घरोंदे पर पैर मारकर तोड़ देजा है और नाचता है कि मेरा था तोड़ दिया...तुझे क्या। लोग अपने चिट्ठों पर क्या लिख रहे हैं जाने दें किंतु नारद की औपचारिक पोस्टों तक में कहा-
’इतनी बड़ी पोस्ट लिखने से अच्छा है, दो लाइनों मे sunonarad at gmail dot com पर लिख भेजें कि हमारा फलां फलां ब्लॉग नारद से हटा दिया जाए। विश्वास कीजिए, आपका भी समय बचेगा, पाठकों का भी और हमारा भी। ‘आपने इसके समर्थन में बड़ी पोस्ट लिखी, अनूपजी ने पोस्ट लिखी है और अगर मैं कहूँ कि लंबी पोस्ट है तो मुझसा बौढ़म और कौन होगा- अरे फुरसतिया ने लिखी है लंबी ही होगी :) मैं भी लिख रहा हूँ, औरों ने भी लिखी पर अब जरा कल्पना करें कि अनूप या आप या जितेंद्र से नारद की ओर से कहा जाए कि अविनाश का लिखा पसंद नहीं तो इतनी लंबी पोस्ट न बघारें चुपचाप एक मेल सुनो नारद पर भेज दें और हट जाएं। मुझे मालूम है कि एक फूहड़ कल्पना है कि भई ‘मालिक’ लोगों से कोई ऐसा कैसे कह सकता है- पर इसका मतलब ये भी है कि अविनाश, राहुल को इसलिए कहा गया क्योंकि वे ‘मालिकों’ को पसंद नहीं थे। अनूपजी पर जो भलमनसाहत का ‘आरोप’ लगाया गया है उसे सच सिद्ध करते हुए उन्होंने माना कि भई जितेंद्र पेड़ आदमी हैं उन्हें प्रवक्ताई नहीं आती है इसलिए उसपर ध्यान न दें, तो क्षमा करें या तो पेड़ को बगीचे में खड़ा करें (यूँ भी आपके अहाते में इसकी खूब गुंजाईश है :)) और प्रवक्ताई खुद संभालें या किसी गैर-पेड़ को दे दें, लेकिन यदि भाषा का मसला इतना मामूली है कि खुद नारद में तो इसे पेड़ों को दे दिया जाता है लेकिन दूसरों की भाषा पर फरमान जारी होते हैं तो शायद बहुत ठीक नहीं।
खैर ऊपर अंत के हिस्से की कुछ बातें आवेश में लिखी गई हैं इसलिए वर्तनी और शिष्टाचार की उसमें भूलें हैं। क्षमा।
कवि नागार्जुन और गुलाबी चूडि़यॉं- वीडियो में
Wednesday, June 13, 2007
आपको न माने ताके बाप को न मानिए
‘इसलिए मैं पंत को कूड़ा लिखने का दोषी नहीं मानता। कुरूप को कुरूप स्त्री को सज-संवर कर निकलने का हक़ है, मूर्ख से मूर्ख व्यक्ति को अपनी बात कहने का अधिकार है, अदालत में जाने का भी। यही जीवन का लोकतंत्र है, जिसमें कुत्ते भौंकते रहते हैं, कोयल कू कू करती रहती है, गाय रंभाती है और घोड़े हिनहिनाते रहते हैं। इसी नाते, मेरा भी यह अधिकार है कि मैं कौए की वाणी की प्रशंसा न करूं, कुत्तों के कुछ समय तक नि:शब्द रहने की कामना करूं और अपने कमरे में ऐसे रसायन फैलाऊं कि मच्छड़ कहीं और जाकर भनभनाएं।...’
जवाब में इधर जनसत्ता में अशोक वाजपेयी ने नामवर से अपना हिसाब बराबर करने के लिए इस प्रकरण पर अपने विचार दिए हैं और जाहिर है राजकिशोर को भी लपेटे में लिया है। मुद्दे के जवाब के जवाब के जवाब ...में आज राजकिशोर ने फिर जवाब दिया है और कचरा विमर्श पर कचरे की व्यक्तिनिष्ठता का सिद्धांत प्रतिपादित किया है...जनसत्ता आपकी पहुँच में हो तो जरूर पढें। हमें जो पंक्ति पसंद आई वह है ये रीतिकालीन पंक्ति...’आपको न माने ताके बाप को न मानिए’
आप कहेंगे कि भई यह तो हिदी की सामान्य सी कीचड़बाजी है उसे यहॉं क्यों फैलाया जा रहा है...उत्तर है- राजकिशोर ने कचरा प्रसंग में ब्लॉगजगत को लपेटा है और इसे कचराप्रधान ऐसे लेखन का ढेर कहा है जो है तो कचरा, पर लेखक को मूल्यवान जान पड़ता है। आपकी सुविधा के लिए प्रासंगिक अंश को यहॉं अविकल प्रस्तुत किया जा रहा है-
दरअसल साधारण से साधारण रचनाकार भी जो लिखता है, उसमें कुछ ऐसा होता है जिसे मूल्यवान कहा जा सकता है। अगर हर व्यक्ति का मूल्य है तो उसके हर उत्पादन का भी कुछ न कुछ मूल्य है। दुख की बात यह कि इसी आधार पर आज का ब्लॉग वर्ल्ड विकसित हो रहा है। मुफ्त का इंटरनेट, मुफ्त का वेबिस्तान, ब्लॉग पर ब्लॉग छांटते जाओ मेरे नंदनों या मेरी नंदनियों। तुम्हारी अभिव्यकित हो रही है, दुनिया का जो भी हो। वैसे इसमें भी क्या शक है कि मर जाने के बाद बड़े से बड़े लेखक का भी काम कचराघर में डाल दिया जाता है, क्योंकि इतनी जगह कहॉं है दिले दागदार में।
(कुछ और कचरा, राजकिशोर, जनसत्ता 13/06/2007)
Friday, June 08, 2007
हिंदू स्त्री का जीवन - High Caste Hindu Women

पंडिता रमाबाई (1858-1922) का जन्म एक ब्राह्मण परिवार में हुआ और तमाम बिडंबनाओं और कष्टों को सहते हुए उन्होंने उच्च जाति की स्त्रियों विशेषकर विधवाओं की दशा सुधारने के लिए आधुनिक दृष्टि से कार्य किया। ‘हिंदू स्त्री का जीवन’ तत्कालीन अमरीकी व ब्रिटिश जनता का ध्यान भारतीय स्त्रियों की दशा की ओर आकर्षित कर संसाधन जुटाने के इरादे से लिखी गई थी। हैरानी की बात है कि उत्तर भारतीय पाठ्यपुस्तकों में राष्ट्रनायकों की जीवनियों में आमतौर पर पंडिता रमाबाई को स्थान नहीं दिया जाता है जबकि वे शुरूआती शिक्षित भारतीय महिलाओं में से एक थीं जिन्होंने स्त्री सशक्तिकरण के भारतीय संस्करण को खड़ा करने में अहम योगदान दिया। यहॉं तक कि संस्कृत की पाठृयपुस्तकें भी इस संस्कृत विदुषी के स्थान पर इंदिरा गांधी या झांसी की रानी से ही काम चला लेना चाहते हैं। कारण ये रहा है कि संस्कृत के शास्त्री लोग इस प्रथम महिला 'शास्त्री' से इसलिए नाराज रहे हैं कि इन्होंने बाद में ईसाई धर्म स्वीकार कर लिया था और ब्राह्मण होते हुए भी एक बंगाली कायस्थ से कोर्ट मैरिज करने का निर्णय लिया था- एक सहयोगी ने बताया कि इस साल NCERT की एक मीटिंग में पंडित लोगों ने ये आशंका जाहिर की कि जीवनी में इन ‘तथ्यों’ की वजह से बालमन पर ‘बुरा प्रभाव’ पड़ सकता है।
हिंदू स्त्री का जीवन का अंग्रेजी संस्करण 1886 में प्रकाशित हुआ। पंडिता रमाबाई की इस पुस्तक ने जहॉं अपने समय में विवादों और चर्चा को जन्म दिया वहीं इसने भारतीय स्त्री जीवन में बदलाव की शुरूआत की। पुस्तक में आठ अध्याय हैं जिनमें लेखिका उच्च जाति की भारतीय स्त्रियों के बचपन, वैवाहिक जीवन, वैवाहिक अधिकार, वैधव्य आदि का तार्किक विश्लेषण करती है और जनसंख्या आंकड़े (1881 की जनगणना के) आदि का उपयोग कर अपने मत को रूथापित करती हैं।
मनुस्मृति की इतनी तीखी आलोचना के लिए उस युग में एक स्त्री को बहुत साहस जुटाना पड़ा होगा। वे कुछ उदाहरण पेश करती हैं-
कोई भी बल द्वारा स्त्री की रक्षा नहीं कर सकता, किंतु इन उपायों से स्त्री की रक्षा की जा सकती है: स्त्री को धन के संग्रह, व्यय, वस्तु और पदार्थ की शुद्धि, पति तथा अग्नि की सेवा, घर तथा बर्तन आदि की सफाई में नियुक्त करें। ( मनु IX, 10-11)
पति के किसी बुरी आदत से ग्रस्त होने या शराबी होने या रोगी होने की वजह से पत्नी अपने पति के प्रति श्रद्धा नहीं रखती है तो वह पति उससे गहने व अन्य आवश्यक सामग्री लेकर उसे त्याग दे ( मनु IX, 77-78)
संतानहीन स्त्री की आठवें वर्ष में, मृत संतान वाली स्त्री की दसवें वर्ष में, कन्या को ही जन्म देने वाली स्त्री की ग्यारहवें वर्ष में और अप्रियवादिनी की तत्काल उपेक्षा कर उसके जीवित रहने पर भी पति दूसरा विवाह कर ले ( मनु IX, 80-81)
पति के दूसरा विवाह करने पर जो स्त्री कुपित होकर घर से निकल जाए या निकलना चाहे उसे पति कैद कर ले। ( मनु IX, 83)
स्त्रियों की दशा सुधारने के पंडिता रमाबाई के सुझाव कुछ कुछ हिंदू नन व मिशनरियों की स्थापना जैसे प्रस्तावित हैं जिन पर बहस व असहमति की गुंजाइश है किंतु अपने समय में रमाबाई का चिंतन निश्चय ही आंखे खोलने वाला रहा होगा।
Thursday, June 07, 2007
पहाड़ सुन्दर बन पड़ा है...साधुवाद
धनोल्टी से एकाध किलोमीटर आगे (सुरकंडा देवी की ओर) चलते हुए एक मनोरम हरा भरा पहाड़ प्रस्तुत हुआ- ठंडे ‘समीर’ के झोंके के प्रभाव से सुजाता के मुँह से सहसा निकला – पहाड़ सुंदर बन पड़ा है....साधुवाद।
जाहिर है कि ब्लॉगरों से भरी इस किराए की क्वालिस में जोरदार ठहाका लगा और एक आफलाइन टिप्पणवर्षा शुरू हुई। ....बेचारा ड्राईवर।
नीलिमा व सुजाता ने टिप्पणियों की बेंतबाजी शुरू कर दी हम बीच बीच में शामिल होते थे।
(1)
सुजाता: पहाड़ सुंदर बन पड़ा है....साधुवाद
नीलिमा: वाह वाह वाह
मसिजीवी: पहाड़ सुंदर है किंतु ऐसे ही पहाड़ पर मैंने दो वर्ष पर पूर्व टिप्पणी की थी यहॉं देखें।
नीलिमा: (कॉपी-पेस्ट) विशेष रूप से ये मोड़ पसंद आया...जारी रहें।
(2)
घोड़े वाले ने 3 किमी की दूरी (तपोवन) के लिए 400 रुपए की मांग की जो जाहिर है हमें ज्यादा लगे।
सुजाता – यह तो घोड़े के मद में चूर है- कहॉं है मेरी गदा।
रास्ता ट्रेकिंग से तय करने का निर्णय लिया पर बाद में नीलिमा को लगा इस पहाड में चढ़ाई ‘फुरसतिया की पोस्ट’ की तरह खत्म होने का नाम नहीं ले रही थी।
(3)
शनिवार को कम से कम बीस बार सुजाता ने चिंता जाहिर की, पता नहीं देवाशीष ने चर्चा की भी होगी कि नहीं। हमने रविवार को पच्चीस बार विश्वास जाहिर किया कि आज तो चर्चा नहीं ही हुई। इन सभी पैंतालीस बार हमने सबने गर्दन झटकी कि और लो वो इसे कहते हैं कि हमारा सशक्तिकरण हो रहा है।
इतना सब तो इस भ्रमण में चिट्ठामयी था और आप कह रहे हैं कि हम ब्लॉगर मीट में नही थे।
Wednesday, June 06, 2007
इस बार धनोल्टी
Thursday, May 31, 2007
(दिल्ली) कॉलेज के बहाने तारीखे दिल्ली पर एक नजर
दिल्ली कॉलेज (अब इसका नाम जाकिर हुसैन कॉलेज है) को दिल्ली विश्वविद्यालय की स्थापना से पहले ही अस्तित्व में होने का गौरव प्राप्त है। यह शिक्षण संस्था स्वयं में तीन सौ सालों का इतिहास संजोए है। 18वीं सदी के अंतिम वर्षों में बादशाह औरंगजेब के दक्कन के एक सिपहसलार गजिउद्दीन खान के संरक्षण में यह मदरसा गाजिउद्दीन के नाम से जाना जाता था। कॉलेज के पुराने परिसर में एक मस्जिद के साथ साथ गजिउद्दीन की मजार आज भी विद्यमान है। फिर मुगल शासन के अंतिम चरण की शुरूआत हुई और इसने दिल्ली शहर की सास्कृतिक व शैक्षिक जिंदगी को भी प्रभावित किया जिससे कॉलेज भी प्रभावित हुआ। कॉलेज पर संकट के बादल छाने लगे किंतु शहर की बौद्धिक जमात की दिलचस्पी के परिणामस्वरूप 1792 में ओरिएन्टल कॉलेज के रूप में पुनर्व्यवस्थित होने पर इस कॉलेज ने साहित्य, कला एवं विज्ञान के प्राच्य कॉलेज के रूप में ख्याति प्राप्त की। बाद में यह एंग्लो अरेबिक कॉलेज के रूप में जाना गया। इस कॉलेज में भाषा, तर्कशास्त्र, न्यायशास्त्र, दर्शन, ज्योतिष और चिकित्सा की पढ़ाई होती थी।

मुगल साम्राज्य का पतन हो चुका था और औरंगजेब के परवर्ती शासक नाममात्र के शासक थे। इसी दौरान सन 1824 में ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी ने इस कॉलेज से ही एक नवीन आधुनिक कॉलेज को खड़ा किया और इसे दिल्ली कॉलेज का नाम दिया गया। अगले 150 सालों तक, यानि 1975 तक यह दिल्ली कॉलेज के नाम से ही प्रसिद्ध रहा। 1824 में ही अवध के वजीर नवाब इत्मदुद्दौला ने 1,70,000 रुपए का अनुदान यहॉं शास्त्रीय भाषाओं अरबी, फारसी और संस्कृत के विभागों को मजबूत करने के लिए दिया।
इस कॉलेज के इतिहास का दिल्ली शहर के इतिहास से अटूट संबंध है। यह संस्थान इतिहास के अनेक उतार चढ़ावों का साक्षी रहा है। एक ओर 1857 व 1947 की ऐतिहासिक घटनाओं ने कॉलेज को गहरे प्रभावित किया जबकि दूसरी ओर 19वीं सदी सृजनात्मक उभार का वह दौर जो दिल्ली नवजागरण के रूप में प्रसिद्ध है, उसकी गतिविधियों का केंद्र भी यही कॉलेज था। इस काल में कॉलेज ने प्रगतिशील आदर्शों के निर्माण में अहम भूमिका अदा की। यही वह संस्थान था जिसने 1824 में एक विषय के रूप में अंग्रेजी पढ़ाए जाने की शुरूआत करने का साहसिक निर्णय लिया था जो उस जमाने के लिहाज से एक खासा विवादित मुद्दा था। 1843 में कॉलेज में दिल्ली वर्नाक्यूलर सोसाइटी की स्थापना हुई जिसके माध्यम से अनेक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक व गणितीय ग्रंथों, शास्त्रीय ग्रीक साहित्य एवं फारसी कृतियों का उस जमाने की जनभाषा उर्दू में अनुवाद हुआ।
भारत के भूतपूर्व राष्ट्रपति एवं महान शिक्षाविद् डा. जाकिर हुसैन की महत भूमिका का सम्मान करते हुए 1975 में कालेज का नामकरण उन्हीं के नाम पर किया गया। अगले डेढ़ दशक बाद जाकिर हुसैन कॉलेज अपने वर्तमान परिसर मे स्थानांतरित हो गया। आज जाकिर हुसैन कॉलेज भौगोलिक एवं प्रतीकात्मक रूप से ऐसे स्थान पर है जो पुरानी दिल्ली को नई दिल्ली से जोड़ता है इस प्रकार प्राचीन परंपरा एवं नित नवीन प्रगति व आधुनिकता के बीच समन्वय को द्योतित करता है।
1925 में कॉलेज को नवस्थापित दिल्ली विश्वविद्यालय से संबद्ध कर दिया गया। इस कॉलेज ने शिक्षा के प्रचार प्रसार में निरंतर एक केंद्रीय भूमिका अदा की है, चाहे वह स्त्री शिक्षा का क्षेत्र हो अथवा वैज्ञानिक दृष्टिकोण के निर्माण का या फिर भारतीय भाषाओं और अंग्रेजी के परस्पर अनुवाद का।
दिल्ली नवजागरण के केंद्र के रूप में दिल्ली कालेज की विरासत को स्वीकार करते हुए आक्सफोर्ड यूनीवर्सिटी प्रेस ने हाल ही में एक विद्वतापूर्ण शोधग्रंथ प्रकाशित किया है जिसका शीर्षक है- ‘द दिल्ली कॉलेज: ट्रेडिशनल इलीट्स, द कोलोनियल स्टेट एंड एजूकेशन विफोर 1857’।

यह ग्रंथ उन्नीसवीं सदी के पूर्वार्द्ध में ब्रिटिश शिक्षा नीति एवं पारंपरिक शिक्षा की पृष्ठभूमि में दिल्ली कॉलेज की विरासत की पड़ताल करता है। इसमें कॉलेज और इससे जुड़े लोगों के जरिए तत्कालीन दिल्ली के समाज पर अलग अलग नजरिए से विचार किया गया है। पुस्तक का संपादकीय सुस्थापित विद्वान मार्ग्रिट पर्नाउ ने लिखा है। यह पुस्तक इतिहास, समाजशास्त्र, शिक्षा एवं साहित्य के शोधार्थियों व विद्यार्थियों के लिए अत्यधिक उपयोगी है विशेषकर उनके लिए जिनकी रुचि संस्थाई इतिहास, उर्दू भाषा के विकास अथवा दिल्ली के इतिहास में है।
वैसे दिल्ली के इतिहास पर लिखी कोई भी पुस्तक शायद ही इस कॉलेज की उपेक्षा कर सके क्योंकि मुगलकालीन दिल्ली के जीवन का पूरा परिचय केवल इसी संस्थान से मिल पाता है। इस कॉलेज ने गालिब और मीर को खुद सुना और अब तक बचा रखा है (वैसे ‘गालिब ने इस कॉलेज में पढ़ाया है’ किवंदती की, असलियत यह है कि उन्हें ऐसा कोई प्रस्ताव ससम्मान दिया ही नहीं गया था किंतु वे इस कॉलेज के उत्कर्ष के दिनों में दिल्ली में सक्रिय थे और दिल्ली नवजागरण का हिस्सा हैं जिसका यह कॉलेज केंद्र रहा है।
जहॉं तक मेरे इस कॉलेज से संबंध की बात है...एक सीधा संबंध यह है कि मैं इस कॉलेज में विद्यार्थियों को कबीर, सूर, दिनकर, प्रसाद, रूपिम, स्वनिम, वाक्य पढ़ाता हूँ। लेकिन उससे भी गहरा संबंध यह है कि ये सब मैंने 1990-93 में इसी कॉलेज में सीखे थे। मदरसा गजिउद्दीन वाली इमारत में पढ़े विद्यार्थियों का अंतिम बैच हमारा ही था, हमने एक साल मजारों
और बलुआ पत्थर वाली पुरानी इमारत में और शेष दो साल नई चमचमाती सुविधा संपन्न इमारत में बिताए थे। और यहीं दिसंबर 1992 में भी मैं छात्र था ओर सीखा कि कैसे गहरी नींव की संस्थाए इतिहास के धक्कों को सह जाती हैं। यहीं मुझे पता लगा कि 1857 के विद्रोह में पहले विद्रोहियों ने इस कॉलेज के प्रिसीपल व कई शिक्षकों मार दिया (वे अंगेज थे) और गदर के बाद बदला लेने के उपक्रम में अंगेजों ने कॉलेज को ही तहस नहस कर दिया, विद्यार्थियों ओर शिक्षकों को फांसी चढ़ाया गया और कॉलेज को बंद कर दिया गया। कॉलेज फिर उठ खड़ा हुआ।1947 के विभाजन ने तो कॉलेज को तोड़ ही दिया था, पुरानी दिल्ली का कॉलेज था और बहुत से शिक्षक व विद्यार्थी पाकिस्तान चले गए और वहॉं के लाहौर कॉलेज को उन्होंने चुना। लेकिन तब भी डा. बेग जैसे लोग यहीं रहे और इस कॉलेज ने अपने दरवाजे पाकिस्तान से आए शरणार्थियों के लिए खोल दिए। उन्हें बिना प्रमाणपत्रों के ही प्रवेश दे दिए गए और पढ़ाई जारी
यह कॉलेज अपनी संस्कृति में दिल्ली का प्रतिनिधित्व कर पाता है क्योंकि इसमें विरोधों के समन्वय की अद्भुत शक्ति है। इसमें एडवांस्ड टिश्यू कल्चर लैब में प्रयोग करने के बाद छात्राएं सहजता से अपना बुरका पहनती हैं और रिक्शे पर सवार हो जाती हैं। हिंदू-मुसलमान प्रेम प्रसंग जितने इस कॉलेज ने देखे हैं उतने तो बॉलीवुड ने भी नहीं। और भी बहुत कुछ है जो इस शहर में है और इसीलिए कॉलेज में भी....कोई हैरानी नहीं कि हमारे शिक्षक श्री भीष्म साहनी यहॉं ‘तमस’ लिख पाए क्योंकि वह इतिहास ही तो है..और उनके संस्थान के हर पत्ते और पत्थर के पास ये कथाएं थी।
पुरानी इमारत से स्थापत्य के कुछ नमूने:
खुला प्रांगण, आज भी कॉलेज का छात्रावास इसी इमारत में चलता है और इस ओर खुलता है।
एक पुरानी तस्वीर, सामने के गलियारों में आजकल एंग्लो अरेबिक स्कूल चलता है।
Friday, May 25, 2007
मायावती से कौन डरता है

तमाम आकलनों को धता बताकर कैसे मायावती उप्र के सिहांसन पर आरूढ़ हो गई हैं- ये अब एक पुरानी खबर है। हिंदी चिट्ठाकारों में भी सृजन व अन्यों ने इसका पर्याप्त संतुलित विश्लेषण किया और एक प्रकार से इस घटनाक्रम की ऐतिहासिकता से सहमति जाहिर की है। किंतु दूसरी ओर अंग्रेजी का चिट्ठाकार जगत अभी तक इस ‘सदमे’ से उबर नही पाया है। एक लेख भारतीय अंगेजी चिट्टाजगत में आजकल खूब चर्चा में है। आई.बी.एन के ब्लॉग्स में से एक पर हिंदौल सेनगुप्ता ने ‘मैं मायावती से क्यों डरता हूँ’ शीर्षक से एक लेख लिखा है। अजी लेख क्या है, मध्यवर्गीय आभिजात्य पूर्वाग्रहों की नंगी घोषणा है। कुल जमा तर्क यह कि मायावती की जीत ‘हम’ पढें लिखे मध्यवर्गीय कान्वेंट शिक्षित, मेहनती लोगों के हाशिए पर चले जाने की घोषणा है। आगे यह भी कहा कि जिस दिन बहनजी या लालू टाईप लोग देश के प्रधानमंत्री बने उस दिन ‘हम’ बेचारों के पास सिवाय देश छोड़ने के कोई उपाय न होगा। शिवम ने काफिला में इस पर अपनी प्रतिक्रिया लिखी है।
यूँ अंग्रेजी पत्रकारिता में इस प्रकार का अभिजातपन कोई नई बात नहीं है और सारी अंगेजी पत्रकारिता इससे पगी हुई भी नहीं है, लेकिन फिर भी यह लेख इस मायने में खास है कि यह इस बात को रेखाकिंत करता है कि अब वे भय की बात करने लगे हैं। न लालू मेरे प्रिय नेता हैं न मायावती ही हमें कोई खास पसंद हैं, लेकिन अगर इनमें से किसी के प्रधानमंत्री बनने से देश सेनगुप्ता जैसी खरपतवारों से मुक्त हो जाएगा तो मैं इनके प्रधानमंत्री बनने का खुशी से स्वागत करूंगा।
Tuesday, May 22, 2007
दिल्ली से सांगला-चिटकुल : एक ड्राईवरी नजर
तय हुआ था कि इन छुट्टियों में हिमाचल का भ्रमण किया जाएगा इसकी कुछ तस्वीरें हम दिखा चुके हैं किंतु आपको यहॉं पूरी यात्रा का वृतांत नहीं बता रहे हैं उसके ड़ाईविंग पक्ष को आपके सामने रख रहे हैं। खैर, हम सपरिवार यानि पति पत्नी और बेटा-बिटिया (क्रमश: 7 व 4 साल) के साथ कार्यक्रम बना जिसके लिए HPTDC व तमाम ब्लॉगों से शोध कर निम्न रास्ता चुना गया।
दिल्ली – अम्बाला (NH-1) – जिरकपुर – पंचकुला-पिंजौर- शिमला- फागु- नारकंडा- रामपुर- सरहन- कल्पा- सांगला- चिटकुल – सांगला- रामपुर- शिमला-दिल्ली

वाहन के विकल्प इस हिंदी मास्टर के पास सीमित थे। या तो अपनी 1997 मॉडल की मारूति 800 (हँसो मत यार) या फिर दूसरा उपलब्ध विकल्प 2005 मॉडल की आल्टो। सहज ही आल्टो चुन ली गई। वैसे ऐंडेवर या कोई और SUV होती तो उसे ही चुनते पर ...सपने तो सपने हैं सपनों का क्या।


सुबह नाश्ते के बाद आगे का सफर शुरू हुआ...ड्राईविंग की असली परीक्षा आगे थी..परिवार के साथ चलते हुए आप कोई जोखिम नहीं लेना चाहते, हमने भी अगले दिन के लिए केवल 150 किमी का ही सफर रखा था रास्ते में पड़ते थे ठियोग, नारकंडा, रामपुर, ज्योरी और फिर 17 किमी की हाईवे से हटकर चढ़ाई के बाद सरहन। सरहन बुशैर राजवंश की राजधानी रहा है और भीमकाली मंदिर के लिए प्रसिद्ध है। खैर, रास्ता लगातार सतलुज के किनारे किनारे का था, थोड़ी थोड़ी देर के बाद छोटे छोटे झरने थे तस्वीरें खींचते, बंदरों को देखते और चेरी के बागों के किनारे से ज..जूम से निकलते हुए आगे बढ़ते गए। एक झरने पर तो बाकायदा मन लगाकर कार वाश भी किया...देखें।

वांग्टू से करचम की सड़क पर दोहरी मार है एक तो प्राकृतिक रूप से ही दुर्गम इलाका है दूसरे जेपी घराना यहॉं एक बहुत बड़ी पनबिजली परियोजना का निर्माण कर रहा है जिस कारण पर्वतों को सुरंगें बना बनाकर छलनी कर दिया गया है और कच्ची सड़क पर भारी डंपर डंपर चलाकर उसे खतरनाक बना दिया है, रेंगेती गति और आशंकित हृदय से जैसे तैसे करचम पहुँचे...हर किमी इस बेचारी आल्टो के साथ अन्याय सरीखा था। पर असली परीक्षा तो अभी बाकी थी।

यह 13 किमी जैसे तैसे कटे। इस सारे सफर में मैं यही आकलन करता रहा कि मैं इसका आनंद ले रहा हूँ कि डरा हुआ हूँ...दरअसल दोनों ही बात थीं। पोवारी जाकर पता चला कि पोवारी से रिकांगपिऊ की सड़क बंद है और तीन किमी आगे जाकर एक कच्ची सड़क से घूमकर वहॉं जाना होगा। रिकांगपिऊ किन्नौर जिले का मुख्यालय है। यह तीन किमी की सड़क और ऊपर कच्चा रास्ता मेरे अब तक के जीवन 85000 किमी के ड्राईविंग अनुभव में सबसे रोमांचक और जोखिम भरे थे। इस रास्ते को सड़क कहना इस संज्ञा के साथ अन्याय है..ये आठेक किमी के रास्ते पर संतुलन बनाए रखने में बड़ी परेशानी थी...गनीमत है कि हमें ऐसा कोई मुगालता नहीं है कि हम कोई बड़े तीस मारखां ड्राईवर हैं, इसलिए जब एक बस ने साईड मांगी तो हमने गाड़ी साईड में लगाकर हाथ खड़े कर दिए..यहॉं साईड का मतलब कोई साईड नहीं है, आठ दस फुट के रास्ते में क्या बीच क्या साईड। जैसे तैसे मुख्य सड़क तक पहुँचे और फिर रिकांगपिऊ होकर कल्पा पहुँचे जहॉं के सौंदर्य ने सारे भय और थकान को हवा कर दिया। यहॉं किन्नर कैलाश के ठीक चरणों में हमें पर्यटन विभाग के होटल किन्न्र कैलाश में हमें दो दिन रुकना था। अगले दिन 7-8 किमी के सुनसान व रोमांचक रास्ते से इस इलाके के अंतिम भारतीय गांव रोघी भी गए...देखिए रास्ते में लहराता भारतीय ध्वज

और मील के पत्थर पर टिके हमारे लाल को।

दिन में आए तूफान ने कल्पा के दृश्य को तो और सुंदर बना दिया था, शिखरों पर ताजा बर्फ पड़ी थी किंतु इसने हमारे कल्पा से सांग्ला के सफर पर ढेरो सवालिया निशान लगा दिए थे। तूफान तेज था और रास्ते में पेड़ और पत्थरों के सड़क पर आ गिरने की आशंका थी। चन्द्रगुप्त में प्रसाद का कथन है कि समझदारी आने पर यौवन चला जाता है..और हम सौभाग्य से अभी उतने समझदार नहीं है इसीलिए वावजूद इसके कि अभी अभी सांग्ला से आए एक टैक्सी ड्राईवर कम मालिक ने हमसे कहा कि भाईजी हमें तो कोई पैसे दे और कहे कि सांग्ला घूम आओ तो हम हाथ जोड़ दें..बहुत खतरनाक है। हमने तय किया कि देखा जाएगा। चाभी घुमाई और चल दिए। इस बार सड़क खुली हुई थी इसलिए पोवारी आसानी से पहुँच गए। पोवारी से करचम सड़क पर पत्थर थे और धाराओं का बहाव अणिक था पर विशेष कठिनाई नहीं हुई। असली परीक्षा थी करचम से सांग्ला का 16 किमी का रास्ता। विशेषता यह थी कि गाड़ी को बेहद संकरे रास्ते पर चलना था और पहाड़ी रास्ते के सभी जोखिम यानि घुमावदार सड़क, संकरा रास्ता और बहुत ही गहरी खाई सभी यहॉं विद्यमान थे उस पर तुर्रा ये कि इसी रास्ते पर बास्पा नदी को बांधने के पाप में रत कंपनी के विशाल डंपर भी यहॉं से गुजरते थे...जब सामने से ट्रक आता था तो किसी भी तरह कार उसके बराबर से नहीं निकल सकती थी इसलिए कार को बैक करके सुरक्षित कोने तक ले जाना होता था...कोई भी ड्राईवर जानता है कि कितना भी कुशल चालक क्यों न हो बैक करना अंतत: अनुमान का काम है और जमीन से सैकडों मीटर ऊपर, पतली सी सड़क पर पत्नी और छोटे बच्चों को कार में बैठाकर ऐसा अनुमान लगाना..उ..फ्फ।
खैर इस रोमांचक अनुभव के बाद हम जा पहुंचे सांग्ला (2680 मीटर) जो एक तरह से एंटी क्लाइमेक्स सा था जब तक कि हमने चिटकुल (3460 मीटर) की ओर रुख नहीं किया जो 26 किमी दूर है। ये रास्ता ट्रक रूपी दानवों से मुक्त था और बेहद मोहक था। चिटकुल सांग्ला क्षेत्र का अंतिम गांव है जिसके ढाबे पर बड़े बड़े अक्षरों में लिखा है हिंदुस्तान का आखरी ढाबा-चाय 4 रूपै। ये था हमारा अंतिम पड़ाव और यहाँ से हमारी वापसी की यात्रा शुरू....।

