Sunday, January 17, 2010

चिट्ठाचर्चा साइबर स्‍क्वैटिंग का शिकार : आइए पतन की कुछ और गहराइयॉं नापें

कुछ दिन हुए अनूपजी का फोन आया, चूँकि हम चर्चाकार हैं अत: वे हमसे राय जानना चाहते थे कि क्‍या चिट्ठाचर्चा को खुद के डोमेन पर ले जाना चाहिए। हम इस बात से कतई उत्‍साहित नहीं थे। एक सामूहिक ब्‍लॉग के डोमेन पर जाने की कुछ दिक्‍कतें होती हैं तथा ये उसकी गतिशीलता को प्रभावित करती है ये हम सब चोखेरबाली के अनुभव से जानते हैं। दूसरी दिक्‍कत हमें डोमेन के मालिकाना हक की वजह से भी थी... हाल में कितना भी शोर मचाकर लोगों ने कहा हो 'अनूप की' चिट्ठाचर्चा पर हम पहले कह चुके हैं हमें ऐसा नहीं लगता... हमारी ही है चिट्ठाचर्चा। अस्‍तु हमने सबसे राय लेकर जो तय हो उस पर अपनी अनापत्ति दी संभवत इसे फिलहाल ब्‍लॉगर पर ही रखने का निर्णय लिया गया।

अनूपजी व पाबला साहब (संयोग ही है कि इन पाबला साहब से मेरा कोई विशेष संपर्क नहीं है इसलिए उनकी प्रकृति पर कोई भी टिप्‍पणी कयास ही होगी) के बीच कोई छाया युद्ध चल रहा है इसका आभास कुछ कुछ हमें भी है पर यह सब चिट्ठा संसार में होता ही रहता है कोई अनोखी बात नहीं है। पर इतना तय है कि इस तरह के पंगो की एक मर्यादा रही है। नारद के जितेंद्र को हम कतई पसंद नहीं थे पर पासवर्ड बताने/पाने तक में कोई संकोच नहीं था बाकी लागों के साथ भी ऐसा ही रहा। हिन्‍दी चिट्ठाकारी में अब तक गिरावट केवल भाषिक रही है...एक दूसरे के खिलाफ अपराध करने के रिवाज नए हैं।  खुद अक्षरग्राम मिर्ची सेठ के नाम दर्ज रहा है किसी को नहीं लगा कि इसे हथियाया जाएगा पर चिट्ठाचर्चा पर एक टिप्‍पणी के बाद देखा तो बेहद छि: का अहसास हुआ।

काजल कुमार Kajal Kumar said:

यूं ही घूमते-टहलते मैं एक अन्य साइट
http://chitthacharcha.com पर पहुंचा. पाया कि अमरीका के सर्वर पर भिलाई के किन्हीं गुरप्रीत सिंह सज्जन ने यह नाम बुक कर रखा है. वाह जी बल्ले बल्ले

क्‍या वाकई...

अरे हॉं

WHOIS information for chitthacharcha.com :

[Querying whois.internic.net]
[Redirected to whois.PublicDomainRegistry.com]
[Querying whois.PublicDomainRegistry.com]
[whois.PublicDomainRegistry.com]
Registration Service Provided By: LOOP NAMES
Contact: +091.4229549
Website: http://www.loopnames.com

Domain Name: CHITTHACHARCHA.COM

Registrant:
dillmillgaye.in
Gurupreet Singh (gspabla@gmail.com)
272/A, Risali Sector
Bhilai
Chhattisgarh,490006
IN
Tel. +91.9993908226
Fax. +91.9993908226

Creation Date: 12-Dec-2009
Expiration Date: 12-Dec-2010

Domain servers in listed order:
ns12.netwayweb.net
ns11.netwayweb.net


Administrative Contact:
dillmillgaye.in
Gurupreet Singh (gspabla@gmail.com)
272/A, Risali Sector
Bhilai
Chhattisgarh,490006
IN
Tel. +91.9993908226
Fax. +91.9993908226

ScreenHunter_01 Jan. 17 14.21

 



उल्‍लेखनीय है कि प्रशासक के रूप में दर्ज दिलमिलगए एक व्‍यवसायिक साईट है जिसके संपर्क के लिए नाम के रूप में श्री जीएस पाबला तथा श्री बी एस पाबला नाम दर्ज हैं।  संभवत गुरप्रीत पाबला, पाबला जी के कोई परिजन ही हैं।



अब सवाल ये है कि क्‍या ये साईबर स्‍क्‍वैटिंग है? निश्चित तौर पर है अगर विकी पर साइबर स्‍क्‍वैटिंग की परिभाषा के मूल तत्‍व को देखें तो-




 Cybersquatting (also known as domain squatting), according to the United States federal law known as the Anticybersquatting Consumer Protection Act, is registering, trafficking in, or using a domain name with bad faith intent to profit from the goodwill of a trademark belonging to someone else




साइबर स्‍क्‍वैटिंग अपराध है उस पर कानून कुछ कहता होगा...ये हमारी नहीं कानूनचियों की दिक्‍कत है...अपनी दिक्‍कत बस इतनी है कि लोगों के व्‍यक्तिगत छाया युद्ध यहॉं सामूहिकता के विरूद्ध अपराधों की गर्त में जा पहुँचे हैं। इससे पहले की कोई बॉंग देकर मसीही हासिल करे चेता देना जरूरी है।



1/02/2010: अपडेट  अभी ज्ञात हुआ कि श्री पाबला इस पोस्‍ट से आहत हुए हैं, खेद है। उनकी पोस्‍ट का शीर्षक कोई उत्तर देने की मांग करता है, किंतु हमें कोई सवाल पोस्‍ट में मिला नहीं यूँ भी ऐसा सर गाड़े उत्‍तरपुस्तिकाओं से जूझ रहे हैं कि उत्‍तर शब्‍द से ही थकान हो रही है :) । उन्‍हें शायद तस्‍वीर से आपत्ति थी.. हम उनकी यही तस्‍वीर पता थी इसलिए ये लगाई। पर यदि उन्‍हें आपत्ति है तो हटा देने में क्‍या हर्ज है। हटा दे रहे हैं आशा है अब बेहतर अनुभव कर रहे होंगे। अब तक हुए कष्‍ट के लिए खेद है।

Thursday, December 10, 2009

ब्‍लॉगवाणी पर हैकर हमला

ब्‍लॉगवाणी पहुँचने की कोशिश करने पर आज ये चेतावनी दिख रही है

ScreenHunter_01 Dec. 10 16.45

चिंतित हो मैथिलीजी से संपर्क किया तो उन्‍होंने पुष्टि की कि ये ब्‍लॉगवाणी तथा उनकी कुछ अन्‍य साईट्स पर ये हैकर अटैक है। उनके तनाव का अनुमान कर हमने आगे बात की नहीं पर उन्होंने बताया कि टीम काम पर लगी है उम्‍मीद है ब्‍लॉगवाणी जल्‍द ही दिखने लगेगी... हमारा अनुमान कुछ घंटों का है।

कृपया ध्‍यान दें यदि आपके ब्‍लॉग पर ब्‍लागवाणी के विजे़ट हैं तो कई ब्राउजर आपके ब्‍लॉग पर पहुँचने की कोशिश करने वाले पाठकों को माल्‍वेयर चेतावनी दे रहे हैं तथा ब्‍लॉग पर नहीं पहुँचने दे रहे हैं।  आप प्रतीक्षा न करने चाहें तो अस्‍थाई रूप से ब्‍लॉगवाणी विजेट अपने ब्‍लॉग से हटा लें फिर आपका ब्‍लॉग सक्रिय हो जाएगा।

यह पोस्‍ट केवल सूचनार्थ है।

खून खौलाना की काफियापूर्ति करते मौलाना (आजाद)

टॉम ऑल्‍टर की कुछ सबसे दमदार प्रस्‍तुतियों में से एक है मौलाना आज़ाद। हम पिछले कुछ सप्ताह से इंतजार कर रहे थे और फिर कल दोपहर इस एकल नाटक (सोलो)  की प्रस्‍तुति हमारे कॉलेज सभागार में की गई। आधुनिक भारत में भारतीय मुसलमानों के राजनैतिक जीवन की उथल पुथल पर बेबाक टिप्‍पणी है ये नाटक। बहती हुई उर्दू में टॉम ऑल्‍टर मौलाना आजाद के किरदार को इस खूबसरती से अदा करते हैं कि इस सोलो प्रस्‍तुति को भारतीय रंगमंच की चंद सबसे दमदार प्रस्‍तुतियों में शुमार किया जाता है इसलिए कल जब खुद अपने ही कॉलेज में इसे देखने का मौका मिला तो हमने झट लोक लिया। नाटक पीरो ट्रूप  रंगमंच समूह द्वारा मंचित किया गया। कॉलेज में हुई प्रस्‍तुति से चंद तस्‍वीरें-

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यूट्यूब से प्राप्‍त इसी नाटक से संबंधित दो वीडियो जिनमें से एक तो इस नाटक पर इसके निर्देशक सईद आलम साहब की टिप्‍पणी है जबकि दूसरा कहीं अमरीका में हुए प्रदर्शन का वीडियो है किंतु इस अमरीकी प्रस्‍तुति में सेट तथा प्रस्‍तुति उतनी दमदार नहीं दिख रही है जितनी कल थी... इसकी वजह शायद यह कि कॉलेज में उर्दू को लेकर महौल तथा स्‍वीकृति दोनों ही अधिक है। सेट भी कॉलेज सभागार में कहीं अधिक संसाधन संपन्‍न था।

वीडियो-1

वीडियो 2

हमारी राय पूछें तो इस मायने में ये एक साहसिक प्रस्‍तुति है कि सईद आलम लिखते हैं... टॉम ऑल्‍टर किरदार अदा करते हैं पर वे अल्‍पसंख्‍यकों की रिवाजी देशभक्ति के चक्‍कर में नहीं पड़ते... सरदार पटेल (और नेहरू) को जिन्‍ना के बराबर विभाजन का दोषी बताना साहस का काम है और इस प्रस्‍तुति में इस तरह से कही गई है कि विश्‍वसनीय जान पड़ती है।

Wednesday, December 09, 2009

हमारा अँगूठा हाजिर है श्रीमान

थोड़ी देर लिंक खोजा पर मिला नहीं लेकिन याद ताजा है कि पिछले दिनों किसी ने सवाल उठाया था कि कुछ लोग अपने कार्यालय से ब्‍लॉगिंग करते हैं ये कहॉं तक उचित है ये संभवत पाबलाजी, अनूपजी या ज्ञानदत्‍तजी को या शायद हमें भी संबोधित था, लेकिन  अपने मन में ये कोई सवाल ही नहीं है क्‍योंकि हमारे लिए नैतिकता की परिभाषा इतनी स्‍थूल नहीं है। तब भी पिछले दिनों इलाहाबाद में जब ज्ञानदत्‍तजी समय प्रबंधन के मसले पर मंच से मुखातिब थे तो हमने ये कहकर कि सवाल हमारा नहीं बेनामी है पूछा ...ये बताऍं कि क्‍या दफ्तर से ब्‍लॉगिंग करने में नैतिकता का कोई सवाल उठता है... ज्ञानदत्‍तजी का उत्‍तर बेहद शांत व स्‍पष्‍ट था... नहीं ये कतई नैतिकता का सवाल नहीं है। सुबह उठते ही ज्ञानदत्‍तजी अल्‍ल सुबह घर से कंप्‍यूटर चलाते हैं और देखते हैं कि ट्रेनों का स्‍टेटस क्‍या है... ब्‍लॉगिंग करते हैं..काम करते हैं...दफ्तर में भी ये क्रम रहता है...दरअसल दफ्तर व घर का जो बंटवारा समझा जा रहा है वह बेहद कृत्रिम है असल जिंदगी में दोनों जगह काम होता है ... चौबीस घंटे की नौकरी है... इस मायने में घर के सब काम भी उसी कार्यालयी मनोदशा से ही जुड़े हैं इनके बीच तनाव व नैतिकता का सवाल बेमानी है।

हमें पांडेयजी के इस उत्‍तर से न कोई हैरानी हुई न परेशानी क्‍योंकि हमारा खुद का दृष्टिकोण यही रहा है। ये सवाल हमारे पेशे के बारे में अक्‍सर उठाया जाता है..दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में शिक्षकों को प्रति सप्‍ताह अठारह घंटे कक्षाएं लेनी होती है, हम विद्यार्थियों की हाजिरी लेते हैं तथा इसे सत्र के बाद दाखिल कर देते हैं इसे ही हमारी हाजिरी भी माना जाता है  अलग से न आने के समय की बंदिश है न जाने की... बस उम्‍मीद ये की जाती है कि कक्षा के समय हम कक्षा में उपस्थित रहेंगे। इतने सब के बाद भी जितनी शिद्दत से हम छुट्टियों का इंतजार करते हैं कोई और नहीं करता दिखता।  आखिर क्‍यों ?

वजह वही है जो ज्ञानदत्‍तजी ने बताई। शिक्षक के लिए कक्षा और कक्षा से बाहर के काम की जो हदबंदी कई लोगों खासकर नौकरशाही किस्‍म की सोच के लोगों के दिमाग में है वो शैक्षिक दुनिया का सच नहीं है। आज ही फेसबुक में एक दोस्‍त ने पूछा कि बायोमैट्रिक हाजिरी के बारे में आपकी क्‍या राय है- उनका इशारा विश्‍वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा प्रत्‍येक शिक्षक के अंगूठे के छाप से रोजाना हाजिरी लेकर ये सुनिश्चित करने के प्रस्‍ताव से था जिसके तहत हर शिक्षक को रोजाना 6-8 घंटे कॉलेज में रहना होगा। फिलहाल प्रस्‍ताव को टाल दिया गया है पर ये प्रस्ताव कितना फूहड़ है इसे केवल वे ही समझ सकते हैं जो दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय या जेएनयू जैसे विश्‍वविद्यालयों की कार्यसंस्‍कृति से परिचित हैं। ऐसा नहीं है कि यहॉं  गैरहाजिर रहने की समस्‍या यहॉं है ही नहीं पर वाथवाटर के साथ बेबी फेंक देना मूर्खता है। शिक्षक केवल 6-8 घंटे रोजाना शिक्षक नहीं होता वो चौबीस घंटे केवल शिक्षक ही होता है। जिस पचास मिनट के पीरियड में वह कक्षा लेता है उसमें उसके अब तक के सारे ज्ञान को शामिल रहना होता है ठीक वैसे ही जैसे कि एक कलाकार के श्रम को उसके प्रदर्शन के मिनटों की गणना करके नहीं समझा जा सकता। ये पचास मिनट शिक्षक का काम नहीं होते वरन उसकी परफार्मेंस होते हैं उसका काम तो उस सारे रियाज को समझा जाना चाहिए जो वह पूरे दिन करता है और हमारे लिए तो दिन भी कम पड़ता है।  अगर हमारे कॉलेज हमें कॉलेज में ही इस रियाज के मौके देने को तैयार हों तो शायद किसी को भी पूरे दिन वहॉं रहने में तकलीफ न हो। हम जब कॉलेज से  रवाना होते साथियों से दिन भर की विदाई का हाथ मिलाते हैं तो सदैव सवाल होता है ...कहॉं ? क्‍योंकि अधिकांशत: कॉलेज के बाद किसी गोष्‍ठी, लेक्‍चर, पुस्‍तकालय, सुपरवाइजर, मंडी हाउस, विश्‍वविद्यालय ही जाना होता है या कभी कभी उत्‍तर सुनाई देता है ... कहीं नहीं यार घर ही जाउ़ंगा थकान है घर जाकर पढूंगा... कोई शुद्ध लिपिकीय तरीके से इस बात की जॉंच पर बल दे सकता हे कि इस सब 'कामों' में कितने 'पर्सनल' हैं कितने 'आफीशियल' यानि बताएं कि जो उपन्‍यास आप पढ़ रहे हैं वो पाठ्यक्रम का ही है न... वगैरह।  हमारी नजर में कसौटी ये है कि आउटपुट की तुलना करें। देश के बहुत से राज्‍यों में शिक्षक हाजिरी देते हैं स्‍कूल कॉलेज में मौजूद रहते हैं लेकिन सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का परिणाम कहीं कम होता है... क्‍या स्‍वविवेक पर निर्भर स्‍वाभिमानी  प्रोफेसर को अंगूठाछाप बना देना उन्‍हें बेहतर शिक्षक बनाएगा.. हमें तो शक है, पर अगर अब द्रोणाचार्य के एकलव्‍य बनने की बारी है तो हमारा अंगूठा हाजिर है श्रीमान। 

Wednesday, November 11, 2009

मैं चर्चाता हूँ...इसलिए मैं हूँ

अगर इंसान पहचान के कई टुकड़ों में साथ साथ जीता है पिता, मित्र, धर्म, जाति... तो भला ब्‍लॉगर की क्‍योंकर एकमुश्‍त पहचान होगी... वो भी अपने अलग अलग चिट्ठों, पोस्‍टों, टिप्‍पणियों से पहचान हासिल करता है... हम भी करते हैं, पर जब कोई हमसे पूछता है तो जिस पहचान को हम मसिजीवी होने के बाद सबसे अहम मानते हैं वह है चर्चाकार होना। चिट्ठाचर्चा के इतिहास पर हमारी कोनो पीएचडी नहीं है, सुकुलजी इतिहास दर्ज कर चुके हैं बांच लें, चिट्ठाचर्चा ने 1000 पोस्‍टों का सफर पूरा करने के अवसर पर हम केवल इस मंच से अपने जुड़ाव की बात करेंगे और नहीं।

मित्रों के सद्भाव के चलते जनसत्‍ता से ब्‍लॉगों पर एक स्‍तंभ जिखने की पेशकश हुई... पहले अविनाश अपना कॉलम लिखते थे पर उन्‍होंने भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया तो जाहिर है जनसत्‍ता में जारी नहीं रख सकते थे, थानवीजी से फोन पर बात हुई उन्‍होंने कहा कि आपका कालम है खुद कोई नाम रखें... 'चिट्ठाचर्चा' हमने बिना झिझक कहा, आखिर नियमित रूप से पोस्‍टों की चर्चा और भला क्‍या नाम आ सकता था हमारे मन में। जब तक जनसत्‍ता में कॉलम आया चिट्ठाचर्चा नाम ही रहा कभी मन में नहीं आया कि ये शुक्‍लजी के मॉडरेशन में चल रहे किसी सामूहिक ब्‍लॉग का नाम है... भले ही शुक्‍लजी हमसे सौगुनी मेहनत करते हैं चर्चा पर, किंतु चिट्ठाचर्चा हम सब का है... ये 'अविनाश के' मोहल्‍ले या 'यशवंत के' भड़ास सा कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग नहीं है ये वाकई हमारी चिट्ठाचर्चा है इसलिए जब कोई टर्राते हुए इसे सुकुलजी के किन्‍हीं गुट की चर्चा कहता है तो झट मन में आता है बड़े आए सुकुलजी...(नारद को लेकर भी ऐसा ही मन में आता था अभी तक तो उम्‍मीद है कि चर्चा के मामले में ये विश्‍वास बना रहेगा)  

ऐसा नहीं कि नाराजगी नहीं हुई खुद अनूप धुरविरोधी प्रकरण में हमसे धुर असहमत थे... उनकी क्‍या कहें घर में खुद नीलिमा असहमत थीं

धुरविरोधी के विरोध का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं

पर हमने चर्चा का विषय इसे बनाया एक बार नहीं लगा कि चिट्ठाचर्चा अनूप के मॉडरेशन में चल रहा ब्‍लॉग है उन्‍हें आपत्ति होगी। दरअसल चिट्ठाचर्चा में वैयक्तिकता व सामुदायिकता का जो संतुलन है उसे महसूसने की जरूरत है इसे साधुवादी वाह वाह से नहीं पकड़ा जा सकता। आप कौन सी पोस्‍ट चर्चा के लिए चुनेंगे ये प्रक्रिया राग द्वेष से मुक्‍त नहीं है होना मुश्किल भी है पर सिद्धांतत: चर्चाकार मानते हैं कि चर्चाकार को अपने विवेक से यह तय करने का हक है इसलिए इन आपत्तियों को कभी तूल नहीं दिया जाता कि कौन सी पोस्‍टें चुनी गईं... इसी प्रकार चर्चाकार की दृष्टि भी स्‍वतंत्र है किंतु दूसरी ओर सरोकारों की एक स्‍वीकृत सामुदायिकता है। पिछले कुछ महीनों से मेरी, नीलिमा तथा सुजाता की   ब्‍लॉगिंग में सक्रियता कम हुई है पर कम से कम इतना प्रयास अवश्‍य करते हैं कि चर्चा अवश्‍य हो जाए भले ही संक्षिप्‍त रह जाए वैसे इसमें कितना योगदान हमारी प्रतिबद्धता है कितना अनूपजी के तकादों का, यह कहना कठिन है।

भविष्‍य की ओर घूरें तो मुझे लगता है कि जैसा कि इलाहाबाद में इरफान ने अपने परचे में कहा था...हम ब्‍लॉगर खुद ब्‍लॉगिंग पर लिखना बांचना पसंद करते हैं इससे तय है कि चर्चा की यात्रा अभी चलेगी...नए चर्चा मंच दिखाई दे रहे हैं...उनकी मौलिकता को लेकर कुछ संशय है पर ये संशय भी मिटेंगे...अपनी तो राय है मोर दि मेरियर।

Thursday, November 05, 2009

हिन्‍दी के हेड कविता क्‍यों नहीं लिखते ?

“हिन्‍दी के हेड हमेशा कवि-आलोचक होते हैं, एकाध तो उपन्‍यास लिखने की धमकी भी दे रहे हैं। ये लोग इसीलिए लेखक को नीची नजर से देखते हैं। साहित्‍य के औजार हैं इनके पास। जब जी चाहा, कुछ भी गढ़ लिया। ये लोग समझदार बहुत होते हैं , लेकिन स्‍याने ? किसने कहा था एजुकेशन कम्‍स बट विज़डम लिंगर्ज। “

- स्‍वदेश दीपक (मैंने मांडू नहीं देखा, पृ. 20)

स्‍वदेश दीपक के इस कथन के आलोक में अपने विश्‍वविद्यालय के पुराने, हाल फिल‍हाल और बेहाल नए-पुराने सब हेड (विभागाध्‍यक्ष...क्‍या भारी शब्द है न) को याद कर जाता हूँ... डा. नगेन्‍द्र, भारी भरकम आलोचक...गैर कवि..और शायद कवित्‍व विरोधी भी। head और फिर सर्वप्रोफेसर सुरेशचंद्र गुप्‍त, नित्‍यानंद तिवारी, बालीजी, महेन्‍द्र कुमार.... और प्रो. निर्मला जैन ( स्‍वदेश दीपक उनके लिए तो ये कथन लिखा ही है) ...और अब प्रो. पचौरी सब के सब एक के बाद एक आलोचक... कवि कोई नहीं। लिखे गए नामों के अलावा कई 'वगैरह' भी हैं जो हेडत्‍व को प्राप्‍त हुए हैं और वे 'वगैरह' इसलिए हैं कि वे कविता तो छोडो कुछ्छे नी लिखते। हमारे विश्‍वविद्यालय को छोडि़ए तमाम हिन्‍दी के हेड शायद इसी व्‍याधि से दर्ज हैं, मैं हैरान हूँ कि विश्‍वविद्यालयी हिन्‍दी की गत का इस तथ्‍य से कोई संबंध बनता है कि हिन्‍दी के हेड कविता नहीं लिखते ?

पुनश्‍च: मैं भी कविता लगभग नहीं ही लिखता :)

Sunday, October 25, 2009

इलाहाबाद...कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

ब्‍लॉगजगत में हलकान तत्‍व की प्रधानता व सजगता देख दिल बाग बाग हुआ जाता है। लोग हैदराबाद की उपेक्षा और वर्धा वालों की निमंत्रण सूची की अनुपयुक्‍तता से भी दुखी हैं... सजगता भली चीज है इसलिए इन आशंकाओं का स्‍वागत होना चाहिए। पर हम एक ब्‍लॉगर नजर से बात साफ कर देना चाहते हैं कि ब्‍लॉगिंग कोई कूढे का ढेर नहीं कि जिस पर खड़ा होकर कुक्‍कुट मसीहा होने की घोषणा कर सकें...चलिए एक ब्‍लॉगर नजर से बताते हैं कि क्‍यों विश्‍वविद्यालयी आयोजन उत्‍सव भले ही हों...भय खाने की चीज नहीं हैं- अनूपजी हमें यहीं छोड़कर कानपुर चले गए हैं हम भी गेस्‍टहाउस से उसी परिसर में आ गए हैं जहॉं कार्यक्रम था  ताजा हाल ये है कि

नामवरी कुर्सियॉं औंधा दी गई हैं, पोडियम दबे पड़े हैं

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आसनों की अट्टालिका कुछ कहती है क्‍या ?

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घोषणापत्रों की गत ये हो गई है

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अभी संजयजी ने बताया कि हम चौथा पॉंचवा खंबा हैं...

बाहर मीडिया से मिले तो बोल पड़े- यह पांचवा स्तंभ है. संभवत: नामवर सिंह भी मानते हैं कि चार स्तंभ कमजोर हुए हैं इसलिए नियति के कारीगर ने इस पांचवे स्तंभ को गढ़ने का काम शुरू कर दिया है.

गिनती आप खुद कर लें कि कौन सा है पर इतना तय है मीडिया एक खंबा तो है .. देख लें-

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बहुत से लोगों को आपत्ति है कि कुछ को फूल मिले कुछ को नहीं... तो जान लें कि हर गुलदस्‍ते की परिणति एक ही है -'कचरापेटी'

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तो तंबू बंबू उखड़ चुका है...लोगों से मिले उन्हें जाना.. मनीषा, आभा, प्रियंकर, अनूप, इरफान, भूपेन, रवि, अफलातून, बोधिसत्‍व, विनीत, अजीत,प्रवीण....और भी इतने लोग... किसी पर कोई प्राइस टैग नहीं था, कोई बिकाऊ नहीं था... सब जानते हैं मानते हैं कितनी ही संगोष्‍ठी हों... ब्‍लॉगिंग वो तो नूंहए चाल्‍लेगी :)

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Saturday, October 24, 2009

इलाहाबाद से गैर-रपटाना....एकदम ब्‍लागराना

इस रपट बहुल वातावरण में हम सरीखे हमारे सामने बहुतई दिक्‍कत है... जब त्‍वरित रिपोर्टिंगों के चलते एक दो तीन चार पॉंच छ: सात... रपटें आ चुकी हों तो हम का करें। बेचारे एक ही नामवर सिंह है गलत तथ्‍य भी एक ही दिया है अब इस पर कितनी बार लिखा जा सकता है.... अमृत उत्‍सव मना चुका व्‍यक्ति एकाध तथ्‍यात्‍मक भूल का हक तो रखता ही है। अपना संकट ये है कि अगर कुछ नहीं लिखा तो कई लोग जिनमें घर के अधिकार-प्राधिकार संपन्‍न लोग शामिल हैं मान बैठेंगे कि हम इहॉं बस मस्‍ती करने आए हैं... तो हमारी निम्‍न बातों पर जरा ध्‍यान दें कि हम मस्‍ती नहीं कर रहे हैं खूब काम कर रहे हैं....

सुबह सुबह खून के आसुओं कर पृष्‍ठभूमि में दो-ठो चाय पीना कम जोर काम नहीं है...

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दो क्‍यों ? अरे साहब हम दम ठोंक कर कहते हैं कि चाय के प्‍यालों का जितना पतन इस शहर में हुआ है उतना तो सांसदों की गरिमा तक का नहीं हुआ...

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हमने खूब अनुमान लगाए कि इस कप का आयतन क्‍या है पर कोई अनुमान तीस एमएल को छू नहीं पाया।

फिर भी चाय साधुवादी थी....क्यों ? इसलिए कि चायवाला साधु था-

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इतने काम को ही ही हम पर्याप्‍त मानते हैं पर यहॉं तो इलाहाबाद न जाने हमसे कितना काम करवा लेने पर उतारू था..मसलन ये कैथा का अनुभव करना..

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न जी इसे कम वीरता का काम न मानें..देखें ये प्रापर इलाहाबादी बालिका तक इस कैथे को चख कैसे उफ कर बैठी हैं-

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और जिन को अबहू लग रहा है कि हम कुछ नहीं कर रहे तो बताइए कि अगर ये जो नामवरजी लुड़कत्व को प्राप्‍त हुए हैं क्‍या इसमें हमारी कोनो भूमिका नही है...

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फिर शाम को अंडा भक्षण...

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सुबह पोहा पूजन

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रात को गपबाजी के चिरकुट सुख-

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इतने काम कर हम बहुत थक गए हैं अनूपजी सर पर सवार हैं चलो नाश्‍‍ता करना ही पडेगा...सुबह भी जलेबी 'खानी पडीं'।

चलते चलते आयोजकों की व्‍यवस्‍था के विषय में बता दें कि पूरा ध्‍यान रखा गया है यहॉं तक कि ब्‍लॉगर संप्रदाय की अनन्‍य आवश्‍यकता टंकी तक की व्‍यवस्‍था परिसर में है जो चाहे झट टंकी आरोहण कर ब्‍लॉगत्‍व को प्राप्‍त हो... हमारी शिकायत बस यही है कि आयोजकों ने ब्‍लॉगरों को शिकायत की गुंजाइश न देकर शिकायत-ब्‍लागिंग की सुविधा नहीं दी है

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एक और बात विनीत के आडियो रिकार्डर खो जाने की खबर से घर के लोग परेशान होंगे कि विनीत जैसा सुपर सतर्क बालक अगर गुमाने पर आतुर हो गए हैं तो हम जैसे गुमातुर व्‍यक्ति क्‍या होगा... तो आश्‍वस्‍त रहें अब तक केवल एक कंघी लापता है...उसकी भी तफ्तीश जारी है। हमारे कमरे के साथी अनूप शुक्‍ल हैं... ये केवल सूचना के लिए है पिछले वाक्‍य से इसका कोनो संबंध नहीं है।

Tuesday, September 29, 2009

ब्‍लॉगवाणी में चंद कोड्स से अधिक जो कुछ था हमारा था

अब घंटों बाद ये कोई खबर नहीं रह गई है कि ब्‍लॉगवाणी बंद हो गया है। क्रोध, आश्‍चर्य, पीड़ा और भी कई संज्ञाओं से उस भावना को व्‍यक्त करने की कोशिश कर सकता हूँ जो इस खबर को जानने के बाद उपजी हैं। ये सभी संज्ञाएं ठीक भी होंगी पर सच बताने को जी चाहता है और वह ये कि सबसे ज्‍यादा जिस भाव को महसूस किया वह है अपमान। मैथिलीजी व सिरिल से बहुत कुछ सीखा है तथा हम किताबी लोगों में उद्यमी लोगों के प्रति जो अवहेलना का भाव होता हे उससे खुद को जितना कुछ मुक्त कर सका हूँ उसमें इस गुप्‍तद्वय की विशेष भूमिका है। पर इस प्रकरण में ब्‍लॉगवाणी की हत्‍या कर दिए जाने ने मुझे आहत किया है शुद्ध व्‍यक्तिगत हानि। मैथिलीजी तथा सिरिल से संबंध बेहद अनौपचारिक हैं, इतने कि झट से फोन कर दो-चार हजार का उधार मॉंग लेने तक में कभी शर्मिंदगी महसूस नहीं हुई पर इस प्रकरण में इतना अपमानित महसूस कर रह हूँ कि हिम्‍मत नहीं हुई कि फोन या ईमेल कर कुछ कह सकूँ। लगता है एक झटके से उन्‍होंनें  कुछ कहने का अधिकार ही हमसे छीन लिया।

एकाध जगह जहॉं हमने टिप्‍पणी की वहॉं हमने कहा

''ये पूरा प्रकरण ही अत्‍यंत खेदजनक है। न केवल आरोप-प्रत्‍यारोप खेदजनक हैं वरन नीजर्क प्रतिक्रिया में ब्‍लॉगवाणी को बंद किया जाना भी। क्‍या कहें बेहद ठगा महसूस कर रहे हैं...अगर ब्‍लॉगवाणी केवल एक तकनीकी जुगाड़ भर था तो ठीक है जिसने उसे गढ़ा उसे हक है कि उसे मिटा दे पर अगर वह उससे कुछ अधिक था तो वह उन सभी शायद लाख से भी अधिक प्रविष्टियों की वजह से था जो इस निरंतर बहते प्रयास की बूंदें थीं तथा इतने सारे लोगों ने उसे रचा था.... हम इस एप्रोच पर अफसोस व्‍यक्त करते हैं। यदि कुछ लोगों की आपत्ति इतनी ढेर सी मौन संस्‍तुतियों से अधिक महत्‍व रखती है तो हम क्‍या कहें...'' 

जिन ब्‍लॉगरों की आपत्तियों के परिणामस्वरूप ये हुआ उनसे मुझे कुछ खास नहीं कहना, इसलिए भी नहीं कहना चाहता कयोंकि मुझे नहीं लगता उन्‍हें सीधे संबोधित करने का कोई अधिकार मुझे है, मैं ठीक से उन्‍हें जानता पहचानता भी नहीं। शेष कुछ लोगों को सहज ही नारद प्रकरण तथा धुरविरोधी की हत्‍या याद होगी।  काश धुरविरोधी आस पास होता तो वो देख सकता कि कैसे ब्‍लॉगवाणी प्रकरण में  एक हत्‍या को आत्‍म‍हत्‍या करार दिया जा रहा है। नारद में हमारा पैसा नहीं लगा था पर उसे उन लोगों द्वारा मिल्कियत समझने पर हम खुद को ठगा महसूस कर रहे थे जिनका साझे का ही सही पर पैसा व मेहनत इसमें लगी थी। पैसा अपना ब्‍लॉगवाणी में भी नहीं लगा था पर इसे भी हम अपना सा ही समझते थे...गलती हमारी ही थी...एक बार में नहीं सीखे तो धोखा तो होना ही था।

बहुत कुछ कहने की इच्छा नहीं पर दर्ज कर देना चाहते हैं कि भले ही विधिक या जिस भी नजरिए से कोई 'अपनी' साइट मिटा देने से आपको रोक नहीं सकता पर फिर से बेव 2.0 की प्रकृति पर विचार करें... इसमें लगे कोड भले ही आपने रचे हों पर ये कोड जिन शब्‍दों से मिलकर वास्तविक अर्थ गढ़ते हैं वे प्रयोक्ता रचित (यूजर जेनरेटिड) होते हैं अत: इन प्रयोक्ताओं को संभलने का कोई मौका दिए बिना उनके पैरों से कालीन से यह कहकर छीन लेना कि भई ये हमारा कालीन है, हमें न्‍यायपूर्ण नहीं जान पड़ता। 

बस और कुछ कहने को जी नहीं चाहता !!!

Thursday, September 17, 2009

अरे मेरा विश्‍वविद्यालय खो गया है

अभी कुछ नई जानकारी के लिए अपने विश्‍वविद्यालय की वेबसाइट पर झांका तो ये पाया

ScreenHunter_01 Sep. 17 17.58

मतलब विश्‍वविद्यालय की भारी भरकम साइट गायब है उसकी जगह एक नवेली हल्‍की फुल्‍की किसी एडवाइजरी समिति की साइट ने हथिया रखी है जिसका विश्‍वविद्यालय से कोई संबंध नहीं है।

वैसे लगता नहीं कि ये हेकिंग का मामला है क्‍योंकि जो साइट आ रही है वो भी एक सरकारी साइट है जिसका पता बाकायदा इलैक्‍ट्रानिक निकेतन का है। यानि ज्‍यादा संभावना ये है कि बाबूगिरी वाले तरीके से नई तकनीक से खेलने का परिणाम है। उम्‍मीद है हमारा खोया विश्‍वविद्यालय ज्‍ल्‍द ही मिल जाएगा। :))