Thursday, July 12, 2007

क्‍या आप भी विंडोज लाइव राइटर इस्‍तेमाल करते हैं ?

 

है तो ये पोस्‍ट भी एक किस्म की परीक्षण पोस्‍ट ही पर छीछालेदार न हो इसलिए एक छोटी सी पोस्‍ट लिख ही डाली जाए।  हम कुछ समय से एक ऐसा औजार खोज रहे थे जो ऑफलाइन ही पोस्‍ट लिखने और सजान, लिंक देने आदि की सुविधा दे, हो सके तो समय आदि भी तय करने की भी ताकि हमारी इच्‍छा से पोस्‍ट पब्लिश हो और हमारी निर्भरता इस लगातार ऑनलाइन रहने पर से कम हो। हमें सुझाव दिया गया कि विंडोज लाइव राईटर ट्राई करें। सो कर रहे हैं।

सबसे पहले इसे डाउनलोड किया पर इसे आसान न मानें इस पच्‍चीसेक एमबी के डाउनलोड में हमारे एमटीएनएल ब्राडबैंड ने बैंड बजा दिया। पच्‍चीसेक इसलिए कि डाट नेट भी मांगता है जो समझदार लोगों के सिस्‍टम में पहले ही होता है पर हम तो ठहरे....

 

खैर जैसे तैसे  रात के 1.55 पर ये दोनों इंस्‍टाल तो कर लिए हैं, एक परीक्षण पोस्‍ट टेस्‍टब्‍लॉग पर डाली भी पर लगता है कुछ पंगे बचे हैं- मसलन तस्‍वीर डालने की कोशिश की तो पता चला कि हमारा ब्‍लॉगर ये सुविधा नहीं दे रहा है कि सीधे तस्वीर डाल सकें, कुछ एफटीपी जैसी चीज करने को कह रहा है- कुछ कुछ याद है पर ये तो हम 5-6 साल पहले किया करते थे अब तब वहीं तो नहीं होगा मामला।

कुल मिलाकर अब हमारी ब्‍लॉगिंग में हम एमटीएनएल के रहमोकर्म पर कुछ कम निर्भर हो गए हैं...या अभी तक तो ऐसा लगता ही है। आप भी ट्राई करें....अगर पहले से कर रहे हैं तो बताएं कि तस्‍वीर कैसे डालें

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Wednesday, July 11, 2007

देबाशीष की पोस्‍ट से उपजे सवाल और अविनाशरहित दिल्‍ली मीट

चिट्ठाजगत की हाल की घटनाओं पर देबाशीष की पोस्‍ट कई मायने में अहम है। एक तो ये तकनीकी लोगों का खासतौर पर नारदीय तकनीकी लोगों के पक्ष को सामने रखती है जो इसलिए जरूरी था कि आमतौर पर इनमें से कुछ तकनीकी लोगों की भाषाई अभिव्‍यकित में बहुत-कुछ या तो अनकहा रह जाता है या ...या समझें कि बात का हलुवा हो जाता है। पोस्‍ट में कई बातें हैं पर जिस बात को हम सबसे अहम मानते हैं वह है इस बात की पहचान कि चिट्ठाकारी में युग परिवर्तन का दौर आ गया है- अविनाश को केंद्रीय भूमिका देकर (मो‍हल्‍लापूर्व व पोस्‍ट मोहल्‍ला) आप आने वाले युग की प्रवृत्तियों की लगभग सटीक पहचान कर रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हालांकि ऐसे में अविनाश को लोगों द्वारा पुन: अल्‍टीमेटम दिया जाना और बात का लगभग ‘या तो हम रहेंगे या तुम’ तक पहुँच जाना लोगों की इस बदलाव के लिए पूरी तैयारी न होने को ही दिखाता है...खैर तैयार होना ही पड़ेगा...इतिहास यू टर्न नहीं लेता।

इसके साथ ही देवाशीष की पोस्‍ट में नारद के लिए चेतावनी के कई स्वर हैं जिनकी सराहना की जानी चाहिए। पहली बात नारद को लेकर बातें कुछ कुछ गए जमाने की बातों की ही तरह हैं जो ठीक ही है, यदि उनके सुझाए बदलावों पर नारद विचार नहीं करता तो उसका स्‍थानापन्‍न होना तय है। ये नहीं कहा जा रहा कि नारद से उसकी ‘इतिहास में जगह’ को कोई छीन लेगा, वह तो नहीं ही होगा पर ये तो नारद को ही तय करना होगा कि नारद इतिहास की चीज बनना चाहता है कि वर्तमान की। वर्तमान का तकाजा है कि लोगों को जोड़ो न कि उनसे चुन चुन कर मेल मंगाओ।

भाषाई लोग, इसमें केवल पत्रकार ही नहीं हैं हम जैसे भी हैं जिन्‍हें तकनीक भयभीत नहीं करती पर जिनके लिए तकनीक ही सबकुछ नहीं है। हमारा साबका व सरोकार उन तमाम सत्‍ता संरचनाओं से रहता है जो आस पास विद्यमान हैं इसलिए जब कोई तकनीकज्ञ 'ये परिवार सबकी सुनता है’ जैसे सड़ांध मारते जुमले फेंकता है तो इन संरचनाओं के संधुत्‍सु लोगों के कान वैसे ही खड़े हो जाते हैं जैसे किसी खतरनाक ईमेल को देखकर रविजी चौकन्‍ने हो सबको खबर कर देते हैं। क्‍योंकि एक बहुलवादी समाज में सभी पक्षों के प्रति संवेदनशीलता साधना एक जटिल काम है तथा कई बार तकनीकज्ञों का प्रशिक्षण इस मामले में आधा-अधूरा होता है- वे धर्म, परिवार, राष्‍ट्र, जाति, लिंग, क्षेत्रियता आदि में निहित जटिलताओं को समझने में या तो पूरी तरह असमर्थ होते हैं या इन्‍हें वे पूरी तरह महत्‍वहीन लगती हैं (ऐसा नहीं है कि गैर तकनीकज्ञ इस मामले पूरी तरह संवेदनशील होते हैं- पर उसकी कुछ उम्‍मीद अधिक होती है) ये सवाल भले ही किसी नई सुविधा के नामकरण का हो या कडवी बहस या मोहक चुप्‍पी में से एक के चयन का, तकनीकी पक्ष ने लगातार अपनी संवाद व संवेदनशीलता की असमर्थता का खुला विज्ञापन किया है। उदाहरण के लिए जिसे आपने टी आर पी के लिए ही सब शोर मचाने वाला कहा उसके नारद से ही हट जाने के कदम के बाद भी ये स्‍वीकार नहीं आया कि मामला टीआरपी से अलग भी हो सकता है। ऐसा तो नहीं ही होगा कि सभी ऐंजेल सेल्‍स व आईटी में गए होंगे और भाषा के हिस्‍से डेविल ही बचे होंगे।

एक बात जो बहस के तेवर की असहमति से उपजी कड़वाहट से जुड़ी है जो देबाशीष से छूट गई है- जिसकी हठ अविनाश को संवाद के स्थान पर संग्राम की ओर धकेले दे रही है। हर माध्‍यम अपनी भाषा को विकसित करता है तथा उसकी अपनी प्रक्रिया होती है, अन्‍य माध्‍यमों की भाषा यथावत दूसरी जगह रोपी नहीं जा सकती- हिंदी चिट्ठाकारी, जीतू भैया- साधुवाद- जारी रहें- अच्‍छा अच्‍छा- मनोरम- वाह वाह के बीजों से उपजती है, वह बहुत परिपक्‍वता से अविनाश व प्रमोद को पचा लेती है पर राहुल की भाषा...नहीं...क्‍योंकि वह उन सभी संवेदनशीलताओं का अतिक्रमण करता जिनकी दरकार अभी इस माध्‍यम को है। इस भाषा से राहुल प्रतिबंध योग्‍य तो नहीं बन जाता किंतु नजरअंदाज किए जाने योग्‍य जरूर हो जाता है। यही वजह है कि संजय बेंगाणी को कुछ इंच छोटा किए जाने के उनके प्रलाप को हमने देखा, गुस्‍सा भी आया पर उसे टोककर शहादत की प्रसन्‍नता मुहैया कराना उचित नहीं समझा। राष्‍ट्रीय सहारा सुपारी किलरों को पत्रकार बना सकता है तो गुजरात क्‍यों मोदी को मुख्‍यमंत्री नहीं बना सकता। कहना सिर्फ इतना है कि जब अविनाश को सार्थक बहस का वातावरण तैयार करने का श्रेय दिया ही जा रहा है तो ये भी उनकी ही जिम्‍मेदारी बनती है कि स्‍वयं इस वातावरण को चुप्‍पी का वातावरण न बनाएं।
अब लीजिए ये ही देखिए कि चिट्ठाकारी का इतिहास तो देवाशीष प्री-मोहल्‍ला पोस्‍ट-मोहल्‍ला के युग विभाजन से लिख रहे हैं और ये मोहल्‍ले वाले अविनाश हैं कि अभी तक मीट के लिए कन्‍फर्मेशन तक नहीं भेजा- जब इतिहास लिखा जा रहा होगा तब वहॉं किसी भूत-चुड़ैल पर स्‍टोरी लिख रहे होगे- अरे आ जाओ इतिहासपुरुष, ऐसी भी क्‍या नाराजगी। (वैसे भड़ासियों ने कन्‍फर्मेशन भेजा था पर पता नहीं उस फीड को अमित ने क्‍यों एग्रीगेट नहीं किया अपनी सूची में) वैसे सब ठीक ठाक है।

Tuesday, July 10, 2007

गूगलित अहम......कौन आमिर खान...क्‍या नामवर सिंह

मैं कौन हूँ ? मैं क्‍या चीज हूँ ? क्‍या बिसात है अपनी ? हमारे चवन्निया अहम के लिए कभी कभी ये सवाल अहम हो जाते हैं। अमरीका ने जब गूगलिंग करना शुरू ही किया था तो लोगों का अहम इस बात से खूब फूलता-पिचकता था कि इंटरनेट उनकी शख्सियत को कोई अहमियत देता है कि नहीं। दूसरो को जानने का भी ये एक लोकप्रिय तरीका हुआ। पहले से अनजान लोगों से डेट करने से पहले युवा अपने साथी के विषय में जानने के लिए गूगलिंग करने लगे।
हिंदी में गूगल ही एक नई परिघटना है इसलिए जाहिर है गूगलिंग से दूसरे के बारे में जानने का चलन कम है। पर अगर ये कुछ लोगों के लिए कारगर है तो जाहिर है ये हम ही हैं- हिंदी के ब्‍लॉगर- यानि हिंदी हाईपर टेक्‍स्‍ट सृजन में सबसे आगे। तो इंटरनेट पर आपकी व्‍याप्ति कितनी है इसका उत्‍तर अगर आपको .02 सेकंड में पता चले कि लगभग 22500 बेवपेजों में आपका उल्‍लेख है तो जाहिर है कि आपका सीना गर्व से चौड़ा हो सकता है कि चलो हम कहीं तो बहुत लोकप्रिय हैं। खैर ये हमने अपने विषय में नहीं कहा था- ये हैं अपने सुपर स्‍टार सकुलजी देखें- .02 सेकंड में 22500





कुछ अन्‍य हस्तियॉं जिनका अहम की मिजाजपुरसी गूगल खोज से हम कर रहे हैं- वे हैं जीतू भाई, .09 सेकेंड में 9980




रवि रतलामीजी, .10 सेकेंड में 11500


समीर भाई .17 सेकेंड में 28500



और हमारे प्रिय चिट्ठाकार सुनील दीपक। .09 सेकेंड में 16100




आप भी अपने अहम को सहला सकते हैं, आसान है- गूगल पर जाएं अपना नाम खिड़की में लिखें और अपनी अंतर्जाल व्‍याप्ति की रपट देखें , एक सेकेंड से भी कम में। हमने भी देखी है अपनी, पर बताएंगे नहीं- इतनी इंप्रेसिव नहीं है। कैसे होगी- समीर बहुत हो सकते हैं, जिंतेंद्र, सुनील भी पर मसिजीवी तो ऐसा नाम है कि अब तक तो कोई हुआ नहीं..इसलिए दोहराव नहीं। पर फिर भी साहब हम बता दें कि हमारी व्‍याप्ति नामवर सिंह और आमिर खान से ज्‍यादा है। क्‍या...आप इन लोगों को नहीं जानते...ओह लो देखें।






अब तो शर्म कर आमिर खान को रविजी की बात मानकर अपना ब्‍लॉग बना ही लेना चाहिए।

हिंदी ब्‍लागिंग की ग्रेपवाइन कहीं अंडरवर्ल्‍ड तो नहीं बन रही

कामकाज की समझ में ग्रेपवाइन से आशय अनौपचारिक संचार से होता है- मसलन यदि आप एक अफसर हैं तो जो लिखित या मौखिक संवाद आप अपने मातहतों या अफसरों से करते हैं उसके अलावा भी एक पूरी संचार की दुनिया आपके संस्‍थान में चल रही होती है। आपका चपरासी आपके क्‍लर्क के कान में फुसफुसा रहा होता है- कुछ अफवाहें भी चल रही होती हैं वगैरह वगैरह। ये सब अनौपचारिक संचार है, इसके सबूत नहीं होते पर इतना तय होता है कि किसी भी संगठन व में यदि दो या अधिक व्‍यक्ति हैं तो औपचारिक व अनौपचारिक संचार दोनों चलते हैं- ये समानांतर होते हैं। औपचारिक संचार के विपरीत ग्रेपवाइन त्‍वरित होता है, आपसी विश्‍वास पर आधारित होता है तथा औपचारिक संचार के जितना ही, कभी कभी अधिक प्रभावशाली होता है। प्रबंधन की पुरानी विचारधारा मानती थी कि इससे ऊर्जा जाया होती है तथा संगठन के उद्देश्‍यों में बाधा होती है इसलिए ग्रेपवाइन को रोकने की कोशिशें होती थीं। किंतु नवीन प्रबंधकीय विचार इन्‍हें अपरिहार्य मानते हैं तथा इस समानांतर प्रक्रिया को मुख्‍य संचार के पूरक में देखते हैं। गूगल ने तो अपने संगठन में इसे औपचारिक संचार से भी ज्‍यादा अहमियत दी और कहा जाता है कि गूगल की सृजनात्‍मकता का एक बड़ा कारण ग्रेपवाइन का बेहतर इस्‍तेमाल किया जाना रहा है।
अब सवाल यह है कि इसका ब्‍लॉगिंग से क्‍या लेना देना है। जबाव यह है कि दरअसल ब्‍लॉगिंग खुद में ही एक ग्रेपवाइन ही है। कम से कम माना तो यही जाता है। ये अनौपचारिक संचार है, अक्‍सर लोग अपने नाम या बेनाम वे सब कहते हैं जो औपचारिक रूप से कहा नहीं जा सकता। दरअसल ग्रेपवाइन के सभी तत्‍व ब्‍लॉगिंग में पाए जाते हैं इसीलिए कम से कम अंग्रेजी में तो ब्‍लॉगिंग को ग्रेपवाइन ही माना जाता है- छद्मनाम/बेनाम ब्‍लॉगिंग वहॉं स्‍वागतयोग्‍य मानी जाती है तथा सरकारें, मीडिया व खुफिया संगठन, कंपनियॉं सब ही इन ब्‍लॉगों पर व्‍यक्‍त विचारों को लोगों की वास्‍तविक राय मानकर समझने का प्रयास करते रहे हैं। इसीलिए खुद ब्‍लॉगिंग ने भी अपने को अनौपचारिक संचार के रूप में ही विकसित किया है तथा उसमें और एक अनौपचारिक संचार की जरूरत कम महसूस होती है।
लेकिन वह तो अंग्रेजी ब्‍लॉगिंग है- हिंदी की ब्‍लॉगिंग का तेवर अलग है। हिंदी ब्‍लॉगिंग बजाय एक ग्रेपवाइन होने के खुद औपचारिक संचार की भूमिका में आने की कोशिश करती रही है। वह एक प्रवाहमान-फ्लयूडिस संचार होने की जगह एक ठोस पोस्‍चर बनने में अधिक विश्‍वास करती दिख रही है- परिणाम यह है कि उसमें एक ग्रेपवाइन की जगह एक औपचारिक संचार के लक्षण अधिक दिख रहे हैं, लेकिन जैसा कि तय है कि कोई भी औपचारिक संचार बिना समानांतर अनौपचारिक संचार के हो ही नहीं सकता इसलिए यहॉं भी ब्‍लॉगिंग की अपनी एक ग्रेपवाइन खड़ी हो रही है। लोगों आपसे में चैट कर रहे हैं, ईमेल कर रहे हैं और उनसे ही ‘काम चला’ ले रहे हैं, चिटृठे पर तो वे बस 'पोश्‍चर' दिखा रहे हैं, पोजीशन ले रहे हैं। आपसी नेटवर्क तैयार हो रहे हैं और कुछ कुछ पकड़ में आ सकने वाले गुट दिखाई दे रहे हैं। आप अगर कविता/बविता लिखने वाले शख्‍स नहीं हैं तो आप पर होने वाली टिप्‍पणियॉं एक पोजीशन हैं- संचार नहीं। सूत्र और सूत्रधार तैयार हो रहे हैं। ब्‍लॉग तो केवल दिखने वाली बत्तियॉं हो गए हैं जिन्‍हें परिचालित करने वाले सर्किट व बैटरियॉं सतह के नीचे चले गए हैं। केवल बहुत नाराजगी (या सत्‍ता के समायोजन की कोशिश) में ही वह उघड़ के बाहर आ पा रहे हैं, जब कोई अपने ब्‍लॉग पर अचानक पुरानी बातचीत का ब्‍यौरे का हवाला देते हुए कुछ लिख पटकता है। इससे कुछ सफाई पसंद लोगों को लगता है कि अच्‍छा है ब्‍लॉगों पर साफ सुथरी बाते ही दिखाई दे रही हैं- नागवार गुजर सकने वाली बातें ईमेल व चैट के सीवर में बहती रहें पर ऊपर सब साफ साफ दिखाई दे।

जब इस बात को ध्‍यान से देखें कि दरअसल ब्‍लॉगिंग को तो खुद ही वह काम करना था जो ग्रेपवाइन करती है, अब हिंदी ब्‍लॉगिंग में ही एक ग्रेपवाइन खड़ी हो गई है। और उस पर मुश्किल ये कि यह स्‍थापित तथ्‍य है कि ग्रेपवाइन, औपचारिक संचार से ज्‍यादा ताकतवर होती है। बैकचैनल डिप्‍लोमेसी, डिप्‍लोमेसी से ज्‍यादा ताकतवर होती है। आलोक पुराणिकजी का कहना है कि हर वर्ल्‍ड का अंडरवर्ल्‍ड ज्‍यादा मजबूत होता है। इसलिए अब जब औपचारिक व अनौपचारिक संचार के सूत्रधारों के चिट्ठे या टिप्‍पणियॉं दिखती हैं तो अनायास ही दिमाग उसके पीछे के सर्किट व बैटरियों पर चला जाता है- जब कोई ईमेल या चैट या फोन पर कुछ कहने की कोशिश करता है तो आशंका होती है कि कहीं हम भी तो किसी बत्‍ती का सर्किट तो नहीं बनने जा रहे (गनीमत है बैटरी लायक दम हममें नहीं है)

घुघुतीजी दिल्‍ली पहुँच गईं हैं उसने बात हुई- उन्‍होंने कहा कि उनके दामाद को इस बात पर घोर आपत्ति व हैरानी हुई कि किसी अन्‍य के कहने पर उन्‍होंने अपनी पोस्‍ट व कमेंट डिलीट कर दिए क्‍योंकि यह झुकना उनके व्‍यक्तित्‍व के अनुरूप नहीं था। मुझे याद नहीं कि घुघुतीजी यह बात अपने चिट्ठे पर कहीं लिख पाई या नहीं। अगर धुरविरोधी के चिट्ठे को हम आत्‍महत्‍या मानते हैं तो जाहिर है घुघुतीजी की उस पोस्‍ट का मिटना हत्‍या है जो हिंदी चिट्ठाजगत के अंडरवर्ल्‍ड द्वारा की गई।

Sunday, July 08, 2007

शर्मसार करती प्रतिरोध की नग्‍नता

राजकोट में पूजा चौहान को जो करना पड़ा उससे यह सारा समाज और खासतौर पर पितृसत्‍ता कटघरे में खड़ी होती है। राखी सावंत जैसी मॉडल व अभिनेत्रियॉं अक्‍सर नग्‍नता का उपयोग करती हैं पर वह कामुकता का एक बाजार होता है। नग्नता के सौंदर्य से भी सुनील दीपक हमारा परिचय करवा चुके हैं जहॉं सामूहिक नग्‍नता एक कलाकृति बन जाती है पर चौथी जमात तक पढ़ी पूजा किसी कलाकृति के लिए निर्वस्‍त्र नहीं हुई, न ही वह कामुकता की जिन्‍स का व्‍यापार कर रही थी- वह प्रतिशोध ले रही थी- प्रतिरोध कर रही थी अपनी ससुराल वालों, अपने पति के विरुद्ध जो उसका जीना मुश्किल किए हुए थे। ये प्रतिरोध की सृजनात्‍मकता थी और इस नग्‍नता से समाज की- उसी समाज की जिसमें गोत्रो के लिए, दहेज के लिए, जाति के लिए, परिवार के सम्मान के लिए स्त्रियों को मार दिया जाता है या मरने पर विवश कर दिया जाता है।

हो सकता है लोगों को लगे कि क्‍या क्‍या सिर्फ यही रास्‍ता था पूजा के बाद- यकीन मानिए वह जिस रास्‍ते को चुनती यही पूछा जाता। हमारी एक मित्र थी अर्चना, अर्चना मिश्रा ( संजयजी उंची जाति की ब्राह्मण) उसने एक दलित से विवाह किया- जैसा कि हममें से अधिकांश पुरुष होते हैं- ये दलित युवक भी था- फिर दौर शुरू हुआ प्रताड़ना का और 24साल की अर्चना, शोध छात्रा- स्‍वावलंबी शिक्षिका पंखे से लटक गई- सबने यही सवाल उठाया – ऐसा क्‍यों किया- प्रतिरोध करती, कोई और तरीका अपनाती।

पर मुझे तब भी लगता था अब भी लगता है और शिद्दत से लगता है कि हर प्रतिरोध अलग होता है तथा प्रतिरोध का हर तरीका मौलिक होता है। आत्‍महत्‍या भी प्रतिरोध ही है- हमें कायरता लगती है क्‍योंकि हम खुद को कटघरे में देखना नहीं चाहते। बेसबाल बैट हाथ में लेकर निर्वस्‍त्र हो गली में ललकारना भी प्रतिरोध ही है- किसी को बेशर्मी लगती है क्‍योंकि वह पूरे समाज को कटघरे में नहीं देखना चाहता।

शौक से शक करें -- शास्त्री फिलिप

हमारी पोस्‍ट के उत्‍तर में शास्‍त्रीजी ने एक पूरा लेख लिखने का आश्‍वासन दिया था और लीजिए हाजिर है। शास्‍त्रीजी का लेख -


शौक से शक करें -- शास्त्री फिलिप
मसिजीवी ने पिछले दिनों मुझ पर एवं मेरे चिट्ठे
सारथी पर एक लेख लिखा था:
आइए शक करें......क्‍या शास्‍त्रीजी का सारथी एक निजी चिट्ठा है
इस लेख में उन्होंने मेरे चिट्ठे के बारें में एवं मेरे बारे में कई बातें पूछी हैं, एवं उन बातों के जवाब में मैं निम्न बातें पाठकों के ध्यान में लाना चाहता हूं:

1.
सारथी वाकई में मेरा निजी चिट्ठा है, एवं इसको मैं अकेले ही संभालता हूं. यही नही, मेरे अपने 25 और जालस्थल हैं जिनको मैं अकेले ही संभालता हूं. यदि आपको एक पर ताज्जुब हो रहा हो तो 25 सुनकर आप आसमान से गिर पडे होंगे. यदि आपको लगता है कि एक अतिमानव ही अकेले यह सब कुछ कर सकता है तो यह आपकी गलतफहमी है. आप भी यह सब कुछ कर सकते हैं, बशर्ते आप
भी वही सब तय्यारी करें जो मैं ने की है, एवं आप भी वे सब गुर सीख लें जिनका प्रयोग मैं करता हूं.

2. सामान्य से अधिक दक्षता से काम करने के लिये काफी तय्यारी करनी पडती है, जिस के बारे में इस लेख में मैं सिर्फ इशारा मात्र करूंगा. लेकिन सारथी के काफी सारे पाठकों के आग्रह पर मैं "सफलता के गुर" नामक एक लेखन परम्परा अपने चिट्ठे पर चालू करने जा रहा हूं. यदि 100 लोग भी इन बातों में से 10% को अपनायें तो मैं अपने आप को धन्य मानूंगा, क्योंकि मेरा जीवन समाज-सेवा एवं सामाजिक नवीकरण के लिये समर्पित है. सिर्फ 10% जैसी छोटी संख्या मैं इसलिये रख रहा हूं क्योंकि जीवन में
दक्षता बढाने के गुर और तत्व के बारे में हर कोई सुनना पसंद करता है, लेकिन इसके लिये जरूरी कीमत चुकाने के लिये एवं समय देने के लिये बहुत कम लोग तय्यार होते हैं. वे यह भूल जाते हैं कि वे सही निवेश करें तो परिणाम चुकाई गई कीमत से 1000 गुने या अधिक होता है. हम सब कामना करने में व्यग्र, एवं कर्म करने में आलसी हैं.



3. अब मेरे बारे में: पिछले 20 साल से मैं समय-नियंत्रण के बारे में बहुत जागरूक हूं. घर में आज भी टीवी नहीं है. आवश्यक सारी जानकारी एवं खबर अखबार, पुस्तकों एवं जाल से लेता हूं. मित्रों के साथ राजनीति, क्रिकेट, परनिन्दा में समय नहीं बर्बाद करता. हर तरह के अनावश्यक गतिविधि, कार्यक्रम, आदि से दूर रहता हूं. जहां तक हो सके यात्रा रेलगाडी से करता हू, जिससे वह समय पढनेलिखने में बिता सकूं.


4. दक्षता बढाने के लिये कहीं भी कुछ भी दिख जाये, मिल जाये, तो आजमा लेता हूं. ठीक लगे तो तो वह मेरे जीवन का अभिन्न हिस्सा बन जाता है. बचपन में ही टंकणकला सीख ली, अत: अंग्रेजी में 60 से 90 शब्द प्रति मिनिट वेग से टंकण कर लेता हूं. सौ रुपये के कीबोर्ड के बदले 3500 रुपये का "प्राकृतिक कीबोर्ड" प्रयोग में लाता हूं जो हर तरह से मेरे टंकण को आसान बनाता है. नियमित रूप से जो जानकारी बार बार टंकित करता हूं (जैसे मेरा नाम, पता, जाल पता) उनको एक "क्लिपबोर्ड" तंत्राश में रखता हूं एवं एक से तीन कीस्ट्रोक में दो शब्द से लेकर 100 शब्द तक का मजूमन छाप लेता हूं. बैजू बावरे के समान मैं दक्षता-वर्धन के साधन/तंत्राश तलाशता हूं. (इन में से सारे हिन्दी सक्षम औजार अगले महीने से आप सारथी से प्राप्त कर सकते हैं. अंग्रेजी सक्षम औजार अभी भी आप
http://mustdownloads.com
या http://hi.mustdownloads.com से प्राप्त कर सकते है). व्यायाम करते समय टेपरिकार्डर से भाषण सुनाता रहता हूं. समय की दुहरी कीमत वसूल हो जाती है.

5. अपने आप को चुस्त एवं तंदुरुस्त रखने के लिये मैं नियमित रूप से व्यायाम करता हूं, शाकाहार को जीवन में महत्वपूर्ण मानता हूं, जम कर सोता हूं, एवं रोज इतना पानी पीता हूं कि मेरे आयुर्वेद डॉक्टर को भी हैरानी होती है.

6. हर काम में मैं दूसरों को शामिल करने की कोशिश करता हू. इससे भार घटता है, दक्षता बढती है, एवं इस "सहक्रिया" के कारण इस में भागीदार हर व्यक्ति को परिणाम बहुत अधिक मात्रा में मिलता है. उदाहरण के लिये, मेरे चिट्ठे पर मैं अकसर अन्य चिट्ठाकारों के लेख एवं कवितायें (कडी, टिप्पनी, विश्लेषण सहित) छापता हूं. इससे उनको नए पाठक, अतिरिक्त प्रशंसा, एवं एक नये पाठकसमुदाय से सम्मान मिलता है. लेकिन इससे मुझे कोई नुक्सान नहीं होता, बल्कि इस कारण मेरे चिट्ठे
पर जनोपयोगी जानकारी की मात्रा बढती जाती है एवं पाठक भी बढते हैं. एक नये लेखक/रचनाकार को ढूंढ कर जब मैं उसको सारथी के पाठको के समक्ष प्रस्तुत करता हूं तो वह इस प्रोत्साहन के कारण कहीं से कहीं और पहुंच जाता है. यह आसान काम नहीं हैं क्योंकि हम भारतीय लोग अपना नाम एवं अपने हिस्से की प्रशंसा दूसरों के साथ बांटना पसंद नहीं करते. आधिकतर चिट्ठे अपने जमे जमाये पाठकों के सामने अन्य प्रतिभाओं को लाकर अपनी जमी जमाई "ग्राहकी" खराब करना पसंद नहीं करते. मैं ने इस सोच के विपरीत काम किया, एवं मुझे (कई गुना ब्याज सहित) उसका परिणाम मिल रहा है.

7. और भी बातें हैं जो मैं आप लोगों के समक्ष रखना चाहता हूं. अपनी सफलता के किसी भी कदम को मैं रहस्य नहीं रखना चाहता. लेकिन इस के लिये कई लेख लगेंगे,जो जल्दी ही सारथी पर प्रगट होंगे. ये लेख मैं मसिजीवी को नहीं दूंगा. (उनको एक लेख मुझ पर छापो, एक मुझ से लो का मोलभाव करूंगा. फायद दोनों को है).

8. मसिजीवी के लेख के शीर्षक पढ कर बहुतों को लगा के वे मेरी आलोचना कर रहे हैं. ऐसा नहीं है. उनके लेख का चरमोत्कर्ष उनके आखिरी वाक्यों में है जहां उन्होंने कहा है: "हम तो मानते हैं कि शास्‍त्रीजी के रूप में कोई दैवीय पुरूष, शायद खुद ईसामसीह हिंदी के उत्‍थान के लिए हमारे बीच हैं". प्रिय
मसिजीवी, प्रिय पाठकगणों, मैं इस योग्य नहीं कि मुझे इतने उन्नत आसन पर बैठाया जाये. मैं तो सिर्फ ईसा का चरणसेवक मात्र हूं, जो "सारथी" के द्वारा ईसा के निम्न निर्देशन का पालन करने की कोशिश कर रहा हूं: "अपने पडोसी से अपने समान प्रेम करो. जो तुम मेरे नाम में उनके लिये करोगे, मैं मानूंगा कि वह तुम ने मेरे लिये -- अर्थात अपने स्वामी ईसा के लिये -- किया"

9. मसिजिवी ने अपने लेख के अंत में लिखा, "हमें उनका पूरा समर्थन करना चाहिए- कम से कम मैं तो करता ही हूँ। इसलिए इसे सिर्फ निजी चिट्ठा न माना जाए उससे कहीं ‘अधिक’ मानकर पढ़ा जाए।"

प्रिय मसिजीवी, आप से 2500 किलोमीटर दूर स्थित मुझ एक पराये व्यक्ति के कार्य को देख कर आप ने इस तरह से जो प्रोत्साहन दिया है उस के लिये आपको मेरा शत शत नमन !!

पुनश्च: सारथी चिट्ठे के पास बहुत सर्वर-स्थान है. आप में से कोई भी व्यक्ति हिन्दी या हिन्दुस्तान के विकास को प्रोत्साहित करने के लिये किसी भी प्रकार की रचना सारथी पर छपने के लिये भेजें तो उसका स्वागत होगा. सम्पादन हम कर लेंगे. क्रांतिकारियों एवं हिन्दुस्तान के प्राचीन एवं अधुनिक महान नायकों की जीवनियों में आजकल हमारी विशेष रुचि है।

Saturday, July 07, 2007

सुनो नारद के इनबॉक्‍स में एक पेंडिंग बहस

हिंदी के ‘निस्‍वार्थ सेवक’ जीतू भाई ने घोषणा की कि भई अभी नारदजी छुट्टी पर हैं इसलिए मान जाओ ये जो आप लोगों ने दनादन सुनो नारद पर मेल भेजना शुरू कर दिया है कि हमें हटा दो हमें हटा दो- ये ठीक नहीं है इससे हमारा हिंदी सेवा भाव आहत होता है। हमें तो लगता है कि ये स्‍पैम है- भला सच में कौन नारद से हटने की इच्‍छा व्‍यक्‍त कर सकता है। पर जितेंद्रजी जानते हैं कि ऐसा वाकई हो रहा है। अब इनसे तो जितेंद्रजी जैसे सुलटेंगे सो सुलटेंगे – वैसे भी तेवरों से लगता है कि अनूपजी के ये ‘पेड़ आदमी’ सुलझाने में कम, सुलटने में ज्‍यादा विश्‍वास रखते हैं।– लेकिन इस सबने एक रोचक स्थिति पैदा की है जरा इस तस्‍वीर पर गौर फरमाएं






भारत-पाक विदेशमंत्री टाईप फोटोऑप मुस्‍कान के पीछे की असलियत तो मालूम ही है- मामले की जड़ में था कि पंगेबाज की जिद थी कि अविनाश को हटाओ- नहीं हटाए गए- पंगेबाज नाराज हुए और लिखना बंद किया- फिर शुरू हुआ पर अब देखो ये दोनो महानुभाव पिछले कुछ समय से एक जगह एक साथ हैं-
ये जगह है, सुनो नारद का इनबॉक्‍स। नारद ने नहीं कहा कि हम हटा रहे हैं पर खम ठोंक ठोंककर बार बार कहा कि हिम्‍मत है तो मेल भेजकर दिखाओ- अब चिट्ठाजगत, ब्‍लॉगवाणी, हिंदी ब्‍लॉगस के समय में कौन नारद-कैसा नारद, इसने उसने मत पूछो किस किसने मेल भेज दी है।



अब नारद क्‍या करेगा ? हमारे लिए जरूरी है ये पूछना कि जाने कि हम नारद से क्‍या चाहते हैं कि वह करे। हम नारद से क्‍या करने के लिए कहेंगे। कुछ लोगों ने कहना शुरू कर दिया है मसलन ज्ञानदत्‍तजी ने कहा कि यह पैंतरेबाजी है- मेल भेजा तो भेजा पर नारद पर विज्ञापन क्‍यों किया- हम कुछ कहेंगे तो अंग्रेजी में डांटने लगेंगे पर भैया अफसरजी अब तो आपके मेरे दफ्तर तक में सूचना का अधिकार आ गया है- ये मत बताओ, छिपा जाओ का क्‍या चक्‍कर है। कोई बेटे-बिटिया का रिश्‍ता थोड़े ही ठीक कर रहे हैं कि तय होने पर ही बताना वरना कोई भांजी मार देगा। ये एक सार्वजनिक बहस है- जब कोई एग्रीगेटर खुद ही जोड़ने की जगह पर हटाने पर जोर देकर खुद को वंचित करने पर उतारू है और अब किसी को न ये अप्रिय दिख रहा है न गलत तो सोचना तो चाहिए।

तो सोचें कि भले ही ये नारद के सर्वाइवल के सवाल की तरह न देखा जा रहा हो पर इतना तय है कि सवाल गंभीर जरूर है- चिट्ठाजगत जिस दिन 138 पोस्‍ट दिखाता है उस दिन नारद 78 अगर जीएमटी- आईएसटी से थोड़ा बहुत फर्क आया भी हो तो भी ये सवाल है तो वैध कि भई ये बचे हुए साठेक चिट्ठे सिर्फ गंदे नेपकिन ही हैं जिन्‍हें नारद पर नहीं दिखना चाहिए या और लोग भी हैं। अगर किसी संपादकीय विवेक के चलते इनमें से कुछ को नहीं भी दिखना चाहिए तो भी बाकी नारद पर क्‍यों नहीं दिख रहे- सिर्फ आधे चिट्ठों को दिखाकर कौन सी हिंदी सेवा हो रही है – ये तो हिंदी सेवा प्राईवेट लिमिटेड हुई(जो लिमिटेड भी है और प्राइवेट भी)। उत्‍तर तैयार है – भई जिसने पंजीकरण कराया उसे दिखा रहे हैं- बाकी जुड़ने या हटने की अर्जी लगाएगा तो मां-बदौलत विचार करेंगे किंतु हजुरे आला अर्जी-दरख्‍वास्‍त के दिन तो हवा हुए- चिट्ठाजगत कैसे बिना अर्जी के फीड लेता है- क्‍या वह गैरकानूनी काम करता है- नहीं, हम बार बार कह रहे हैं कि फीड सार्वजनिक संपत्ति है, उस पर खुद चिट्ठेकार का भी मालिकाना हक नहीं है- यदि वह नहीं चाहता कि चिट्ठा सार्वजनिक हो तो उसे पब्लिक डोमेन से हटा ले। इसलिए कोई पंगेबाज हो या नंगेबाज- अगर लिख रहा है तो हम तो उसे नारद पर ही दिखता हुआ चाहेंगे- उसे हम पढ़ें या नहीं ये हमारा चयन होगा- हम अपने इस चयन की मुख्‍तारी किसी एग्रीगेटर को सौंपना नहीं चाहते। और 'खबरदार जो हमें गाली दी तो.....'- बहुत प्रभावशाली अभिव्‍यक्ति नहीं है- और 'हम बहुत बड़े हिदी सेवक हैं...' - ये खुद का बहुत अच्‍छा परिचय नहीं है, लोग अपने चिट्ठे पर आपको गंदा-साफ नैपकिन फिर भी कहते रहेंगे और यह पढ़ा भी जाता रहेगा- अगले को पता होगा कि आपको ऐसा कहे जाने पर आपको मिर्च लगती हैं तो वह और जोर से कहेगा- पुलिस अदालत में आपकी रुचि हो तो खूब करें लेकिन यदि विवेक को तरजीह देते हैं तो ईस्‍वामी जी की बात मानें, इन्‍हें बकने दें- इनके लिए या अपने अहम के लिए नारद की बलि न दें।

Friday, July 06, 2007

नारदजी छुटि्टयों में क्‍या कर रहे हैं :~)))

आजकल जितेंद्रजी नारदजी छुट्टियों पर हैं। इधर उधर घूम रहे हैं- पिछले दिनों जबलपुर में थे- हमारी स्टिंग आपरेशन टीम ने उन्‍हें वहीं पकड़ा। वहॉं वे धुरविरोधी भोलाराम के जीव को खोजने में लगे थे। आपको मालूम ही है कि भोलाराम का जीव अपने चिट्ठे की अपनी मौत के बाद से ही लापता है। स्टिंग वीडियों देखें और अपनी राय दें-




हमारे द्वारा इंटरनेट उपभोग योग्‍य बनाने से पहले मूल वीडियों का निर्देशन-अनवर जमाल

आइए शक करें......क्‍या शास्‍त्रीजी का सारथी एक निजी चिट्ठा है

चिट्ठाकार मित्र ने कहा कि भई मसिजीवी तुम बड़े संशयजीवी हो- हम मान गए। संशयजीवी हैं थोड़ा भदेस होकर कहें कि शकजीवी हैं- इसलिए जिन्‍हें लगता है कि शक करना बेहद बुरी बात है वे बिला शक दाहिने ऊपरी कोने पर बना X का निशान दबाए और निश्‍शंक जीवन जीएं :) हम इस बुरे काम को करेंगे- इसलिए नहीं कि बहुत बुरे हैं पर इसलिए कि काम बुरा है और कोई और इसे करना नहीं चाहता- और हम इसलिए कर रहे हैं कि है तो बुरा, पर जरूरी है- कोई न करेगा तो हो नहीं पाएगा- नहीं हुआ तो बुरा होगा। चूंकि लोग शक करने को बुरा मानते हैं इसलिए जो शक करते हैं वे तक इसे कहते नहीं- कहेंगे तो लोग (कम से कम जिन पर शक किया गया वे तो) बुरा मानेंगे और फिर इंडीब्‍लॉगीज तो मिलने से रहा। लेकिन ब्हिसल बलोअर बनना एक कठिन काम है इसलिए भी कि इसमें गलत सिद्ध होने की गुंजाइश होती है- और इस जोखिम को लेने का साहस कर रहे हैं- अब देखा जाएगा। इससे पहले हम अविनाश, मोहल्‍ला, धर्म, नारद आदि पर शक जाहिर कर चुके हैं और निश्‍शंक/निर्द्वंद्व बिरादरी के कोप का भाजन बन चुके हैं- अब ये भी सही।

हम शास्‍त्रीजी के चिट्ठे ‘सारथी’ पर विचार करना चाहते हैं- क्‍योंकि मैं इससे बेहद प्रभावित हुआ हूँ। शास्‍त्रीजी जिन्‍होंने भौतिकी, देशीय औषधिशास्त्र, और ईसा के दर्शन शास्त्र में अलग अलग विश्व्वविद्यालयो से डाक्टरेट किया और वे पुरातत्‍व जैसे विषय में एक और डाक्‍टरेट में लीन हैं- वे हिंदी के विकास में आगे आए हैं, आए क्‍या हैं बहुत पहले से हैं तो इससे ज्‍यादा प्रसन्‍नता की बात भला क्‍या हो सकती है। उनका अध्‍ययन विविध है और चूंकि ये गगरी भरी हुई है इसलिए बेबात छलकती नहीं है- ये नहीं कि बात बात पर खम ठोंके कि हमने इस भाषा के लिए ये कर दिया वो कर दिया- देखो फार्च्‍यूनर घर पर खड़ी है और हम हिंदी की ही खातिर इस देश की गंदी सड़कों पर आ रहे हैं। शास्‍त्रीजी का काम वाकई सराहनीय काम है। इतने श्रमी व अध्‍यवसायी व्‍यक्ति पर उनके आराध्‍य ईसा की कृपा भी खूब रही है (उनके आराध्‍य से किसी हिंदू मंच, सुमन सौरभ या ऐसे किसी और नमस्‍ते सदा वत्‍सले को परेशानी हो तो हो हमें किसी ईश्‍वर से वैसे भी कोई लेना देना होता नहीं – और ईश्‍वर भी अक्‍सर इतने समझदार निकलते हैं कि सोचते हैं कि ये भला(?) आदमी हमें परेशान नहीं करता तो हम ही क्‍यों इसे परेशान करें) तो खैर प्रभुकृपा से सारथी जी के चिट्ठे ने जो इतनी सारी सामग्री उपलब्‍ध कराई है उसके कारण उन्‍हें बेतहाशा सम्‍मान व हिट भी मिल रहे हैं- उनके अनुसार उन्‍हें रोज 1000 लोग पढ़तें हैं जबकि हिट 5000 से ज्‍यादा हैं। बहुत अच्‍छे.....पर


पर शक इसीसे शुरू हो गया। क्‍या सारथी वाकई एक निजी चिटृठा है- सारथी का संयोजन, प्रबंधन बहुत से मामलों में हमारे मंच नारद से कहीं बेहतर है- मेल छोडिए आप टिप्‍पणी भी कीजिए तो आपके पास झट से ईमेल से जबाव पहुँच जाता है। 100000 से ज्‍यादा वितरित प्रतियों वाली ईपुस्‍तक के लेखक शास्‍त्रीजी पुरातत्‍व पर डाक्‍टरल शोध करते हुए हर चिटृठा पढ़ लेते हैं- इतने ट्रेफिक को मैनेज कर लेते हैं- हरेक को उत्‍तर दे देते हैं- इतने सारे टूलोंकी समीक्षा कर पाते हैं- अमरीकी विश्‍वविद्यालय के मानद कुलपति के दायित्‍व निवाह ले जाते हैं- अपने अराध्‍य के प्रति के उपासना दायित्‍व पूरे कर लेते हैं- अन्‍य अनुशासनो के प्रति अपने अकादमिक दायित्‍व भी पूरे कर लेते हैं....
कुछ कुछ दैवीय हो रहा है बंधु। हमारा शक है कि सारथी कोई निजी चिटृठा नहीं है। अशोक चक्रधर के चिट्ठे की ओर संकेत करते हुए पंकजजी ने बताया

अभी हिन्दी चिट्ठाजगत में एक बडे व्यंग्यकार और कवि का ब्लोग भी दिख रहा है. कुछ दिन पहले उनकी सेक्रेटरी का मेल आया था सहायता के लिए. :) यानि वे खुद ब्लोग नही लिखते, शायद ही देखते हों!!

लेकिन हमारा शक शास्‍त्रीजी को लेकर ऐसा नहीं है। हम तो मानते हैं कि शास्‍त्रीजी के रूप में कोई दैवीय पुरूष शायद खुद ईसामसीह हिंदी के उत्‍थान के लिए हमारे बीच हैं- हमें उनका पूरा समर्थन करना चाहिए- कम से कम मैं तो करता ही हूँ। इसलिए इसे सिर्फ निजी चिट्ठा न माना जाए उससे कहीं ‘अधिक’ मानकर पढ़ा जाए।

Tuesday, July 03, 2007

चिट्ठाजगत पर धड़ाधड़ महाराज की 'गोपनीय' करतूत

हमें आसार ठीक नजर नहीं आ रहे, अनिष्‍ट की आशंका हो रही है। पहले तो अविनाश ने घोषणा की कि 'मसिजीवी हिंदी ब्‍लॉगिंग के पुरोधा पुरुषों में से हैं '- और अब चिट्ठाजगत ने अपने बाजू में जो सूची लटकाई है- चिट्ठों के टॉप20 की, उसमें भी हमारा नाम दिया है। ये अच्‍छे आसार कतई नहीं है- इतिहास गवाह है कि जब जब किसी प्रोफेसर को हमने अपनी तारीफ करते पाया है – हमने अपनी नौकरी खो दी है। लगता है यहॉं भी दुकान समेटने के दिन आ गए हैं। अविनाश की तो चलो फिर भी समझ में आता है- मीडिया के व्‍यक्ति हैं गलत आकलन करने का उनका पेटेंट है- कलाम को बना रहे थे, या शिवराज पाटिल को – प्रतिभा पर तो कौन हैं’ टाईप आकलन ही था- रवीश की पोस्‍ट पढ़ लें। तो ठीक है अविनाश ने पुरोधा-उरोधा कह दिया है, गलती का अहसास होगा तो रवीश की ही तर‍ह बाद में कह देंगे अपनी बात वापस लेते हैं- कोई पुरोधा नहीं है- ढक्‍कन चिट्ठाकार हैं। माफ करें।
हमारी चिंता है- चिट्ठाजगत से। हम मानते हैं कि हम न तीन में तेरह में। ये तीन व तेरह क्‍या होता है जानना चाहें तो संजीव की ‘वैज्ञानिक पोस्‍ट’ पढ़ लें। पर चिट्ठाजगत हमें तीन में तो नहीं पर तेरह में मानता है- समीर, फुरसतिया, ये....वो की संगत में लेजाकर बैठा दिया, हम तो लाज से गड़ ही गए, कहॉं ये महारथी लोग कहॉं हम।। सही है आलोकजी वगैरह का गुण‍गान एकाध सेमीनार वेमीनार में किया है पर उन्‍हें कौन सा पता है... और हमें ही क्‍या पता था कि वो एग्रीगेटर बना बैठेंगे। और अगर ये चापलूसी का इनाम होता तो भी ठीक ही था..क्‍योंकि इस कौशल के आ जाने से ‘नौकरियॉं’ छूटने के डर खत्‍म हो जाते।

पर ध्‍यान से देखा तो पता चला कि ये आलोक ने नहीं किया उनके कंप्‍यूटर ने खुद ही कर डाला है। लिखा था-

सक्रियता क्रं० क्या है?
धड़ाधड़ महाराज एक स्वचालित तंत्र है जो निम्न बातो का ध्यान रखते हुए चिट्ठों को क्रमबद्ध करता है।

आपके चिट्ठा लिखने की आवृति क्या है।

आपने आखरी लेख कब लिखा।

आपके लेख का उदाहरण कितने चिट्ठों की कितनी प्रविष्टियों में दिया गया। ध्यान रहे "उदाहरण" लेख feed में अवतरित होता हो।

"पसंदीदा चिट्ठे", "पसंदीदा लेख", "चिट्ठे सूचक", "सांकेतिकशब्द सूचक" सूची में आपको कितने प्रयोक्ताओं ने सूचीबद्ध किया है।

इस के लिए प्रयोग होने वाला सूत्र गोपनीय रहेगा, एवं समय के हिसाब से बदला भी जायेगा।

तो ये धड़ाधड़ महाराज की करतूत है- इसे अनदेखा करें। और अंतिम बात ध्‍यान से पढ़ें- डंके की चोट पर ‘गोपनीय’ – लोग सुबह से शाम तक गलियाते रहे कि नारद तानाशाह है- पारदर्शी नहीं है- अब उखाड़ लीजिए। चिट्ठाजगत,( नारद के लिए ‘हमारा’ कितने आराम से निकलता था- यहॉं नहीं), में मामला गोपनीय है। वैसे अच्‍छा है गोपनीय है- अगर सार्वजनिक होता तो डी वाई डीएक्‍स सिगमा जीटा टाईप ही तो होता- समझ तब भी नहीं आता और बेइज्‍जती अलग होती।
पर एक बात साफ है जो (गोपनीय) सूत्र इस कीबोर्डपीट को टॉप20 चिट्ठाकार मानता हो वह ठीक तो नहीं ही हो सकता। विपुलजी वो अपनी गिटर पिटर कीजिए कोई बग-सग है दूर कीजिए। हमें अपनी जगह दिखाएं- पूरी गोपनीयता के साथ।