Sunday, October 19, 2008

शानदार ऑफर- कार्ड खुरचो...मूर्ख बनो

अरसे तक मेरे पास क्रेडिट कार्ड नहीं था, कोई एकाध ही अवसर रहा होगा कि कोई कठिनाई हुई हो मतलब जिंदगी आसान ही थी। फिर गूगलएप्‍स से एक डोमेन लेने की जरूरत पड़ी तब लगा कि घर भर में एक क्रेडिट कार्ड तो होना ही चाहिए। जॉंच परखकर सरकारी बैंक का कार्ड लिया। अब तक कोई धोखा-धड़ी भी नहीं हुई बिल समय से आया और भरा गया इसलिए कोई पेनल्‍टी की भी नौबत नहीं। एकाध बार फालतू के फोन आए...सर अमुक अमुक प्रोडक्‍ट लेंगे क्‍या.. हमने प्‍यार से डपट दिया कि डू नॉट डिस्‍टर्ब रजिस्‍ट्री में नाम दर्ज है, सो फोन आने भी बंद। 

पिछले महीने बिल के साथ आफरों के कार्ड के साथ एक स्‍क्रैचकार्ड था कि आप को अमुक इनाम मिला है, हैंडलिंग चार्ज दें और मंगा लें...हमने इग्‍नोर कर दिया। अब आज फिर बिल आया इस बार के स्‍क्रैच कार्ड में खुरचा तो बताया गया कि वाह.. आपने 3990 रुपए की लुई क्‍वार्टज घड़ी जीत ली है। एकदम मुफ्त, ( बस हैंडलिंग चार्ज 590 रुपए) माथा ठनका... आज तक किसी लाटरी में चवन्‍नी तक नहीं निकली, अब तो नहीं पर बचपन में चूरन गोली वाले की ठेली पर लाटरी खरीदी ही हैं। मामला ललचाऊ लग रहा था, एकठो घडी खरीदने का मन भी था (मन से क्‍या होता हे हिम्‍मत होनी चाहिए, पैसा भी) सोचा चलो इस बार फ्रेंच घडी पहनकर इतराया जाए। स्‍क्रैच कार्ड पर गौर फरमाएं।

SBI offer

एसबीआई बैंक सरकारी है, कार्ड से हमारा पुराना अनुभव भी ठीक ठाक ही था पर गूगल की शरण में जाना ठीक समझा..पहले खोज परिणाम से पता चला कि लुई नाम के ब्रांड की घडी कम से कम डेढ हजार डालर की है। फिर एवीए मर्कें‍डाइजिंग, एसबीआई कार्ड के साथ खोजा तो हाथ लगा कंज्‍यूमर कंप्‍लेंट का यह पेज..ओत्‍तेरेकी ये तो पक्‍की जालसाजी है। यह घड़ी सौ-पचास रुपए की हाथ लगेगी....नकली। मजे की बात यह है कि एसबीआई कार्ड को लपेटे में नहीं लिया जा सकता क्‍योंकि उनका कहना है कि ये आफर तो मार्केटिंग कंपनी के हैं हमें इनसे कोई लेना देना नहीं, और ये भी कि हमारी घड़ी की कीमत अगर हम 3990 /-  कह रहे हैं तो बस है। खोजने से पता चला कि जेटलाइन एयरवेज, स्‍टैंडर्ड चार्टेड बैंक की तरफ से भी ऐसे ही प्रस्ताव बहुत से लोगों को चूना लगा चुके हैं। हमें खुशी है कि फुदककर इनाम मंगाने से पहले हमने गूगलसर्च मार लिया और 590 रुपए का चूना लगने से बच गया। हालांकि ये सवाल बरकरार है कि कानूनन ये बड़ी कंपनियॉं कैसे ग्राहक को चूना लगा सकती हैं और भरोसे का जो नुकसान इन कंपनियों का होता है उसकी ये कोई कीमत नहीं लगातीं।

Tuesday, October 07, 2008

चौप्‍टा- तुंगनाथ- चंद्रशिला से वापसी की हाजिरी में चंद तस्‍वीरें

जैसा कि अनूपजी ने बताया कि हम ताजा ताजा हाथ लगी छुट्टियों का भरपूर लाभ लेने फिर पहाड़ों की ओर पलायन कर गए थे, मानो फिर लौटना ही न पड़ेगा।

ऐसे ही मास्टर मसिजीवी सपरिवार छुट्टी मिलते ही निकल लिये सैर सपाटे को। छुट्टी मिलते ही लोग बाहर इसलिये निकल लेते हैं ताकि लौटकर कह सके -जो सुकून घर में है वो और कहीं नहीं। जब वो निकले तो हमें दे गये चर्चा का जिम्मा।

खैर.. गुरुत्‍वाकर्षण का नियम है कि गई चीज लौटती है। हम भी लौटे हैं। लिए ढेर सी यादें। इस बार रुख किया था भारत का स्विट्जरलैंड कहे जाने वाले चौप्‍टा की ओर। काश विजय गौड़ जी की तरह कह पाता कि सैलानी की तरह नहीं अपने हिस्‍से की तरह पहाड़ को देखा। कह सकता हूँ पर ईमानदार कथन नहीं होगा हॉं ड्राइविंग का आनंद खूब लिया और पहाड़ की खूबसूरती का भी।अस्‍तु.. हमारा रास्‍ता रहा .दिल्‍ली .. कोटद्वार - लैंसडाऊन (बाईपास किया)- खिरसू- खांकरा- ऊखीमठ- चौप्‍टा- तुंगनाथ- चंद्रशिला शिखर- देवरियाताल- ऊखीमठ- देवप्रयाग-कौडियाला-ऋषिकेश- दिल्‍ली

कई बातें हैं कहने की, पर फिलहाल वापसी की हाजिरी भर लगा रहे हैं। इन चंद तस्‍वीरों के स्‍लाइडशो के साथ।

 

 

 

Monday, September 29, 2008

यौन-व्यापार का यह अध्‍याय

यह आकर्षक विजिटिंग कार्ड पड़ोस के मॉल की पार्किंग में इस तरह छोड़ा गया था कि इस पर नजर पड़े। आकर्षक हैंडमेड पेपर पर छपे इस विजिटिंग कार्ड पर कोई पता नहीं था पर फोन नंबर था जिसे मैंने हटा दिया है।

playboy

हमें लगता था कि ये फाइव स्‍टार संस्‍कृति की चीजें हैं पर छनते छनते ये अब मध्‍यवर्गीय जगहों तक पहुँच गई लगती हैं।

 

Saturday, September 20, 2008

दिल्‍ली घेट्टो के एनकाउंटर की एक साइडलाइन रिपोर्ट

मैंने एनकाउंटर की टीवी रिपोर्टिंग नहीं देखी थी, उस रिपोर्टिंग की रिपोर्टिंग जो ब्‍लॉग पर हुई उसे जरूर पढ़ा है। मुझे टीवी पर समाचार न देख पाने पर अब कोई मलाल नहीं होता, इस बार भी नहीं हुआ। पर मीडिया की भयानक तौर पर गिर गई साख से हो रही हानि को गहरे तौर पर बाद में अनुभव किया।

सुबह स्‍टाफरूम में प्रवेश किया तो हवा में कुछ बदलाव था, महसूस करने में कुछ देर लगी। चुप्‍पाचुप्‍पी की फुसफुसाहट थी। मेज पर अखबार बिछे हुए थे...खबरों में एनकाउंटर ही छाया था। दरअसल कम से कम 10-12 शिक्षक साथी उसी इलाके से आते हैं जहॉं ये एनकाउंटर हुआ। उनका कहना था कि उस क्षेत्र के निवासियों की साफ राय ये है कि एनकाउंटर फर्जी था। जिन लड़कों को आतंकवादी कहकर मारा गया उन्‍हें दो दिन पहले ही उठा लिया गया फिर वापस लाकर उसका एनकाउंटर किया गया। इस मान्‍यता का स्रोत क्‍या है ये किसी शिक्षक मित्र को नहीं पता पर ये लोग भी इस राय से सहमत लग रहे थे। उनका कहना था कि यदि इंस्‍पेक्‍टर की मौत की घटना नहीं होती तो जामिया नगर में हालत विस्‍फोटक थी, वो तो इस मौत ने लोगों के मन में शक पैदा किया कि हो सकता है कि एनकाउंटर असली हो, पर तब तक तो वे तमाम मीडिया व पु‍लिस की बातों की तुलना में मोहल्‍ले की अफवाहों में ही ज्‍यादा यकीन कर रहे थे।

मुझे इन लोगों की बात सुनकर राष्‍ट्रवाद के दौरे नहीं पड़े, आप चाहें तो मुझे राष्‍ट्रद्रोही करार दे सकते हैं। मुझे स्‍पेशल सेल के पुलिसवाले जॉंबाज राष्‍ट्ररक्षक भी नहीं लगते ये भी सच है। पर मैं उन्‍हें खास दोषी भी नहीं मानता, मुझे लगता है कि वे राज्‍य की लाचारी के प्रतीक हैं, राज्‍य को अपनी वैधता के रास्‍ते में आ गए तत्‍वों का निपटान करने में जब लाचारी महसूस होती हे तो उसे एनकाउंटर करने पड़ते हैं। इसे करने वाले तो औजार भर हैं, तथा उनकी शहादत एक कोलेट्रल डैमेज है। इस सबके बावजूद जामिया नगर के बहुत से लोगों का राष्‍ट्रीय मीडिया तथा प्रशासनिक ढॉंचे की तुलना में सुनी सुनाई बातों पर विश्‍वास कर लेना बेहद अवसादी परिघटना लगा। माना जा सकता है कि पुलिस ने इन आतंकवादियों को गिरफ्तार करने की तुलना में मार डालने का निर्णय लिया होगा ताकि ढिल्‍लू होम मिनिस्‍टर की छवि को धोया जा सके। पर राज्‍य ही नहीं वरन मीडिया पर भी इतने बड़े स्‍थानीय समुदाय का ऐसा अविश्‍वास कि वे बजाय राज्‍य की अपेक्षाकृत वैध संस्‍था के समर्थन में आने के, आतंकवादियों से सहानुभूति रखें ये त्रासद है।

मुझे लगता है कि दशकभर के संप्रदायीकरण ने अब लगभग पूरे समाज में विभाजन की लकीर खींच दी है। राज्‍य व मीडिया ने अपनी वैधता पूरी तरह नहीं तो कम से कम अल्‍पसंख्‍यकों के लिए तो खो ही दी है। मुझे यह भी लगता है कि आने वाले दिनों में और एनकाउंटर देखने को मिलेंगे उससे भी दुर्भाग्‍यपूर्ण यह कि इन एनकाउंटरों का इस्‍तेमाल तंगअक्‍ल कठमुल्‍ले, आतंकवादियों की पैदावार बढ़ाने के लिए करेंगे, और मीडिया ...वो तो खैर केवल ब्रेक से ब्रेक तक की ही दृष्टि रखता है।

Saturday, September 13, 2008

दिल्‍ली के ये बम मीडिया के लिए सौदा हैं

ये पोस्‍ट बेहद गुस्‍से में लिखी गई है, विवेक की उम्‍मीद न करें।

दिल्‍ली में इस वक्‍त कुछ बम विस्‍फोट हो रहे हैं। लोग मारे जा रहे हैं' ये दुकानदारी का समय है चैनलों के लिए। जिस पैमाने पर गैर जिम्‍मेदाराना रिपोर्टिंग अभी चल रही है, उसके बिना पर तो खुद इन चैनलों पर आतंकवाद फैलाने का मुकदमा चलना चाहिए। मौके पर खड़े पत्रकार शोर सुनते ही शोर मचा रहे हैं नेशनल मीडिया में कि मानव बम मिला ... कमबख्त मुड़कर जॉंच भी नहीं रहे कि खबर है या अफवाह... दो ही मिनट बाद गुब्‍बारे वाला बच्‍चा- मानव बम नहीं .. सबसे अहम गवाह हो जा रहा है। मुझे तो लगता है कि मीडिया वालों से तो कहीं ज्‍यादा जिम्‍मेदार व पेशेवर खुद वे आतंकवादी हैं जिन्‍होंने बम प्‍लांट किए। उनका काम है आतंक फैलाना और वे वहीं कर रहे हैं। लेकिन ये कम्‍बख्‍त पत्रकार व चैनल क्‍या इनका काम भी आतंक फैलाना है..अगर नहीं तो वे क्‍यों ये कर रहे हैं।  कोई इन्‍हें बंद करो नहीं तो ये देश में आग लगवा देंगे- 

एक बानगी देखें-

 

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Thursday, September 11, 2008

बढ़ी सब्सिडी- सरकारी पैसे से बनें हाजी

वैसे ऐसा लिखने में चट से संघी करार दिए जाने का जोखिम है पर कम्‍यूनिस्‍ट करार व संघी करार दिए जाने का जोखिम हम पहले भी उठाते रहे हैं, एक बार और सही। आज की खबर है कि सरकार ने हज के लिए सब्सिडी फिर से बढ़ा दी है- बावजूद बेपनाह बढ़ गए ईंधन के दाम व किराए के हज करने वालों को वही बारह हजार देना होगा बाकी सरकार टैक्सपेयर्स की जेब से भरेगी। और हॉं इस बार और ज्‍यादा लोगों को हाजी होने का पुण्‍य दिलाने का ठेका सरकार ने लिया है। वैसे हमें मुसलमानों पर अधिक पैसा खर्च करने से दिक्‍कत नहीं है, सच्‍चर समिति से भी नहीं थी पर तीर्थयात्रा के लिए सब्सिडी हमें एक सबसे ऊत काम लगता है। शिक्षा, प्रवेश, पढ़ाई, वजीफा ठीक है पर क्‍योंकि ये प्रकाश की ओर ले जाने वाले कदम हैं पर धर्म के नाम पर हजारों खर्च करना वो भी अपनी मेहनत के नहीं खैरात के...ये तो ठीक नहीं। यूँ भी एक मुसलमान दोस्‍त ने बताया कि नियमत: जब ऐसा कोई व्‍यक्ति हज करता है जो खुद उसकी कीमत अदा न करे तो इसे धर्म में वर्जित किया गया है। खैर किताब कुछ भी कहती हो पर हमारा मानना है कि इस तरह के टंटे मुस्‍िलम समुदाय के आत्‍मसम्‍मान  के विरुद्ध हैं जिसका विरोध खुद इस समुदाय को भी करना चाहिए।

 

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Friday, August 29, 2008

हिन्‍दी को हिन्‍दी-प्रेम की बैसाखियों से आजाद करने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें

tata_nen_logo चिट्ठाचर्चा में अनूपजी ने दिखाया और हमने देखा, अच्‍छी खबर है।पहली चर्चा में वे ब्‍लॉगवाणी को भूल गए थे, उन्‍होंने केवल देबूदा के पॉडभारती के लिए सिफारिश की पर अगली पोस्‍ट में फिर से साफ कर दिया गया है कि ब्‍लॉगवाणी भी इस कतार में है। फिलहाल इसका रैंक 5 है, कल तक 9 था। हम चाहते हैं शाम तक पहला हो जाए।  हिन्‍दी तो बाजार में अपनी पहचान जमा ही रही है पर ये घटना हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग की है। टाटा की मुहर और इंटरनेट पर हिन्‍दी उपक्रम की पहचान वाकई अहम बात है। यूँ भी कई दिन से वोटिंग शोटिंग का खेल इधर हुआ नहीं है। तो चलो जुट जाएं हिन्‍दी को शिखर पर देखने के लिए। पूरा तरीका मैथिलीजी ने अपनी पोस्‍ट में साफ कर दिया है। देखें और वोट दें- कम से कम दो वोट तो आप डाल ही सकते हैं- एक टाटा नैन से रजिस्‍टर करके इंटरनेट पर और दूसरा फोन से एसएमएस से।

हमने सोचा था कि इसे दिल का मामला मानकर, जैसा मैथिलीजी ने कहा हिन्‍दी के इस मुकाम तक पहुँचने की तरह देखेंगे और वोट देंगे तथा देने के लिए कहेंगे। पर सोचें ये तो फर्जीवाड़ा हुआ, आखिर हमसे एक ऐसे नए उपक्रम को चुनने का आग्रह है जो दमदार शुरूआती व्‍यावसायिक उपक्रम है और हम दिल के नामपर वोट दे रहे हैं। ठीक है हमें जीजान से पसंद है ब्‍लॉगवाणी, पर तब भी एक बार जॉंचे कि एक उपक्रम के रूप ब्‍लॉगवाणी कितनी संभावनाएं समेटे है। ऐसा इसलिए भी करें कि इस नजरिए से देखने पर आपको और गर्व की अनुभूति होगी। 

हिन्‍दी की चिट्ठाकारी का समुदाय निरंतर बढ़ रहा हे अत: ये विज्ञापन व आय की संभावनाएं लिए है तथा मजेदार बात ये है कि गूगल एडसेंस द्वारा हिन्‍दी ब्‍लॉगों को बेसहारा छोड़ देने को हमारे अपने एग्रीगेटर ने अवसर की तरह लिया लगता है। टाटा नैन के इस सवाल के जबाव में कि वाकी सब तो ठीक पर ये बताओ कि रोकड़ कैसे कमाओगे, सिरिल साफ करते हैं-

How does the business make money?

We plan to introduce a shopping portal in our website and use our 1600 strong blogger network to advertise, bloggers will be given a commission against sales.

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It has Marathi and Hindi blogging now, but soon it will be available in all the Indian languages, and also in English. The aim is to becoming the number one community for Indian bloggers.

तथा यह भी-

Just want to put in my two words that the blogger-affiliation scheme is not the only way to earn from a website like blogvani. We'll be exploring the full plethora of options including conventional ones like advertising too.

वाकई .. तो इसका मतलब है कि हमें जल्‍द ही ब्‍लॉगवाणी पर लिस्‍ट होने के लिए, ज्‍यादा से ज्‍यादा लिखने के लिए पैसा मिला करेगा। ये बात तो अच्‍छी लागै है। :)) उससे भी अच्छी बात ये कि हिन्‍दी सिर्फ 'हिन्‍दी प्रेम' की बैसाखी पर नहीं अपने पैरों पर चलेगी। हिन्‍दी प्रेम के भरोसे रहने में बुराई ये है कि तब ये कल्‍याण खाते के आसरे हो जाती है तथा इसमें त्‍याग का दर्प भी आ जाता है फिर क्‍या होता है, पुराने ब्लॉगर जानते हैं कि उसका हश्र क्‍या होता है।   इसलिए आपसे अनुरोध है कि हिन्‍दी को बैसाखी से आजाद कर अपने कदमों चलाने के लिए ब्‍लॉगवाणी को वोट दें। यदि आप एक वोट पहले ही हिन्‍दी-प्रेम के नाम पर दे चुके हैं तो एक और दें- इस बार हिन्‍दी की आर्थिक आत्‍मनिर्भरता के लिए।

Monday, August 11, 2008

ये है सैम-इंडिया मेरी जान

जुगाड़ और रचनात्मकता हम भारतीयों के यूएसपी हैं। पश्चिमी उत्तरप्रदेश की जुगाड़गाड़ी हो यी वाशिंग मशीन का इस्तेमाल थोक में लस्‍सी बनाने के लिए करने की जुगत- हम हैरान करने से नहीं चुकते। ऐसी ही हैरानी से कल दो-चार  हुए जब एन पिज्‍जाहट के  बरोबर में पूरी लकदक के साथ उसका देसी जबाव देखा। ये था समोसा जी अपना बेचारगी भरा समोसा पर पूरे आत्‍मविश्‍वास के साथ। दिल्‍ली की एक सबसे मशहूर समोसे की दुकान पूंचकुइयॉं वालों के समोसे की है जो पिछले साठ सालों से समोसे खिलाने का दावा करती है। उसकी ही एक दुकान पर हमें ये देखने को मिला..IMG_0976

जी आपने सही पढ़ा सैमबर्गर- जिसका हैमबर्गर के बर्गर से गहरा नाता हे पर हैम से बिलकुल नहीं। हैम की जगह है सैम...बोले तो समोसा। समोसे के सैम हो जाने से हमारा परिचय बिट्स पिलानीIMG_0977 में हुआ था वहॉं समोसों को इंजीनियर-विद्यार्थी सैम कहते हैं। इन्‍हीं सैम को सैम विशेषज्ञों ने बर्गर के साथ गठबंधन कर सैमबर्गर तैयार किए हैं। ये दो वैरिएंट में पाए जाते हैं। आलू सैमबर्गर व पनीर सैमबर्गर।

  चित्र के बाद बताने की जरूरत नहीं कि बर्गर-बन में समोसा, चीज़, सलाद रखने से तैयार होने वाला सैमबर्गर वाकई दमदार चीज था। उबाऊ बर्गरों से तो बेहतर था ही। हॉं तेल इसमें काफी था। पर दाम बेहद कम हैं और इस दुकान ने पास के पिज्‍जाहट का तेल कर रखा है।

तो ये हे अपना सैमइंडिया।

 

 

अभी देखा की लाल्‍टू ने कुछ शानदार पोस्‍टें अपने ब्‍लॉग पर लिखी हैं। किसी वजह से न पढ़ पाए हों तो आप इन पोस्‍टों तक इन लिंकों से पहुँच सकते हैं-

खोजते रहो, हर जगह होमो सेपिएन्स
वॉट हैव वी डन

Thursday, August 07, 2008

एक डायरी नोट के साए में सहमा बचपन

बिटिया पढ़ना अभी सीख ही रही है इसलिए जो संदेश उसकी स्‍कूल डायरी में नत्‍थी किया गया था उसकी इबारत से अनजान थी। पर उसमें लिखे संदेश का मर्म उस तक पहुँचा दिया गया था। कक्षा में उसकी अध्‍यापिका ने कक्षा को समझाया था कि किसी भी व्‍यक्ति से कोई टॉफी, चाकलेट या किसी तरह का गिफ्ट न लें। गंदे लोग इसमें बॉम्‍ब रख सकते हैं आदि आदि। डायरी का संदेश इस तरह है-

notice

 

दरअसल तीन दिन पहले की अखबारों की रिपोर्ट थी कि अब दिल्‍ली में आतंकवादियों का अगला निशाना स्‍कूल हो सकते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से पुलिस ने स्‍कूलों को आगाह किया है कि वे सुरक्षात्‍मक उपाय करें। स्‍कूलों पर आतंकी हमला, सिहरन पैदा करने वाली आशंका है। नन्‍हें खिलखिलाते बच्‍चों को कोई निशाना भला कैसे बना सकता है। पर ये बात कहते हुए भी हमें पता है कि बात बेतुकी है। इन ताकतों पर कोई तर्क काम नहीं करता। पर सच कहें कि इस डायरी-नोट की छाया में बच्‍चे को स्‍कूल भेजते रूह कांपती है। इतना लंबा चौड़ा स्‍कूल हजारों बच्‍चे, हजारों स्‍कूल बैग, बीसियों स्‍कूल बस, टिफिन, खेल का सामान और ये सब तो बस एक ही स्‍कूल में, ऐसे सैकड़ों स्‍कूल है शहर भर में- ऐसे डायरी नोट की आशंका में बेचैन होने वाला पिता मैं अकेला तो नहीं। अब अगर कोई शैतान तय कर ही ले तो उसके लिए क्‍या मुश्किल है एक बम को सरका देना .... उफ्फ।

लेकिन जब फलक को थोड़ा विस्‍तार देते हैं तो लगता है कि बचपन पर ऐसी तलवारें तो पूरी दुनिया में हैं। फिलीस्‍तीन, अफगानिस्‍तान या इराक के बच्‍चे जिन्‍हें कोई स्कूल या तो नसीब नहीं और है तो भी उनके सुरक्षित से सुरक्षित स्‍कूल हमारे स्‍कूलों से ज्‍यादा असुरक्षित हैं। खुद हमारे देश के कई हिस्‍से वर्षों से इस हिंसा के शिकार हैं। सुना है इराक में बच्‍चे उन मैदानों में खेलते हैं जिनमें बारूदी सुरंगे होने की आशंका है। जब अनुराधा ने कहा कि भगदड़, आतंकवाद आदि घटनाओं को देखने का एक नजरिया औरतों जैसे हाशिए के वर्गों पर उसके प्रभाव के आकलन का भी है तो लोगों को ये अति लगा। पर हम जोर देकर कहते हैं कि आतंकवाद हो, दुर्घटनाएं या फिर प्राकृतिक आपदाएं इनकी मार होती सबके लिए बुरी ही है किंतु ये मार सब पर बराबर नहीं होती।

काश हम बच्‍चों को सहमा देने वाले डायरी नोट्स की छाया से मुक्‍त बचपन दे पाएं।

Wednesday, August 06, 2008

ब्‍लॉगिंग आग्रह की वस्‍तु है

बीमा कंपनियों के विज्ञापनों से शहर आच्‍छादित है। चहुँ ओर मौत और बुढ़ापे का भय बिखरा है। इतना दो तुम्‍हारे अपने इतना पाएंगे...अस्पताल जाना पड़ा तो बिल हम चुकाएंगे... और अंत में पुच्‍छल्‍ला ये कि 'बीमा आग्रह की वस्‍तु है' (इंश्‍योरेंस इज़ अ मैटर ऑफ सालिसिटेशन)। भाषिक प्रयुक्तियॉं बेचैन करती हैं सो हमने पड़ताल की तो पता लगा कि ये कानूनी शब्‍दावली है जिसका अर्थ है कि बीमा को बीमा कराने का इच्‍छुक व्‍यक्ति अधिकार की तरह नहीं मांग सकता। यह तभी किया जा सकता है जब इच्‍छुक कहे कि मेरा बीमा कर दो और बीमा कंपनी कहे कि हम आपका बीमा करना चाहते हैं...दोनों राजी तभी बीमा होगा। ये नहीं कि बोर्ड टंगा देखा और हो गया बीमा। तो इस तरह बीमा आग्रह की वस्‍तु है।

पर भई बीमा तो बीमा है कि नोट-शोट का मामला है। पर ये ब्‍लागिंग कैसे आग्रह की वस्‍तु है। है न.. अगर आप हाल फिलहाल की पोस्‍टें पढें तो आपको भी लगेगा। हमने पढ़ा कि किसी ने पोस्‍ट लिखी कविता या कहानी (या जिस विधा की मान लें उस विधा की रचना थी) एक अन्‍य को मजाक की सूझी उसने उसी तर्ज पर एक और लिख डाली। व्‍यंग्य तो खैर नहीं था विनोद ही था पर शुद्ध विनोद तो शुद्ध घी हो गया है, मिलता ही कहॉं है। करने वाला विनोद भी करे तो सुनने वाला उसे व्‍यंग्‍य ही मानता है। अगला बिफर पड़ा, तुम दो कौड़ी के पाठक मैं प्रसाद, प्रेमचंद- अगले ने कहा कि मेरा ब्‍लॉग आग्रह की वस्‍तु है जिसे मैं चाहता हूँ वो पढ़े बाकी मेरा वक्‍त बर्बाद न करें।    वैसे जब लोगों को पता चला कि 'वक्त बर्बाद न करें' एक गांरटीशुदा जुमला हो गया है तो कृपया वक्‍त बर्बाद करें की भी गुजारिश हुई :))

तो भैया अब  ब्‍लॉगिंग, हम लिखें-दुनिया पढे नहीं रह गई :))। अब इसे सैडिस्टिक प्‍लेज़र कहना चाहें तो कहें पर हमें तो ये विवाद बड़ा मोहक सा लगा। वैसे हम साफ बता देना चाहते हैं कि हमारा ब्‍लॉग पढना कतई आग्रह की वस्‍‍तु नहीं है। जो चाहे पढे- रिक्‍शावाला, झल्‍लीवाला या सामानवाला सबका स्‍वागत है। 

 

(बहुत दिनों बाद किसी के फटे में टांग अड़ा रहे हैं, हमें डर लगा कि जैसे पिछले दिनों पंगेबाज पर आरोप लगा कि बस नाम के ही पंगेबाज रह गए हैं, कहीं हमारी भी इमेज न बिगड़ चुकी हो)