Thursday, February 18, 2010

विनीत का जुकाम 2.0

ईमेल को सार्वजनिक न करने को लेकर एक आचार संहिता सी बन गई है पर फेसबुक/आर्कुट/टि्वटर/बज्‍़ज जैसे स्‍पेस कहीं कम निजी हैं तथा उन्‍हें शेयर करने के मामले में अभी एंबीग्‍युटी (अस्‍पष्‍टता)  है इसका लाभ उठाते हुए अपने बज्‍़ज एंकाउंट से विनीत के सर्दी जुकाम का 2.0 संस्‍करण आपके सामने पेश कर रहा हूँ-

मामला सिर्फ इतना है कि विनीत ने 3:55 PM पर बज्‍़ज (पब्लिक)  किया -

 PRO VINEET

3:55 pm vineet kumar - Buzz - Public -
तमाम कोशिशों के बावजूद भी आखिर आ ही गया- सर्दी,खांसी और बुखार की चपेट में।..रियली,बहुत गंदा फील कर रहा हूं।

इस पर जो बज्‍़ज-पंचायत हुई उसे जस का तस पेश कर रहे हैं..अंतिम बज्‍़ज पोस्‍ट किए जाने के  वक्‍त था...उसके बाद के अपडेट इसमें शामिल नहीं हैं- कैसे वेब 2.0 सीधे सादे जुकाम को पहले डीकंटेक्‍स्‍चुअलाइज कर और फिर शरारती तरीके से रीकंटेस्‍चुअलाइज कर बैठता है इसे देखें- जबरिया दिशा देने वाले जो पद हमें‍ दिखे उन्‍हें हमने बोल्‍ड व रंगीन कर दिया है बाकी कोनो छेड़छाड़ नहीं की है-

dilip mandal - सलाह- गर्म पानी से गरारे यानी गार्गलिंग करें, एक गिलास पानी में एक चम्मच के थोड़ा कम नमक डालें- दिन में कम से कम चार बार।

एक बर्तन में पानी उबालें और भाप लें। कंबल ओढ़ कर भाप लेना अच्छा होता है, दिन में तीन बार। जितना हो सके कफ को बाहर निकालें।

खूब फल खाएं खासकर इस मौसम में संतरा। नींद पूरी लें। खूब पानी पीएं। जुकाम के प्रभाव को कम करने के लिए दिन में एक सिट्रिजीन की गोली लें। एक ही।

धूल धुएं से जितना बच सकें, उतना बचें।4:28 pm

ajay brahmatmaj - अपना तो एक ही इलाज है दिन में खौलता गर्म पानी और शाम में वह कोई रंग ले ले तो जुकाम की बला।4:39 pm

ajit anjum - तुम जवानी में बीमार बहुत पड़ने लगो हो . मुझे तो कुछ गड़बड़ लग रहा है . दिलीप मंडल की सलाह मानकर भी कुछ नहीं होगा ....9:00 pm

Manisha Pandey - अजीत जी ठीक कह रहे हैं। इलाज कुछ और ही है दोस्‍त। देखो कोई रूपसी हो आसपास।9:43 pm

Prashant Priyadarshi - बाप रे.. एक सर्दी पर इत्ता बवाल? सर्दी जुकाम तो हमें भी है, हमें तो कोई सलाह नहीं देता!! :)10:02 pm

मसिजीवी blog - नहीं मनीषा की बात पर कान न देना.... two wrongs dont make a right :)Edit10:10 pm

vineet kumar - मनीषा की दिली तमन्ना है कि मेरे नाक से पानी निकलने के बजाय आंखों से आंसू चूने लग जाए। जो कि मैं उसके कहे पर कभी नहीं होने दूंगा। बाकी अजीतजी ने जो सलाह दी है तो साल छ महीने बाद उन्हीं पर ये जिम्मेदारी डालने जा रहा हूं। दिलीपजी की बतायी बातों को सीरियसली ले रहा हूं और अजयजी के सुझावों का असर इतना अधिक है कि जब भी गरम पानी पीता हूं उनका ख्याल आता है।..10:30 pm

vineet kumar - अनुभव नहीं है इस मामले में सर। आप कह रहे हैं तो मान ले रहा हूं। एकाध बार कोशिश की थी लेकिन इन्टर्नशिप की आपाधापी में मामला गड़बड़ा गया और प्रोड्यूसर ने इतनी शिफ्ट बदली कि कुछ ठोस होने नहीं दिया। एक पोस्ट भी लिखी है।..अब इस बुढ़ापे में क्या कोशिश करुं।..10:38 pm
ajit anjum - विनीत , दिलीप मंडल और अजय जी , मसिजीवी जैसे बुद्धिजीवियों की बातों पर बिल्कुल ध्यान मत देना . ये सब बाबा आदम के जमाने के टोटके बता कर तुम्हारी सेहत ठीक करना चाहते हैं . बीमारी की जड़ पर नहीं जा रहे हैं . तुम मनीषा जी की सलाह पर चलो . तबियत ऐसी हरी होगी कि पुदीन हरा भी बेकार हो जाएगा . इस उम्र में इस किस्म की बीमारी ठीक नहीं . फेसबुक पर भी तुम बुद्धिजीवियो के चक्कर में रहते हो . काम भी उसी तरह का करते हो . सोच -विचार भी बौद्धिक है . इस लबादे से बाहर झांको . बीमारी का दवा कहीं न कहीं जरूर मिलेगी10:50 pm

मसिजीवी- अजीतजी भरमा रहे हैं रहे हैं विनीत सावधान... गरम पानी, रंगीन पेय से चिकित्‍सा या स्‍त्री- पदार्थ दोनों में से कौन सा ज्‍यादा पुराना (बाबा आदम के जमाने के टोटके ..) है खुद ही सोचो :)11:00 pm

vineet kumar - आपलोग जो मेरी बीमारी पर इतनी पंचैती कर रहे हैं। बीमारी की जड़ है कि मेरी जब भी तबीयत खराब होती है..मेस का खाना ताकने का मन नहीं करता और लगभग दिनभर भूखा रह जाता हूं। आपलोग घर-गृहस्थीवाले लोग है। घर का खाना खिलाइए कि देखिए तबीयत कैसी हरी हो जाती है।..11:03 pm

Friday, February 12, 2010

राजेश जोशी की एक कविता

हमारी भाषा

                                 - राजेश जोशी

भाषा में पुकारे जाने से पहले वह एक चिडि़या थी बस

और चिडि़या भी उसे हमारी भाषा ने ही कहा

भाषा ही ने दिया उस पेड़ को एक नाम

पेड़ हमारी भाषा से परे सिर्फ एक पेड़ था

और पेड़ भी हमारी भाषा ने ही कहा उसे

इसी तरह वे असंख्‍य नदियॉं झरने और पहाड़

कोई भी नहीं जानता था शायद

कि हमारी भाषा उन्‍हें किस नाम से पुकारती है

 

उन्‍हें हमारी भाषा से कोई मतलब न था

भाषा हमारी सुविधा थी

हम हर चीज को भाषा में बदल डालने को उतावले थे

जल्‍दी से जल्‍दी हर चीज को भाषा में पुकारे जाने की जिद

हमें उन चीजों से कुछ दूर ले जाती थी

कई बार हम जिन चीजों के नाम जानते थे

उनके आकार हमें पता नहीं थे

हम सोचते थे कि भाषा हर चीज को जान लेने का दरवाजा है

इसी तर्क से कभी कभी कुछ भाषाऍं अपनी सत्‍ता कायम कर लेती थीं

कमजोरों की भाषा कमजोर मानी जाती थी और वह हार जाती थी

भाषाओं के अपने अपने अहँकार थे

 

पता नहीं पेड़ों, पत्‍थरों, पक्षिओं, नदियों, झरनों, हवाओं और जानवरों के पास

अपनी कोई भाषा थी कि नहीं

हम लेकिन लगातार एक भाषा उनमें पढ़ने की कोशिश करते थे

इस तरह हमारे अनुमान उनकी भाषा गढ़ते थे

हम सोचते थे कि हमारा अनुमान ही सृष्टि की भाषा है

हम सोचते थे कि इस भाषा से

हम पूरे ब्रह्मांड को पढ़ लेंगे 

                                (कविता संग्रह - 'दो पंक्तियों के बीच ' से साभार)

Thursday, February 11, 2010

भड़ास-मोहल्‍ला अब ( मौसेरे) भाई भाई

यह पोस्टिका एक रहस्‍यपूर्ण सूचना बॉंटने भर के लिए है। आप में से कुछ को अवश्‍य ही मोहल्‍ला के विषय में याद होगा ऐसे ही भड़ास के भी। दोनों ही ब्‍लॉग रहे हैं और अब मीडिया समाचार पोर्टल बन गए हैं तथा एक मायने प्रतिस्‍पर्धी भी हैं। दोनों ही के संचालकों में विवादों, बलात्कार की कोशिश के आरोप जैसी कई चरित्रगत समानताएं भी बताई जाती  हैं पर तब भी ये समानधर्मी पूर्व-ब्‍लॉगर विरोधी ही कहे जाते हैं या कम से कम पब्लिक ऐसा ही जानती है।   इसलिए कल जब ब्‍लॉगवाणी पर ये दिखा तो हैरानी हुई-

ScreenHunter_01 Feb. 11 15.58

ये अविनाश भला क्‍यों यशवंत का प्रचार कर करने लगे। जब जिज्ञासावश इस पर क्लिक किया तो ये मोहल्‍ले की ओर महीनों बाद पहली बार जाना हुआ था..देखा तो वाकई भड़ास की पोस्‍ट मोहल्‍ले पर विराजमान थी।

ScreenHunter_01 Feb. 10 20.05

समानधर्मी लोग वाकई एक हो गए हैं या इतने दिनों तक एक पोर्टल  के मालिक लोग किसी प्रतिस्पर्धी की फीड को पोस्‍ट होने से रोकना नहीं सीख पाए :)। वैसे अगर ये तकनीक का अनाड़ीपन न होकर वाकई भड़ास तथा मोहल्‍ले का गठजोड़ है तो  ये गठजोड़ हमें बेहद स्‍वाभाविक जान पड़ता है। क्‍या कहते हैं?  

Tuesday, February 09, 2010

हर घेटो खुद शहर पर एक सवाल है

हिन्‍दी के मानूश हैं पर गणित से मो‍हब्‍बत रही है इतनी कि पहले भी कहीं कह चुके हैं कि गणित की याद उस प्रेमिका की तरह टीस देती है जिससे विवाह न हो पाया हो (कोई ये न माने कि हिन्‍दी से चल रहे गृहस्थिक प्रेम में हमें कोई असंतुष्टि है :) पर पुराने प्रेम की टीस इससे कम थोड़े ही होती है) खैर गणित में जब कोई सवाल अटक जाता था तो बस वो अटक जाता था  और जितना सर भिडा़ओ हल न होकर देता था ..जल्द ही समझ आ गया कि ऐसे में कापी बंद कर घूमने चल देना चाहिए वापस आने तक सवाल का हल या अब तक की कोशिशों की गलती सूझ चुकी होती थी। जब पिछले दिनों तमाम कोशिशों के बावजूद छत्‍तीसगढ़ के ब्‍लॉगर साथियों की खुद से नाराजगी पकड़ में न आई तो हम कापी बंद कर इधर उधर टहलने निकल पड़े। इधर यानि अपने ही ब्‍लॉग पर अपने ही ब्‍लॉग पर दो साल पहले जनवरी 2008 की एक पोस्‍ट और उधर यानि कल मित्र बिल्‍लौरे के ब्‍लॉग पर अनूप के साक्षात्‍कार... इन दोनों पोस्‍टों में ही हमें इस फिनामिना को और बेहतर समझने के सूत्र दिखे।
जब हम ब्‍लॉगस्‍पेस को समझना चाहते हैं तो पब्लिक स्‍पेस की शब्‍दावली में ही समझना होगा। इसलिए अगर किसी शहर में घेटो तैयार हों तो इसके लिए खुद घेटो को या उसके बाशिंदो को दोष देना उनके खड़े होने की प्रक्रिया के प्रति उदासीनता को ही दर्शाता है। दिल्‍ली के ओखला या जाफराबाद में लोग घेटो इसलिए नहीं बसाते कि उन्‍हें असुविधाएं पसंद हैं या तंग गलियों में रहना उन्‍हें अच्‍छा लगता है वरन इसलिए कि बाकी शहर उनके प्रति या तो उदासीन हैं या उनकी उपेक्षा कर रहा है।
'घेटो' के घेटो होने में अपरिचित जगह में अपने जैसों को इकट्ठा कर अपनी असुरक्षाओं से कोप करने का भाव होता है। जो पूरे शहर में डरा डरा सा घूमता है क्‍योंकि वह वहॉं खुद को अजनबी सा पाता है, अल्‍पसंख्‍यक पाता है या शक की निगाह में पाता है वह जैसे ही अपनी बस्‍ती में आता है जो उसने बसाई ही है 'अपने जैसों' की वहॉं वह फैलता है कुछ ज्‍यादा ही फैलता है- गैर आनुपातिक होकर। पहली पीढ़ी के प्रवासी महानगर की सुखद एनानिमिटी के आदी नहीं होते और उससे बचकर भागते हैं और वह छोटी सी बस्ती ही उन्‍हें सुकून देती है जहॉं एनानिमिटी की जगह 'पहचान' की गुजाइश होती है इस तरह महानगर में घेटो बसते हैं- ओखला, तैयार होता है, जाफराबाद, बल्‍लीमारान और मुखर्जीनगर।
ये सही है कि ये प्रवृत्ति मूलत: फिजीकल स्पेस की है तथा इसे वर्च्‍युअल पर सीधे सीधे लागू करने के अपने जोखिम हैं। पर ये घालमेल हम हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत में होता ही रहा है एक बार फिर सही।  अगर छत्‍तीसगढ़ या किसी और क्षेत्र या समूह के ब्‍लॉगर इस पूरे ब्‍लॉगशहर को पूरा अपना न मानकर अपनी बस्‍ती बसाना चाहते हैं तो इसे कानूनी नुक्‍तेनजर से समझने की कोशिश इस एलियनेशन को और बढ़ाएगी ही इसलिए जरूरी है इसे पूरे ब्‍लॉग शहर की असफलता के रूप में देखे जो कुछ साथियों में इस एलियनेशन के पनपने को रोक नहीं पाई।
गणित के उस बेहद उलझे सवाल के साथ सुविधा ये होती थी कि किताब के आखिर में दिए हल से मिलाने पर पता चल जाता था कि हमारा हल ठीक हे कि नहीं। काश ऐसी कोई सुविधा यहॉं भी होती।

Thursday, February 04, 2010

कुछ गलतफहमी कितनी प्रिय होती हैं

न जी इस गलतफहमी का चिट्ठाचर्चा, डोमेन स्‍क्‍वैटिंग या इस किस्म के किसी प्रकरण से कोई लेना देना नहीं, वहॉं की गलतफहमी में प्रिय तत्‍व अभी हमें नहीं मिले हैं मिलते ही सूचित करेंगे। यहॉं की गलतफहमी का संबंध हमारी एक अन्‍य पोस्‍ट से है। जब अमिताभ बच्‍चन ने ब्‍लॉगिंग शुरू की तो उस पर हिन्‍दी ब्लॉगजगत में कुछ चर्चा हुई थी, अफलातून ने ध्‍यान दिलाया था कि इसके पीछे अम्बानी का पैसा है, खैर हिन्‍दी ब्‍लॉगजगत की इस हलचल को हमने अपनी एक पोस्‍ट में रखा था... हमारा ये अंग्रेजी ब्‍लॉग, हिन्‍दी ब्‍लॉगों के बारे में है। इसे आजकल कम ही अपडेट कर पाता हूँ।  इस ब्‍लॉग का सारा ट्रैफिक सर्च के माध्‍यम से ही आता है तथा टिप्‍पणी शायद ही कभी आती हैं हालांकि विजीटर काउंट खूब होता है। किंतु अगर इस अमिताभ वाली पोस्‍ट पर ध्‍यान दें तो आज तक कमेंट आ रहे हैं अधिकतर कमेंट सीधे अमिताभ बच्‍चन को संबोधित होते हैं, हिन्‍दी भाषी क्षेत्र के अमिताभ के प्रशंसक गगूल पर अमिताभ बच्‍चन पर्सनल ब्‍लॉग सर्च करते हैं तथा जैसे कि आप देख सकते हैं कि अमिताभ के अपने ब्‍लॉग के ठीक नीचे की कड़ी इस पोस्‍ट पर भेज देती है

ScreenHunter_01 Feb. 04 18.45

हालांकि पोस्‍ट में पढ़ने पर किसी तरह की गलतफहमी की गुंजाइश नहीं है पर शायद प्रेम ही नहीं फैन भी अंधा होता है इसलिए इसी पोस्‍ट पर कई लोग अमिताभ के बारे में अपने प्रशंसा भरे उद्गार इस पोस्‍ट पर दे गए हैं। इन्‍हें पढ़ना मजेदार है कोई अमित अंकल कहकर बुलाते है कोई गंगा किनारे से होने के कारण निकटता स्‍थापित करता है।

नमस्कार अमित अंकल,
मेरा नाम रचना है और हम आपसे कहना चाहते हैं की 'निः-शब्द' जैसे पिक्चर को करने के लिए आपने क्यों नहीं हमारे सामाजिक परिवेश के बारे मैं सोचा. आपका क्या कांसेप्ट था प्लस. हमे बताइए.

नमस्कार,
वाराणासी उत्तर प्रदेश से मैं विनोद कुंवर छोरा गंगा किनारेवाला और मेरी पत्नी संगम इलाहाबाद से,हमलोग आपके बहूत बड़े फेन हैं. मैं चाहता हूँ कि आप एक फिल्म वाराणासी में शूट कीजिये ताकि यादगार रहे एक बार जरूर आइये.
आपका.विनोद कुमार "दब्बू"

इस तरह गलतफहमी में पड़ने वालों में पत्रकार बिरादरी के लोग भी हैं :)

रेस्पेक्टेड अमिताभ जी,
आप से अटैच होने का मौका पाकर बेहद ख़ुशी का एहसास हो रहा है.
मैं आशुतोष श्रीवास्तवा, आजमगढ़ (उ.प.) में एक नेशनल इलैक्‍ट्रानिक मीडिया चैनल का जर्नलिस्ट हूँ. आप जब श्री अमर सिंह के साथ उनके घर आजमगढ़ ए थे तो आपको करीब से देखने का मौका मिला था. आज भी आपकी तस्वीरें आँखों के सामने रहती हैं. मैं बचपन से आपकी फिल्म्स देखते आया हूँ. इश्वर आपको स्वस्थ और दीर्घ आयु बनाये ये ही कामना है

सिर्फ प्‍यार ही नहीं लोग उपहार भी भेजने की सूचना देते हैं (काश उपहार के पते को लेकर भी ब्‍लॉग के पते की तरह कोई गलतफहमी होती :)

आज आपका इन्‍टरव्‍यू दैनिक भास्कर में पढ़ा. आज दैनिक भास्कर ने आपके बारे में सब कुछ लिखा है आपके 68वे बी'डे पर. आपके इन्‍टरव्‍यू में आपने कहा था क अगर कोई चैलेंजिंग काम हो तो में आज भी उसको करना चाहूँगा....

...दुनिया आपको एक से एक महंगे गिफ्ट्स देती है, मैं ज्यादा कुछ तो नहीं एक छोटा सा तोहफा आपके जलसा वाले बंगलो पर भेज रहा हूँ. यहाँ से भेजने में कुछ वक़्त लगा भी तो 10 दिनों में पहुच जायेगा. थैंक्‍स फॉर रीडिंग दिस कमेन्ट

हम जानते हैं कि बात हमें नहीं सुपरस्‍टार को कही गई है पर कोई हमारे घर को अमितजी का घर समझकर हमें गले लगा रहा है अफसोस भी है कि जो प्रेम किसी ओर के लिए था वो हम जैसे कुपात्र के कारण अटक गया .. पर ये भी सही है कि झुट्टा ही सही पर प्‍यारा तो लगता ही है।

Sunday, January 17, 2010

चिट्ठाचर्चा साइबर स्‍क्वैटिंग का शिकार : आइए पतन की कुछ और गहराइयॉं नापें

कुछ दिन हुए अनूपजी का फोन आया, चूँकि हम चर्चाकार हैं अत: वे हमसे राय जानना चाहते थे कि क्‍या चिट्ठाचर्चा को खुद के डोमेन पर ले जाना चाहिए। हम इस बात से कतई उत्‍साहित नहीं थे। एक सामूहिक ब्‍लॉग के डोमेन पर जाने की कुछ दिक्‍कतें होती हैं तथा ये उसकी गतिशीलता को प्रभावित करती है ये हम सब चोखेरबाली के अनुभव से जानते हैं। दूसरी दिक्‍कत हमें डोमेन के मालिकाना हक की वजह से भी थी... हाल में कितना भी शोर मचाकर लोगों ने कहा हो 'अनूप की' चिट्ठाचर्चा पर हम पहले कह चुके हैं हमें ऐसा नहीं लगता... हमारी ही है चिट्ठाचर्चा। अस्‍तु हमने सबसे राय लेकर जो तय हो उस पर अपनी अनापत्ति दी संभवत इसे फिलहाल ब्‍लॉगर पर ही रखने का निर्णय लिया गया।

अनूपजी व पाबला साहब (संयोग ही है कि इन पाबला साहब से मेरा कोई विशेष संपर्क नहीं है इसलिए उनकी प्रकृति पर कोई भी टिप्‍पणी कयास ही होगी) के बीच कोई छाया युद्ध चल रहा है इसका आभास कुछ कुछ हमें भी है पर यह सब चिट्ठा संसार में होता ही रहता है कोई अनोखी बात नहीं है। पर इतना तय है कि इस तरह के पंगो की एक मर्यादा रही है। नारद के जितेंद्र को हम कतई पसंद नहीं थे पर पासवर्ड बताने/पाने तक में कोई संकोच नहीं था बाकी लागों के साथ भी ऐसा ही रहा। हिन्‍दी चिट्ठाकारी में अब तक गिरावट केवल भाषिक रही है...एक दूसरे के खिलाफ अपराध करने के रिवाज नए हैं।  खुद अक्षरग्राम मिर्ची सेठ के नाम दर्ज रहा है किसी को नहीं लगा कि इसे हथियाया जाएगा पर चिट्ठाचर्चा पर एक टिप्‍पणी के बाद देखा तो बेहद छि: का अहसास हुआ।

काजल कुमार Kajal Kumar said:

यूं ही घूमते-टहलते मैं एक अन्य साइट
http://chitthacharcha.com पर पहुंचा. पाया कि अमरीका के सर्वर पर भिलाई के किन्हीं गुरप्रीत सिंह सज्जन ने यह नाम बुक कर रखा है. वाह जी बल्ले बल्ले

क्‍या वाकई...

अरे हॉं

WHOIS information for chitthacharcha.com :

[Querying whois.internic.net]
[Redirected to whois.PublicDomainRegistry.com]
[Querying whois.PublicDomainRegistry.com]
[whois.PublicDomainRegistry.com]
Registration Service Provided By: LOOP NAMES
Contact: +091.4229549
Website: http://www.loopnames.com

Domain Name: CHITTHACHARCHA.COM

Registrant:
dillmillgaye.in
Gurupreet Singh (gspabla@gmail.com)
272/A, Risali Sector
Bhilai
Chhattisgarh,490006
IN
Tel. +91.9993908226
Fax. +91.9993908226

Creation Date: 12-Dec-2009
Expiration Date: 12-Dec-2010

Domain servers in listed order:
ns12.netwayweb.net
ns11.netwayweb.net


Administrative Contact:
dillmillgaye.in
Gurupreet Singh (gspabla@gmail.com)
272/A, Risali Sector
Bhilai
Chhattisgarh,490006
IN
Tel. +91.9993908226
Fax. +91.9993908226

ScreenHunter_01 Jan. 17 14.21

 



उल्‍लेखनीय है कि प्रशासक के रूप में दर्ज दिलमिलगए एक व्‍यवसायिक साईट है जिसके संपर्क के लिए नाम के रूप में श्री जीएस पाबला तथा श्री बी एस पाबला नाम दर्ज हैं।  संभवत गुरप्रीत पाबला, पाबला जी के कोई परिजन ही हैं।



अब सवाल ये है कि क्‍या ये साईबर स्‍क्‍वैटिंग है? निश्चित तौर पर है अगर विकी पर साइबर स्‍क्‍वैटिंग की परिभाषा के मूल तत्‍व को देखें तो-




 Cybersquatting (also known as domain squatting), according to the United States federal law known as the Anticybersquatting Consumer Protection Act, is registering, trafficking in, or using a domain name with bad faith intent to profit from the goodwill of a trademark belonging to someone else




साइबर स्‍क्‍वैटिंग अपराध है उस पर कानून कुछ कहता होगा...ये हमारी नहीं कानूनचियों की दिक्‍कत है...अपनी दिक्‍कत बस इतनी है कि लोगों के व्‍यक्तिगत छाया युद्ध यहॉं सामूहिकता के विरूद्ध अपराधों की गर्त में जा पहुँचे हैं। इससे पहले की कोई बॉंग देकर मसीही हासिल करे चेता देना जरूरी है।



1/02/2010: अपडेट  अभी ज्ञात हुआ कि श्री पाबला इस पोस्‍ट से आहत हुए हैं, खेद है। उनकी पोस्‍ट का शीर्षक कोई उत्तर देने की मांग करता है, किंतु हमें कोई सवाल पोस्‍ट में मिला नहीं यूँ भी ऐसा सर गाड़े उत्‍तरपुस्तिकाओं से जूझ रहे हैं कि उत्‍तर शब्‍द से ही थकान हो रही है :) । उन्‍हें शायद तस्‍वीर से आपत्ति थी.. हम उनकी यही तस्‍वीर पता थी इसलिए ये लगाई। पर यदि उन्‍हें आपत्ति है तो हटा देने में क्‍या हर्ज है। हटा दे रहे हैं आशा है अब बेहतर अनुभव कर रहे होंगे। अब तक हुए कष्‍ट के लिए खेद है।

Thursday, December 10, 2009

ब्‍लॉगवाणी पर हैकर हमला

ब्‍लॉगवाणी पहुँचने की कोशिश करने पर आज ये चेतावनी दिख रही है

ScreenHunter_01 Dec. 10 16.45

चिंतित हो मैथिलीजी से संपर्क किया तो उन्‍होंने पुष्टि की कि ये ब्‍लॉगवाणी तथा उनकी कुछ अन्‍य साईट्स पर ये हैकर अटैक है। उनके तनाव का अनुमान कर हमने आगे बात की नहीं पर उन्होंने बताया कि टीम काम पर लगी है उम्‍मीद है ब्‍लॉगवाणी जल्‍द ही दिखने लगेगी... हमारा अनुमान कुछ घंटों का है।

कृपया ध्‍यान दें यदि आपके ब्‍लॉग पर ब्‍लागवाणी के विजे़ट हैं तो कई ब्राउजर आपके ब्‍लॉग पर पहुँचने की कोशिश करने वाले पाठकों को माल्‍वेयर चेतावनी दे रहे हैं तथा ब्‍लॉग पर नहीं पहुँचने दे रहे हैं।  आप प्रतीक्षा न करने चाहें तो अस्‍थाई रूप से ब्‍लॉगवाणी विजेट अपने ब्‍लॉग से हटा लें फिर आपका ब्‍लॉग सक्रिय हो जाएगा।

यह पोस्‍ट केवल सूचनार्थ है।

खून खौलाना की काफियापूर्ति करते मौलाना (आजाद)

टॉम ऑल्‍टर की कुछ सबसे दमदार प्रस्‍तुतियों में से एक है मौलाना आज़ाद। हम पिछले कुछ सप्ताह से इंतजार कर रहे थे और फिर कल दोपहर इस एकल नाटक (सोलो)  की प्रस्‍तुति हमारे कॉलेज सभागार में की गई। आधुनिक भारत में भारतीय मुसलमानों के राजनैतिक जीवन की उथल पुथल पर बेबाक टिप्‍पणी है ये नाटक। बहती हुई उर्दू में टॉम ऑल्‍टर मौलाना आजाद के किरदार को इस खूबसरती से अदा करते हैं कि इस सोलो प्रस्‍तुति को भारतीय रंगमंच की चंद सबसे दमदार प्रस्‍तुतियों में शुमार किया जाता है इसलिए कल जब खुद अपने ही कॉलेज में इसे देखने का मौका मिला तो हमने झट लोक लिया। नाटक पीरो ट्रूप  रंगमंच समूह द्वारा मंचित किया गया। कॉलेज में हुई प्रस्‍तुति से चंद तस्‍वीरें-

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Photo0591

यूट्यूब से प्राप्‍त इसी नाटक से संबंधित दो वीडियो जिनमें से एक तो इस नाटक पर इसके निर्देशक सईद आलम साहब की टिप्‍पणी है जबकि दूसरा कहीं अमरीका में हुए प्रदर्शन का वीडियो है किंतु इस अमरीकी प्रस्‍तुति में सेट तथा प्रस्‍तुति उतनी दमदार नहीं दिख रही है जितनी कल थी... इसकी वजह शायद यह कि कॉलेज में उर्दू को लेकर महौल तथा स्‍वीकृति दोनों ही अधिक है। सेट भी कॉलेज सभागार में कहीं अधिक संसाधन संपन्‍न था।

वीडियो-1

वीडियो 2

हमारी राय पूछें तो इस मायने में ये एक साहसिक प्रस्‍तुति है कि सईद आलम लिखते हैं... टॉम ऑल्‍टर किरदार अदा करते हैं पर वे अल्‍पसंख्‍यकों की रिवाजी देशभक्ति के चक्‍कर में नहीं पड़ते... सरदार पटेल (और नेहरू) को जिन्‍ना के बराबर विभाजन का दोषी बताना साहस का काम है और इस प्रस्‍तुति में इस तरह से कही गई है कि विश्‍वसनीय जान पड़ती है।

Wednesday, December 09, 2009

हमारा अँगूठा हाजिर है श्रीमान

थोड़ी देर लिंक खोजा पर मिला नहीं लेकिन याद ताजा है कि पिछले दिनों किसी ने सवाल उठाया था कि कुछ लोग अपने कार्यालय से ब्‍लॉगिंग करते हैं ये कहॉं तक उचित है ये संभवत पाबलाजी, अनूपजी या ज्ञानदत्‍तजी को या शायद हमें भी संबोधित था, लेकिन  अपने मन में ये कोई सवाल ही नहीं है क्‍योंकि हमारे लिए नैतिकता की परिभाषा इतनी स्‍थूल नहीं है। तब भी पिछले दिनों इलाहाबाद में जब ज्ञानदत्‍तजी समय प्रबंधन के मसले पर मंच से मुखातिब थे तो हमने ये कहकर कि सवाल हमारा नहीं बेनामी है पूछा ...ये बताऍं कि क्‍या दफ्तर से ब्‍लॉगिंग करने में नैतिकता का कोई सवाल उठता है... ज्ञानदत्‍तजी का उत्‍तर बेहद शांत व स्‍पष्‍ट था... नहीं ये कतई नैतिकता का सवाल नहीं है। सुबह उठते ही ज्ञानदत्‍तजी अल्‍ल सुबह घर से कंप्‍यूटर चलाते हैं और देखते हैं कि ट्रेनों का स्‍टेटस क्‍या है... ब्‍लॉगिंग करते हैं..काम करते हैं...दफ्तर में भी ये क्रम रहता है...दरअसल दफ्तर व घर का जो बंटवारा समझा जा रहा है वह बेहद कृत्रिम है असल जिंदगी में दोनों जगह काम होता है ... चौबीस घंटे की नौकरी है... इस मायने में घर के सब काम भी उसी कार्यालयी मनोदशा से ही जुड़े हैं इनके बीच तनाव व नैतिकता का सवाल बेमानी है।

हमें पांडेयजी के इस उत्‍तर से न कोई हैरानी हुई न परेशानी क्‍योंकि हमारा खुद का दृष्टिकोण यही रहा है। ये सवाल हमारे पेशे के बारे में अक्‍सर उठाया जाता है..दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय में शिक्षकों को प्रति सप्‍ताह अठारह घंटे कक्षाएं लेनी होती है, हम विद्यार्थियों की हाजिरी लेते हैं तथा इसे सत्र के बाद दाखिल कर देते हैं इसे ही हमारी हाजिरी भी माना जाता है  अलग से न आने के समय की बंदिश है न जाने की... बस उम्‍मीद ये की जाती है कि कक्षा के समय हम कक्षा में उपस्थित रहेंगे। इतने सब के बाद भी जितनी शिद्दत से हम छुट्टियों का इंतजार करते हैं कोई और नहीं करता दिखता।  आखिर क्‍यों ?

वजह वही है जो ज्ञानदत्‍तजी ने बताई। शिक्षक के लिए कक्षा और कक्षा से बाहर के काम की जो हदबंदी कई लोगों खासकर नौकरशाही किस्‍म की सोच के लोगों के दिमाग में है वो शैक्षिक दुनिया का सच नहीं है। आज ही फेसबुक में एक दोस्‍त ने पूछा कि बायोमैट्रिक हाजिरी के बारे में आपकी क्‍या राय है- उनका इशारा विश्‍वविद्यालय के अधिकारियों द्वारा प्रत्‍येक शिक्षक के अंगूठे के छाप से रोजाना हाजिरी लेकर ये सुनिश्चित करने के प्रस्‍ताव से था जिसके तहत हर शिक्षक को रोजाना 6-8 घंटे कॉलेज में रहना होगा। फिलहाल प्रस्‍ताव को टाल दिया गया है पर ये प्रस्ताव कितना फूहड़ है इसे केवल वे ही समझ सकते हैं जो दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय या जेएनयू जैसे विश्‍वविद्यालयों की कार्यसंस्‍कृति से परिचित हैं। ऐसा नहीं है कि यहॉं  गैरहाजिर रहने की समस्‍या यहॉं है ही नहीं पर वाथवाटर के साथ बेबी फेंक देना मूर्खता है। शिक्षक केवल 6-8 घंटे रोजाना शिक्षक नहीं होता वो चौबीस घंटे केवल शिक्षक ही होता है। जिस पचास मिनट के पीरियड में वह कक्षा लेता है उसमें उसके अब तक के सारे ज्ञान को शामिल रहना होता है ठीक वैसे ही जैसे कि एक कलाकार के श्रम को उसके प्रदर्शन के मिनटों की गणना करके नहीं समझा जा सकता। ये पचास मिनट शिक्षक का काम नहीं होते वरन उसकी परफार्मेंस होते हैं उसका काम तो उस सारे रियाज को समझा जाना चाहिए जो वह पूरे दिन करता है और हमारे लिए तो दिन भी कम पड़ता है।  अगर हमारे कॉलेज हमें कॉलेज में ही इस रियाज के मौके देने को तैयार हों तो शायद किसी को भी पूरे दिन वहॉं रहने में तकलीफ न हो। हम जब कॉलेज से  रवाना होते साथियों से दिन भर की विदाई का हाथ मिलाते हैं तो सदैव सवाल होता है ...कहॉं ? क्‍योंकि अधिकांशत: कॉलेज के बाद किसी गोष्‍ठी, लेक्‍चर, पुस्‍तकालय, सुपरवाइजर, मंडी हाउस, विश्‍वविद्यालय ही जाना होता है या कभी कभी उत्‍तर सुनाई देता है ... कहीं नहीं यार घर ही जाउ़ंगा थकान है घर जाकर पढूंगा... कोई शुद्ध लिपिकीय तरीके से इस बात की जॉंच पर बल दे सकता हे कि इस सब 'कामों' में कितने 'पर्सनल' हैं कितने 'आफीशियल' यानि बताएं कि जो उपन्‍यास आप पढ़ रहे हैं वो पाठ्यक्रम का ही है न... वगैरह।  हमारी नजर में कसौटी ये है कि आउटपुट की तुलना करें। देश के बहुत से राज्‍यों में शिक्षक हाजिरी देते हैं स्‍कूल कॉलेज में मौजूद रहते हैं लेकिन सीखने-सिखाने की प्रक्रिया का परिणाम कहीं कम होता है... क्‍या स्‍वविवेक पर निर्भर स्‍वाभिमानी  प्रोफेसर को अंगूठाछाप बना देना उन्‍हें बेहतर शिक्षक बनाएगा.. हमें तो शक है, पर अगर अब द्रोणाचार्य के एकलव्‍य बनने की बारी है तो हमारा अंगूठा हाजिर है श्रीमान। 

Wednesday, November 11, 2009

मैं चर्चाता हूँ...इसलिए मैं हूँ

अगर इंसान पहचान के कई टुकड़ों में साथ साथ जीता है पिता, मित्र, धर्म, जाति... तो भला ब्‍लॉगर की क्‍योंकर एकमुश्‍त पहचान होगी... वो भी अपने अलग अलग चिट्ठों, पोस्‍टों, टिप्‍पणियों से पहचान हासिल करता है... हम भी करते हैं, पर जब कोई हमसे पूछता है तो जिस पहचान को हम मसिजीवी होने के बाद सबसे अहम मानते हैं वह है चर्चाकार होना। चिट्ठाचर्चा के इतिहास पर हमारी कोनो पीएचडी नहीं है, सुकुलजी इतिहास दर्ज कर चुके हैं बांच लें, चिट्ठाचर्चा ने 1000 पोस्‍टों का सफर पूरा करने के अवसर पर हम केवल इस मंच से अपने जुड़ाव की बात करेंगे और नहीं।

मित्रों के सद्भाव के चलते जनसत्‍ता से ब्‍लॉगों पर एक स्‍तंभ जिखने की पेशकश हुई... पहले अविनाश अपना कॉलम लिखते थे पर उन्‍होंने भास्‍कर ज्‍वाइन कर लिया तो जाहिर है जनसत्‍ता में जारी नहीं रख सकते थे, थानवीजी से फोन पर बात हुई उन्‍होंने कहा कि आपका कालम है खुद कोई नाम रखें... 'चिट्ठाचर्चा' हमने बिना झिझक कहा, आखिर नियमित रूप से पोस्‍टों की चर्चा और भला क्‍या नाम आ सकता था हमारे मन में। जब तक जनसत्‍ता में कॉलम आया चिट्ठाचर्चा नाम ही रहा कभी मन में नहीं आया कि ये शुक्‍लजी के मॉडरेशन में चल रहे किसी सामूहिक ब्‍लॉग का नाम है... भले ही शुक्‍लजी हमसे सौगुनी मेहनत करते हैं चर्चा पर, किंतु चिट्ठाचर्चा हम सब का है... ये 'अविनाश के' मोहल्‍ले या 'यशवंत के' भड़ास सा कम्‍यूनिटी ब्‍लॉग नहीं है ये वाकई हमारी चिट्ठाचर्चा है इसलिए जब कोई टर्राते हुए इसे सुकुलजी के किन्‍हीं गुट की चर्चा कहता है तो झट मन में आता है बड़े आए सुकुलजी...(नारद को लेकर भी ऐसा ही मन में आता था अभी तक तो उम्‍मीद है कि चर्चा के मामले में ये विश्‍वास बना रहेगा)  

ऐसा नहीं कि नाराजगी नहीं हुई खुद अनूप धुरविरोधी प्रकरण में हमसे धुर असहमत थे... उनकी क्‍या कहें घर में खुद नीलिमा असहमत थीं

धुरविरोधी के विरोध का अपना एकदम निजी तरीका है इसपर सेंटी होने की भी जरूरत नहीं है उक्त विचार भी आपके एकदम निजी हैं

पर हमने चर्चा का विषय इसे बनाया एक बार नहीं लगा कि चिट्ठाचर्चा अनूप के मॉडरेशन में चल रहा ब्‍लॉग है उन्‍हें आपत्ति होगी। दरअसल चिट्ठाचर्चा में वैयक्तिकता व सामुदायिकता का जो संतुलन है उसे महसूसने की जरूरत है इसे साधुवादी वाह वाह से नहीं पकड़ा जा सकता। आप कौन सी पोस्‍ट चर्चा के लिए चुनेंगे ये प्रक्रिया राग द्वेष से मुक्‍त नहीं है होना मुश्किल भी है पर सिद्धांतत: चर्चाकार मानते हैं कि चर्चाकार को अपने विवेक से यह तय करने का हक है इसलिए इन आपत्तियों को कभी तूल नहीं दिया जाता कि कौन सी पोस्‍टें चुनी गईं... इसी प्रकार चर्चाकार की दृष्टि भी स्‍वतंत्र है किंतु दूसरी ओर सरोकारों की एक स्‍वीकृत सामुदायिकता है। पिछले कुछ महीनों से मेरी, नीलिमा तथा सुजाता की   ब्‍लॉगिंग में सक्रियता कम हुई है पर कम से कम इतना प्रयास अवश्‍य करते हैं कि चर्चा अवश्‍य हो जाए भले ही संक्षिप्‍त रह जाए वैसे इसमें कितना योगदान हमारी प्रतिबद्धता है कितना अनूपजी के तकादों का, यह कहना कठिन है।

भविष्‍य की ओर घूरें तो मुझे लगता है कि जैसा कि इलाहाबाद में इरफान ने अपने परचे में कहा था...हम ब्‍लॉगर खुद ब्‍लॉगिंग पर लिखना बांचना पसंद करते हैं इससे तय है कि चर्चा की यात्रा अभी चलेगी...नए चर्चा मंच दिखाई दे रहे हैं...उनकी मौलिकता को लेकर कुछ संशय है पर ये संशय भी मिटेंगे...अपनी तो राय है मोर दि मेरियर।