Friday, December 07, 2007

स्‍वागत करें, ब्‍लॉगिंग अब पत्रकारिता पाठ्यक्रम का हिस्‍सा होने जा रही है

मूलत: जो शीर्षक सोचा था इस पोस्‍ट का वह था, सावधान ब्‍लॉगिंग अब पाठ्यक्रम का हिस्‍सा होने जा रही है। कुछ कुछ सुधीशजी वाली पोस्‍ट की तरह। पर फिर खुद को सुधार लिया। माना विश्‍वविद्यालय चिरकुटई के महामिलन स्‍थल होते हैं पर कब तक हर चीज से सावधान, हैरान परेशान होते रहेंगे। आने दो ससुरे पाठ्यक्रम को भी देखें हमारा क्‍या बिगाड़ लेता है। बहुत होगा तो ये कि इतिहास में चार नाम पढ़ाने लगेगा, अमुक ने शुरू किया, अमुक चिट्ठाकारी का शुक्‍ल है अमुक द्विवेद्वी। अमुक युग अमुक वाद। थोड़ी मठाधीशी आ पैठेगी..निपट लेंगे।

हॉं तो मूल समाचार ये कि गढ़वाल के किसी विश्‍वविद्यालय में जिसकी न ईसी(कार्यकारी परिषद) है न एसी (अकादमिक परिषद) ने अपने एकवर्षीय पत्रकारिता पाठ्यक्रम में हिन्‍दी ब्‍लॉगिंग को भी जगह दी है। खबर की पुलकित च खिलकित घोषणा राकेश ने हाल में की। हम जब उन आशंका के द्वीपों को निपटा चुके जो विश्‍वविद्यालयी जिंदगी को पिछले बीस सालों से देखने के बाद उग आए हैं, तो बहुत ही शरारती विचार आने शुरू हुए।

कल्पना करें कि स्‍लाइडशो में जितेंद्रजी व महावीर प्रसादCap and Gown 2 द्विवेदी का चेहरा गड्डमड्ड होते हुए कोई डाक्‍साब हिन्‍दी चिट्ठाकारी के नारद युग की तुलना सरस्‍वती से कर रहा है। भगवा चिट्ठे, लाल चिट्ठे पर टिप्‍पणी पूछी जा रही हैं। वाह वाह।  बाहर चैंपियन च कुजिओं के ऊपर ही ब्‍लॉगवाणी बनी है। प्रेक्टिकल परीक्षा में परीक्षक बनने व बनवाने का धंधा चल रहा है। ब्‍लॉगरोल माफिया सक्रिय है। आचार्य ब्‍लॉगर का झोला (लैपटॉप) थामने के लिए पीछे पीछे शोधार्थियों की सेना चल रही है....आनंदम परम-आनंदम।

5 comments:

बाल किशन said...

अद्भुत दृश्य होगा वह. कल्पना करके ही रोमांच हो उठता है.,

अरुण said...

मतलब अब हम भी मास्साब बन सकते है....?

Sanjeet Tripathi said...

बहुत खूब!!
विवि का नाम दिए रहते तो सेटिंग बिठाने मे आसानी होती है, खैर फ़िलहाल इतनी जानकारी मे ही कोशिश करे मा का हर्ज है!!

विनीत कुमार said...

sirji acha hai na hum chirkut logo ko bhi para jayaega,khali ek kaam kar digiyaega ki jo bhi syaalabus banabe usme ek chapter daal de vishvidyalaya ke blogger aur hamre baare me likh de,parshidh hone ka man karta hai

राकेश said...

संजीत भाई को जानकारी कि उत्तराखंड मुक्त विश्वविद्यालय नाम है उसका. अरुण भाई, बिल्कुल मास्साब बन सकते हैं. कम से कम इसके लिए युजीसी वाली नेट और विश्वविद्यालयों से डॉक्टरेट-फाक्टरेट की कोई दरकार नहीं होनी चाहिए. हमारे जैसों के लिए लॉटरी! ह...हा....
विनीत भाई को विख्यात बनाने के तरकीब पर विचार करने के लिए चोटी के ब्लॉगबाज़ों की एक शिखर वार्ता का प्रस्ताव दिए देता हूं.