Monday, August 27, 2007

टेक्‍नोफोबिया और बैग-दुपट्टे की दुखद प्रणयलीला

मैट्रो अब दिल्‍ली की लाईफ लाइन बन चुकी है। इसकी कई तकनीक मजेदार हैं और इन्‍होंने दिल्‍ली की सिविक सेंस को काफी प्रभावित किया है। मसलन एक तो लें एस्‍केलेटर्स और दूसरे बात करें ट्रेन के स्‍वचलित दरवाजों की। गैर दिल्‍लीवासियों को बताया जाए कि चूंकि मैट्रो अंडरग्राउंड, भूतल तथा एलीवेटिड तीनों सतर पर चलती है तथा अक्‍सर लोगों को ट्रेनें बदलनी पड़ती हैं अत: यात्रियों को खूब ऊपर नीचे की सीढि़यॉं चढ़नी-उतनी पड़ती हैं अत: मैट्रो ने हर स्‍टेशन पर बहुत से एस्‍केलेटरों की व्‍यवस्‍था की है

- इन बिजली की सीढियों के सार्वजनिक स्‍तर पर इतने बढ़े पैमाने पर उपयोग को इस शहर (और शायद किसी भी भारतीय शहर) ने पहले कभी नहीं देखा था अत: बहुत से लोगों के लिए ये प्रोद्योगिकी तथा टैक्‍नोफोबिया को उभारता स्‍थल होता है। अक्‍सर इन सीढि़यों के पास ऐसे भयभीत लोग खड़े अनिर्णय में खड़े दिखते हैं कि पैर आगे बढ़ाएं कि नहीं- अकसर फिर वे साथ में बनी सामान्‍य सीढि़यों से जाने का निर्णय लेते हैं- बहुधा ये लोग बुजुर्ग होते हैं क्‍योंकि उम्र के बढ़ने के साथ साथ नई तकनीकों को लेकर अविश्‍वास बढ़ता जाता है। कुल मिलाकर होता ये हैं कि युवा लोग तो मजे में एस्‍केलेटर से जाते हैं और बुजुर्ग हॉंफते हॉंफते तीस तीस मीटर या तो सामान्‍य सीढि़यों से चढ़ते हैं या फिर लिफ्ट का लंबा इंतजार करते हैं।

दूसरी तकनीक यानि स्‍वचलित दरवाजे भी कम नहीं है। ट्रेन के ड्राईवर के सामने कैमरे से सीसीटीवी के माध्‍यम से पूरे प्‍लेटफार्म का दृश्‍य रहता है- जब सब उतर चढ़ जाते हैं तो वह अरवाजे बंद करता है, यदि कुछ सामान या कोई व्‍यक्ति टकराता है दरवाजे से तो दरवाजे स्‍वमेव पुन: खुल जाते हैं तथा फिर बंद करने होते हैं- ट्रेन दरवाजे बंद होने पर ही चल सकती है।


पिछले सप्‍ताह चॉंदनीचौक स्टेशन पर एक महिला (अधेड़, आकार नाशपाती पर आप इस वृतांत को  रोचक बनाना चाहें तो कल्‍पना में कमनीयता का समावेश करें) ट्रेन में थी और एक बंधु उतरना चाहते थे, उतरे पर जनाब के बैग की चेन में इन महिला का दुपट्टा जा फँसा- अब वे प्‍लेटफार्म पर और ये ट्रेन में- न वे ट्रेन में वापस आएं न ये ही ट्रेन से उतरें और बैग है कि दुपट्टे को छोड़ नहीं रहा। ट्रेन के सपीकर उवाच रहे हैं ' यात्री कृपया दरवाजों से हटकर खड़े हों'    बैग और दुपट्टे का प्रणय जारी था और दरवाजे लगे बंद होने हम सब दर्शक दम साधे देख रहे हैं कि हैं अब क्‍या होगा- कोई इन महिला को सलाह दे रहा है कि वे उतर जाएं तो कोई उन साहब से ही वापस चढ़ आने की गुजारिश कर रहा है :) :) दरवाजे साहब के बैग और हाथ से टकराकर वापस खुले और फिर बंद होने को आए तब अंतत: उन्‍होंने बिना इस बात की परवाह के कि उस दुपट्टे का कया होगा उसे पूरी ताकत से खींचा और छेददार दुपट्टा छोड़कर तथा उसका एक अंश, स्‍मृति के रूप में अपने बैग की चेन के मुँह में दबाए अपने रास्‍ते चले- तब जाकर दरवाजे बंद हो पाए और दर्शकों के लिए इस शो का पटाक्षेप हुआ। 

Friday, August 24, 2007

ब्‍लॉगरों पर कब बरसेंगी नौकरियॉं

बहुधा इस बात पर हम लोगों ने चर्चा की है कि जब तक चिट्ठाकारी के साथ आजीविका का सवाल नहीं जुड़ेगा तब तक यह गैर पेशेवर सिमटा हुआ समुदाय ही रहेगा। पहले तो इस बात को लेकर ही असहजता थी पर धीरे धीरे अब विज्ञापन दिखने लगें हैं हम भी चेप चुके हैं मुख्‍यत: यह बताने के लिए हमारी सैद्धांतिक सहमति है कि व्‍यावयायिकता के सवाल को गंभीरता से लिया जाना चाहिए। रविजी इस मामले में हम लोगों पथ प्रदर्शक हैं। किंतु पेशेवर ब्‍लॉगिंग का मतलब केवल यही नहीं लिया जाना चाहिए कि ब्‍लॉग पर लगे विज्ञापनों से कितनी आय हुई। हिंदी ब्‍लॉगिंग को एक और जमीन तलाशनी चाहिए वह है उन नौकरियों की जो आपके हाथ इसलिए लगें क्‍योंकि आप ब्‍लॉगर हैं। जॉब्‍स फार ब्‍लॉगर्स के प्रस्‍ताव अक्‍सर विज्ञापनों में दिखने लगे हैं। इन नौकरियों में अकसर कंटेंट-डेवेलपमेंट, संपादन, लेखन, पत्रकारिता आदि की नौकरियॉं हैं। वेतन आदि शुरुआती लिहाज से ठीकठाक ही होता है। पर समस्‍या अभी यह है कि नौकरियॉं सामान्‍यत: अंगेजी के ब्‍लॉगरों के लिए हैं पर इसकी वजह यह नहीं कि हिंदी ब्‍लॉगरों के उपयुक्‍त नौकरियॉं बाजार में नहीं हैं वरन यह है कि जॉब-मार्केट में हिंदी वाले लोगों को खोज रहे नियोक्‍ताओं में जागरूकता का अभाव है- वे स्किल्‍स तो वे ही खोज रहे हैं जो ब्‍लॉगरों में होती हैं- मसलन तत्‍काल लिख पाना, हल्‍के फुल्‍के गद्य में बात कह पाना, कंटेस्‍टड वातावरण में प्रतिक्रिया कर पाना, अंतर-वैयक्तिक संप्रेषण में योग्‍य होना आदि  किंतु ये नियोक्‍ता अभी इस बात से अपरिचित हैं कि हिंदी में ब्‍लॉगरों का एक समुदाय बन रहा है जहॉं उन्‍हें आसानी से अपने मतलब के लोग मिल सकते हैं। यानि वे हमें खोज रहे हैं पर बिना ये जाने कि वे हमें खोज रहे हैं।

पर सवाल यह भी कि यदि हिंदी के ब्‍लॉगरों के लिए नौकरियॉं मिलने की नौबत आए भी तो क्‍या लेने वाले लोग हम लोगों में से हैं। हिंदी में संघर्षशील युवा ब्‍लॉगर कम हैं- लोग अपने अपने जमे जमाए नौकरी या पेशे में हैं। और स्‍वांत: सुखाय या भविष्‍य में निवेश के लिहाज से ब्‍लॉगिगं में हैं (कुछ 'हिंदी-सेवा'  के क्षेत्र से भी हैं पर उस राजनीति की अभी नौकरियॉं निकलनी शुरू नहीं हुईं)  पर फिर भी अनजमे अधजमे पत्रकार, विद्यार्थी आदि यदि हों तो उन्‍हें चाहिए कि वे इस प्रासंगिक नौकरियों में आवेदन करते हुए अपनी ब्‍लॉगिंग स्किल्‍स का उल्‍लेख प्रमुखता से करें।  इसी प्रकार कंप्‍यूटर व पत्रकारिता के जमे जमाए लोग अगर नौक‍रियॉं देने की स्थिति में आ गए हों तो वे भी अपने अपने संस्‍थानों में योग्‍यताओं को तय करते समय ब्‍लॉगिंग का उल्‍लेख करना शुरू करें। एक बार शुरूआत होगी तो उम्‍मीद है कि हिंदी के चिट्ठाकारों पर भी नौकरियों की बरसात शुरू होगी। एक बार हिंदी ब्‍लॉगिंग के नाम पर नौकरियॉं मिली तो ये अपने आप में चिट्ठाकारी का ऐसा विज्ञापन होगा कि फिर तो बल्‍ले बल्‍ले हो जाएगी।

Tuesday, August 21, 2007

क्‍या भारतीय कम्‍यूनिस्‍ट चीनी हितों के लिए काम कर रहे हैं

अमरीका से रिश्‍तों में गर्माहट हो इससे हमें मनमोहन सिंह टाईप खुशी नहीं होती और इस न्‍यूक्लियर डील पर प्रतिक्रिया किए बिना हमारा काम चल रहा था पर हाल की वाम नौटंकी ने चिढ़ा दिया है। हमारा जन्‍म ही 1962 के युद्ध के 10 साल बाद हुआ था पर फिर भी हमें ये बात कुढ़न पैदा करती है कि वाम के लोगों ने उसउस युद्ध में भारतीय पक्ष का खुला समर्थन करने से इंकार कर दिया था- लेकिन असल नग्‍न नृत्‍य हम तो इस बार देख रहे हैं। परमाणु समझौता एक अंतर्राष्‍ट्रीय करार है, ये कोई अंधा प्रेम नहीं है कि कोई पक्ष अपना सर्वस्‍व लुटाने के लिए तैयार हो इसलिए कुछ गिव एंड टेक रहा ही होगा पर हमें वाम की लाइन आव ऐक्‍शन से दिक्‍कत ये है कि वे पूरी तरह से अपने चीनी आकाओं के इशारे पर काम करते दिखाई दे रहे हैं।



हम बल्‍ले बल्‍ले वाले देशभक्‍त नहीं हैं- उकसाऊ इशारों पर तिरंगा लहलहाते हुए वावले हुए नहीं फिरते पर फिर भी इतना तार्किक तो हैं कि मानें कि अगर देश है तो उसके नियामक सिद्धांत इस देश के हितों के अनुसार होने चाहिए किसी लाल-पीले पड़ोसी के लिए नहीं। ऐसा भी नहीं कि दूसरों के इशारों पर नाचते प्राधिकारी हमने देखे नहीं- हमारा प्रधानमंत्री कठपुतली है- राष्‍ट्रपति तो है ही और भी है पर कम से कम इनकी डोर तो इसी देश में ही थी इस परमाणु प्रपंच में तो डोर साफ साफ नाथुला दर्रे के उस ओर से आ रही है। आजकल मीडिया में छप रही खबरें भी साफ साफ प्‍लांट की हुई दिखाई दे रही हैं- इस पक्ष या उस पक्ष के द्वारा पर फिर भी आज के हिंदुस्‍तान टाइम्‍स में प्रकाशित बी रमन के लेख द मंच्‍यूरियन कैंडीडेट को पढें, हो सकता है ये भी सी आई ए की प्‍लांट की गई स्‍टोरी हो पर इस लेख से पहले भी हम यही मान रहे थे कि लेफ्ट के आचरण के पीछे चीनी आकाओं के हितों की रक्षा का भाव है न कि भारत के हित।


Sunday, August 19, 2007

हाशिए का क्‍या कहें-क्‍या करें-हमें नहीं बूझता

आजकल गाड़ी चलाने की बात करना खतरे से खाली नहीं है और ये बात मैं चुहल में नहीं कह रहा हूँ। किसी सैडिस्टिक प्‍लेजर को पाने के लिए भी नहीं। पर आप अगर उस जमात से हैं जो हाशियाई विमर्श में दूसरे पाले में है तो आपके दिन खराब चल रहे हैं- गाड़ी चलाने से बात शुरू इसलिए की कि तब मैं भी गाड़ी ही चला रहा था जब यह हुआ-

हुआ यह कि हमारे एक मित्र हैं- नेत्रहीन बोले तो 'विज्‍युअली चैलेंज्‍ड' और पोलिटिकली करेक्‍ट होना चाहें तो 'डिफ्रेंटली एबल्‍ड' पर ये सब वे बाद में हैं पहले मित्र हैं और हमारी ही तरह पचास कमियों के मालिक हैं पर तब से दोस्‍त हैं जब हम अपने कॉलेज से डिबेट करते थे वे स्‍टीफेंस में थे। बहसियाते थे- अब भी खूब करते हैं। डिसेबिलिटी के विमर्श से हमारी पहचान उन्‍हीं के रास्‍ते हुई है। दिल्‍ली में मुबाहिसा नाम की संस्‍था हुआ करती थी जो लुईब्रेल पर कार्यक्रम करती थी हम भी जाया करते थे। कुल मिलाकर ये कि हम भी सहमत थे- और हैं, कि संरचनाएं पूरे शरीर वालों ने खड़ी की हैं और वे शारीरिक पूर्णता वालों के ही लिए हैं तथा इसी के सहारे यह सिद्ध कर दिया जाता है कि कमी विकलांगों में है जबकि सच्‍चाई ये है कि खड़े किए गए ढांचे गलत हैं जो किसी को कमतर सिद्ध करते हैं- ये बात हम समझते थे और हैं, पर उस दिन मित्र के साथ गाड़ी में जा रहे थे- हम ही ड्राईव कर रहे  थे- सामने एक साईकल वाला था जिसे न अपनी सुध थी न किसी ओर की- बिना किसी भी किस्‍म के संकेत झट साइकल मोड़ी और बस....वह बच तो गया पर हमारे मुँह से निकला 'अंधा है क्‍या....' 

क्‍या बताएं क्‍या गत हुई। पर उसे छोडें मित्र था जानता था कि कमी है हममें भी हो सकती है। लाख संवेदनशीलता दिखाएं पर अंदर के संस्‍कारों से पीछा छुटाने में अरसा लगता है और तब भी कब संस्‍कार जोर मारने लगेंगे नहीं कह सकते। इसलिए दलितों का सवर्ण मित्र, फेमिनिस्‍ट का पति, विकलांग का संकलांग साथी,  समलैंगिक का लोकतांत्रिक हैट्रोसेक्‍सुअल मित्र,  कुल मिलाकर हर वह व्‍यक्ति जो हाशियाई विमर्श में मुख्‍यधारा से है पर हाशिए के सवालों के प्रति संवेदनशील है वह लगातार निशाने पर होता है। दरअसल वह खुद  हाशियाई हमलों का पहला निशाना होता है।

मुझे इस हालत जैसी एक रोचक स्थिति तब दिखाई देती है जब हम अध्‍यापक कक्षा से गायब रहने वालों को लेकर अपनी खीज कक्षा में व्‍यक्‍त करते हैं- अरे भई जो गायब है वो तो गायब है- सुना रहे हैं उसे जो गायब नहीं है, पर नहीं तब तो 'छात्र बिरादरी' निशाने पर होती है। :)

यदि आप सवर्ण, पुरुष, वयस्‍क, शरीर से पूरे हैं बहुसंख्‍यक हैं तो आप लाख संवेदनशीलता हासिल करें इतना तो तय है कि कहीं न कहीं से आपकी जाति, लिंग, वय, धर्म का कीड़ा कुलबुला ही बैठेगा, इसलिए भी कि सच्‍ची-झूठी संवेदनशीलता के कारण आप बार बार सामने आकर इस दोषदर्शन के पात्र बनते हैं। कम से कम हमारे साथ तो ऐसा होता है और खूब। स्‍त्री संवेदनशीलता पर लिखे, छपे, पुरस्‍कृत हैं पर जानते हैं कि पत्‍नी की कसौटी पर पुरुषवादी ठहरेंगे- दिल्‍ली के कथित तौर पर मुसलमान कॉलेज से पढे और पढ़ाया करते हैं दोस्‍त, छात्र मुसलमान है इसलिए उनकी ही नजर से बहुसंख्‍यकवादी ठहरते होंगे, बेटा अभी आठ का नहीं हुआ पर उसे साफ दिखता है कि हम बडे होने के कारण रौब गांठते हैं (उसका वाक्‍य है कि इस दुनिया में कुछ भी बच्‍चों के हिसाब से नहीं है), एक दलित के खिलाफ लडे़ कि उसने अपनी बीबी को मरने पर मजबूर कर दिया था तो उसने कहा-कहलवाया कि राजपूत है-सवर्ण, इसलिए दलित के खिलाफ मोर्चा खोला है। तो इतना तय जानें कि हाशियाई विमर्श एक क्रूर विमर्श है पर उसकी ये क्रूरता जो जाहिर है प्रतिहिंसा है शत्रु को बाद में आहत करती है शत्रुओं में मित्र को पहले।

Wednesday, August 15, 2007

साठ सालों पर कार्टूनिया नजर

स्‍वतंत्रता दिवस के मौके पर द हिंदू ने एक विशेष परिशिष्‍ट प्रकाशित किया है जिसमें नामी गिरामी लोगों के लेख हैं साथ ही एक पूरे पन्‍ने पर छ: दशकों से खास खास कार्टून हैं- अच्‍छा संकलन लगा, इन्‍हीं में से कुछ कार्टून पेश हैं-
















Tuesday, August 14, 2007

कहीं से नहीं आए जहाँपनाह, हम यहीं थे

विश्‍वविद्यालयों के क्‍लासरूम, शोधपत्रों, और नई पीढ़ी के दिमाग में लड़ी जा रही एक बड़ी और अहम जंग यह है कि 'आर्य कहॉं से आए'। कई बेचारे विद्यार्थी बड़े भोलेपन से पूछते हैं कि सर इससे क्‍या फर्क पड़ जाएगा- पर जल्‍द ही सब मान जाते हैं कि यह अहम लड़ाई है - जैसे ही तय पाया जाएगा कि आर्य भारत के ही मूल निवासी है- तुरंत फुरत अनार्य 'बाहरी' हो जाएंगे और देश- आर्यों का, यानि आर्यवर्त हो जाएगा- इसके बाद क्‍या क्‍या हो सकता है इस पर काफी लिखा गया है, इसलिए कौन कहॉं से आया, कब आया ये बड़ा सवाल, अहम सवाल है। जो पहले आया उसने जमीन घेरी और वो उसकी हो गई- जो बाद में आया उसके लिए कायदे भी पहले से जमे जहॉंपनाह तय करेंगे बाकी सब के आचरण को मर्यादा में रखने की 'पुनीत जिम्‍मेदारी' भी फिर जाहिर है- पहले आए लोगों को निबाहनी पड़ेगी।


कहॉं देश में आर्यों के आने की बात, कहॉं चिट्ठासंसार की चूं..चूं चवन्निया जागीर, पर बात बदली नहीं। अब देखें जीतू भाई जनवरी 2004 में अवतरित हुए ब्‍लॉग जगत पर, वैसे पहली पोस्‍ट शायद सितम्‍बर की है, पर जनवरी ही माने लेते हैं। हम बहुत जूनियर हैं, हम दिखें ब्‍लॉगर पर दिस्‍मबर 2004 में- अब दिख रही पहली पोस्‍ट जो अब मिल पाएगी वो और बाद में जून 2005 की। तो भई आर्यपुत्र जितेंद्र चौधरी का अवतरण इस आर्यावर्त पर कम से कम तीन महीने और अधिक से अधिक 17 महीने पहले का है। तो भई ये आर्यावर्त हम बाहरी लोगों का नहीं है- जीतेंद्र चौधरी सर का है- अत: उन्‍हें तीन साल बाद हमारी रैगिंग की सुध आई और उन्‍होंने घोषणा की-



@मसिजीवी
आपके बारे मे कुछ कहने को बचा ही नही, आपने आकर हिन्दी चिट्ठाजगत मे जो द्वेष/नफ़रत को फैलाया है वो सर्वविदित है, मै आपके तमाशे चुपचाप देख रहा हूँ, लेकिन शायद अब पानी सर से ऊपर हो रहा है।


रैगिंग के खिलाफ हम लिख चुके हैं पर वह सभ्‍य समाज की बात थी, जितेंद्र हमारी राय मानने के लिए मजबूर नहीं हैं पर भई बात तो तथ्‍यात्‍मक कहोगे हमें आए तीन साल होने को आए, अगर हम इतना विद्वेष फैलाते हैं तो इतने महीनों बाद याद आई- पहले तो आपका कुछ रौब-दाब भी था कहते तो हम शायद मान भी जाते :) पर मामला दरअसल ये है कि शरीया और हुदूस के इलाके में नोट कूटते-कूटते शेखों से कदम कदम पर दुरदुराए जाते हुए जितेंद्र चौधरी जहॉंपनाह दरअसल भूल गए हैं कि लोकतंत्र क्‍या होता है- सम्‍मान क्‍या होता है तथा सम्‍मान देना क्‍या होता है। पर ये जितेंद्र जी की व्‍यक्तिगत समस्‍या है- उनके व्‍यक्तिगत चयन हैं- हमें उससे दिक्‍कत नहीं- हम आज भी लोकतंत्र में ही रहते हैं और उसी से अपने विमर्श के लहजे को अंगीकार करते हैं। ये नहीं कि गलतियॉं नहीं करते पर उन गलतियों को ओन करने का जिगर रखते हैं।


आर्यो का सवाल या जितेंद्रजी की राय केवल भूमिका थी जो अकारण लंबी हो गई। मूल मामला वही है जो अविनाश प्रकरण में था, राहुल प्रकरण में था कि भई जो आपको पसंद नहीं है उसे भी उसका स्‍पेस दो- जब तक वह आपकी जमीन पर तंबू गाड़ता था तब तक तो आपसे स्‍पेस मांगना पड़ता था अब वह बात नहीं है पर विमर्श के उसी जागीरदारी लहजे पर लगाम देने की जरूरत है। आप नहीं चाहते कि जरा सा भी असहमत स्‍वर रहे, ऐसा आपके आका सुल्‍तानों की सल्‍तनत में होता है, यहॉं तो आपकी इच्‍छा के खिलाफ मुसलमान भी रहेंगे, औरतें भी रहेंगी, और भी लोग रहेंगे। मसलन आपके सर के ऊपर से पानी गुजर गया जहॉंपनाह तो क्‍या करेंगे भई? तमाम विकारों के वावजूद इस देश के लोकतंत्र में हम अपनी बात कहते हैं- कभी कभी नाराजगी भी होती हैं और असहमति तो हमेशा होती हैं- मैं आपके जबाव में कह सकता हूँ कि आप क्‍या कर लोगे- कुछ नहीं, पर इस तेवर से बात वह करे जिसे अपने कहे के असर में विश्‍वास न हो। आपने अविनाश से भी यही सब बातें कहीं थीं अब आप हमें कह रहे हो- इस चौधराहट को जेब में रखें- आपको हमारी बात ठीक नहीं लगती कह दें कि भई ठीक नहीं है- हममे ऐंठ नहीं है, आपमें हैं, हम सुन लेंगे- जो चार बात कहता है उसमें आठ सुनने का हाजमा भी होना चाहिए, हम यह जानते हैं


हम तो केवल विनम्रता से बात कहकर बात खत्‍म करते हैं कि जहॉंपनाह जितेंद्र चौधरी आप कहते हैं कि हमने यहॉं आकर हमने द्वेष फैला दिया, हमारी सीधी सी राय है कि हम 'कहीं नहीं आए' हम यहीं थे जहॉंपनाह।

तस्‍वीर जितेंद्रजी के ही कैमरे से :)



Sunday, August 12, 2007

गंगा और रामचरितमानस से मुक्ति का क्रूर प्रसंग

' मैं मानता हूँ कि इस हिंदी प्रदेश की जड़ता, पिछड़ेपन और निष्क्रियता निठल्‍लेपन के लिए जिम्‍मेदार दो चीजें हैं- एक का नाम 'रामचरितमानस' और दूसरे का का नाम 'गंगा' नदी है। ये दो नहीं होते तो शायद हम इनसे उबरने की कोशिश कर लेते'

उपर्युक्‍त कथन किसका हो सकता है इसके अनुमान पर कोई ईनाम नहीं रखा जा सकता- जी सही बूझा...ये हँस के संपादक राजेंद्र यादव के उवाच हैं जो उन्‍होंने स्‍वप्निल प्रजापति के साथ बातचीत में रखे थे और जो वाक के पिछले अंक में प्रकाशित हुए थे (वाक 1, पृ. 28)

इसके पीछे का तर्क पुन: उद्धरण में इस प्रकार है- ' लेकिन गंगा के साथ जो पौराणिकता, जो मिथक जोड़े गए हैं, वे ही गंगा को इस रूप में बनाते हैं। कहीं गंगा विष्‍णु के चरणों से निकल रही है। कहीं शिव के सिर से निकल रही है। मतलब उसमें बहुत से देवताओं को शामिल करने की कोशिश की गई है। कृष्‍ण इसमें शामिल नहीं हैं। इसके महत्‍व में शामिल नहीं हैं। राम तो गंगा के ही हैं। गंगा इन्‍हीं धार्मिकताओं की वजह से है .....गंगा ने निठल्‍ले यानि मात्र खाने पीने वाले, अफीम गांजे का नशा करके पड़े रहने वाले करोड़ो साधुओं की जमात पेदा कर दी है, जो इनके किनारे पर पलते हैं। कहीं पुजारियों के रूप में, कहीं पंडों के रूप में कहीं किसी रूप में। आप जानते हैं कि जो धन परिश्रम से कमाया नहीं जाता, मुफ्त में आता है वह अपराधों का जनक है। कोई अपराध ऐसा नहीं जो यहॉं न होता हो और ये लोग न करते हों' 

इसी प्रकरण में और एक बार राजेंद्र यादव का- 'और रामचरितमानस अपरिवर्तनशीलता का सबसे बड़ा शास्‍त्र है। राम जैसा बनने के लिए आपको दलितों और शूद्रों का वध करना पड़ेगा। गभ्रवती स्‍त्री को घर से भगा देना पड़ेगा'

हिंदी की दुनिया में एक जुमला आजकल कहा जाता है कि 'भई तुलसी के दिन बुरे चल रहे हैं' एक समय था कि आचार्य शुक्‍ल, निराला जैसे रचनाकार तुलसीदास को सर ऑंखों पर बैठा रहे थे (अब ये ब्राह्मणों के रूपों में पहचाने जा रहे हैं) और आजक वर्णवाद व स्त्रीविरोध के प्रतीकों के रूप में।

राजेंद्र यादव की बातों में दम है इससे इंकार नहीं किया जा सकता, प्रतिक्रिया में लिखते हुए हमारे गुरू कृष्‍णदत्‍त पालीवाल जो बकौल खुद के ' ब्राह्मण हैं, पिशाच हैं, नीच हैं- वे कोशिश करते हैं पर कन्विंसिंग नहीं हैं। हम तो बात सामने इस मकसद से रख रहे थे कि देखो भाई हाशियाई विमर्श क्रूर है, किसी को नहीं बख्‍शता। क्‍या बख्‍शना चाहिए ?

आपका ब्‍लॉग भौत अच्‍छा है- मुजको गपडचौथ डॉट इन....

आपका blog अच्छा है
मे भी ऐसा blog शुरू करना चाहता हू
आप कोंसी software उपयोग किया
मुजको *******डाट इन अच्छा लगा
आप english मे type करेगा तो hindi मे लिपि आएगी

 

पिछले दिनों इस मार्के के संदेश लगभग हर हिंदी चिट्ठे पर दिखे हैं। ये रंजू, मनोज, रानी, .. और न जाने किस किस नाम से किए गए हैं। कोई सर्च मूल्‍य न जुड़ जाए उनके उत्‍पाद में इसलिए उसका नाम तो नहीं लूंगा, उस औजार की तरफ गया भी नहीं क्‍योंकि जो अपने प्रचार में ईमानदार नहीं उसके उत्‍पाद में ईमानदारी की भला क्‍या गुंजाइश।  पर हमारी दिक्‍कत उत्‍पाद से नहीं है, प्रचार की इस बेईमानी से है जिसमें अलग अलग नामों से एक ही संदेश दिया जा रहा है जो प्रचार है। बाजारवाद के  आने का एक मतलब कई लोगों को यह लगता है कि मूल्‍यों की कोई जगह या जरूरत ही नहीं रह गई है, बहुत खुंदक आती है...

पर इस तरह के स्‍पैम कम से कम एक बहुत भरोसा देने वाली बात करते हैं जो इस टैक्‍स्‍ट की क्‍लोज रीडि़ग से उभरता है। टैक्‍स्‍ट जानबूझकर दक्षिण भारतीयों की शैली में हिंदी (और उसकी गलतियॉं) करता है- यह भाव जगाने की कोशिश है कि देखो कोई दक्षिण भारतीय हिंदी में कोशिश कर रहा है, चलो देख आएं- मुझे सद्भाव का यह विश्‍वास राहत देता है। निहित स्‍वार्थ को जाने दें- ऐसे नौसिखिए नहीं हैं कि जाएंगे और उत्‍पाद खरीद/इंस्‍टाल कर बैठेंगे पर कितनी मनोहारी है यह धारणा कि लोगों को लगता है कि हिंदी भाषी दक्षिण भारतीयों की हिंदी विषयक छोटी सी बात से ही आकर्षित होकर खिंचे चले आएंगे- दो भाषाओं के बीच इस सद्भाव से आनंद अनुभव होता है।

Saturday, August 11, 2007

वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड की शर्मिंदगी से गुजरे हैं कभी ?

अगर आपको कभी बैंक लोन लेना पड़ा हो , बीमा पॉलिसी लेनी पड़ी हो या किसी हाई कोर्ट या सर्वोच्‍च न्‍यायालय में कोई कागज दाखिल करना पड़ा हो- तथा अगर आप हिंदी में हस्‍ताक्षर करने वाले जीव हों तो आपको बेहद अपमानजनक प्रक्रिया से गुजरना पड़ा होगा- इस प्रक्रिया का नाम है- 'वर्नाक्‍यूलर इंडैम्निटी बांड' यानि गुलामों की भाषा विषयक दायित्‍वमुक्ति का करार।




अब हम लाख खुद को प्रगतिशील व रैशनल घोषित करें पर राष्‍ट्रवाद का इतना कीड़ा तो हममें भी है (और सच कहें हमें कोई शर्मिंदगी नहीं) कि हमें ये बात बेहद चुभती है कि ये देश है किसका... अगर अपनी भाषा में लिखने/बोलने पर हम जाहिल मान लिए जाते हैं और हमें लिख कर देना पड़ता है (गवाह के साथ) की हमें हमारी औकात वाली भाषा में समझा दिया गया है हजूर। हमारे नाम के सामने डा. लिखा था, हमारी बैंक सेल्‍स एजेंट बेचारी पत्राचार से बीए थी, खिसियाते हुए पर्चा आगे करती है- सर क्‍या करें रूल्‍स ऐसे हैं- गलत हैं पर पुराने चले आते हैं- हम भी पूरी व्‍यवस्‍था की खीज भला उस बेचारी पर क्‍यों निकालें पर अगर कहें कि अपमानित महसूस नहीं किया तो झूठ होगा।


न्‍यायपालिका की भाषा बिना किसी तैं पैं के अंग्रेजी है- संविधान नाम की वह किताब जो संविधान सभा नाम के जमावड़े ने लिखी जिसमें भाषा को लेकर आत्‍मविश्‍वास की गहरी कमी थी, उससे यही उम्‍मीद की जा सकती थी। हम कोई सिद्धांत नहीं गढ़ रहे, बुरे अनुभव को साझा कर रहे हैं, पर सब बुरा ही बुरा नहीं हो रहा भाषा के मोर्चे पर। हिंदी राष्‍ट्रवाद की कैद से आजाद हो रही है, और गनीमत है कि हो रही है। हिंदी जब एक भाषा की तरह जीने की राह छोड़कर राष्‍ट्र या संस्कृति का बोझा ढोने वाली डांगर बनती है तो वह बहुत कुछ से वंचित होती है। वह दूसरी देशी-विदेश भाषाओं से अठखेलियॉं करने का अवसर गंवाती है, कभी कभार संसर्ग या संभोग के उन अवसरों से भी वंचित होना पड़ता है जिनसे भाषा गाभिन होकर सृजन करती है। केवल हाल में मीडिया के उफान व बाजार की जरूरतों के चलते हिंदी 15 अगस्‍तों और 14 सितम्‍‍बरों से मुक्‍त होती दिख रही है और - आई एम लविंग इट :)


Friday, August 10, 2007

ताजा कीवर्ड विश्‍लेषण

हमारे स्‍टेटकाउंटर के अनुसार इस चिट्ठे तक हाल में सर्च इंजनों के माध्‍यमों से पहुँचे लोग दरअसल निम्‍न चीजों को तलाशते हुए पहुँचे थे।

मसिजीवी

hi.mustdownloads.com

कामसूत्र

mentapan

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masijeevi

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suno nigam

हैरी पॉटर इन

रिपुदमन

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क्या चल रहा है

क्‍यों जरूरी है पॉलीमिक

रिवर्स स्‍वीप सचिन की अपनी ईज़ाद नहीं है पर इसके वे बेहतरीन खिलाड़ी हैं। एक साक्षात्‍कार में उन्‍होंनें इस शाट में अपनी दक्षता के कारण का खुलासा किया कि गली क्रिकेट के दिनों में बाल खोने से बचने के लिए एक नियम होता था कि सीधे हाथ के बल्‍लेबाजों को खब्‍बू बनकर खेलना होता था तथा खब्‍बू बल्‍लेबाज सीधे हाथ से बल्‍लेबाजी करते थे। बचपन के इस अभ्‍यास ने उन्‍हें ऐसी दक्षता दी कि वे रिवर्स स्‍वीप जैसे शाट आसानी से लगा पाते थे। हम किसी रिवर्स स्‍वीप के माहिर नहीं हैं, न तो अक्षरश: न ही प्रतीकात्‍मक रूप से। पर बहस के ककहरे को हमने भी इसी अंदाज में सीखा है।

कालेज के दिनों में हम खुद या कोई मित्र बहसबाज जब कोई विचार पटकते थे, गिराते थे तो वे गुजारिश करते थे कि एक सत्र थेथेरोलॉजी का किया जाए, इसका मतलब होता था कि अपनी राय को तह रखकर बगल में रखो, और विचार के ईमानदार विपक्ष बनकर उन सभी आपत्तियों को यथासंभव ताकत से सामने रखो ताकि विचार की दरारें स्‍पष्‍ट हो जाएं। इस प्रक्रिया का फायदा यह था कि ये गर्म बहस को जन्‍म देती थी और इससे बहस आगे बढ़ती थी। हमारी बौद्धिक ट्रेनिंग किसी संघी बौद्धिक शिविर में नहीं हुई है, न ही नक्‍सली या वामपंथी कैंपों का ही अनुभव है पर वाम लोगों से संघी तर्को का इस्तेमाल कर बहसियाने में गुरेज नहीं हुआ- लोग सांप्रदायिक कहें तो कहें, इसी तरह संघी मित्रों के साथ लोकतांत्रिक तर्कों से लोहा लिया है। बहुत बार बहस आगे बढ़ पाई है। इससे किसी को भ्रम होता होगा... उस पर फिर कभी, यूँ ये बातें गली क्रिकí