Thursday, March 08, 2007

एक उजड्ड हिंदीवाले की ब्‍लॉग दिक्‍कतें

कंप्‍यूटर हम उस जमाने से इस्‍तेमाल कर रहे हैं जब वह 8088 प्रोसेसर से चला करता था और PC-XT और PC-AT ही इसके वर्गीकरण थे। डिस्‍क में 20 एमबी की हार्ड डिस्‍क होती थी। MSDOS में मजे से काम करते थे, मतलब ये कि टेक्‍नॉल्‍जी से फोबिया कभी नहीं था। पर वह हमें हमेशा साधन ही लगती थी- साध्‍य नहीं। इसलिए टेकीज में हमारी गिनती कभी नहीं हुई। सबसे पहले हिंदी टाईप शायद वर्डस्‍टार (वर्जन III plus) जैसे एक वर्डप्रोसेसर ‘अक्षर’ में की फिर विंडोज आया और पेजमेकर व वेंचुरा का समय आया। इस सारी यात्रा में कंप्‍यूटर केवल प्रिटिंग की दुनिया की सहायता भर कर रहा था। हम कोने पर खड़े देख रहे थे भोग रहे थे।
अब मामला काफी अलग है। कंप्‍यूटर बाकायदा एक संचार माध्‍यम है और बहु ऐंद्रिय है- टेक्‍स्‍ट, आडियो, वीडियो की गुंजाइश के साथ है। यह भाषा को उसकी आखिरी सीमा तक ले जाकर परखता है और फिर उसका बाकायदा अतिक्रमण करता है। ब्‍लॉग यही कर रहा है। हिंदी की दुनिया का व्‍यक्ति हूँ किंतु यहॉं देखता हूँ कि टेकीज लोग ई पंडित, रवि, अनूप, आलोक सब उसी दुनिया के हैं ये अलग बात हे कि हिंदी की विषय वस्‍तु के भी माहिर ही हैं। हमें कई बातें बेचैन करती हैं उनमें से कुछ आपको हमारी अल्‍पज्ञता का प्रमाण लगें तो उन्‍हें सहेजें नहीं क्‍योंकि हम ऐसे ही बता देते हैं कि बुड़बक आदमी हैं- प्रभुजी मेरे अवगुण चित्‍त न धरौ...
कुछ लोगों को अभी भी लगता है कि हिंदी और इंटरनेट अलग चीजें हैं और हिंदी पढ़ने ओर लिखने के लिए ज्‍यादा मेहनत करनी पढ़ती है। पता नहीं मुझे तो अतुल की यह टिप्‍पणी जायज जान पड़ती है-

‘जीतू भाई , यह बात स्वामी की पोस्ट पर भी लिख चुका हूँ, मेरी नजर में वह हिंदीभाषी
लोग जिनकी रोजी रोटी कंप्यूटर की बदौलत है या जिनका पाला आये दिन कंप्यूटर से पड़ता
है, अपने ब्लाग पर आकर अगर फोन्ट का रोना रोते हैं “कि बाक्स दिखता है” उनसे बड़ा
ढकोसलेबाज , बहानेबाज और लुच्चा कोई इंसान नही हो सकता। जिस शख्स ने माँ को पुकारना
भी हिंदी मे सीखा हो आज अगर कंप्यूटर पर बैठे बैठे पाँच दस साल निकाल चुका है और
उसने एक भी हिंदी साईट नही देखी तो इससे बढा झूठ क्या होगा? कोई जरूरत नही ऐसे
बहानेबाजो को स्पूनफीडिंग कराने की। मैने शुरू में बहुतो को आपकी तरह पकड़ पकड़ कर
पढाया, अब नहि करता। पढना है तो खुद ढूढों फोंट और पड़ लो वरना देखते रहो कटिंग
चाय।‘

हॉं गैर हिंदी या गैर कंप्‍यूटर के लोगों के साथ फिर भी थोड़ी रियायत की जा सकती है।
सही कहें तो अब सिवाय चंद्रबिंदु (ँ ) के कोई विशेष परेशानी आती। मतलब यदि मैं Indic IME ही इस्‍तेमाल करना चाहूँ और रेमिंगटन कीबोर्ड इसतेमाल करूँ तो किसी किसी जगह चंद्रबिंदु ँ की जगह कॉं की तरह दिखती है लेकिन चूँकि मैं उतना शुद्धतावादी हूँ नही इसलिए काम चला लेता हूँ ।
मेरी असल दिक्‍कतें विषय वस्‍तु को ले‍कर ज्‍यादा हैं। क्‍यों हम लोग दुनिया जहान के विषयों पर नहीं लिख पा रहे हैं। मसलन आज आशीष नंदी को सुना उन्‍होंने डा. गिरींद्रनाथ का उल्‍लेख किया। ये भारत में मनोविज्ञान के पिता कहे जाते हैं। लेकिन जिस बात से मैं ज्‍यादा आकर्षित हुआ वह यह कि ये बंगाली और अंग्रेजी दोनों में मनोविज्ञान पर लिखते थे लेकिन मजेदार बात यह है कि इनका लेखन जो बंगाली में है वह अधिक प्रामाणिक है, साहसी है मौलिक है और आज प्रासंगिक है। काश हुगली के किनारे पर बैठा कोई पुरबिया उनके लेखन को हिंदी में ब्‍लॉगरों के लिए लिखता। हो सकता है उसे आज पढ़ने वाले चंद लोग ही हो पर चिट्ठा तो यहॉं हमेशा के लिए है। कोई लिखो तब तक वर्तनी जॉंचने का काम मैं देख लेता हूँ कोई गलती हो भी गई तो आप आकर सुधार देना।

Sunday, March 04, 2007

वे तीन साथ-साथ थे

कविताएं मैं कम लिखता हूँ। ये भी एक पुरानी कविता है। यूनीकोड में बदलकर देखा, बदल गई। सोचा बॉंटा जाए। पेश है-

कविता

वे तीन
साथ-साथ थे
सड़क साफ थी
अचानक
सामने से धूल भरी आंधी का
एक जबरदस्त झोंका आया
दरअसल तूफान आने वाला था
एक ने झट से उसकी और पीठ कर ली
दूसरे ने मींच लीं आखें
तीसरे ने आखें फाड़ धूल के पार
देखने की चेष्टा की,
वैसे दिखाई उसे भी कुछ खास न दिया
आखें उसकी
रेत से भर गईं
आखें मलते
उसके मुंह से निकला
बड़ी तेज आंधी है, शायद तूफान...
:
:
वह
आंधी लाने के षडयंत्र में
धर लिया गया
उसके दोनों साथी
बने चश्मदीद गवाह।

Friday, March 02, 2007

मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ? ----- ओपन सोर्स में

इस पोस्‍ट का सोर्सकोड यह है ...
मंटो का वक्‍तव्‍य 'मैं अफसाना क्‍यों लिखता हूँ' लिया। फाइंड-रिपलेस कमांड से अफसाना की जगह चिट्ठा चेपा। तदनुसार कागज-कलम की जगह कंप्‍यूटर के शब्‍द रखे। .....पोस्‍ट कर दिया। कॉपराईट या तो मंटो का माना जाए या ओपनसोर्स में माना जाए। हाजिर है-
मुझसे कहा गया कि मैं यह बताऊँ कि मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ? यह 'क्यों कर' मेरी समझ में नहीं आया. 'क्यों कर' का अर्थ शब्दकोश में तो यह मिलता है - कैसे और किस तरह?
अब आपको क्या बताऊँ कि मैं चिट्ठा क्योंकर लिखता हूँ. यह बड़ी उलझन की बात है. अगर में "किस तरह" को पेशनज़र रखूं को यह जवाब दे सकता हूँ कि अपने कमरे में कुर्सी पर बैठ जाता हूँ. कीबोर्ड पकड़ता हूँ और बिस्मिल्लाह करके चिट्ठा लिखना शुरू कर देता हूँ. मेरे तीन बच्‍चे शोर मचा रहे होती हैं. मैं उनसे बातें भी करता हूँ. उनकी आपसी लड़ाइयों का फैसला भी करता हूँ, अपने लिए "सलाद" भी तैयार करता हूँ. अगर कोई मिलने वाला आ जाए तो उसकी खातिरदारी भी करता हूँ, मगर चिट्ठा लिखे जाता हूँ.
अब 'कैसे' सवाल आए तो मैं कहूँगा कि मैं वैसे ही अफ़साने लिखता हूँ जिस तरह खाना खाता हूँ, गुसल करता हूँ, सिगरेट पीता हूँ और झक मारता हूँ.
अगर यह पूछा जाए कि मैं चिट्ठा 'क्यों' लिखता हूँ तो इसका जवाब हाज़िर है.
मैं चिट्ठा अव्वल तो इसलिए लिखता हूँ कि मुझे चिट्ठा लिखने की शराब की तरह लत पड़ी हुई है.
मैं चिट्ठा न लिखूं तो मुझे ऐसा महसूस होता है कि मैंने कपड़े नहीं पहने हैं या मैंने गुसल नहीं किया या मैंने शराब नहीं पी.
मैं चिट्ठा नहीं लिखता, हकीकत यह है कि चिट्ठा मुझे लिखता है. मैं बहुत कम पढ़ा लिखा आदमी हूँ. यूँ तो मैने किताबें लिखी हैं, लेकिन मुझे कभी कभी हैरत होती है कि यह कौन है जिसने इस कदर अच्छे चिट्ठे लिखे हैं, जिन पर आए दिन विवाद चलते रहते हैं.
जब कलम मेरे हाथ में न हो तो मैं सिर्फ़ कखग होता हूँ जिसे हिंदी आती है न संस्‍कृत, न अंग्रेजी, न फ्रांसीसी.
चिट्ठा मेरे दिमाग में नहीं, जेब में होता है जिसकी मुझे कोई ख़बर नहीं होती. मैं अपने दिमाग पर ज़ोर देता हूँ कि कोई चिट्ठा निकल आए. कहानीकार बनने की भी बहुत कोशिश करता हूँ, सिगरेट फूंकता रहता हूँ मगर चिट्ठा दिमाग से बाहर नहीं निकलता है. आख़िर थक-हार कर बाँझ औरत की तरह लेट जाता हूँ.
अनलिखे चिट्ठे की घोषणा वसूल कर चुका होता हूँ. इसलिए बड़ी कोफ़्त होती है. करवटें बदलता हूँ. उठकर अपनी चिड़ियों को दाने डालता हूँ. बच्चों का झूला झुलाता हूँ. घर का कूड़ा-करकट साफ़ करता हूँ. जूते, नन्हे मुन्हें जूते, जो घर में जहाँ-जहाँ बिखरे होते हैं, उठाकर एक जगह रखता हूँ. मगर कम्बख़्त चिट्ठा जो मेरी जेब में पड़ा होता है मेरे ज़हन में नहीं उतरता-और मैं तिलमिलाता रहता हूँ.
जब बहुत ज़्यादा कोफ़्त होती है तो बाथरूम में चला जाता हूँ, मगर वहाँ से भी कुछ हासिल नहीं होता.
सुना हुआ है कि हर बड़ा आदमी गुसलखाने में सोचता है. मगर मुझे तजुर्बे से यह मालूम हुआ है कि मैं बड़ा आदमी नहीं, इसलिए कि मैं गुसलखाने में नहीं सोच सकता. लेकिन हैरत है कि फिर भी मैं ब्‍लॉगिस्‍तान का बहुत बड़ा चिट्ठाकार हूँ.
मैं यही कह सकता हूँ कि या तो यह मेरे आलोचकों की खुशफ़हमी है या मैं उनकी आँखों में धूल झोंक रहा हूँ. उन पर कोई जादू कर रहा हूँ.

माफ़ कीजिएगा, मैं गुसलखाने में चला गया. किस्सा यह है कि मैं खुदा को हाज़िर-नाज़िर रखकर कहता हूँ कि मुझे इस बारे में कोई इल्म नहीं कि मैं चिट्ठा क्यों कर लिखता हूँ और कैसे लिखता हूँ.
अक्सर ऐसा हुआ है कि जब मैं लाचार हो गया हूँ तो मेरी बीवी, जो संभव है यहाँ मौजूद है, आई उसने मुझसे यह कहा है, "आप सोचिए नहीं, कीबोर्ड पीटिए और लिखना शुरू कर दीजिए."
मैं इसके कहने पर कीबोर्ड पर अंगुलियॉं चलाता हूँ और लिखना शुरू कर देता हूँ- दिमाग बिल्कुल ख़ाली होता है लेकिन जेब भरी होती है, खुद-ब-खुद कोई चिट्ठा उछलकर बाहर आ जाता है.
मैं खुद को इस दृष्टि से चिट्ठाकार नहीं, जेबकतरा समझता हूँ जो अपनी जेब खुद ही काटता है और आपके हवाले कर देता हूँ-मुझ जैसा भी बेवकूफ़ दुनिया में कोई और होगा?

Thursday, March 01, 2007

.......सच बड़ा मजा आए

यूँ तो बार बार पीछे मुड़ के देखना ओर हाय हमारा अतीत....हाय वे मोहक दिन.....वो पीली छतरी वाली लड़की.....वो काले छाते वाले मास्‍टरजी......वो सफेद टोपी वाले इरफान साहब......वो बड़े छाते वाली यूनीवर्सिटी स्‍टाल......वगैरह वगैरह ये पीछे मुड़ मुड़ के देखना, ये अपना डोमेन नहीं है। अविनाश, इरफान, जितेंद्र वगैरह इसे अच्‍छा कर पाते हैं हालांकि इसकी चैंपियन फिर भी प्रत्‍यक्षा ही हैं ;) पर थोड़ा बहुत होली की पिनक में हम भी बहक गए थे। पर सच मानिए अपने ही पॉंवों पर खड़े हैं और 'मैं कुछ हूँ' की खामख्‍याली अब छोड़ चुके हैं। इसलिए उन अतीत की फाइलों को रहने ही देते हैं जिसके यूनीकोड में परिवर्तन के बाद साझा करने का आदेश (था तो सुझाव ही पर हम उसे भी आदेश की तरह ही लेते हैं) हमें रविजी, श्रीशजी और अनूपजी ने दिया। इसलिए कि मुझे लगता है कि डींगें और शौर्यगाथाएं तब गाएंगे जब जंग जीत लेंगे अभी तो लड़ाई जारी है। इसलिए पीछे नहीं चलिए आगे देखें। और बॉंटनी ही हैं तो मोहक अतीत की बजाय चलिए अपने सपने बॉटूं, मोहक सपने भी होते हैं लेकिन उनके साथ एक जिम्‍मेदारी भी होती है कि या तो उन्‍हें पूरा करो नहीं तो कम से कम ऐसा पत्‍थर तो बन ही जाएं जिसपर होकर भविष्‍य के अद्यतन लोग उसे पूरा करने निकलेंगे।

मैं टाफलर नहीं न ही जो मैं भविष्‍य के रूप में देख रहा हँ वह कोई प्रो़द्योगिकीय अनुमान है मैं तो केवल सपने की तरह इसे देख रहा हँ पर अलौकिक व अवास्‍तविक की गुंजाइश पैंतीस साल की उम्र में बहुत नहीं रह जाती है। हिंदी चिट्ठाकारिता को लेकर जिस बात की मैं सबसे पहले कामना करता हँ वह यह है कि ये पिता की अपने पिता से बात करने भर की भाषा न हो वरन अपने बच्‍चों से बात करने की भाषा हो। मेरा मतलब है मैं इस चिट्ठा समुदाय को किशोर किशोरियों से भरा देखना चाहता हूँ जो कभी कभी किसी गुरू गंभीर विषय पर र्भी बात कर लें तो मुझे कोई हर्ज नहीं लेकिन आम तौर पर वे आपसी छेड़छाड़, इश्‍क मोहब्‍बत, हम बड़ों की बुराइयॉं, कूल, हैंगिंग आउट, पढ़ाई .....ये सब बातें करते ही दिखें ( न कि हमेशा किसी गुरूभार में दबे कि ये सब वे अपनी भाषा के संरक्षण या बढ़ावे वगैरह के लिए कर रहे हैं) कुछ ऐसे चिट्ठाकार बिरादरियॉं हों जहॉं देशी विदेशी गीत-संगीत नाच आदि की बातें होती हों और तीस साल से बड़े लोगों को वहॉं मुँह न लगाया जाता हो। मतलब हिंदी की चिट्ठाकारिता सॉंस लेने की हद तक स्‍वाभाविक हो कोई महत कार्य न रह जाए, न तो तकनीकी तौर पर ना सांस्‍कृतिक तौर पर। वैसे तकनीकी तौर पर तो ये बस एक कदम भर दूर है आज एक अच्‍छा हिंदी स्‍पीच रेकगिनिशन औजार आया जो हिंदी में बोले को झट यूनीकोड में बदल दे बस फिर क्‍या है....सांस्‍कृतिक तौर पर जरूर एक लंबी लड़ाई है। यानि हमें चाहिए हिंदीटीन (हिंदी के किशोर)। वैसे ये ना समझें कि हमें रैप-रॉक पसंद हैं अरे हम तो बस इतना चाहते हें कि ये हिंदी की दुनिया इतनी बड़ी हो जाए कि भले बुरे सब करम होने लगें इसमें।

चिट्ठाकारिता का दूसरा सपना जरूर ऐलिस इन वंडरलैंड किस्‍म का है। जाहिर है चिट्ठाकारिता की दुनिया विशाल होती जाएगी ओर फिर गूगलदेव के नित नवीन अवतारों के आते जाने के बाद भी कितना मजा आए कि ऐसे ही तफरीह करते हुए हम बाहर निकलें और कोलम्‍बस की तरह हमें कोई नया अमरीका मिल जाए। यानि चिट्ठाकारिता की एकदम अनदेखी दुनिया जिससे हम अब तक अपरिचित थे। किस्‍से कहानी जैसी बात है पर सबकुछ संभव है। नए आबाद ग्रह मिलना अगर स्‍वीकृत सपना है तो दस-बीस नारद क्‍यों नहीं मिल सकते......चलते चलते जमीन पर ऑंखें गढ़ाकर चलता था बचपन में कि शायद कोई सिक्‍का पड़ा मिल जाए। सच बड़ा मजा आए।

Tuesday, February 27, 2007

हमार का करिबै नीलिमा......जबाब फागु की पिचकारी से

बालमुकुंद जब शिवशम्‍भु के चिट्ठे लिख रहे थे तो हिंदी पत्रकारिता की स्थिति कुछ कुछ वैसी ही थी जैसी आजकल हमारी चिट्ठाकारिता की है। उनके शिवशम्‍भु शिवबूटी छानकर अइसे मगन होते थे कि फिर काहे के लाटसाहब और काहे के कोई और। हम भी कुछ ऐसी ही पिनक में होते हैं बसंत में। और अइसा भी नहीं कि नीलिमा नहीं जानतीं कि हम अइसे हैं। भई आपके लिए होंगी नई हम तो तबसे जानते हैं जब नारी उत्‍थान मार्के की कविताई किया करती थीं, हमें लगत है कोई चौदह बरस हुई गए हुंगे.....नहीं नीलिमाजी। अरे भूल गईं ....वहीं बिट्स पिलानी ही तो रहा उ उ उ ओएसिस 1993। आप आईं अपनी कविताए लेकर और हम निकालत रही उ एक पत्रिका (कंपटीशन था भई)....। तो मतलब ई कि आप जानत तो थीं ही कि होली पर इसे नहीं छेड़ना है पर फिर भी आप नहीं मानीं। दे ही मारी पिचकारी सवालों की। अब भुगतो ....। देखि बुरा नहीं मानने का है ....वो क्‍या है होली है। और होली की उमंग हमसे बरजास्‍त नहीं होती।
पाठक लोग पहला सवाल की धार है
आपकी चिट्ठाकारी का भविष्य क्या है ( आप अपने मुंह मियां मिट्ठू बन लें कोई एतराज नहीं)
अब आप तो जानती हैं आपसे भी पैसे कई बार उधार लिए हैं हम। ये हिंदी कमबख्‍त हमारी माशूक है पीछा ही नहीं छोड़ती। सुनील दीपक जी पूछत रही कि इंजीनियरिंग काहे छोड़ दिए। अरे खब्‍ती रहे और क्‍या, और फिर छोड़े कब। इंजीनियरिंग में थे तो हिंदी हिंदी किया करते थे अब हिंदी में कंप्‍यूटर कंप्‍यूटर चिल्‍लाते हैं। ...हॉं तो क्‍या कह रहे थे। हॉं हिंदी... तो याद तो होगा ही आपको कि जब यूनिकोड ससुरा पईदा नहीं हुआ था तबहीं मैगजीन निकाले रहे हिंदी में ऊसका नाम रहिन 'ईत्रिका' और नारद उ ह तो ससुर हमार फांट का नाम रहि। फ्रीसर्वर पर थी बाद में डोमेन भी लिया पर का करिं बेरोजगारी अइसन पकरी कि अबहिं तक ना छोडि़। तो उह इत्रिका ओर उससे पहले xoom पर साहित्‍य, (इत्रिका के टाइटिल पर लिखा होता था हिंदी की पहली इंटरनेट पत्रिका) (ह ह ह जवानी में विश्‍व, सवसे पहले, ....कितना महत्‍व रखती हैं।) तो हम कहि रह हैं कि चिट्ठाकारी तो है ही वो चीज जिसके लिए हम हैं और तबसे इसके साथ हें जब ये होती ही नहीं थी पर सही वक्‍त पर सही जगह पर अनूपजी, जीतू भैया थे वे वो सब कर गए...अच्‍छा किया। हम भी अपना भर करेंगे...भारतेंदु वो ही सही हम शिवशम्‍भू ही सही। कभी कभी कंप्‍यूटर की पुरानी इत्रिका उत्रिका की फाइलें खोलकर देख लेते हैं...खुश होते हैं जो सोचा था कोई तो कर रहा है। और रही चिट्ठाकारी के भविष्‍य की तो सुनो वोह तो है आपके हाथ। मतबल ई कि नए लोगल को लाओ भविष्‍य बनाओ।
आपके पसंदीदा टिप्‍पणीकार।
आपहीं हैं और कौन। और किसी की तस्‍वीर में उह बात नहीं। वैसे एक प्रियंकर भैया रहिन पर ऊ रूसे हुए हैं। लजा लो लजा लो पर बुरा मानने की बात नहीं है्....होली है न।
तीसरा सवाल किसी एक चिट्ठाकार से उसकी कौन सी अंतरंग बात जानना चाहेंगे?
सभी व्‍यसनी चिट्ठाकारों से पूछन का है कि भैयन हमार तो चलो कोई बात एक तो हम सनके हुए हैं और घर-उर में सब लोगन को पहिले ही से ये मालूम रही फिर हमार जो घरआली हैं वो भी समझों कि इसे कैटेगरी की हैं जो जिआदा बुरा-उरा नहीं मानती। पर भैया लोग आप जो जी जान लगाकर खून फुंकर रहि हो...बहुत उमीद वुमीद तो नहीं रखे हो न। सवाल इह है कि कइसे मनाते हो भैया हमार भौजी लोग को..।


वह बहुत मामूली बात जो आपको बहुत परेशान किए देती है?
लो कल्‍लो बात। ससुरी बड़ी बात की तो औकात नहीं कि हम परेशान हों। अब नीलिमा की सादी हुई ...हुए हम परेशान...। बाजा आदमी होता तो बजीराबाद के पुल से छलांग लगा देता परेशानी में। नहीं भाई लोग हम परेशान नहींए होते। (हम तो पहिले ही कहे थे मान जाओ होली पर पंगा मत लो नहीं मानी...अब पता नहीं क्‍या क्‍या राज खुलेंगे आज।
आपकी जिंदगी का सबसे खूबसूरत झूठ?
अरे ससुर की नाती...हमार जिंदगी ही हईगी खूबसूरत झूठ। सोचत हैं किरांति करेंगे....पता है झूठ है पर खुद ही खुद कहते हैं कि हमें यकीन है। तो ई रहा खूबसूरत झूठ।
अब देखो बुरा लगा होई तो होली पर हमारी गुंझिया भी खुदहिं खा लहीं। ओर हमार का करिबै।

Sunday, February 25, 2007

ब्‍लॉग मंडी में हमारा भाव......फर्जी है भई फर्जी है

भोला भाई ने बड़े भोलेपन से सुझाया कि हम जाकर मंडी में अपना बाजार भाव पता करके आएं। हम भी उसी भोलेपन से चले गए। और लीजिए जबाब हाजिर है।





ठीक है हम हिंदी वाले हैं और सारी दुनिया ऐसे सनकी लोगों को चंपक समझती है पर इतने भी नहीं हैं कि मात्र 12 लाख 130 डालर में बिक जाएं हुए ही कितने 48 रुपए से लगाएं तो 5 करोड़ 76 लाख......भई हमें अंडरवैल्‍यू किया जा रहा है। एक और साईट पर गए उनका कहना ये था

तो हमारा फैसला......फरजी है भाई सब फरजी है।


Friday, February 23, 2007

पापा !!! ये मसिजीवी क्‍या है.....

हम छोटा परिवार सुखी परिवार की आकार सीमा का परिवार हैं। कुल जमा चार जीव. हम दो हमारे दो। प्र... 7 साल का हे ओर श्रे... 4 साल की। सभी चार सदस्‍य डिजीटल डिवाइड के दूसरी ओर के हैं यानि कंप्‍यूटर जीव हैं। इंटरनेट को दोनों बच्‍चे डॉट कॉम कहते हैं जो उनकी गेमिंग की दुनिया से अलग है या कहो कार्टूननेटवर्क के गेम्‍स से अलग है। आज का वाकया- मैं ड्राइविंग सीट पर हूँ,(पितृसत्‍ता के कई क्रूर मायने पुरुषों के लिए भी होते हैं) बाकी सब अपनी-अपनी जगह

प्र.. ...............ये मसिजीवी क्‍या होता है ?
मैं................. (चुप्‍प)
प्र................ पापा ये मसिजीवी क्‍या होता है ?
मैं................. तुमने ये कहॉं सुना ?
प्र................. पता नहीं। शायद किसी बुक में पढ़ा है
श्रीमती मैं.... (हँसते हुए) मुझे पता है कहॉं पढ़ा है। कंप्‍यूटर पर है न।
प्र.................. हॉं । पर बताओ न मसिजीवी क्‍या होता है।
मैं................. किसी का नाम होगा न।
प्र................. मतलब आपको भी नहीं पता।
मैं................ बताया तो किसी का नाम है
प्र................. अच्‍छा.. ये जिंदा है कि मर गया
(हम दोनों चुप...मैं स्थिति की मनोरंजकता पर और श्रीमती मैं अपशकुनी आशंका से)

ऐसे वक्‍त मैं जब अंग्रेजी ब्‍लॉगिंग गुमनामता (Anonymity) को एक अधिकार के रूप में स्‍वीकृत मानता है ओर शिवम विज ऐसा न करने देने पर सबको लताड़ रहे हैं। यूँ भी अंग्रेजी के अधिकांश ब्‍लॉग सुरक्षा कारणों से गुमनाम रूप से ही शुरू किए जाते हैं। मुझे याद है कि ब्‍लॉगर मीट में रिवर ने फोटोग्राफी की थी पर साथ ही सभी को हिदायत भी थी कि मीट के फोटोग्राफ्स कोई अपने ब्‍लॉग पर न डाले। हम सभी एक दूसरे को उसकी ब्‍लॉगर पहचान से संबोधित कर रहे थे मसलन मुझे मसिजीवी बुलाया जा रहा था जबकि कम से कम शिवम और रिवर तो मेरी वास्‍तविक पहचान से नावाकिफ नहीं थे (वैसे शिवम, शिवम ही हैं इसलिए उनकी पहचान में छिपाने जैसा कुछ नहीं)



किंतु जब हिंदी ब्‍लागिंग को देखें तो यहीं स्‍वतंत्र ब्‍लॉगिंग विधा के रास्‍ते में काफी मुश्किल दिखाई देती हैं मसलन छपास ओर अपना नाम देखने की खुजली (अब तो तस्‍वीर भी) इससे होता क्‍या है ? बेड़ागर्क होता है.... ब्‍लॉग प्रकाशन, प्रिंट प्रकाशन की छोटी बहन बनकर रह जाता है और चूंकि हम उसी पहचान के साथ होते हैं जो 'वास्‍तविक' जीवन की है तो उस दुनिया के पाखंड, पॉलिटिकल करेक्‍टनेस, महानता के व्‍यामोह, उदार सांप्रदायिक सद्भाव (तेरा इरफान मेरे इरफान से सफेद कैसे??) जैसे मुखौटे भी साथ आते हैं। जबकि अगर एक अपनाई पहचान रहे तो वह एक मुखौटा इस सच्‍ची जिंदगी के मुखौटों से मुक्ति दिला देता है। अवचेतन व्‍यक्‍त हो पाता है।
मेरी बात में क्‍या सच्‍चाई है ये तो शायद नीलिमा अपने शोध में बाद में खोज निकालेंगी उन्‍होंने ब्‍लॉगों के नामों पर तो ध्‍यान देना शुरू कर ही दिया है। पर मैं अपने बेटे के लिए किसी मुर्दे का नाम भर होकर खुश हूँ। और हिंदी ब्‍लॉगर.... आदि चंद गुमनाम ब्‍लॉगरों की ओर देख रहा हूँ कि ये बिरादरी कुछ बढ़े।

Thursday, February 22, 2007

.....चड्डी पहनकर खिले फूल के माली से एक भेंट

एक पुराने और बसे जमे दिल्‍ली के इस कॉलेज में मास्‍टर होने के कई लाभ हैं एक तो यही कि नामी हस्तियों का इस या उस बहाने आना हो जाता है। अभी पिछले सप्‍ताह पद्म विभूषण ज‍यंत विष्‍णु नार्लिकर को सुनने का अवसर मिला था और कल ही हमने मनाया अपना वार्षिकोत्‍सव और अति‍थि थे पद्म भूषण जनाब गुलजार और सच में उनसे साक्षात होना तो बाकायदा एक मन की दावत ही हो गई।
विद्यार्थियों को पुरस्‍कार बॉंटने इत्‍यादि औपचारिकताओं के बाद जब उन्‍होंने संबोधन दिया और अपनी नज्‍में सुनाई तब तो बस समॉं ही बंध गया।


गुलजार का लिखा जंगलबुक एनीमेशन का शुरुआती गीत 'जंगल जंगल बात चली है पता चला है......' मुझे बेहद पसंद रहा और अब मेरे दोनों बच्‍चों को बेहद पसंद है, .....कि जिगर में बड़ी आग है.......' की सृजनात्‍मकता मुझे हैरान करती है और वह भी बच्‍चों को ठुमकने लायक लगता है।......पर हैरानी की बात है कि ये दोनों गीत किसी एक गीतकार की रेंज में हैं। मनीष यहॉं वैसे ही गुलजार पर चर्चा कर ही रहे हैं। हम तो बस उनका बेहद सादा पर आकर्षक व्‍यक्तित्‍व देखकर केवल मोहित ही हो पाए।
अखबार को मिली एक कॉलम की खबर

Monday, February 19, 2007

....आखिर ये मर्दानगी का मामला है

एक संवेदनशील मित्र ने फोन करके आज के अखबारों में छपे एक विज्ञापन पर हमारी राय मॉंगी। एक बस स्‍टाप का दृश्‍य है और एक लड़की को कुछ मनचले छेड़ रहे हैं बाकी चुपचाप हैं। कैप्‍शन कहता है कि इस चित्र में कोई मर्द नहीं है वरना ऐसा न होता।
(तस्‍वीर का गुणवत्‍ता के लिए क्षमा बेवकैम से ली है, वैसे इसका अंग्रेजी संस्‍करण दिल्‍ली पुलिस की साईट से लेकर नीचे चेपा गया है)
हमारी मर्द पुलिस द्वारा मर्दवाद का ऐसा औदात्‍तीकरण ......क्‍या बात है। वाह लुच्‍चई करने वाले ऐसा करते है क्‍योंकि वे मानते हैं ऐसा करना मर्दानगी है और लीजिए देवत्‍व ओड़कर हमारा राज्‍य भी अपनी पुलिस के माध्‍यम से कहता है कि मर्दानगी दिखाना तो बिल्‍कुल ठीक है बस यह समझ लीजिए कि उसे ऐसे नहीं वैसे दिखाएं। भलेमानसों कोई तो इन्‍हें बताए कि जब तक आप मर्दानगी को ग्राहय पूज्‍य महानता से पूर्ण बताते रहेंगे तब तक आप एक लुच्‍चे समाज को बढ़ावा दे रहे हैं।

आज के अखबारों में यह विज्ञापन था और फिर याद करने पर याद आया कि पहले भी दिल्‍ली पुलिस के विज्ञापन अभियानों में इसका इस्‍तेमाल हुआ है। जरा ध्‍यान दें कि चित्र में छेड़खानी की शिकार के अतिरिक्‍त एक और महिला भी है, शायद पुलिस कहना चाहती है कि उसकी चुप्‍पी तो ठीक है क्‍योंकि आखिर इसे रोकने का मामला तो मर्दानगी का मामला है...

Sunday, February 18, 2007

.......डिग्री भी खिलाफ .....ससुरी

देसी पंडित ने राह दिखाई और जा गिरे इस बेचारे के विलाप पोस्‍ट पर।
यह पीएच. डी (हॉं भई लिखना सीखना चाहो तो सीख लो, Ph.D. ऐसे ही लिखा जाता है,Ph , फिलासफी के भी लिए और D डॉक्‍टरेट के लिए, पी. एच. डी. लिखना गलत है) हॉं तो यह भला बला क्‍या है- 2x3x7 का तो कहना रहा कि कभी यह वह ख‍तरनाक प्राणी प्रतीत होता है कि सावधान !!!! सावधान दो पीएच.डी. सड़क पर छुट्टे घूम रहे हैं...... यह विस्‍फोटक हो सकता है। अपनी सुरक्षा का ध्‍यान रखें। या फिर कभी कभी यह एक भिन्‍न प्रजाति के समान लगती है तार्किकता से परे......अपने नितांत निजी संसार में लीन। इस बेचारे पीएच. डी. के मारे ने और भी कई पीड़ाऍं साझी की मसलन यह कि पता ही नहीं चलता कि हम इस डिग्री के पीछे हैं या ये डिग्री हमारे पीछे है।
और एक बात कहूँ ।। सच है बीडू.....। इस डिग्री की माया अजीब है। इस दुनिया में दो ही तरह के लोग होते हैं एक तो वे जो पीएच. डी. होते हैं और वे जो मनुष्‍य होते हैं। और क्‍या कहूँ हमें भी वे दिन खूब याद आते हैं जब हम मनुष्‍य थे.......