Tuesday, November 20, 2007

मुशर्रफ के खिलाफ प्रतिरोध के मौ‍लिक स्‍वर: लै के पेंशन जाऊंदा क्‍यूँ नईं - वीडियो में

यू ट्यूब पाकिस्तान में (या विदेश में बसे पाकिस्‍तानियों का) प्रतिरोध व्‍यक्‍त करने का नायाब जरिया बनकर उभरा है। उदाहरण के लिए मुझे शिवम के ब्‍लॉग पर पंजाबी कविता का यह मजेदार वीडियो  देखने का मिला। आप भी देखें मजे लें (कश्‍मीर वगैरह पर एकाध लाईन से कुछ गुस्‍सा आए तो बेचारे पड़ोसी देश पर तरस खाते हुए नजरअंदाज कर दें :))

 

 

 

Friday, November 16, 2007

तारीख़ के गलियारों की सैर

दिल्‍ली की उत्‍तरी रिज़ या तो अपनी कॅटीली झाडि़यों, सघन वनस्‍पति (अत: प्रेमी युगलों की शरणस्थली) के लिए जाना जाता है तथा किसी भी महानगर की तरह हम अपने शहर के खंडहरों को भुला बैठते हैं। इस सप्‍ताह हमें एक मोका मिला इसी रिज के रास्‍ते छानने का, ताकि उसमें छिपी उन इमारतों तक जा सकें जिनका संबंध महत्‍वपूर्ण ऐतिहासिक घटनाओं विशेषकर 1857 के विद्रोह से रहा है। दरअसल 1857 के 150 साला समारोह के ही अंतग्रत विश्‍वविद्यालय ने अपने विद्यार्थियों के लिए कुछ कार्यक्रमों का आयोजन किया है जिनमें से एक है- तारीख़ के गलियारों की सैर: उत्‍तरी रिज़ के स्‍मारक और 1857

taareqh

कार्यक्रम की शुरुआत सुबह नौ बजे से हुई, पहले अल्‍काजी न्‍यास की 1857 के चित्रों की अति दुर्लभ प्रदर्शनी से हुई, जो एक पूरी पोस्‍ट की मॉंग करती है, उसे अभी  छोड़ा जा रहा है । इसी प्रकार वाइस रीगल लॉज के बॉलरूम व संग्रहालय भी जाना हुआ पर वह तो कई पोस्‍टों की मॉंग में प्रतीक्षा करेगा।

इस रिज व हिंदूराव क्षेत्र में कम स कम 5-6 अहम स्‍मारक हैं। 1857 में जब मेरठ से विद्रोही दिल्‍ली पहुँचे और दिल्‍ली शहर पर कब्‍जा हुआ तो वे शहर, किले आदि में काबिज हुए। उनका संपर्क शेष विद्रोहियों से बरास्‍ता दिल्‍ली गेट रहा। पर कश्‍मीरी गेट वाले इलाके से भागकर अंग्रेज दिल्‍ली रिज के इलाके में जा छिपे तथा वहीं से उनकी लड़ाई विद्रोहियो से जारी रही- सबसे पहले वे उस जगह पहुँचे जो आजकल बाउंटा के नाम से जानी जाती है यानि फ्लैग स्‍टफ टॉवर

 flagstaff tower

लगभग 200 अंग्रेज इस बेहद छोटी सी इमारत में आकर जम गए और तोपों से हमला करने और बचाव में जुटे

 chauburja

दूसरी ओर बिद्रोही इस चौबुर्जा मस्‍िजद में जमे थे और लड़ रहे थे। बाद में अंग्रेजों को अंबाला व करनाल से मदद मिलनी भी शुरू हुई

hindurao 1857

पर दिल्‍ली पर फिर से कब्‍जा करने के उपक्रम में अंग्रेजों का असली जमावड़ा  इस इमारत यानि कोठी हिदूराव (आज का हिंदूराव अस्‍पताल) रहा।

 peer gayab

पीर गायब है तो तुगलक कालीन इमारत पर लड़ाई में इसकी आड़ में होकर भयंकर लड़ाई लड़ी गई।

 mutiny memorial

और जब विद्रोह को पूरी तरह कुचल दिया गया तो अंगेजों ने अपनी जीत के स्‍मारक के रूप में बनवाया म्‍यूटिनी मेमोरियल जिसके शिलालेख 'शत्रु' तो छोडि़ए अपनी ओर से सेना में लड़े व मरे भारतीय सैनिकों तक को उपेक्षा से नेटिव की कैटेगरी में डालते हैं तथा कोई नामोल्‍लेख नहीं करते।

विशेष आभार - डा. संजय शर्मा जो इस कार्यक्रम के समन्‍वयक हैं

Wednesday, November 14, 2007

चिट्ठा आत्‍महत्‍या : कुछ स्‍फुट विचार

नीलिमा अरोरा ने एक पोस्‍ट ना अभी ब्लॉग डिलीट नहीं करूंगी में लिखा -

पिछले दो दिन तो ऐसे बीते कि एकबारगी तो ब्लाग ही डिलीट करने वाली थी, पर जब तक जिन्दगी सामान्य ना हो जाए आपको कोई कदम नहीं उठाना चाहिए सो मैंने भी डिलीट नहीं किया। आखिरकार ये आपके अपने होने जैसा है 

हिन्‍दी ब्लगजगत में अपने चिट्ठे को डिलीट कर देने का विचार कोई बिल्‍कुल नया हो ऐसा नहीं है। यदा कदा लोग ऐसा विचार व्‍यकत करते रहे हैं। मसलन धुरविरोधी तो ऐसा कर ही गुजरे। कुछ अन्‍य के मन में भी हो सकता है ऐसा विचार आया हो। ब्‍लॉग हमने भी डिलीट किया था पर बस तकनीकी लोचा था, लगा कि हटो मिटाते हैं, नया बना लेंगे, इसके कोई अन्‍य निहितार्थ तब पता न थे। लेकिन खुद की नेट शख्सियत को मिटा देना, ब्‍लॉगजगत से खुदकशी कर खत्‍म हो जाना एकदम अलग विचार है।

एक परिचित ब्‍लॉगर हैं- रिवर। उनका ब्‍लॉग हमारे पसंदीदा ब्‍लॉगों में से रहा है  वे मई से अक्‍तूबर तक 194 दिन तक नदारद रही ब्‍लॉगजगत से। 194 दिन.. ध्‍यान रहे कि यह ब्‍लॉग गूगल पेजरैंक 5 का ब्लॉग था, कुल टेक्‍नोराटी उस समय 20000 के आस पास था। यथार्थ जगत में कोई घनिष्‍टता नहीं है, पर मिलीं, तो पूछा कि क्‍या विचार है, कहॉं गायब हैं तो गोलमोल सा टालू जबाव मिला, हम टल गए। अब अपनी इस पुनरागमन पोस्‍ट में उन्‍होंने मंशा जाहिर की कि वे 'ब्‍लॉग स्‍यूसाईड' करने पर विचार कर रही थीं।

मौत पर जो आधे शटर वाला चिंतन पिछले दिनों आलोकजी कर रहे थे उसी क्रम में मेरा भी मन बहक रहा है कि भला कोई चिट्ठा क्‍यों आत्‍महत्‍या करता होगा ? गूगल खोजा तो कुछ खास नहीं मिला, एक कारण तो ये दिखा कि कभी कभी चिट्ठे के हिट, लिंक, टिप्‍पणियों से खुद उसके चिट्ठाकार का ही  अहम हिलने लगता है - अरे ये मेरा ही तो बच्‍चा है और इसका कद खुद मुझसे बढ़ गया है (शायद भड़ास के साथ हुआ था  ऐसा, पर यशवंत मानेंगे थोड़े ही) एक ब्‍लॉग पर विचार मिला कि ब्‍लॉग स्‍युसाईड इसलिए भी की जाती है कि ब्‍लॉग खुद उस जिंदगी के दुश्‍मन हो जाते हैं जो उस चिट्ठे को चलाती है। पर सच कहूँ तो मैं बहुत आश्‍वस्‍त नहीं हूँ कि चिट्ठे को सुबह शाम तक खटना नहीं होता, रोज रोज एक ही किस्‍म की जिंदगी की ऊब से दो चार नहीं होना होता, चिट्ठों के देश में बलात्‍कार कर किसी चिटृठे को सड़क पर छोड़ नहीं दिया जाता।  चिट्ठों अपने मिट जाने के बाद किसी पुनर्जन्‍म, स्‍वर्ग की उम्‍मीद नहीं होती तो फिर वे भला क्‍यों आत्‍महत्‍या करते है?

Monday, November 05, 2007

ब्‍लॉगविरोधी/ब्‍लॉगफोबिक कुछ भले तर्क: एक टैग हम-आप पर

 

पहले हसन जमाल ने ये तर्क या इन तर्कों के भाई बहन प्रस्‍तुत किए थे, ज्ञानोदय में, मसला कुछ कड़वा चला गया था। इधर जब आप किसी लोकतांत्रिक स्‍पेस में रहते हैं तो मुद्दे घूम फिरकर वापस आते रहते हैं। आज यही हुआ हमारे दो विद्वान मित्र दो मग कॉफी और यही कुछ आधा दर्जन तर्कों के साथ हमें हिन्‍दी बलॉग जगत का प्रतिनिधि मानकर (न न हमें ऐसी कोई गलत फहमी नहीं है पर वे भी क्‍या करें शायद हमारे मुँह से इस मीडिया रूप के बारे में कुछ ज्‍यादा सुनते हैं) आ बहसियाए। एक भले वातावरण में हुई ठीक ठाक बहस, पर तर्कों में कोई रियायत नहीं न उधर से इधर से। उनके तर्क हमारे जिस जुमले से भड़के  वह यह था कि हमने उनके ब्‍लॉग मीडिया को खारिज किए जाने के उपक्रम को ब्‍ला‍गोफोबिया करार दिया और उन्‍होंने फिर तो तर्क दिए ही, हमने भी जबाव दिए पर हमारे जबाव क्‍या रहे होंगे आप अनुमान लगा सकते हैं। मित्रों के तर्क हमारी भाषा में ये थे-

  1. वही हसन जमाली राग कि ब्‍लॉग हिन्दी की दुनिया की नहीं खाए पीए अघाए लोगों का शगल है। तकनीक स्‍वयं वर्गीय मार्कर है, कंप्‍यूटर की कीमत, जटिलता का मतलब ही है कि ये हिन्‍दी जमात की चीज नहीं है (गनीमत है एक मित्र की राय को दूसरे मित्र ने ही नहीं स्‍वीकारा वैसे ये उनका सबसे मजबूत तर्क था भी नहीं)
  2. ब्‍लॉग भले ही संपादन, प्रकाशन की सीमाओं का अतिक्रमण करता है इसलिए अनसुनी आवाजों को स्‍पेस देता है पर ये मुख्‍यधारा मीडिया की तुलना में जनमत निर्माण की कोई क्षमता नहीं रखता (केवल कम संख्‍या की वजह से नहीं वरन इसलिए कि इसकी प्रकृति में ये निहित है कि समूह को इससे संबोधित नहीं किया जा सकता)
  3. हिन्‍दी के मुख्‍यधाराई संघर्षों से पलायन कर रहे, या हिन्‍दी के मुख्‍यधाराई स्पेस से खदेड़े गए लोगों की शरणस्‍थली बन चुका है ब्‍लॉगोस्‍पेस। (उनका कहना था कि घरेलू महिलाएं, मैकेनिक, तकनीकी लोग आदि आदि ब्‍लॉग में आए ये तो ठीक- बेआवाजों को आवाज मिली पर ठेठ हिन्‍दी वाले जिनके पास बसने पसरने का स्‍पेस था वे क्‍यों भागकर, ब्‍लॉग के गैर पेशेवरों के ऑंचल में छिपते हैं)
  4. ब्‍लॉग वैयक्तिक दिक्‍कतों की चोट को निकाल बाहर करने का सेफ्टी वाल्‍व भर है ताकि सब जुटकर कोई बड़ी सामुदायिक पहल न बन सके।
  5. संपादन व अन्‍य क्‍वालिटी चैक न होना ब्‍लॉग की सामग्री को कम विश्‍वसनीय बनाते हैं- ये लेखक की एकाउंटेबिलिटी का अंत है। (मैं जो मानता हूँ लिखूंगा, उसके प्रति खुद भी जबाबदेह नहीं)
  6. लेखकीय तेवर में ब्‍लॉग अक्‍खड़ व गरूर भरा लेखन है तिसपर ये भी कि इस गरूर व अक्‍खड़ता का कोई ऐसा गुणात्‍मक आधार भी नहीं कि इसे सहा जाए ( एक तो कोई तोप विचार या लेखन नहीं उस पर अकड़ ऐसी कि महान क्रांतिकारी लेखन कर रहे हैं)

इन तर्कों पर हमारा नजरिया क्‍या है वह पहले कई बार कह चुके हैं चर्चा में दोहरा भी दिया। पर इतना तय है कि एक तो ये सवाल इसलिए खड़े होते हैं कि ब्‍लॉग मीडिया की प्रकृति समझने में कई लोग असमर्थ रहते हैं। इसीलिए ये जरूरी हो जाता है कि प्रिंट आदि में और अधिक लिखा जाए। हम तो कह आए कि इनके जवाब ब्‍लॉग मित्र खुद ही दे देंगे पर आपको अपना फोबिया छोड़कर कंप्‍यूटर तक आकर देखना पड़ेगा। तो हम आप सब टैगित हैं। इसे टैग मानें और बताएं कि ऊपर के तर्क क्‍यों सही नहीं हैं?

Thursday, November 01, 2007

1984 : एक दंगाई स्‍मृति कोलाज

स्‍मृति किन्‍हीं बहानों की मोहताज नहीं। लोग अपने गंवाए प्रियजनों को केवल उनकी बरसी पर याद करते हों, ऐसा नहीं है। किंतु फिर भी समय-आवृत्ति की स्‍मृति के उदृदीपन में अपनी भूमिका तो होती ही है। एक नवंम्‍बर भी ऐसा ही अवसर है। 1984 में मेरी उम्र 12 साल थी, कक्षा आठ में पढ़ता था और मेरी वैकल्पिक भाषा संस्‍कृत नहीं थी जैसा दिल्‍ली के स्‍कूलों में तब आमतौर पर होता था वरन पंजाबी थी। इसलिए मेरी कक्षा में कई सिख छात्र थे। एशियाई खेल हो चुके थे, दिल्‍ली के मध्‍यवर्ग तक रंगीन तो नहीं पर ब्‍लैक एंड व्‍हाईट टीवी पहुँच चुका था, हम आपरेशन ब्‍ल्‍यू स्‍टार से परिचित थे। इंदिरा गांधी, भिंडरावाले, खालिस्‍तान सुनी हुई संज्ञाएं थीं पर ये मेरे स्‍कूली खेलों को प्रभावित नहीं कर पाई थीं। ये सब सिख साथी मेरे  दोस्‍त थे। मैंने दोस्‍त सुखदेव से पूछ लिया कि खालिस्‍तान बन गया तो क्‍या करोगे। मैं सुनना चाहता कि दोस्‍त सुखदेव सिंह कहे कि वह मुझे छोडकर किसी खालिस्‍तान नहीं जाएगा पर उसने कुछ सोचकर कहा कि 'मैं सभी हिंदुआं नू वड देवेंगा' इस जवाब पर तब मैंने क्‍या सोचा मुझे नहीं याद, पर आज सोचता हूँ कि इस बात का मतलब था कि दिलों में दीवार बढ़ रही थी, बच्‍चों तक भी पहुँच रही थी। लेकिन तब भी प्रभात फेरियों में हिंदू सिख शामिल होते थे।

फिर 31 अक्‍तूबर आया और 31 की रात को कुछ सुगबुगाहट रही होगी पर हमें पता नहीं चली। हमारे लिए इंदिरा की मौत केवल छुट्टी लाई थी। क्रिकेट खेलने पहुँच गए पर तब दोपहर तक धुएं की लकीरें दिखने लगीं। सिख विरोधी दंगेRiot1 शुरू हो चुके थे।  खून का बदला खून से लेंगे वह नारा था जो दंगाईयों की जुबान पर था। हमारा मोहल्‍ला भजनपुरा नाम का इलाका था जो यमुनापार के सबसे अधिक प्रभावित इलाके में से था। गांवड़ी की वह गली जिसे बाद में इस दंगे की सबसे अधिक प्रभावित गली के रूप में माना गया पास ही थी। गुरूद्वारों, ट्रकों, घरों को जलाना शुरू हुआ। लोग सकते में थे। अफवाहों और जलने की गंध से सारा वातावरण भरा हुआ था। पड़ोस में एक सिख परिवार था। रात को हमारा दरवाजा खटखटाया गया  इस परिवार के बुजुर्ग, महिलाएं व बच्‍चे हमारे घर में आ गए, पुरुष लोग एक दूसरे पड़ोसी के यहॉं जाकर टिके। बड़े भाई ओर पिताजी सुरक्षा को लेकर चिंतित थे पर हम बच्‍चों के लिए ये भी उत्‍सव ही था, सारा मोहल्‍ला छत पर था- इस तरह छतों पर उग आए मोहल्‍ले की तुलना मेरी माताजी ने 1978 की बाढ़ से की पर एक बड़ा फर्क यह था कि तब आपस में सहयोग था जबकि अब नफरत थी।

अगले दो दिन तक दिल्‍ली में वही रहा जिसे बाद में मोदी ने गुजरात में लागू किया। पुलिस चुप थी। लोग छतों से पुलिस के सिपाहियों को एक तरफ जाने को कहते ताकि कुछ लोग बचाए जा सके पर वे दूसरी ओर जाते। अपनी आंखों, लूट, तलवारें, जली लाशें देखीं। मोहल्‍ले का कलसी का गुरूद्वारा जला दिया गया वह और उसके तीनों लड़के मार दिए गए। घर जला दिया। कुल मिलाकर 7 लाशें निकलीं वहॉं से। दिल्‍ली की जनता भली-भांति जानती है, उसे किसी स्टिंग की जरूरत नहीं  1984 के दंगों में कांग्रेस शामिल थी, बिला शक। स्‍थानीय कांगेसी दंगों की अगुवाई कर रहे थे। इसलिए जब पिछले महीने  सीबीआई ने टाईटलर के खिलाफ आरोप वापिस लिए तो तय हो गया कि मोदी के खिलाफ भी कुछ नहीं हो सकता।riot2

स्रोत:http://www.sikhspectrum.com/012003/images/1984.jpg

मेरी स्‍मृति के लिए इन दंगों की विशेष भूमिका है। मुझे पता लग गया था कि दंगाई कहीं बाहर से नहीं आते। आम घरबारी लोग ही किसी दिन दंगाई बन जाते हैं। हम मौने-सरदार को मारो का खेल खेलते थे। यह भी जाना कि अच्‍छाई बुराई एक ही मन में होती है। इन दंगों में हिंदू और मुसलमानों दोनों ने मिलकर हत्‍याएं कीं जबकि पूरे देश में ये कौमें एक दूसरे को ही मारती आई हैं।  सिख परिवार के घर में होने से हम डरे हुए थे इसलिए जब उन्‍हें राहत शिविर भेज दिया गया तो हमने राहत की सॉंस ली पर उन तीन दिनों में हम कई बार मरे। जब दोबारा स्‍कूल खुले तो पंजाबी की कक्षा से कई बच्‍चों के परिवार में लोग मारे गए थे या घर जला दिए गए थे। आज सोचता हूँ कि एक उन दंगों ने इस शहर की एक पूरी पीढ़ी से उसकी सहजता छीन ली।

टाईटलर आज भी दिल्‍ली के सांसद हैं।

Tuesday, October 23, 2007

सरकारी मास्‍टर के रूप में मेरा सीटीसी क्‍या है?

नौकरियॉं करना शुरू की थी 1991 में, उम्र थी 19 वर्ष। डिप्‍लोमा के आखिरी साल में कैंपस इंटरव्‍यू में वोल्‍टास, महाराजा और शायद सीएमसी ने चुना था पर घर पर नहीं बताया क्‍योकि हिंदी आनर्स में प्रवेश ले लिया था और हिंदी पढ़ना चाहता था, फिर नौकरी करना और पढ़ना साथ साथ जारी रहा है- एक फैक्‍टरी में बजाज की आयरन के ईसीआर और ह्यूमिडिटी टेस्‍ट करने के अलावा सारी नौकरियॉं अकादमिक जगत की रही हैं। सरकारी नौकरी तीन बार छोड़ी इसलिए उसी का अनुभव अधिक है, इसलिए पिछले दिनों कारपोरेट दुनिया से जब एक नौकरी का प्रस्‍तावनुमा आया तो थोड़ा चौंकना पड़ा। वो इसलिए कि एचआर का प्रस्‍तावक जानना चाहता था कि मेरी सीटीसी अपेक्षा क्‍या है।...अब ये ससुरा क्‍या हुआ ?

सीटीसी हमारे लिए तो चाय के मतलब चीज है, इसलिए शानूं जी जाने तो जानें हमें क्‍या पता सीटीसी? हॉं सीटीस्‍कैन जरूर पता है पर क्‍या कोई नौकरी देने से पहले हमारा दिमाग स्‍कैन करवाएगा क्‍या ? ऐसे तो सारा पागलपन पकड़ में आ जाएगा।  खैर गए गूगल देवता की शरण में तो पता लगा महाशय उस चीज की बात कर रहे हैं जिसे कॉस्‍ट टू कंपनी कहा जाता है। पर गलतफहमी में न रहिएगा इसका मतलब वेतन नहीं है,  वेतन तो इसका छोटा सा हिस्‍सा है। कहावती रूप में देखें तो आपकी  सुविधा के लिए लगाए गए टायलेट पेपर तक की कीमत इसमें जोड़ लेती है कंपनी। वैसे शुद्ध बीए, एमबीए, सीए तक यानि नए नवेले बालकों तक को कंपनियॉं 10-25 लाख तक का सीटीसी देने लगी हैं, भले ही हाथ में महीने के 30-35 हजार ही पकड़ाए (पता नहीं कितना टायलेट पेपर इस्‍तेमाल करते हैं, प्राइवेट सेक्‍टर वाले) हम तो फिर भी 17 साल से इधर उधर धक्‍के खा रहे हैं।ctc

तो हमें बताना है कि अगर हम लगी लगाई इस सरकारी नौकरी (कस्‍बाई अभिव्‍यक्ति में कहूँ, और चौपटस्‍वामी, प्रियंकर नाराज न हों  तो, दिल्‍ली की प्रोफेसरी ) को छोड़कर अगर हम कोई प्राइवेट नौकरी करना चाहें तो कितने रूपे के पड़ेंगे...उस कंपनी को। पर इससे हमारे मन में सवाल कौंधा कि अब कितने के पड़ते हैं भई सरकार को। यानि हम सरकारी मास्‍टरों का सीटीसी क्‍या है, भई।

तो पहले तो होता है वेतन, मान लीजिए 25 हजार (हॉं भई उतने पुराने नहीं हैं, मोटी तनख्‍‍वाह वाले मास्‍साब तो वो हैं, वो हैं, यहॉं तक कि वो हैं :)) फिर सरकार पेंशन की गारंटी देकर बाल बच्‍चों की जिम्‍मेदारी लेगी,  छुट्टियॉं- असल माल तो मास्‍टरी में ये ही मिलता है, नियमत: कॉलेज में 11 घंटे प्रति सप्‍ताह लेक्‍चर लेने होते हैं, पांचेक घंटे ट्यूटोरियल बस। आने जाने पर कोई बंदिश नहीं है। इतनी पढ़ाई भी तब ही हो पाती है जब ग्रीष्‍मावकाश(पौने चार माह), शरदावकाश(15 दिन), बसंतावकाश(15 दिन), पर्व, चुनाव, परीक्षा, जाम, हड़ताल (कर्मचारी, शिक्षक, विद्यार्थी), मौसम होने दें। तिस पर कैज्यूअल लीव, अर्न लीव, मेडिकल लीव, मेटरनिटि/पैटरनिटि लीव, भी होती हैं। और हॉं सारा चिकित्‍सा व्‍यय पूरे परिवार का सरकार की ही जिम्‍मेदारी है। इसके अलावा पूरी नौकरी में कुल मिलाकर पॉंच साल की स्‍टडी लीव भी मिलती है जिसमें सरकार पूरा वेतन देती रहती है। नौकरी करते हुए मर मरा गए तो सरकार पूरा बीमा करती है तथा घरवालों को पेंशन देती है। वैसे टायलेट में टायलेट पेपर हमारे यहॉं भी होता है। पर असल बात सुरक्षा की है, आप नौकरी में हैं तो बस हैं। पिछली बार नौकरी छोड़ने की कोशिश की तो दो साल तक इस्‍तीफे के बाद इंतजार में रहा पर कंबख्‍त नहीं छूटी, फिर से शुरू की और दो साल करने के बाद फिर से छोड़ी तब जाकर छूटी।    तो कोई भला मानस बताए कि कॉस्‍ट टू कंपनी क्‍या बैठी। ध्‍यान रहे कि ये तो सरकार के सबसे दरिद्र तबके मास्‍टर की सीटीसी बताई है जिसे बंगला, नौकर, अर्दली, सैलून कुछ नहीं मिलता। ध्‍यान रहे कि छठा वेतन आयोग फिर से वेतन बढ़ाने वाला है और उसका भी मत है कि केवल वेतन न देखें कॉस्‍ट टू नेशन देखो। अपना अनुमान है कॉस्‍ट टू कंपनी( बोले तो जनता)  हमारी भी खूब है।  तो कहो कितने सीटीसी पर जाएं इस नगरी को छोड़कर।

Wednesday, October 10, 2007

ॐ अष्ट‌ध‌ातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे.....ॐ म‌ह‌ाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे - नागार्जुन की कविता आडियो में

उम्‍मीद हैं संघी मित्र नाराज नहीं होंगे। नागार्जुन की कविता मंत्र सही मायने में ए‍क ब्‍लॉगिया कविता है- बिंदास, सपाट, दुनिया की ऐसी की तैसी टाईप सच्‍ची कविता। संजय झा ने फिलम बनाई है स्ट्रिंग जिसमें इस कविता को ज़ुबीन ने गाया है। खुद संजय झा ब्‍लॉग बनाकर प्रचार भी कर रहे हैं। इस ब्‍लॉग में हिंदी भी है- तो इस मायने में इस तरह का पहला ब्‍लॉग हुआ। खैर पूरी कविता नीचे है और हमारे पहले पॉडकास्‍ट में हम इस गीत को प्रस्‍तुत कर रहे हैं।

 

 

मंत्र कविता / नागार्जुन

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..

ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द

ॐ प्रण‌व‌, ॐ न‌ाद, ॐ मुद्रायें

ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌ग‌ार्, ॐ घोष‌णाएं

ॐ भ‌ाष‌ण‌...

ॐ प्रव‌च‌न‌...

ॐ हुंक‌ार, ॐ फ‌टक‌ार्, ॐ शीत्क‌ार

ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्क‌ार, ॐ चीत्क‌ार

ॐ आस्फ‌ाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इश‌ारे

ॐ न‌ारे, और न‌ारे, और न‌ारे, और न‌ारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ

ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं

ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग

ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग

ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के प‌ात

ॐ ड‌ाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट ब‌ात

ॐ कोय‌ल‌ा-इस्प‌ात-पेट्रोल‌

ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, ब‌ाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌म‌ान्नं, इम‌ा आपः इद‌म‌ज्य‌ं, इद‌ं ह‌विः

ॐ य‌ज‌म‌ान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राज‌ा, ॐ क‌विः

ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं क्रांतिः

ॐ श‌ांतिः श‌ांतिः श‌ांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं श‌ांतिः

ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं भ्रांतिः

ॐ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ

ॐ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ

ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ

ॐ निभ‌ाओ निभ‌ाओ निभ‌ाओ निभ‌ाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌न‌ा द‌ल, ॐ

ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण

ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण

ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुश‌ास‌न

ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न

ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्व‌ास‌न

ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्त‌ास‌ापेक्ष जोड़‌-तोड़‌

ॐ छ‌ल‌-छ‌ंद‌, ॐ मिथ्य‌ा, ॐ होड़‌म‌होड़

ॐ ब‌क‌व‌ास‌, ॐ उद‌घ‌ाट‌न‌

ॐ म‌ारण मोह‌न उच्च‌ाट‌न‌

ॐ क‌ाली क‌ाली क‌ाली म‌ह‌ाक‌ाली म‌ह‌ाक‌ाली

ॐ म‌ार म‌ार म‌ार व‌ार न ज‌ाय ख‌ाली

ॐ अप‌नी खुश‌ह‌ाली

ॐ दुश्म‌नों की प‌ाम‌ाली

ॐ म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार

ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले क‌ा ह‌ार

ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ

ॐ ह‌म च‌ब‌ायेंगे तिल‌क और ग‌ाँधी की ट‌ाँग

ॐ बूढे़ की आँख, छोक‌री क‌ा क‌ाज‌ल

ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, ग‌ंग‌ाज‌ल

ॐ शेर के द‌ाँत, भ‌ालू के न‌ाखून‌, म‌र्क‌ट क‌ा फोत‌ा

ॐ ह‌मेश‌ा ह‌मेश‌ा राज क‌रेग‌ा मेरा पोत‌ा

ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट

ॐ श‌त्रुओं की छ‌ाती अर लोह‌ा कुट

ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली

ॐ ब‌ंदूक क‌ा टोट‌ा, पिस्तौल की न‌ली

ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ प‌ाउंड

ॐ स‌ाउंड, ॐ स‌ाउंड, ॐ स‌ाउंड

ॐ ॐ ॐ

ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌

ॐ अष्ट‌ध‌ातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे

ॐ म‌ह‌ाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे

ॐ दुर्ग‌ा, दुर्ग‌ा, दुर्ग‌ा, त‌ारा, त‌ारा, त‌ारा

ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌म‌ा ज‌ाय स‌र्व‌ह‌ारा

ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌

[रचनाकार:नागार्जुन - 1969]

 

मंत्र कविता / नागार्जुन

ॐ श‌ब्द ही ब्रह्म है..

ॐ श‌ब्द्, और श‌ब्द, और श‌ब्द, और श‌ब्द

ॐ प्रण‌व‌, ॐ न‌ाद, ॐ मुद्रायें

ॐ व‌क्तव्य‌, ॐ उद‌ग‌ार्, ॐ घोष‌णाएं

ॐ भ‌ाष‌ण‌...

ॐ प्रव‌च‌न‌...

ॐ हुंक‌ार, ॐ फ‌टक‌ार्, ॐ शीत्क‌ार

ॐ फुस‌फुस‌, ॐ फुत्क‌ार, ॐ चीत्क‌ार

ॐ आस्फ‌ाल‌न‌, ॐ इंगित, ॐ इश‌ारे

ॐ न‌ारे, और न‌ारे, और न‌ारे, और न‌ारे

ॐ स‌ब कुछ, स‌ब कुछ, स‌ब कुछ

ॐ कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं, कुछ न‌हीं

ॐ प‌त्थ‌र प‌र की दूब, ख‌रगोश के सींग

ॐ न‌म‌क-तेल-ह‌ल्दी-जीरा-हींग

ॐ मूस की लेड़ी, क‌नेर के प‌ात

ॐ ड‌ाय‌न की चीख‌, औघ‌ड़ की अट‌प‌ट ब‌ात

ॐ कोय‌ल‌ा-इस्प‌ात-पेट्रोल‌

ॐ ह‌मी ह‌म ठोस‌, ब‌ाकी स‌ब फूटे ढोल‌

ॐ इद‌म‌ान्नं, इम‌ा आपः इद‌म‌ज्य‌ं, इद‌ं ह‌विः

ॐ य‌ज‌म‌ान‌, ॐ पुरोहित, ॐ राज‌ा, ॐ क‌विः

ॐ क्रांतिः क्रांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं क्रांतिः

ॐ श‌ांतिः श‌ांतिः श‌ांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं श‌ांतिः

ॐ भ्रांतिः भ्रांतिः भ्रांतिः स‌र्व‌ग्व‌ं भ्रांतिः

ॐ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ ब‌च‌ाओ

ॐ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ ह‌ट‌ाओ

ॐ घेराओ घेराओ घेराओ घेराओ

ॐ निभ‌ाओ निभ‌ाओ निभ‌ाओ निभ‌ाओ

ॐ द‌लों में एक द‌ल अप‌न‌ा द‌ल, ॐ

ॐ अंगीक‌रण, शुद्धीक‌रण, राष्ट्रीक‌रण

ॐ मुष्टीक‌रण, तुष्टिक‌रण‌, पुष्टीक‌रण

ॐ ऎत‌राज़‌, आक्षेप, अनुश‌ास‌न

ॐ ग‌द्दी प‌र आज‌न्म व‌ज्रास‌न

ॐ ट्रिब्यून‌ल‌, ॐ आश्व‌ास‌न

ॐ गुट‌निरपेक्ष, स‌त्त‌ास‌ापेक्ष जोड़‌-तोड़‌

ॐ छ‌ल‌-छ‌ंद‌, ॐ मिथ्य‌ा, ॐ होड़‌म‌होड़

ॐ ब‌क‌व‌ास‌, ॐ उद‌घ‌ाट‌न‌

ॐ म‌ारण मोह‌न उच्च‌ाट‌न‌

ॐ क‌ाली क‌ाली क‌ाली म‌ह‌ाक‌ाली म‌ह‌ाक‌ाली

ॐ म‌ार म‌ार म‌ार व‌ार न ज‌ाय ख‌ाली

ॐ अप‌नी खुश‌ह‌ाली

ॐ दुश्म‌नों की प‌ाम‌ाली

ॐ म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार, म‌ार

ॐ अपोजीश‌न के मुंड ब‌ने तेरे ग‌ले क‌ा ह‌ार

ॐ ऎं ह्रीं क्लीं हूं आङ

ॐ ह‌म च‌ब‌ायेंगे तिल‌क और ग‌ाँधी की ट‌ाँग

ॐ बूढे़ की आँख, छोक‌री क‌ा क‌ाज‌ल

ॐ तुल‌सीद‌ल, बिल्व‌प‌त्र, च‌न्द‌न, रोली, अक्ष‌त, ग‌ंग‌ाज‌ल

ॐ शेर के द‌ाँत, भ‌ालू के न‌ाखून‌, म‌र्क‌ट क‌ा फोत‌ा

ॐ ह‌मेश‌ा ह‌मेश‌ा राज क‌रेग‌ा मेरा पोत‌ा

ॐ छूः छूः फूः फूः फ‌ट फिट फुट

ॐ श‌त्रुओं की छ‌ाती अर लोह‌ा कुट

ॐ भैरों, भैरों, भैरों, ॐ ब‌ज‌रंग‌ब‌ली

ॐ ब‌ंदूक क‌ा टोट‌ा, पिस्तौल की न‌ली

ॐ डॉल‌र, ॐ रूब‌ल, ॐ प‌ाउंड

ॐ स‌ाउंड, ॐ स‌ाउंड, ॐ स‌ाउंड

ॐ ॐ ॐ

ॐ ध‌रती, ध‌रती, ध‌रती, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌, व्योम‌

ॐ अष्ट‌ध‌ातुओं के ईंटो के भ‌ट्टे

ॐ म‌ह‌ाम‌हिम, म‌हम‌हो उल्लू के प‌ट्ठे

ॐ दुर्ग‌ा, दुर्ग‌ा, दुर्ग‌ा, त‌ारा, त‌ारा, त‌ारा

ॐ इसी पेट के अन्द‌र स‌म‌ा ज‌ाय स‌र्व‌ह‌ारा

ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त, ह‌रिः ॐ त‌त्स‌त‌

[रचनाकार:नागार्जुन - 1969]

 

 

संजयझा के ब्‍लॉग से साभार

Sunday, October 07, 2007

'कलक्‍टर' व 'डीआईजी' के पिता की भूख से मौत: वाह देश-वाह गोरखपुर

अगर यह खबर देश की राजधानी के पहले पन्‍ने तक पहुँच पाई हे तो इसने कई रास्‍ते तय किए होंगे। या शायद देशभर में हो रहे घटनाक्रम का केवल एक अंश है जो राजधानी तक पहुँच पाया है।  गोरखपुर कोई अनजान गॉंव नहीं है, महंतो से लेकर साहित्यिकों, राजनीतिकों सब का अखाड़ा है। आज की एक मुखपृष्‍ठ खबर के अनुसार 50 साल केविनोदकुमार की भूखमरी से मौत हो गई। जिला प्रशासन आसानी से भुखमरी की मौतों को स्‍वीकार नहीं करते इसलिए पता नहीं औपचारिक रूप से इसका क्‍या कारण दर्ज किया जाएगा पर सच्‍चाई यही हे कि देशभर में गरीबी का नाच बढ़ा है  और अब भूख दर दराज के गॉंवों ही नहीं वरन ऐन शहरों की भी सच्‍चाई हो गई है। इस गरीब विनोद के ही परिवार के दो और सदस्‍य अभी अस्‍पताल में मौत से लड़ रहे हैं पर गरीबी एक बार के इलाज से दूर होने वाली बीमारी नहीं है।

इस खबर के बरक्‍स प्रदेश की मुख्‍यमंत्री की महारैली पर ध्‍यान दें, कम से कम 16 लाख लोगोंको जुटाने में हर जिले का स्थानीय प्रशासन (जी, पार्टी तो जो करेगी वो करेगी ही, कलक्‍टर और आला पुलिस अधिकारी भी इसी काम में लगे हैं) इस रैली को सफल बनाने में जुटा है। यह भी त्रासद व्‍यंग्‍य है कि इस गरीब विनोद कुमार ने अपने बच्‍चों में से दो के नाम  कलक्‍टर व डीआईजी रखे हुए थे।  कलक्‍टर व डीआईजी नाम के बच्‍चों का यह पिता भुखमरी का शिकार हुआ।

अब यदि कोई कहना चाहे कि देश भर में व्‍याप्‍त इस भुखमरी व बाजारवादी नीतियों के बीच संबंध है तो हमें तो शक है कि इस बात कोई गंभीरता से सुनेगा भी नहीं। पर केवल राज्‍य ही की बात क्‍यों करें पास पड़ोस, नाते रिश्‍तेदारी सभी सामाजिक सपार्ट स्‍ट्रक्‍चर चरमरा गए हैं वरना इतना निकट एक पूरा परिवार महीनों भूखा मरता रहा और सब सोते रहे। इस घनघोर संवेदनहीनता का दोषी कौन माना जाए....क्‍या हम खुद भी नहीं।

Thursday, October 04, 2007

क्‍या मेरे चिट्ठे के रोमन रूप पर मेरा कापीराईट है ?

इधर चिट्ठों की दुनिया में चोरी-चकारी खूब बढ़ गई है- कुछ तो बाकायदा पेशेवर चोर हैं। अब जब ऐसा है तो जाहिर है कि कुछ लोगों को इन्‍हें रंगे हाथों पकड़ने का जिम्‍मा भी लेना पड़ेगा। तो बेचारे शास्‍त्रीजी सरीखे कुछ मित्र मेहनत कर कर खोजते रहते हैं कि कब, कहॉं, किसने, क्‍या चोरी किया, किसका माल चोरी गया। चुराए जाने का गौरव प्राप्‍त लोगों में अधिकतर कवि बिरादरी के लोग हैं पर व्‍यंग्‍यकारों ने भी जब तब गर्व से घोशित किया है कि हमें ऐसा वैसा न जानो आखिर हमें भी चुराया जाता है। हम इस चुराने-चुराए जाने के मामले में किनारे खड़े बस देखते रहते हैं। बहुत बार चुराए गए माल पर नजर डाल ये जरूर जानने की कोशिश करते हैं कि भई इसे आखिर चुराया क्‍यों गया। किसी अधेड़ दंपत्ति को जाते देख जब कोई ये बताए कि देखो इन्‍होंने 'लव मैरिज' की थी, तो कुछ लोग खूब आंखे गाड़कर ये जानने की कोशिश करते हैं कि आखिर इसमें क्‍या रहा होगा....। हम भी चुराई पोस्‍टों में चोरिएबिलिटी के तत्‍व खोजते हैं। पर सही कहें कि हम तो खूब कन्‍फ्यूज हैं।

पहला भ्रम तो यह है कि भई किसी ब्‍लॉग में ब्‍लॉगर का क्‍या है- मतलब तकनीकी तौर पर पूरा ब्‍लॉग बनता है पोस्‍ट से और उसपर की गई टिप्‍पणियों से। टिप्‍पणी पाठक की 'रचना' है और पोस्‍ट लेखक की। दोनों मिलकर तो लेखक-पाठक की रचना हुए फिर काहे की चोरी- तेरा तुझको सौंपे क्‍या लागे मेरा। पर ये भी तो सच है कि अगले (लेखक) ने इतplagiarisनी मेहनत से लिखा  तो श्रेय पर तो हक बनता है कि नहीं। पर अगर एडसेंस की दुनिया से बात करें तो (वैसे हम खूब जानते हैं कि महीने भर की हिंदी एडसेंस से हफ्ते भर की प्‍याज खरीदने लायक भी कमाना संभव नहीं पर मात्रा छोड़ें सैद्धांतिक स्‍तर पर बात करें)  तो चूंकि लेखन से कमाई पर लेखक का हक बनता है इसलिए बिना अनुमति किसी और की सामग्री नहीं छापी जानी चाहिए। यहॉं एक और लोचा है- कई ब्‍लॉगों पर गेस्‍ट लेखकों की रचनाएं छपती हैं (मसलन रचनाकार, मोहल्‍ला) तो उनकी अनुमति लेखक से ली जाए कि ब्‍लॉगर से।

पर असल भ्रम है रूपातंरित रचनाओं पर। नया चिट्ठाजगत आया है। अंगेजी में। देखें वो बाकायदा आपकी ही नई नवेली (और पुरानी) पोस्‍टों के रोमन संस्‍करण को सामने रख रहा है- डंके की चोट पर। वहॉं कहा गया है-

Chitthajagat.com is automated devanagari to english (Roman Hindi) transliteration of chitthajagat.in.
Chittha (Blog) Jagat (World) dot in aggregates and publish devanagri blogs. Here you can read them in roman. To read the original article in Hindi click the title of entry, and to read it in roman click more at the end of clipping.

अब आप क्‍या कहेंगे। चोरी .... या क्रिएटिविटी। हम बताएं हमें तो लगता है कि अपने लिखे पर मालिकाना हक को कुछ लोचदार बनाया जाना चाहिए। कोई अगर लिंक व नाम देकर उपयोग करे तो करने दें। लिंक व नाम नहीं भी दे रहा होगा तो हम कर ही क्‍या लेंगे पर कम से कम तब हम नैतिक रूप से जरूर उसे 'चोर' कह सकते हैं।

 

Wednesday, October 03, 2007

कहो तो कह दें....साधुवाद, पर अविनाश हमें तुमसे और बेहतर की उम्‍मीद है

कादम्‍बनी में बालेन्‍दुजी के लेख के बाद फिर से छापे में ब्‍लॉग की कवरेज की ओर ब्‍लॉगरों का ध्‍यान गया है। अत: जरूरी जान पड़ा कि आपको याद दिलाया जाएं कि हिंदी ब्‍लॉगिंग पर एक नियमित कॉलम प्रतिष्ठित पत्रिका कथादेश में छपता हे जिसे अविनाश लिखते हैं। एक नई जानकारी ये है कि गंभीर समझे जाने वाले दैनिक जनसत्‍ता ने भी एक नियमित कालम अपने रविवारीय में पाक्षिक रूप से शुरू किया है। इस स्‍तंभ का शीर्षक है ब्‍लॉग लिखी। यह स्‍तंभ भी अविनाश ने ही लिखना शुरू किया है। यानि अब दो ही नियमित स्‍तंभ हैं- एक इंटरनेट का मोहल्‍ला जो कथादेश में आता है और दूसरा ब्‍लॉगलिखी जो जनसत्‍ता में शुरू हुआ। इस मायने में अविनाश की छापे में यह पहलकदमी निश्‍चय ही स्‍वागतयोग्‍य है।

इस रविवार को आए ब्‍लॉगलिखी का स्‍कैन्‍ड संस्‍करण इस प्रकार है-

(बड़े आकार में देखने के लिए क्लिक करें)

 

फिर भी हमने इतनी बदमजा हैडिंग क्यों दी, सनसनीखेजता के लिए नहीं वरन इसलिए कि दोस्‍तों से कुछ आजादी ले ली जाती है। कथादेश के स्‍तंभ में तो अविनाश अपने रंग में होते हैं- साफगोई होती है तथा साधुवादी सवर नहीं होता- किसी को बुरा लगे तो लगे वाला स्‍वर होता है- सो ठीक अविनाशोनुकूल है पर जनसत्‍ता में अब तक वो आजाद स्‍वर दिखा नहीं। शिष्‍टाचार को ताक पर रख कहे दे रहे हैं कि दोस्‍त बिंदास लिखो। है तो ये भी अच्‍छा पर हमें अविनाश से और बेहतर की उम्‍मीद है आखिर तमाम लोगों की तिरछी भौंहों के बावजूद वे इस साल के सबसे तेजी से आगे बढ़े ब्‍लॉगर हैं- टेक्‍नोराटी, चिट्ठाजगत या बाकी जो स्‍केल हो हर पर वे सबसे तेजी से बढे ब्‍लॉगर हैं- इसलिए मित्र हमारी अपेक्षाओं के ही लिए सही- इन बड़े नामों के पदार्पण पर हर्ष दिखाने की बजाय उन पर ध्‍यान केंद्रित करें जिनकी वजह से हिंदी ब्‍लॉगिगं सर्वाधिक लोकतांत्रिक किस्‍म की विधा है। आने दें चक्रधरों, राजकिशोरों,  उदयप्रकाशों को अच्‍छी बात है आएं पर हिंदी की ब्‍लॉगिंग खास है इसलिए कि यहॉं वे आते हैं - जमते हैं, जो हिंदी लेखन में कहीं न थे- सागर, अरुण, शुएब, ज्ञानदत्‍त ....। सुनोगे अविनाश ??