Sunday, May 20, 2007
बंदिनी बस्पा और मोहक किन्नर कैलाश: एक स्लाइड शो
Friday, May 11, 2007
फुरसतिया, उनका उबटनिआया लैपटॉप...और कानपुर
उस एसी कोच के शांत वातावरण में अपने इस कायांतरण पर विचार करने का पर्याप्त अवसर था और हमारा निष्कर्ष था कि ये चिट्ठाकारी असामाजिक लोगों में भी सामाजिकता का संचार करने की काबिलियत रखने वाली चीज है। खैर रात कुछ तो युवा डाक्टर सहयात्री की अपनी गर्लफ्रेंड से चर्चा को सुनकर या अन्य युवा साफ्टवेयर इंजीनियर के साथ गूगल बनाम माइक्रोसॉफ्ट पर हलकी फुलकी चर्चा से कटी और शेष सोकर। सुबह हम कानपुर में थे।
शहर हमारा अध्ययन और रूचि का क्षेत्र है, एक मित्र ने पिछले साल कानपुर को मृत औद्योगिक शहर के रूप में परिभाषित किया था, हम भी इसे और प्रत्यक्ष अनुभव करना चाहते थे ताकि इस राय के पक्ष या विपक्ष में खड़े हो सकें। आयुध निर्माणिनी के रास्ते में ही हमारी राय बनने लगी थी कि वाकई एक औद्योगिक शहर के रूप में यौवन इस शहर का बचा नहीं है...झुर्रियॉं हैं जो न केवल अतीत की चुगली करती हैं वरन ये भी कहती सी लगती हैं कि ये सब ऐतिहासिक अचानकता से हुआ है...कल तक ये था आज ये ...ये हो गया है।
खैर हमने एक SMS से अनूपजी को अपने पहुँच जाने की सूचना दी, अपना सामान अपने परिचितों के यहॉं पटका और स्नानादि के बाद शहर की ओर रवाना हुए जहॉं हमारी विशेष इच्छा वही थी जो किसी भी शहर के मामले में होती है, यानि वहॉं के ‘अड्डों’ तक पहुँचने की कोशिश कर शहर के मिजाज को समझने की कोशिश करना। लेकिन हम इस इरादे में सफल हो सकें तभी अनूपजी का फोन आया कि भई आने की सूचना से ज्वाईनिंग नहीं मानी जाती बताइए कहॉं हैं लेने आते हैं, वे इससे पहले ही घर पर फोन कर चुके थे, खैर हमने शहर का इरादा टाला और वापस अनूपजी से मिलने के लिए लौट चले।
अब अनूपजी एक बड़े अफसर हैं और ये प्रभाव उनके ऐस्टेट में लगातर अनुभव होता है, हम कुछ सकुचा से गए थे, लेकिन ये उनसे मिलने भर तक था, मिलना ऐसा तो नहीं हुआ जैसे पहली बार मिल रहे हों क्योंकि अक्सर नेट पर तो भेंट हो ही जाती है। वे बड़े उत्साह से मिले और परिवार के लोगों से परिचय करवाया हमने स्वाति को खुभकामनाएं दी...और लीजिए ब्लॉगर मीट बाकायदा शुरू हुई।

अनूपजी लगभग भूल ही गए कि वे उसी दिन शाम को आयोजित विवाह समारोह के मेजबान हैं और उनके जिम्मे हजारों काम हैं..वे तो बस किलकते चिट्ठाकार बन चुके थे....ये ओर वो और वो बीच बीच में भोजन, मिठाई, इस काम के निर्देश उसे, उस काम के निर्देश इसे दिए जाते रहे। तभी आया किस्सा उबटनिआए लैपटॉप का... जी आनुष्ठानिक पूर्तियों में बेचारे लैपटॉप को ही उबटन से अभिसिक्त कर दिया गया था। हमें ये बेहद चिट्ठोपयोगी प्रकरण लगा, अनूपजी ने झट से अपने साहबजादे को बुलाकर उस लैपटॉप की तस्वीर खींचने की हिदायत दी लेकिन अफसोस उसे पहले ही साफ कर दिया गया था।
खैर हमारी ब्लॉगर मीट जारी थी, हमें वह गुलमोहर दिखाया गया और उसके विषय में बताया गया जो उनकी चर्चित पोस्ट का आधार बना था। ऐसी ही और चीजें और व्यक्ति भी मिले या उनपर चर्चा हुई जो उनके चिट्ठा-लेखन का आधार बनते रहे हैं। और यहॉं अब मुझे फुरसतियात्व से साक्षात्कार हो रहा था जिसे जानने मैं वहाँ पहुँचा था। वे मानते हैं कि चिट्ठाकारी सहज स्वाभाविक लेखन है जितना स्वाभाविक व निजी अनुभव से जुड़ा होगा उतना बेहतर। ये इतनी ढेर सी बातें हम फुरसत से कर रहे थे जबकि उन्हें कुछ घंटों में कन्यादान की जिम्मेदारी निबाहनी थी- फुरसत इस शख्स की शख्सियत में है। कोई तनाव नहीं, हड़बड़ाहट नहीं बस मौज ही मौज।
अगले बीसेक घंटे में मैनें चिट्ठाकारी के इतने पाठ सीखे जितने दो वर्षों की चिट्ठाकारी में नहीं सीखे हैं। उन पाठों को बांटते रहेंगे आपसे...और राजीव टंडनजी से मुलाकात, ढेर सारी बातें...कुछ ऐसी कि हम बस उनके मुरीद ही हो गए हैं, इनपर भी चर्चा की जाऐगी।
फिलहाल के लिए इतना ही...
और हाँ काकेश ने कई कनपुरिया अड्डों की ओर इशारा किया पर अफसोस हमें वे नहीं मिले...हम तो बहुत उम्मीद के साथ कानपुर प्रैस क्लब में भी घुसे लेकिन ठीक तब जबकि शाम गुलजार थी वहॉं कई मुए पत्रकार बाकायदा सो रहे थे। क्या कहें..
Monday, May 07, 2007
कंपू शहर में ब्लॉगर मीट
Sunday, May 06, 2007
पत्रकारिता की दुनिया में ये हो क्या रहा है ..अविनाश
The report on the Gujarat fake encounter killings submitted by Inspector General of Police Geetha Johri speaks of "the collusion of [the] State government in the form of Shri Amit Shah, MOS for Home." It says the episode "makes a complete mockery of the rule of law and is perhaps an example of the involvement of [the] State government in a major crime."
लगा कि भई ये तो पातालफोड़ खबर है, गुजरात की सरकार के लिए हमारे मन में कोई सहानुभूति न थी न है। नवंबर 84 के दंगे स्मृति में हैं और उस बालक अनुभव से भी जानते हैं कि बिना राज्य की मिली भगत के इतने बड़े नरसंहार नहीं होते। पर यहॉं सवाल पत्रकारिता के मूल्यों और पाठकों के विश्वास का भी है, क्योंकि अगले ही दिन यानि आज हिंदू ने लिखा
The Hindu retracts its front-paged assertion that the Johri report speaks of
``collusion of the State government'' and of the role of Mr. Amit Shah, Minister of State for Home; and also that it recommends a CBI enquiry. We deeply regret these serious errors in a story that drew on documents we relied upon in good faith. We agree that we should have verified the facts, especially those relating to the provenance of ``Facts of the Case,'' before publishing the news stories
अब इस सारे प्रकरण को इस तरह भी देखा जा सकता है कि देखो कितने ईमानदार तरीके से गलती मान ली जो अखबार अपनी लीड में ऐसे कर्म करता हो उसे तो पांचजन्य ले जाकर बैठा देना चहिए और ये तो ‘द हिंदू’ है। हमें तो मामला इतना सीधा लगा नहीं पर पत्रकारिता की बातें हैं...पत्रकार ही जानें।
Friday, May 04, 2007
हसन जमाल प्रकरण और चौपटस्वामी का गिद्धदृष्टि संधान
हम चौपट स्वामीजी को कहीं गंभीरता से लेते रहे हैं। पर हसन जमाल प्रकरण में वे लिखे से ज्यादा पढ रहे हैं। मुझे रविजी (रतलामी) के लेख में, अपनी पोस्ट में और अन्य लोगों के हसनजी को संबोधित प्रतिक्रियाओं में उनकी व्यक्तिगत उपलब्धियों को कूड़ा कहती एक भी प्रतिक्रिया नहीं दिखी। उन्हें नोचने की कोशिश, उनपर गिद्धदृष्टि जैसी कोई बात भी कही नहीं है। इन पोस्टों की प्रतिक्रिया में जरूर एकाध मित्र ने उत्साह का आधिक्य दिखाया है जिसे आनुपातिक महत्व ही दिया जाना चाहिए।
चौपटस्वामी व्यक्तियों की निजी तफसीलों में इतने रमे है कि वे परिवारों को खोज रहे हैं, अकारण।
मेरी पोस्ट का सीधा सा उद्देश्य था जो व्यक्त था इस प्रकार-
'अब तक चिट्ठाकारी चंद सिरफिरों के खतूत भर थी इसलिए एम एस एम यानि मेन स्ट्रीम मीडिया या मुख्यधारा मीडिया उदासीन उपेक्षा से काम लेता था पर अब आवरण कथाएं आ रही हैं, इलेक्ट्रानिक मीडिया पर कवरेज हो रहा है, लेख भी छप रहे हैं। यानि सत्ता प्रतिष्ठानों के जड़ दरवाजों पर खटखटाहट अब शुरू हो गई है इसलिए इन दुर्गों के किलेदार हसन जमाल साहब जैसे ही तर्कों के हथियारों से हमला करने वाले हैं। कम से कम दो तर्क तो बार बार आने वाले हैं पहला ये कि इंटरनेट चंद खाते पीते लोगों की चीज है इसका हिंदी मुख्यधारा से कोई सरोकार नहीं और दूसरा यह कि यह हिंदी के बहुत छोटे समुदाय की नुमाईंदगी करता है ( यानि से विध्न संतोषी लोग हैं) इन्हें मत सुनो। ऐसा नहीं जबाव हें नहीं या दिए नहीं जा सकते पर बंधु लोगों संवाद उससे ही हो सकता है जो संवाद में यकीन करता हो। हम तो अपने बीच के अविनाशों से संवाद कायम कर पाने में असफल सिद्ध हुए.....
अर्थात इस प्रकरण को चिट्ठाकारी के लिए आत्मालोचन व वैध अवैध तर्कों के लिए तैयार होने की जरूरत को रेखांकित करने के लिए ही इस पोस्ट को लिखा गया था। और जैसा कहा गया कि भैया हमारी तो पहुँच उन तक नहीं है (बहुत पहूँचे हुए लोग है भई) पर उनकी पहूँच और प्रतिनिधि देखिए जरूर सब जगह हैं। कृपया उन्हें बताइए कि इसमें कोई हेठी की बात नहीं है, आइए हमें जानिए और शामिल होइए ठीक वैसे ही जैसे रविजी व्यंजल लिखने का प्रयास करते ही हैं।
बाकी हिंदी उर्दू मसले को संकेतित करना...जैसी हवा और पंगे इधर चिट्ठाजगत में चल रहे हैं, बहुत निर्दोष सी दिख रही चीज नहीं है। वैसे भी मजे की बात है जिन्हें चुन चुनकर आप गालिया रहे हैं वे ही वे लोग हैं जिन्होंने हसन साहब की चिट्ठाकारी से प्रमुख आपत्ति यानि प्रिंट के विरुद्ध होने वाली बात उसके निराकरण की कोशिश की। रविजी ने उत्तर प्रिंट में दिया, और मनीषा ने भी जैसा भी लिखा प्रिंट में लिखा, हमने भी लिखा। दरअसल लगता है चौपटस्वामीजी की मुख्य आपत्ति कूपमंडूकता शब्द से अधिक है....पर रुककर देखें जमाल साहब के तर्कों को, वे कहते हैं- जिसे हाथ से लिखने की या टाईप करने की आदत हो गई है वे हजार प्रलोभनों के बावजूद इंटरनेट के गुलाम नहीं बनेंगे....।
क्या कहेंगे इसे आप.. टाईपराईटर की ही तरह आप और हम कंप्यूटर पर टाईप करते हैं..इसमें क्या संघर्ष है। पर वे खोजकर मानेंगे। जो जी में आए करें हमें क्या।
असंतुलित विकास वाले पक्ष पर हम में से किसी ने नही लिखा, न उनके 'महान' व्यक्तित्व पर कीचड़ उछाली उनके परिवार को बीच में खींचा (कुछ लोगों को इसका विशेष शौक है) हमने केवल तात्कालिक उद्दीपक पर उनकी समझ पर प्रश्नचिह्न लगाया, जो जरूरी था। उनके तर्क फूहड़ थे, अब वे चौप्टस्वामी से अपने पुराने कर्मों के आधार पर वकालत करवा रहे हैं, हम फिर वही कह रहे हैं कि ऐसे ही और इससे भी अधिक टटकी तर्कपद्धति से लेकिन अधिक मजबूत किलेबंदी से सवाल उठाए जाएंगे...भाषा इससे भी ज्यादा अश्लील होगी।
Thursday, May 03, 2007
नोम चोमस्की, अमर्त्य सेन अब हिंदी में नेट पर उपलब्ध
1. साझी दुनिया में न्यायपूर्ण साझेदारी- अमर्त्य सेन
2.विकासशील देशों में कृषि भूमंडलीकरण- जे मोहन राव तथा सर्वास स्ट्राम
3.भूमंडलीकरण और अंतर्राष्ट्रीय वित्त की राजनीति - कौशिक बासु
4. शक्ति और वैश्वीकरण पर विचार - नोम चोमस्की
5. विकासशील देशों में कृषि भूमंडलीकरण : नियम, तर्काधार और परिणाम जे मोहन राव व सर्वास स्ट्राम
और भी कुछ विषयों पर विशेषकर हिंदी भाषा, साहित्य, संस्कृति पर भी सामग्री उपलब्ध है। जिसके लिंक विषय अलग हाने के कारण अलग से उपलब्ध कराए जाएंगे।
Tuesday, May 01, 2007
फो-ग्रास उर्फ बत्तख का कलेजा..... अहिस्ता से निकालो

खैर इसी लेख में वीर संघवी ने एक और लफड़े के विषय में बताया कि आजकल दुनिया भर में विशेषकर अमेरिका में फो-ग्रास के खिलाफ आंदोलन जारी है क्योंकि यह पशुओं (बत्तखों) के खिलाफ क्रूरता को बढ़ावा देता है। वीर संघवी को और मुझे भी यह बड़ा बत्तख तर्क लगता है कि जी बत्तख का कलेजा ऐसे निकालना उसके साथ क्रूरता है, अरे भई या तो सारा माँसाहार क्रूरता है नहीं तो कुछ भी नहीं। कहा जाता है कि प्रवासी पक्षी जब लंबी यात्रा पर निकलते हैं तो बहुत सा खाकर कलेजे को बढ़ा लेते हैं जो स्वादिष्ट होता है। अब पॉल्ट्री फार्म में किया यह जाता है कि वे प्रवास पर तो जाते नहीं लेकिन फॅनल लगाकर उन्हें जबरन खिलाया जाता है और कलेजे का आकार बढ़ने पर ...जै राम जी की। क्रूरता है तो सही, पर आराम से मारेंगे तब भी है। दरअसल देखें तो आदमजात है बहुत खुदगर्ज अपने लिए बाकी सारी प्रजातियों को नष्ट करने में उसे कोइ्र तकलीफ नहीं।
खैर हमें क्या अब माँसाहारी होते भी तो भी शायद कोबे बीफ या फो ग्रास हमें तो नसीब होने वाला नहीं था।
Monday, April 30, 2007
साइबर पथ के होरी......विश्वास करें यह लेख सृजन शिल्पी पर नहीं है
साइबर पथ के होरी
जनसत्ता 29.06.2000
दिल्ली में भारत का पहला साइबर अपराधी पकड़ा गया और फिर दूसरा भी। पहले मामले में एक इंजीनियर ने सेना के अधिकारी के पासवर्ड – जो स्वयं उस अधिकारी ने दिया था- का उपयोग करके उसके इंटरनेट समय से लगभग 100 घंटे का उपयोग कर डाला। इतने समय की कीमत इस समय बाजार में लगभग 750 रुपए है और यह चोर बाजार में 400-500 रुपए में मिल जाता है। यह खबर पढ़ते हुए प्रेमचंद के ‘होरी’ की बांसों के सौदे में अपने भाई से पांच रुपए की बेईमानी याद आई। आज होरी का याद आना संयोग भर नहीं है। ‘गोदान’ का होरी भारतीय संवेदना के इतिहास का अहम चरित्र है। वह चूंकि सामंतवाद से पूंजीवाद के संक्रमण का सबसे बड़ा चरित्र रहा है इसलिए अब इस नए संक्रमण में जिसमें हम खड़ें हैं, होरी को याद कर लेना जरूरी जान पड़ता है। इस ‘बेचारे’ चोर इंजीनियर को पहली बार में जमानत भी न मिल पाई ओर 400-500 रुपए की हेरा फेरी में वह 20-25 दिन जेल में रह आया। अभी मुकदता चलेगा, सो अलग। दूसरा मामला साइबर भी था और अपराध भी, शायद इसीलिए अभियुक्त को पहली ही पेशी में जमानत मल गई। इस मामले में अभियुक्त ने खुद को महिला के रूप में पेश करते हुए दूर विदेश में बैठे लोगों के साथ अश्लील वार्तालाप के सत्र में अपनी खुन्नस वाली एक भद्र महिला का फोन नंबर कुछ मनचलों को इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिया और बेचारी महिला के पास बड़ी संख्या में आपत्तिजनक फोन आने लगे। यहॉं ज्ञानवान व्यवस्था को लगा कि मामला छोटी मोटी छेड़छाड़ का है और हल्का फुल्का केस दर्ज हुआ।

गंभीरता और प्रकृति के गलत आकलन के ये मामले अलग थलग वाकयात नहीं हैं। घटनाओं, मूल्यों, अपराधों, व्यक्तियों आदि में हाल के समय में कुछ ऐसी जटिलताएं देखने में आईं हैं कि कानून, पुलिस, नैतिकता, तर्क जैसे औजार जो अब तक की व्यवस्था ने खास तौर पर होरी की मौत के बाद विकसित किए थे, इन जटिलताओं को समझने-सुलझाने में नाकाम रहे हैं हालांकि अधिकतर बौद्धिक कारीगर उन्हीं औजारों से इस कोशिश में लगे हैं जरूर। मैच फिक्सिंग, सट्टेबाजी, छिपा कैमरा, फोन टैपिंग, तहलका डॉट कॉम ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं जहां कानून असहाय दिखते हैं, अनैतिकता स्वीकार्य जान पड़ती है और नायक खलनायक की आकृतियाँ एक ही चेहरे में गड्डमड्ड जान पड़ती हैं।
सच दरअसल यह है कि इतिहास की अपनी कोई मंजिल नहीं होती। कई बार दिशा और पैटर्न जरूर होते हैं जिन्हें पकड़ना ऐतिहासिक समझदारी है। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने पूंजीवाद को जन्म दिया था वैसे ही उत्तर औद्योगिक परिदृश्य ने, जहां निर्माण क्षेत्र नहीं वरन सेवा क्षेत्र उफान पर है, उत्तर पूंजीवादी स्थितियाँ पैदा की हैं। इस स्थिति की अपनी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक विशेषताएं हैं, इसकी अपनी शब्दावली है, अपना व्याकरण और औजार हैं। पूंजीवाद ने जब सामंतवाद की जगह ली थी तो उसके भी ऐसे ही नए उपकरण थे जिन्होंने सामंतवाद के तत्संगत उपकरणों की जगह ली थी। सामंतों जमींदारों ने जमीनें बेचकर मिलों, कारखानों, कंपनियों के शंयर खरीदने शुरू कर दिए थे और रियासतों के राजाओं ने कांग्रेस क मेंबरी और लोकसभा का चुनाव लड़ने में अपना भविष्य देखा था। आज पुन: वह स्थिति आन पड़ी है जब पूंजीवादी उपकरण सामयिक स्थितियों को समझ पाने, उनकी व्याख्या करने और उनमें हस्तक्षेप कर उन्हें नियंत्रित करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं। उत्तर पूंजीवादी औजारों जैसे बाजारवाद, उत्तर आधुनिकता, फजी लॉजिक, इंटरनेट, साइबर कैफे, नेटीजनशिप आदि ने पूंजीवादी उपकरणों की जगह लेना शुरू कर दिया है।
यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और कहीं कही लगभग पूरी हो चुकी है। भारत में दौर संक्रमण का है। इस स्थिति संक्रमण की है। इस स्थिति ने संकट उन लोगों के लिए के लिए पैदा कर दिया है जो इस बदलाव को देख तो रहे हैं हालांकि देखना नही चाहते। सामंतवाद के सामंत, संक्रमण के बाद पूंजीवाद के पूंजीपति बन जाते हैं और सामंती व्यवस्था के खेतिहर बिना किसी हील हुज्जत के पूंजीवाद के औद्योगिक मजदूर बन जाते हैं। दिक्कत उस वर्ग के साथ होती है जो खुद को बदले बिना अगले युग में जाना चाहता है। वर्तमान संक्रमण के बाद की व्यवस्था में दलित, शोषित, पीडितों को अधिक मानवीय व्यवस्था मिल जाएगी, ऐसे ख्याली पुलाव पकाना व्यर्थ है। किंतु उनके अस्तित्व पर संकट नहीं है, वे बने रहेंगे- शायद उतने ही दमित, पीडित व शोषित, पर रहेंगे जरूर। सही मानी में सबसे बड़ा संकट हमारी व्यवस्था के उन सभी मध्यवर्गीय विचारवान लोगों पर है जो उत्तर पूंजीवादी स्थितियों पर पूंजीवादी मूल्यों और व्यवस्थाओं को लागू करना चाहते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आई आई टी) के परिसरों में जहां कंप्यूटर समय की चोरी इतनी आम है कि प्रत्येक छात्र उसे अपना अधिकार समझता है, इस काम के लिए गिरुतारी और सजा जैसे कदम उठाने वालों लोगों और व्यवस्थाओं की बुद्धि पर केवल तरस खाया जा रहा होगा। इन परिसरों में गोदान न पढ़ा जाता है न पढ़ाया जाता है। पर यहां के लोग जानते हैं कि पूंजीवाद के होरी चाहे व्यक्तियों के रूप में हों या संस्थाओं के रूप में, वे ‘आप्टिकल फाइबर सूचना महामार्ग’ के निर्माण में मारे जाएंगे, जैसे कि सामंतवाद का होरी गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क बनाते हुए मरा था।
Friday, April 27, 2007
ब्लॉगराइनों की व्यथा........नारद पर बजर गिरे
हमारे पुराने घर के पड़ोस में एक मास्टराईन रहती थीं, अब थीं तो वह सामान्य गृहिणी ही पर चूंकि उनके पति प्राईमरी स्कूल मास्टर थे इसलिए उन्हें मास्टराईन की पदवी सहज ही हासिल हो गई। कस्बों की तो यह रीत रही ही है और लिंग बदलों के सवाल के जवाब में सालों से लिखा आता आ रहा है कि मोची- माचिन, धोबी-धोबन, डाक्टर- डाक्टरनी (डाक्टराइन) .... इस तर्ज पर ब्लॉगर पत्नियॉं हुईं ब्लॉगराइन। तो मित्रो आज की कथा ब्लॉगराइनों की व्यथा है। वे ब्लॉगराइनें जो खुद तो ब्लॉगियाती नहीं है पर चूंकि उनके पति ब्लॉगियाते हैं इसलिए भुगतती हैं। नोट पैड ने विवाह के शोषण पर लिखा तो डिस्क्लेमर लगाया कि उन्हें ही दु:खी न मान लिया जाए..और यूँ भी आजकल तो डिस्क्लेमर ‘इन थिंग’ हो गए हैं। इसलिए साफ बता दें कि ये हमारी या हमारी पत्नी की व्यथा नहीं है क्योंकि हमारी गत तो और बुरी है। एक ही उल्लू काफी होता है बरबादे गुलिस्तां करने को यहॉं तो सभी ब्लॉगर हैं....पर वो फिर कभी। आज तो शुद्ध ब्लॉगराइनों पर लिखा जाए।यूँ तो ब्लॉगराइनें भी मनुष्य प्रजाति की ही प्राणी होती हैं और यह वृत्ति उन्होंने अपनी पसंद से नहीं चुनी होती वे इस दुनिया में धकेल दी गईं होती हैं। उनके पिताओं ने या खुद उन्होंने तो अच्छे खासे खाते पीते और जिंदा इंसानों को चुना था पर बुरा हो उस आलोक जो ये लिख मारा।
नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।
हाँ भैया हम तो देख पा रहे हैं पर क्या तुम देख पा रहे थे कि ये लिखकर तुम कितने घरों की बरबादी का सामान लिख रहे हो। मुआ मरद सुबह से शाम तक नौकरी पीट कर आता है और घर में घुसते ही बिना कमीज उतारे, जूते रैक में रखे सीधा कंप्यूटर की ओर लपकता है, कंप्यूटर ऑन करके बाथरूम में घुसता है ताकि जब तक वापस आए कंप्यूटर ऑन हो जाए और फिर गिटर पिटर शुरू।
....हम तो खरीदी हुई लौंडी हो गई हैं अरे इससे तो बाहर कोई चक्कर वक्कर ही चला लेता कम से कम घर में तो हमारा होता। ओर फिर तब तो तमाम दुनिया की सहानुभूति हमारे साथ होती। अब सारी दुनिया समझती है कि कितना शरीफ आदमी है सर झुकाए मोहल्ले भर से गुजरता है किसी की तरफ ऑंख उठाकर देखता तक नहीं- अब कौन बताए कि देखेगा क्या खाक चलते चलते तक तो दिमाग नारद पर अटका होता है...मन मस्तिष्क ऑनलाइन होता है टिप्पणियॉं सोची जा रही होती हैं स्माइली लग रही होती हैं...हाय मॉं मेरे ही साथ ऐसा होना था। ओर यह प्रोषित पतिका विरहिणी जार जार रोती है। वह अचानक त्रिलोचन की चम्पा बन जाती है-
चम्पा काले पीले चिट्ठे नहीं चीन्हती...
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नारद पर बजर गिरे
इस चिट्ठा प्रेरित विरहावस्था का आलम यह है कि पति पर अब धमकियों का असर नहीं होता...मायके चले जाने को वह अवसर की तरह लेता है और लौटने पर उसके चिट्ठे का टैंपलेट बदला हुआ होता है...कई जुगाड़ी लिंक उसने जॉंच लिए होते हैं, उसके गूगलटॉक में कई नए चिट्ठेकार जुड़ गए होते हैं। पत्नी मन मसोसका अगली बार मायके न जाने की प्रतिज्ञा करती है। इस विरहावस्था में वह विरह की दसो दशाओं से गुजरती है।
अभिलाषा- आज जब ब्लॉगर आएगा तो उसे ब्लॉग नहीं मैं याद होंगी, या काश आज तीन घंटे बिजली न रहे।
चिन्ता- कहीं मुआ रास्ते में ही किसी साईबर कैफे में न घुस गया हो।
स्मृति- उसे याद आते हैं वे रात दिन....जब कोई कंप्यूटर न था, नारद न था...बस मैं थी और तू था।
गुणकथन – वह बहुत संवेदनशील था, प्यार करता था मतलब जो कुछ वह प्रोफाइल में लिखता है चिट्ठों में बताता है पहले सच में वह ऐसा था।
उद्वेग – सौतन कंप्यूटर के पास रखे होने के कारण ए.सी. की हवा भी लू के समान प्रतीत होती है।
प्रलाप - हाय।। इस नारद को, आलोक को, चिट्ठे को मेरी हाय लगे...नारद पर बजर गिरे
उन्माद – आज...आज या तो इस घर में मैं रहूँगी या ये कंप्यूटर....(फिर इसका मतलब समझ में आ जाता है कि कंप्यूटर का विरहिणी कुछ बिगाड़ नहीं पाएगी इसलिए शांत हो जाती है)
व्याधि – अब क्या होगा...इस चिंता में ब्लॉगराइन बिस्तर पकड़ लेती है- कमबख्त ब्लॉगर इस पर भी साथी बलॉगर से राय लेकर ही कुछ करने का विचार करता है।
जड़ता – अब ब्लॉगर के आने की घंटी बजती है, बलॉगराइन पर कोई असर नहीं होता वह सुख दुख से दूर हो गई है।
मरण- इसका वर्णन निषिद्ध है वरना ये भी संभव है।
तो हे चिट्ठाकारो।। जागो अपने अमर्त्य चिट्ठाजीवन में ब्लॉगराइन के प्रति इतने निष्ठुर न हो जाओ। वैसे है तो ये हमारी धूर्त ब्लॉगिंग ही कि ब्लॉगिंग के अनाचार को भी एक पोस्ट बना दिया जाए पर क्या करें आदत से मजबूर हैं।
Wednesday, April 25, 2007
बुर्के में ज्योतिहीन आँखें....और नेत्रहीन का वैष्णोंदेवी दर्शन
आज भी वही कर रहा था। जिस कॉलेज में हूँ वहाँ काफी विद्यार्थी मुसलमान हैं जिनमें कुछ छात्राएं बुर्के में भी आती हैं, अब इस पर अलग से नजर नहीं जाती, सामान्य ही लगता है, गणित, विज्ञान, साहित्य पढ़ती बुर्के वाली छात्राएं। रसोई और सौंदर्य पर अपनी राय हम व्यक्त कर चुके हैं ऐसे में जाहिर है कि वस्तुनिष्ठ रूप से हमारी राय बुर्के के पक्ष में नहीं है पर सुनीलजी की उस राय से भी सहमत हैं कि हम उनकी आजादी की परिभाषा तय नहीं कर सकते।

खैर...जिस कमरे में चौकीदारी करनी थी वह मुख्य प्रवेश के निकट था तभी एक परिचित का हाथ थामे एक छात्रा जिसने बुर्का पहना था लेकिन नकाब नहीं था वह गुजरी। उसके एकाध कदम आगे निकल जाने के बाद ध्यान दिया कि वह दरअसल नेत्रहीन थी। मैं हतप्रभ था...नहीं ऐसा नहीं कि नेत्रहीन विद्यार्थियों या बुर्के वाली छात्राओं को पढ़ाना मेरे लिए कोई नई बात है वरन इसलिए कि एक ही छात्रा को इन दो रूपों में देखना मुझे असहज बना रहा था। जो खुद देखने में असमर्थ है...देखना क्या है इससे अपरिचित है वह खुद को न दिखने देने के लिए इतना सजग क्यों। देखना बुरा भी हो सकता है..देखने से वंचित ये कैसे सोचता होगा। ओर भी बहुत कुछ इस दोहरे वंचन पर सोचा.... पर वह छात्रा क्या सोचती होगी यह नहीं पता। ....और भी, ये कि नेत्रहीन के लिए खुद को संभलना ही क्या कम था कि बुरका भी लाद लिया। धर्म वगैरह की क्रूरता भी मन में आयी।
फिर याद आया अपना नजदीकी मित्र नरेश। नेत्रहीन है, पढ़ता-पढ़ाता-लिखता है...कम्यूनिस्ट टाईप है पर आस्तिक है हमारे उलट। नजदीकी है इसलिए बिना आशंका के कह पाते हैं कि यार एक बात बताओ ये वैष्णो देवी जाकर क्या भाड़ भूंजते हो..क्या ‘दर्शन’ करते हो, जिधर मर्जी मुँह करके हाथ जोड़ लो....नेत्रहीन का तो हो गया दर्शन। पर उनका धर्म नाम की सत्ता संरचना में विकलांगता के हाशियाकरण की अपनी समझ है...हम भी जोर नहीं देते।आज लगा कि ये भी बुरका ही तो है।