Thursday, September 20, 2007

चेतो शीला दीक्षित अक्षरधाम और कॉमनवैल्‍थ दिल्‍ली के शमशान सिद्ध होंगे

बहुत बार दोहराने से कई वाक्‍यॉंश अपने अर्थ खो बैठते हैं। 'यमुना मर रही है' भी एक ऐसा ही वाक्‍यॉंश है। रामसेतु के संदभ्र में जब बार बार पर्यावरण का सवाल उठाया जा रहा है तो ऐसे में कुछ रामभक्‍तों से ये सवाल पूछा जाना बेहद प्रासंगिक है कि जब दिल्‍ली के रिवरबैड पर अक्षधाम नाम के 'धार्मिक माल' का निर्माण किया जा रहा था (कल जारी नोटिस में मंदिर से पूछा गया है कि आपकी व्‍यवसायिक गतिविधियों की व्‍याख्‍या करें)  तब क्‍यों चुप्‍पी थी। यहॉं यह नहीं कहा जा रहा है कि रामसेतु के मामले में यदि कोई पार्यावरणीय चिंताएं हों तो उन्‍हें व्‍यक्‍त न किया जाए पर इस कराहती मरणासन्‍न नदी दिल्‍ली पर भी एक नजर डालें।

yamunapolluted 

दिल्‍ली में 2010 में एक बड़ा जमावड़ा खेल खिलाडि़यों का होने वाला है जिसे कॉमनवेल्‍थ खेल कहा जाता हे। इसकी कीमत 70,000 करोड़ रुपए आंकी जा रही है जो किसकी जेब से आएगा हमें पता ही है और ये किसकी जेब में जाने वाला है इससे भी हम अपरिचित नहीं हैं। पर एक बात जिससे हम अपरिरिचित हैं वह यह कि शायद इसकी कीमत चुकाने में हमें इस शहर के अस्तित्‍व से ही हाथ धोना पड़ेगा। कैसे ?

दिल्‍ली का अस्तित्‍व प्राचीन काल से ही यमुना पर निर्भर रहा है, दिल्‍ली की सभी वावडि़यों, कुओं और बरसाती नदियों को खत्‍म कर चुकने के बाद अब हमने अनी यमुना को भी समाप्‍त प्राय: कर दिया है। और इस ताबूत की आखिरी कील है कॉमनवेल्थ खेलगॉंव जो यमुना के खादर में बनाया जा रहा है। ये खादर ही वह बचा हुआ एकमात्र सहारा है जो बरसात में पानी का संचय भूजल के रूप में कर अब तक दिल्‍ली को पानी मुहैया कराता रहा है। 10000 हेकटेयर का यह क्षेत्र जल को सोख सकने की दुनिया में सबसे अधिक खमता वाला क्षेत्र हे जो 70% तक जल सोखने की क्षमता रखता है।

इस त्रासद कहानी की शुरूआत अक्षरधाम मंदिर नाम की इमारत बनने से होती है।akshardham रामभक्‍त पार्टी के प्रधानमंत्री ने तमाम आपत्तियों को नजरअंदाज करते हुए इस निर्माण की अनुमति दी तो मानो दिल्‍ली सरकार को बस मौका ही मिल गया है। उसने यमुना प्‍लान नाम से बड़े पैमाने पर निर्माण कर इस रिवरबैड को समाप्‍त कर देने की योजना बनाई है। यदि वह हो गया तो जिसे रोकने की फिलहाल तो किसी में इच्‍छाशक्ति नहीं ही दिखाई दे रही है तो हमारा शहर ओर इस देश की राजधानी एक जींत शहर के रूप में समापत हो जाएगी क्‍योंकि उसके सभी जलस्रोत इस निर्माण के बाद समाप्‍त हो चुके होंगे, भूजल भी।

इस सारी विनाशकारी प्रकिया के खिलाफ जल सत्‍याग्रह पिछले पचास दिनों से दिल्ली में चल रहा है। शिक्षिका के खिलाफ नकली स्टिंग से भीड़ भड़काकर दंगे करवा सकने वाला ताकतवर मीडिया क्‍या कर रहा है वह ही जानता होगा। राज्‍य की मुख्‍यमंत्री ने बेशर्मी से विधानसभा में ही कह डाला कि इस 10000 हेकटेयर जमीन का दोहन कर दिल्‍लीवासियों को लक्‍जीरियस जिंदगी उपलब्‍ध करवाना उनका अधिकार है।  मानो हमें पता नहीं कि यह लग्‍जरी किसे मिलेगी और इसकी कीमत कौन चुकाने वाला है।

3 comments:

Sanjeet Tripathi said...

अफ़सोस कि कमोबेश सब जगह यही हो रहा है!!
राजनीति इतनी हावी हो चुकी है हम सब पर कि आने वाले कल की त्रासदी दिखाई ही नही देती!!

रही बात रामभक्त पार्टी की तो उसे राम या अन्य देवी देवता तभी याद आते हैं जब कहीं न कहीं चुनाव होने हों!!

काकेश said...

काश आपकी आवाज शीला जी तक पहुंचती.

पुनीत ओमर said...

अजी किस पिछली सदी की बातें कर रहे हैं आप। आजकल पैसे से पैसा बनता है। हमें कौन सा कोई सौ साल बाद तक जिन्दा रहना है। जो हुआ ही नहीं उसके बारे में अभी से क्यों चिन्ता करना। यमुना हजारों सालों में ना बिगड़ी तो क्या खेल खिलाने से बिगड़ जायेगी? ओजोन पर्त में छेद हो जाता है तो क्या हम उपग्रह बनाना बन्द कर दें। इस नश्वर संसार में कभी ना कभी तो सब खत्म होना है। पानी भी हवा भी और इन्सान भी। जब भूगर्भ जल खत्म होगा तो देखा जायेगा। हमारी आने वाली पीढ़ी तब तक कुछ ना कुछ समाधान तो निकाल ही लेगी। तब तक ना तो कॉमनवेल्थ में खेलने वाले रहेंगे और ना उनके विरोध में नारे लगाने वाले।