
हमारे पुराने घर के पड़ोस में एक मास्टराईन रहती थीं, अब थीं तो वह सामान्य गृहिणी ही पर चूंकि उनके पति प्राईमरी स्कूल मास्टर थे इसलिए उन्हें मास्टराईन की पदवी सहज ही हासिल हो गई। कस्बों की तो यह रीत रही ही है और लिंग बदलों के सवाल के जवाब में सालों से लिखा आता आ रहा है कि मोची- माचिन, धोबी-धोबन, डाक्टर- डाक्टरनी (डाक्टराइन) .... इस तर्ज पर ब्लॉगर पत्नियॉं हुईं ब्लॉगराइन। तो मित्रो आज की कथा ब्लॉगराइनों की व्यथा है। वे ब्लॉगराइनें जो खुद तो ब्लॉगियाती नहीं है पर चूंकि उनके पति ब्लॉगियाते हैं इसलिए भुगतती हैं। नोट पैड ने
विवाह के शोषण पर लिखा तो डिस्क्लेमर लगाया कि उन्हें ही दु:खी न मान लिया जाए..और यूँ भी आजकल तो डिस्क्लेमर ‘इन थिंग’ हो गए हैं। इसलिए साफ बता दें कि ये हमारी या हमारी पत्नी की व्यथा नहीं है क्योंकि हमारी गत तो और बुरी है। एक ही उल्लू काफी होता है बरबादे गुलिस्तां करने को यहॉं तो सभी ब्लॉगर हैं....पर वो फिर कभी। आज तो शुद्ध ब्लॉगराइनों पर लिखा जाए।
यूँ तो ब्लॉगराइनें भी मनुष्य प्रजाति की ही प्राणी होती हैं और यह वृत्ति उन्होंने अपनी पसंद से नहीं चुनी होती वे इस दुनिया में धकेल दी गईं होती हैं। उनके पिताओं ने या खुद उन्होंने तो अच्छे खासे खाते पीते और जिंदा इंसानों को चुना था पर बुरा हो उस आलोक जो ये
लिख मारा।
नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।
हाँ भैया हम तो देख पा रहे हैं पर क्या तुम देख पा रहे थे कि ये लिखकर तुम कितने घरों की बरबादी का सामान लिख रहे हो। मुआ मरद सुबह से शाम तक नौकरी पीट कर आता है और घर में घुसते ही बिना कमीज उतारे, जूते रैक में रखे सीधा कंप्यूटर की ओर लपकता है, कंप्यूटर ऑन करके बाथरूम में घुसता है ताकि जब तक वापस आए कंप्यूटर ऑन हो जाए और फिर गिटर पिटर शुरू।
....हम तो खरीदी हुई लौंडी हो गई हैं अरे इससे तो बाहर कोई चक्कर वक्कर ही चला लेता कम से कम घर में तो हमारा होता। ओर फिर तब तो तमाम दुनिया की सहानुभूति हमारे साथ होती। अब सारी दुनिया समझती है कि कितना शरीफ आदमी है सर झुकाए मोहल्ले भर से गुजरता है किसी की तरफ ऑंख उठाकर देखता तक नहीं- अब कौन बताए कि देखेगा क्या खाक चलते चलते तक तो दिमाग नारद पर अटका होता है...मन मस्तिष्क ऑनलाइन होता है टिप्पणियॉं सोची जा रही होती हैं स्माइली लग रही होती हैं...हाय मॉं मेरे ही साथ ऐसा होना था। ओर यह प्रोषित पतिका विरहिणी जार जार रोती है। वह अचानक त्रिलोचन की चम्पा बन जाती है-
चम्पा काले पीले चिट्ठे नहीं चीन्हती...
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नारद पर बजर गिरे
इस चिट्ठा प्रेरित विरहावस्था का आलम यह है कि पति पर अब धमकियों का असर नहीं होता...मायके चले जाने को वह अवसर की तरह लेता है और लौटने पर उसके चिट्ठे का टैंपलेट बदला हुआ होता है...कई जुगाड़ी लिंक उसने जॉंच लिए होते हैं, उसके गूगलटॉक में कई नए चिट्ठेकार जुड़ गए होते हैं। पत्नी मन मसोसका अगली बार मायके न जाने की प्रतिज्ञा करती है। इस विरहावस्था में वह विरह की दसो दशाओं से गुजरती है।
अभिलाषा- आज जब ब्लॉगर आएगा तो उसे ब्लॉग नहीं मैं याद होंगी, या काश आज तीन घंटे बिजली न रहे।
चिन्ता- कहीं मुआ रास्ते में ही किसी साईबर कैफे में न घुस गया हो।
स्मृति- उसे याद आते हैं वे रात दिन....जब कोई कंप्यूटर न था, नारद न था...बस मैं थी और तू था।
गुणकथन – वह बहुत संवेदनशील था, प्यार करता था मतलब जो कुछ वह प्रोफाइल में लिखता है चिट्ठों में बताता है पहले सच में वह ऐसा था।
उद्वेग – सौतन कंप्यूटर के पास रखे होने के कारण ए.सी. की हवा भी लू के समान प्रतीत होती है।
प्रलाप - हाय।। इस नारद को, आलोक को, चिट्ठे को मेरी हाय लगे...नारद पर बजर गिरे
उन्माद – आज...आज या तो इस घर में मैं रहूँगी या ये कंप्यूटर....(फिर इसका मतलब समझ में आ जाता है कि कंप्यूटर का विरहिणी कुछ बिगाड़ नहीं पाएगी इसलिए शांत हो जाती है)
व्याधि – अब क्या होगा...इस चिंता में ब्लॉगराइन बिस्तर पकड़ लेती है- कमबख्त ब्लॉगर इस पर भी साथी बलॉगर से राय लेकर ही कुछ करने का विचार करता है।
जड़ता – अब ब्लॉगर के आने की घंटी बजती है, बलॉगराइन पर कोई असर नहीं होता वह सुख दुख से दूर हो गई है।
मरण- इसका वर्णन निषिद्ध है वरना ये भी संभव है।
तो हे चिट्ठाकारो।। जागो अपने अमर्त्य चिट्ठाजीवन में ब्लॉगराइन के प्रति इतने निष्ठुर न हो जाओ। वैसे है तो ये हमारी धूर्त ब्लॉगिंग ही कि ब्लॉगिंग के अनाचार को भी एक पोस्ट बना दिया जाए पर क्या करें आदत से मजबूर हैं।