Monday, April 16, 2007

अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे -सुजाता तेवतिया

सुजाता का यह लेख आज जनसत्‍ता में आवरण कथा के रूप में छपा और जगदीशजी ने इसकी छवि भी अपलोड की लेकिन मित्रों को इसे पढ़ने में तकलीफ हो रही थी। तारणहार बने रवि रतलामीजी और उन्‍होंने लेख को यूनीकोडित कर भेजा है। प्रकाशित लेख में इस सामग्री के अतिरिक्‍त कुछ बॉक्‍स आइटम भी हैं कितु अभी तो लीजिए पेश है मुख्‍य लेख-


अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे
पूरी एक शताब्दी पीछे चर्चित रहे बालमुकुन्द गुप्त के 'शिवशंभू के चिट्ठे' अब इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग बन कर धूम मचा रहे हैं। खड़ी बोली गद्य की भाषा का यह आरंभिक स्वरूप जितना रोचक और आत्मीय था, अंतर्जाल पर हिन्दी के चिट्ठे भी वैसे ही रोचक और आत्मीय शैली में अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए हैं। अत: इसे हिन्दी की एक नई विधा माना जाए तो अनुचित न होगा। अंतरिक्ष की भांति अनन्त साइबर स्पेस पर ये हिन्दी चिट्ठे हमेशा के लिए दर्ज हो जाने वाली डायरी की तरह हैं।
'वेबलॉग' से 'ब्लॉग' बना और ब्लॉग का हिन्दी शब्द आया 'चिट्ठा' - सर्वप्रथम आलोक जी द्वारा - जो अब लगभग मानक हो चला है। यूँ तो अंग्रेजी चिट्ठाकारी अमेरिका में 1997 से प्रचलित हो चली है लेकिन हिन्दी का यह पहला 'चिट्ठा' 2 मार्च 2003 को प्रकाश में आया। इसे वास्तविक लोकप्रियता हासिल हुई रवि रतलामी के 'अभिव्यक्ति' में छपे लेख से जिसने कई नेट-प्रयोक्ताओं को हिन्दी ब्लॉग बनाने के लिए उकसाया।
कुल जमा 10 वर्ष की ब्लॉग विधा और उसमें भी हिन्दी ब्लॉग की 4 वर्ष की आयु यद्यपि किन्हीं निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए नाकाफ़ी है तथापि यह मानने में कोई संकोच नहीं कि अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रचार करने वाली यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा है। अंतर्जाल पर हिन्दी में मिलने वाली सामग्री का सबसे बड़ा भाग ये चिट्ठे हैं जो भविष्य में कीबोर्ड लेखन की इस अद्यतन विधा के परिष्कृत और निरंतर परिवर्तित होने का संकेत देती है।
हिन्दी के इन चिट्ठों में ताज़गी है और कोई एक सामान्य विशेषता, गुण या स्वरूप न होने पर भी इनकी अनगढ़ता और बेबाकी सभी चिट्ठों में सामान्यत: मिलती है। इस चिट्ठाजगत में न विषयों का बंघन है न नियमों की कवायद। पूरी तरह से अनौपचारिक यह विधा हर एक ब्लॉगर या चिट्ठाकार को अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता देती है। यहाँ लोग जूतों से लेकर रसोई, बाथरूम और खान-पान से लेकर सुभाष चंद्र बोस, वर्ल्ड कप क्रिकेट, आरक्षण तक पर लिख सकते हैं और पाठक इन्हें पढ़ते भी हैं। किसी के लिए चिट्ठाकारी शौक है, किसी के लिए अपने मन की भड़ास निकालने का माध्यम तो किसी के लिए समय नष्ट करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यद्यपि इन चिट्ठों का व्यावसायिक पक्ष भी है और गूगल इन चिट्ठाकारों को एडसेन्स द्वारा धन कमाने के अवसर भी देता है। पर सामान्यत: इन चिट्ठाकारों में धन कमाने की उतनी चाह नहीं जितनी लिखने और खुद को पढ़वाने की चाह है।
बैठे-ठाले का चिन्तन और शौकिया लेखन इन चिट्ठों के नाम और परिचयात्मक वाक्यों में भी झलकता है जो इन्हें निराला बनाता है - जैसे फ़ुरसतिया, निठल्ला-चिन्तन, नोटपैड, कॉफ़ी हाउस, टैमपास, नुक्ताचीनी, वाद-संवाद, गप-शप, ब्लॉगिया कहीं का, खाली-पीली, ठलुआ, मटरगश्ती, मस्ती की बस्ती।
ब्लॉगिंग का माध्यम न केवल देसी हिन्दी प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है वरन् प्रवासी भारतीयों को भी बहुत लुभा रहा है। सबसे रोचक तो है कि हिन्दी चिट्ठों के शुरूआती दौर में सामने आने वाले बहुत से चिट्ठाकार विदेश में रह रहे भारतीय ही हैं जो अनायास ही हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास के साक्षी और निर्माणकर्ता भी हो गए। जितेन्द्र चौधरी, पंकज नरूला, प्रतीक, अनुनाद, रमण कौल इन्हीं आरंभिक बलॉगरों में से हैं।
यहाँ तक कि हिन्दी के तमाम चिट्ठों को संकलित करके एक स्थान पर दिखाने वाली फ़ीड एग्रीगेटर साइट नारद.अक्षरग्राम.कॉम भी इन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। नारद न केवल इन चिट्ठों की रोज़ की आवाजाही पर नज़र रखता है वरन् इन चिट्ठों की चर्चा करता है साथ ही साहित्यिक गतिविधियों, ब्लॉगज़ीन ; ब्लॉग मैगज़ीन व काव्य प्रतियागिताओं का भी संचालन समय-समय पर करता है। नियमितता और लोकप्रियता के आधार पर वह इन चिट्ठों की रेटिंग भी करता है।
चिट्ठाकारी की विधा के सभी पहलू बड़े दिलचस्प है जिसमें 'टिप्पणी' एक रोचक भूमिका निभाती है। जैसा कि बहुत से ब्लॉगर मानते हैं कि हिन्दी चिट्ठा लेखन छपास - छपने की इच्छा-पीड़ा का इलाज है उस दृष्टि से यहाँ छप कर न केवल न छपने के दर्द से मुक्ति मिलती है वरन् पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाएँ टिप्पणियों के रूप में पाकर लेखक धन्य हो जाते हैं। लेखन की किसी भी विधा और माध्यम में यह स्थिति संभव नहीं है। ये टिप्पणियाँ न केवल लेखक का उत्साहवर्धन करती है वरन् उसे निरन्तर माँजते रहने में भी कारगर साबित होती है। हालाँकि, कभी-कभी मामला 'एक दूसरे की पीठ खुजाने की तरह' टिप्पणी करने और टिप्पणी पाने वाला भी हो जाता है। ब्लॉग में टिप्पणी का महत्व बताते हुए एक जीतू का कथन है - ''टिप्पणी का बहुत महत्व है, ब्लॉग लिखने में, बकौल शुक्ला जी; रामचंद्र नहीं - अनूप शुक्ला ...बिना टिप्पणी का ब्लॉग उजड़ी माँग की तरह होता है। जिसकी जितनी टिप्पणियाँ उसके उतने सुहाग।''
एक सबसे रोचक पहलू इन चिट्ठों की भाषा और शैली है। रचनात्मकता की कई छटाएँ यहाँ देखने को मिलती है। यहाँ भाषा आभिजात्य, शुद्धता और मानक भाषा से आतंकित हुए बिना अपना स्वरूप निर्मित करती है। इस दृष्टि से ये हिन्दी चिट्ठे भाषा की नई भंगिमा लिए है। ये हिन्दी भाषा की नई प्रयोगशाला है। शब्दों की नई टकसाल हैं और टकसाल भी ऐसा जिसमें व्याकरण के नियमों की जकड़बंदी और पांडित्य का माहात्म्य नहीं है। यहाँ भाषा आम हिन्दुस्तानी की मातृभाषा है, बोलचाल की भदेस बोली है। यहाँ अंग्रेजी के हिन्दी पर्याय संस्कृत कोश में ढूँढने के बजाय खुद गढ़े जाते हैं और विद्यमान शब्दावली को इंटरनेट के अनुसार विकसित और परिष्कृत किया जा रहा है। यहाँ बात करते-करते लोग बिहारी, मैथिली, भोजपुरी, पंजाबी के शब्दों और अभिव्यक्तियों पर उतर आते हैं। चिट्ठाकार, चिट्ठाकारिता, चिट्ठा जगत, चिट्ठोन्मुक्त जैसे शब्द तो प्रचलन में है ही साथ ही आधिपत्य की तर्ज पर ब्लॉगपत्य, पोस्ट करने के लिए पोस्टियाना, टिप्पणी देने के लिए टिप्पियाना, टिप्पणी की इच्छा रखना - टिप्पेषणा आदि शब्दों का इस्तेमाल यहाँ बेरोक-टोक होता है। यहाँ कुबेरनाथ राय की पंक्तियाँ 'भाषा बहता नीर...' सही साबित होती लगती है। 'ब्लॉगित' हिन्दी जनों के 'लिंकित' मनों; एक शोध् ब्लॉग का नाम भी यह इंगित करती है कि भाषा निरन्तर प्रवाहमान है।
रोचक तथ्य यह भी है कि हिन्दी चिट्ठा जगत ने न केवल छपास पीड़ित, अनगढ़ लेखकों को आकर्षित किया है वरन् हिन्दी पत्रकारिता व मीडिया जगत से भी कई हस्तियों को लुभाया है। मोहल्ला, कस्बा, मुम्बई ब्लॉग्स ऐसे ही पत्रकारों के ब्लॉग है जो मीडिया लेखन के तयशुदा एजेंडों से मुक्त होकर स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। फ़िर भी, अंतर्जाल के हिन्दी चिट्ठाजगत में यह निरालापन है कि सुगढ़, सुविचारित और अनुभवी लेखन यहाँ स्तुत्य तो हैं लेकिन लोकप्रिय होने की शर्त नहीं है। बल्कि आम बातों के आम ब्लॉग, साधरण बातें, व्यंग्य और बहसें यहाँ अधिक लोकप्रिय हैं।
यद्यपि हिन्दी के जाने-माने ब्लॉग्स अभी लगभग 500 ही हैं जबकि अंग्रेजी के हज़ारों ब्लॉग्स हैं। फ़िर भी नित नए ब्लॉग्स हिन्दी में सामने आ रहे हैं और रोज़ाना नारद पर रजिस्टर हो रहे हैं। अत: आने वाले कुछेक वर्षों में यह चिट्ठा जगत अनंत विस्तार पाएगा, नारद विस्तार पाएगा या नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएँगे इसमें संदेह नहीं। इस लेख का भी यही उद्देश्य समझा जाए। एकमात्र जो समस्या रह जाती है वह तकनीक का है। हिन्दी के पहले चिट्ठे पर आलोक जी ने भी यही लिखा था 'नमस्ते! क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं। यदि नहीं तो यहाँ पर देंखे।' माने यह कि कीबोर्ड पर हिन्दी लेखन और अन्य तकनीकी जानकारियाँ एक बड़ी बाधा है लोकप्रियता के रास्ते में। नारद, वर्डप्रेस, ब्लॉगस्पाट, गूगल सहित कई अन्य ब्लॉगर इस संबंध में सहायता करते हैं कि 'हिन्दी कैसे लिखें'। फ़िर भी समस्या अभी व्यापक है क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखने वालों को यह नहीं पूछना पड़ता कि ''अंग्रेज़ी में कैसे लिखें?'' साथ ही यह भी कि हिन्दी चिट्ठाकारिता की दुनिया अभी काफ़ी सीमित है। हिन्दी चिट्ठा जगत से बाहर बहुत कम ब्लॉगरों की पहुँच है। अधिकांश केवल नारद पर दिख कर और टिप्पणी पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता के ऊँचे प्रतिमान छूने हैं तो अधिक व्यापक होना होगा। चार वर्षीया हिन्दी चिट्ठाकारिता इस बुलंदी को छूने के लिए आरंभिक तैयारी की अवस्था से गुजर रही है।
यद्यपि विषयों की कोई प्रतिबंध या नियमावली यहाँ नहीं है तथापि कई मुद्दों पर विविधता कम ही मिलती है। फ़ैशन, फ़िटनेस, सौन्दर्य, यात्रा, पाक कला, टेकनॉलाजी, खेल से जुड़े ब्लॉग अभी नहीं के बराबर है। लेकिन इस विकासमान विधा का स्वरूप इतना शीघ्र तय नहीं किया जा सकता। निरन्तर विविधतामय लेखन का एकमात्र रास्ता है यह।
हिन्दी चिट्ठाकारिता की विधा का स्वरूप क्या होगा? यह हिन्दी के चिट्ठाकार और आने वाला समय ही तय करेंगे और इससे पहले कि मीडिया, विश्वविद्यालय, साहित्य और आलोचना के बड़े-बड़े विद्वान इसे अपनी सुगढ़ भाषा में कोई रूपाकार देने की कोशिश करें उससे पहले ही यह तय करना होगा कि अनौपचारिक लेखन की यह चिट्ठा विधा अपने स्वरूप के मूल और मुख्य गुण यानी बेबाकी, अनगढ़ता, भदेसपने और फक्कड़पने को बनाए रखे। इसे अन्य माध्यमों से अलगाने वाला मुख्य बिन्दु भी यही है जो इन हिन्दी के चिट्ठों में सूखी मिट्टी पर पड़ी फ़ुहार से उठने वाली सोंधी गंध की सी ताज़गी का एहसास दिलाता है।

Sunday, April 15, 2007

छा....गए हिंदी चिट्ठे - जनसत्‍ता की कवरेज

बहुप्रतीक्षित कवर स्‍टोरी आज आई और छाई। सुबह से कई फोन आ चुके हैं खास तौर पर गैर चिट्ठाकार हिंदी वालों के। यही तो मकसद था।


लेख के यूनीकोड‍ीकरण के प्रयास जारी हैं। तब तक इस धुधली छवि से काम चलाएं। कोई दयानिधान साफ छवि भी अपलोड करे तो अच्‍छा रहेगा हम तो 300 किलो पिक्‍सल के वेबकैम से ले रहे हैं।

Saturday, April 14, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि - चिटठावीरता का स्‍थाई भाव : चिट्ठोत्‍साह



अरे चाचा ई...ई का कर रहे हो। हमने खचेढ़ू चाचा को खाट की अदवायन को कसते देखा तो हमारे मुँह से बरबस निकला। हमारी हालत वैसे ही हो गई थी जैसे अवैध दुकान पर सील लगते देख मोटे लाला की होती है। मुसलमान को तरक्‍की करते देख मुलायम की होती है, दलित को तरक्‍की करते देख मायावती की होती है। मतलब हर उस सही काम को देखकर उस व्‍यक्ति की होती है जिसकी दुकानदारी उस गलत की ही वजह से चल रही होती है। अब दो दो पोस्‍ट लिखकर खचेढ़ू चाचा के ढीली अदवायन का ब्रांड सेट किए थे। पहले बताया कि ढीली अदवायन जोर के आईडिया बुलाने का मूल मंत्र है। फिर बताया कि ढीली अदवायन पर रखे कंप्‍यूटर तक में चिट्ठाशास्‍त्र के सूत्र रचने की कूवत आ जाती है। अब ये हमारे चाचा उसी ढीली अदवायन को कसे जा रहे हैं... हमारी तो दुकान बढ़ा दी बैठे बैठे। हमने कहा चाचा ऐसे किसी की रोजी को कसना ठीक नहीं बताओं क्‍या बात है- हम समझा लेंगे परमोद भैया को कि कुत्‍ता गू रहने दें गाय का शुद्ध गोबर ही ठीक है आपके लैपटॉप का सहारा बनने के लिए, और कहो तो दर्जनभर उपले खरीदकर रखवा देता हूँ। वे हँसकर बोले क्‍या बच्‍चे इस गढ़ी मेंडू गॉंव में हम किसी परमोद के परभाव में नहीं आते वो तो हम आज हम उत्‍साह में थे इसलिए सोचा इस ससुरी अदवायन को हाथ लगा दें।
उत्‍साह....उत्‍साह, यही तो है चिंतामणि का अगला निबंध। अब हम भी उत्‍साह में भर गए। हमने कहा अरे अदवायन छोडि़ए लैपटॉप टिकाइए और इस उत्‍साह नाम के मनोविकार का विवेचन कीजिए इस अमर्त्‍य चिट्ठालोक की दुनिया में। यानि हे आचार्य खचेढ़ू चाचा लिखिए अपना अगला निबंध हम आपके साथ हैं। बस खचेढ़ू चाचा शुरू हो गए.. पेश है-

उत्‍साह बोले तो दिन में तीन पोस्‍ट, तेईस टिप्‍पणी (दूसरों के चिट्ठों पर), स्‍टेटकाउंटर 24 X 7 खुला। असल दुनिया में जिसे बिफरना कहते हैं चिट्ठाजगत में उसे ही उत्‍साह कहा जाता है। ओर बिफरा हुआ सांड जब गढ़ी मेंडू के यमुना खादर में हांडता है तो वह गाय ही नहीं भैंस, भैंसे, बैल ओर तो और कभी कभी दूसरे सांड पर ही सवार होने की कोशिश करता देखा गया है। इसी प्रकार उत्‍साह वह (दु)साहसपूर्ण आनन्‍द की उमंग है जिसमें एक चिटृठाकार आंखें ओर अंगुलियों की थकान, बैंडविथ और बिजली के खर्च, बीबी और बच्‍चों की नाराजगी..... कुल जमा दुनिया की हर फिकर से अविचलित रह कर बस चिट्ठाकारी करता है, वह तय मानकर चलता है कि उसकी अगली पोस्‍ट अकेले 1500 हिंट लेकर आएगी। शकुलजी (ये नहीं वो...रामचंदर सकुल) पहले ही बता गए हैं कि वीर जिसका स्‍थाई भाव उत्‍साह है वह केवल युद्ध में ही नहीं तुषार मंडित अभ्रभेदी अगम्‍य पर्वतों की चढ़ाई, ध्रुव प्रदेश या सहारा के रेगिस्‍तान का सफर, क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश इत्‍यादि भी वीरता के कर्म हैं। इनमें जिन आनन्‍दपूर्ण तत्‍परता के साथ लोग प्रवृत्‍त हुए हैं वह उत्‍साह ही है।
ध्‍यान से देखें शुक्‍लजी पहले ही बता गए हैं कि चिट्ठाकारी करना अरे वही....... 'क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश ' भी इसमें शामिल है। यहाँ जिस आनंदपूर्ण तत्‍परता से गदा भांजते हैं, संहार करते हैं, ब्‍लॉग बैन करवाते हैं, दूसरे को नीचा दिखाते हैं, जहर उगलते हैं यह कमाल की चिट्ठावीरता है और यह तत्‍परता ही चिट्ठोत्‍साह है।

Friday, April 13, 2007

टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का कर्बला क्‍यों है

टिप्‍पणी चिंतन के प्रत्‍येक पुरोधा ने बताया कि परस्‍पर पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है, एक दूसरे को बढ़ावा देना है। देखा जाए तो भला काम है। पर इसी किस्‍म का एक और काम है जो इसी तरह एक दूसरे की पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है और भला काम है पर दिक्‍कत है कि अधिक कसाले काम है और कुछ ज्‍यादा सृजनात्‍मकता की मॉंग करता है और वह है परस्‍पर लिंकन। यानि लिंक देना और लिंक लेना। वैसे विवादों से यह सधता होगा पर फिलहाल हम उस पर बात नहीं कर रहे हैं। हम तो इस सवाल पर मगजमारी कर रहे हैं कि ये टैक्‍नोराटी जो इन लिंकन-प्रतिलिंकन की चाल पर नजर रखता है उससे मूल्‍यांकन करता है वो भला इतना हिंदी विरोधी क्‍यों है। एकाध बिरले को छोड़ दें तो अधिकतर चिट्ठों के परिचय में कोयले से भरी मॉंग की तरह सजा होता है - नॉट इन टॉप 100000।


यानि हिंदी चिट्ठे चोटी के 100000 चिट्ठों में भी शुमार नहीं होते। ऐसा क्‍यों भई... कोई तो बताए।
अब उदाहरण के लिए चिटृठा चर्चा पर विचार करें जो अंतत: एक चिट्ठा ही है। एक बेहद लोकप्रिय चिट्ठा है खूब पढ़ा जाता है और खूब लिखा जाता है। अब तक 340 पोस्‍ट लिखी जा चुकी हैं। यदि टैक्‍नोराटी की ही भाषा में बात करें तो यह बहुत से हिंदी चिट्ठाकारों के ब्‍लॉग रोल में भी है। और लिंक- अब क्‍या कहें यह तो है ही लिंक (आऊटवर्ड) देने के लिए और इनवर्ड लिंक भी मिलते ही हैं। लेकिन यदि टैक्‍नोराटी जाकर झांकें तो मिलता है ये-





अब कोई टेकीज में से हमें बताए कि कैसे इतना लोकप्रिय चिट्ठा चर्चा 4 लिंक दिखा पा रहा है ( वैसे नीचे खुद ही 664 लिंक बताता है) और रैंक 10,38,416 जबकि मुझ जैसे कुनाम ब्‍लॉगर तक का रैंक डेढ़-पौने दो लाख के लपेटे में है। पर इसका मतलब ये नहीं कि टैक्‍नोराटी की जरूरत नहीं है। है और बिल्‍कुल है। हमें चाहिंए कि परस्‍पर रुचि के विषयों पर लिखें और यही नहीं वरन बाहर के लोगों की रुचि के विषयों पर ध्‍यान दें ताकि ये जो टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का करबला बना हुआ है वहाँ कुछ सुधार हो। वैसे एक मजेदार पोस्‍ट इस लिहाज से मानसजी क‍ि यह पोस्‍ट है जिसमें उन्‍होंनें हर चिट्ठे को गिना दिया है जिससे शायद सबका टैक्‍नोराटी हित सधता हो (शायद इसलिए कि मेरे लिंको की जो सूची टैक्‍नोराटी पर थी उसमें तो इसका उल्‍लेख पता नही क्‍यों नहीं था) या फिर टेक्‍नोराटी फेवरेट एकसचेंज के इस कार्यक्रम पर विचार करें।

Thursday, April 12, 2007

....क्‍योंकि याद भी एक जगह है और अरसा भी


यह आत्‍मालोचना में किया गया एकालाप है। न विवाद न मस्‍ती।


आदमजात मादा जब जन्‍म देती है तो निस्‍संग नंगे को जो उससे गर्भनाल से जुड़ा होता है, इस दुनिया से पहले जुड़ाव और जिंदा रहने की जरूरत के तहत सबसे पहले काटी जाती है उसकी नाल और फिर पहनाए जाते हैं कपड़े। ये दो क्रियाएं फिर जीवन भर चलती हैं मनुष्‍य नाल के कटने से पहले आदम त्‍वारीख की अब तक की सारी जमा पूंजी याद के रूप में पा चुका होता है और समाज के कपड़े उसे निरंतर ढकने और छिपाने के उद्योग करते रहते हैं। ये कपड़े दूसरों के लिए होना है। सभ्‍यता, शिष्‍टाचार, संस्‍कृति यहॉं तक की खुद भाषा ये कपड़े ही हैं, भाषा हमें ये तो सिखाती ही है कि क्‍या कहना है उससे ज्‍यादा वह यह सिखाने की कोशिश करती है कि कि कैसे कहना है और क्‍या नहीं कहना है। ....तो ब्‍लॉग शुरू तो किया था कि अपनी कहेंगे वो जो कहना तो बहुत चाहते हैं लेकिन कोई सुनने वाला नहीं होता इसलिए यहाँ कहेंगे जो सुने उसका भी भला जो न सुने उसका भी भला।


पर हुआ क्‍या ...वही नई दुनिया...नए कपड़े। अंग्रेजी ब्‍लॉगर मित्र से शंका से पूछा था कि ग्‍लानि नहीं होती कि छिपकर देखते हो कि कौन आया कहॉं से आया। अब खुद के ब्‍लॉग पर काउंटर है। हिट्स, टिप्‍पणियाँ और लिंक्‍स सभी तो इस दुनिया में है। लेकिन इन सब के बदस्‍तूर हम हैं क्‍योंकि वह गर्भनाल जो कटने से पहले जो मानव सभ्‍यता का अर्जित विवेक हममें आ समाया है उसे समेट कर उसमें एक बूंद अपनी ओर से जोड़कर अगली जमात को दें थमा। फ़ुरसतिया ने याद दिलाया कि कमलेश्‍वर अपनी उम्र को पूर्वज लेखकों की उम्र में इंक्रीमेंट लगाकर गिना करते थे, कितना सही करते थे।
सवाल यह है कि कमलेश्‍वर क्‍यों 5550 साल के थे और हम अगले तीस साल में हम 5580 साल के कैसे हो जाएंगे (5550 की उम्र कमलेश्‍वर दे गए हैं अगली तीस साल की लेखकीय उम्र आपकी हमारी जोड़ ली गई है :) ) इसका एक ही टूल है और वह है याद या स्‍मृति। यही वह जो गर्भनाल से बहकर हममें आ जमता है और हमें यह दाय दे जाता है कि इसमें एकाध बूंद जोड़कर आगे दे जा सकें। हर आत्‍मालोचन सत्र में कोशिश करता हूँ कि एकाध सेंकेंड उम्र जोड़ पाया इस अदीबी उम्र में कि नहीं और ईमानदार उत्‍तर 'नहीं' ही होता है, कारण और साफ दिखाई दे जाता यदि ब्‍लॉगर में भी Strike out करने की सुविधा होती क्‍योंकि इस वाक्‍य की शुरुआत ही मैं से की गई थी जिसे बाद में सुधारा गया।


खैर बिना मतलब का एकालाप लगा हो तो क्‍या करें ऊपर चेतावनी तो चेपी ही थी।


Wednesday, April 11, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि उर्फ भाव या मनोविकार

ढीली अदवायन की खाट में यूँ तो कई दिक्‍कतें हैं, मसलन वो आवाज ज्‍यादा करती है, कम आरामदेह होती है...और भी दिक्‍कतें हैं लेकिन सबसे बड़ी दिक्‍कत ये है कि उस पर लैपटॉप ठीक से सीधा रखना मुश्किल होता है। ससुर फिसलकर इस केंन्‍द्र की ओर आ जाता है जो खचेढ़ू चाचा के पैरों पर आ विराजता है। खैर खचेढ़ू चाचा ने इसका सहज सा इलाज ये निकाला है कि गाय के गोबर के एक उपले का मोटा सा टुकड़ा तोड़ा और उसे लैपटॉप के नीचे खोंस दिया हो गया संतुलन कायम। यूँ ये कोई नई तकनीक ई नहीं है ना ही इसका पेटेंट खचेढ़ू चाचा के पास है, धरा पर जब जब भी असंतुलन व्‍यापा है और संतुलन की हानि हुई किसी सूखे गोबर के टुकड़े ने खुद को आधार बनाया है। कभी इस गोबर के टुकड़े को प्रधानमंत्री बनना पड़ा कभी कोई और लैपटॉप संभालना पड़ा, पर ये खचेढ़ू जुगाड़ बार बार इस्‍तेमाल हुआ है। खैर जब हमने खचेढ़ू चाचा को बताया कि चाचा ऊ प्रमोद भैया गाय के गोबर की जगह कुत्‍ता गू के इस्‍तेमाल की बात कर रहे हैं...खचेढ़ू चाचा ने एक भद्दी सी गाली सारे कम्‍यूनिस्‍टों के नाम उगली और 'तेरे ब्‍लॉग पर बेनाम टिप्‍पणीकार दस्‍त करें' की बददुआ दी।

खैर गोबर अवलंबित लेपटॉप पर खचेढ़ू चाचा ने जो लिखा वह चिट्ठाकारी के आचार्य शुक्‍ल को लिखना चाहिए था पर यहॉं तो एक्‍के शकुलजी हैं जो चमरौंधे में ही सर खपा रहे हैं वैसे कविता क्‍या है कि रचना उन्‍होंने की थी पर फिर शेष चिंतामणि की ओर उन्‍हांनें रूचि न दिखाई। इसलिए आचार्य खचेढ़ू चाचा को यह काम करना पड़ रहा है। काम है 'भाव या मनोविकार' का चिट्ठा संस्‍करण हॉं तो पेश है-

भाव बोले तो रेट। और भाव आजकल आसमान पर हैं। पहले एक रुपए के बीस उपले आते थे अब भाव पॉंच रुपए के दस है। पहले टटपूंजी कविता पर पॉंच टिप्‍पणी मिल जाती थीं, अब बिना कत्‍लोगारत किए कुत्‍ता भी नहीं झांकता। वैसे एक दूसरा भाव भी होता है सुख का दु:ख का। पर वे असल दुनिया में होता है, इस यानि चिट्ठाकारी में कोई सुख का भाव नहीं होता सिर्फ दु:ख होता है और उसके भिन्‍न भिन्‍न संस्‍करण होते हैं। दु:ख में ब्‍लॉगिंग सब करैं सुख में करै न कोय। दु:ख का भाव भी कई कई परेशानियॉं लिए हुए है- हिट न होने का दु:ख, टिप्‍पणी न होने का दुख, दूसरे के यहॉं टिप्‍पणी होने का दुख ये दुख वो दुख। ये चिट्ठालोक तो दुख का ही दूसरा नाम है। हॉं इतना जरूर है कि ये दुख भाव संश्लिष्‍ट होकर नाना रूपों में अभिव्‍यक्‍त होता है। ये क्रोध बन सकता है, अगर आपने जीजान से कुछ लिखा और आपके 'मैं हूँ' भाव को ( ले देकर ये ही तो एक पूंजी है ब्‍लॉगर की) किसी ने तरजीह न दी तो आपकी अंगुलिया फड़क उठती है, मॉनीटर से चिंगारियॉं निकलने लगती हैं, प्रोसेसर से धुंआ आप मैं तुझे डस लूंगा या मिट्टी में मिला दूंगा कि तर्ज पर फुंफकारने लगते हैं। या ये दुख जब बढ़ जाए तो ईर्ष्‍या, घृणा, आदि रूपों में भी व्‍यक्‍त हो सकता है। अत: हम कह सकते हें कि चिट्ठा सुख दुख की मूल अनुभूति ही विषय भेद के अनुसार प्रेम, हास, उत्‍साह, आश्‍चर्य, करुणा, घृणा आदि मनोविकारों का जटिल रूप धारण करती है।

Sunday, April 08, 2007

....लोग भूल गए हैं

आज यानि 8 अपैल 2007 को जनसत्‍ता में ओम थानवी का एक संस्‍मरणात्‍मक लेख 'लोग भूल गए हैं' प्रकाशित हुआ है। विश्‍वकप से पहले गयाना देश की उनकी यात्रा के संस्‍मरण हैं, यदि यह अखबार उपलब्‍ध हो तो जरूर पढि़ए। लेख बड़ी तल्‍लीनता से उन्‍नीसवीं सदी में भारत से गए गिरमिटियों की जिंदगी पर नजर डालता है ओर इस बहाने ओम थानवी कुछ इन सवालों को खड़ा करते हैं-


क्‍या मैं उनके बर्ताव में भारतीयता खोज रहा हूँ ? भारतवंशियों को पराई जमीन पर किस चीज ने बांधे रखा ? कोई गयानी या सूरीनामी रहते हुए भी भारतीय हो सकता है ? चंद भारतीय मूल्‍यों का संवाहक। भारतीय मूल्‍य क्‍या हैं ? राष्‍ट्रीयता का जीवन मुल्‍यों से क्‍या संबंध है ? अमेरिका, कनाडा,अफ्रीका, यूरोप में बस गए भारतीय वहॉं के जीवन मुल्‍यों से ज्‍यादा जुड़ाव महसूस करते हैं या भारतीय संस्‍कृति से ?
जाहिर है जिन सवालों को ओम थानवी पूछ रहे हैं वे केवल उन्‍नीसवीं सदी के गिरमिटियों के सवाल नहीं हैं आज के प्रवासियों के भी सवाल हैं- जितेंद्र के, समीर के , सुनील दीपक, राकेश खंडेलवाल, पंकज और उन तमाम भारतीयों के भी जिन्‍होंनें अभी हिंदी चिट्ठाकारी को नहीं अपनाया है। मेरा सलाम इन सब को जो सात समन्‍दर दूर भारत रच रहे हैं।


डर्बन पहुँचे भारतीय मजदूरों का एक जत्‍था

Friday, April 06, 2007

हिंदी चिट्ठाकारी का अगला युग

इधर हिंदी चिट्ठाजगत में कुछ वैसा हो रहा है जैसा कि छायावाद के समय हिंदी साहित्‍य में हुआ, यानि अस्तित्‍व के सवाल से मुक्‍त होकर भविष्‍य के लिए निर्द्वंद्व रचनाधर्मिता शुरू हुई। द्विवेदीयुग वाली यह चिंता कि पता नहीं हिंदी (खड़ी बोली) रहेगी कि नहीं, रहेगी तो क्‍या स्‍वरूप रहेगा। इस तरह के सवाल अक्‍सर द्विवेदी युगीन कर्णधारों को दुखी करते थे पर छायावाद जो इन चिंताओं से तैयार जमीन पर ही खड़ा था पर इनसे अप्रभावित व अकुंठ था। उसने भाषा और संवेदना दोनों ही स्‍तर पर स्‍वतंत्रता का परिचय दिया। अब समकालीन हिंदी चिट्ठाकारिता पर सोचें- वह अपना एक निश्चित रूप ग्रहण करती चल रही है और नए चिट्ठाकार इस आशंका से ग्रस्‍त नहीं है कि कल हम हों न हों..। वे पहली दूसरी पोस्‍ट से ही विवादों में हाथ डालते हैं, जमे अधजमे लोगों पर अकुंठ टिप्‍पणी करते हैं, व्‍यंग्‍य करते हैं, पंगा लेते हैं, सवाल उठाते हैं, सफाई माँगते हैं। अच्‍छे संबंध से उन्‍‍हें गुरेज नहीं पर वे इसके लिए वे अतिरिक्‍त प्रयास करते नहीं दिखाई देते न ही उन्‍हें धमकी या धमकावलियों से कोई खास चिंता नहीं होती भाषा के स्‍तर पर भी वे अकुंठ हैं- जूते, जूतियाते हैं, चूतियापा करते हैं, गदा चलाते हैं, पीठ खुजाने, खुजवाने स्‍तर की दैहिकता भी आ ही गई है। कर्णधार भी अब अपना ऐतिहासिक महत्‍व स्‍वीकारते हुए इतिहास वर्णन की ओर अग्रसर हुए हैं। मतलब साफ है कि यदि संकेतों की ओर ऑंखें मूंदने के स्‍थान पर उन पर विचार किया जाए तो कुछ सवाल दिखाई दे रहे हैं -

1- क्‍या हिदीं चिट्ठाकारिता में युग परिवर्तन का समय आ गया है ?
2- नए युग की नई चुनौतियाँ क्‍या हैं ? पुराने चिट्ठाकारों ओर स्‍थापित संरचनाओं के लिए बदलाव से कौन सी नई चुनौतियाँ हाजिर हुई हैं?
3- और सबसे महत्‍वपूर्ण सवाल यह है कि क्‍या हम इस नए बदलाव के लिए तैयार हैं- प्रौद्योगिकीय रूप से, भाषिक रूप से और चिट्ठासमाज की दृष्टि से?

ऊपर के पहले सवाल का जबाव इतना कठिन नहीं, बदलाव के चिह्न इतने स्‍पष्‍ट हैं कि
उनकी अवहेलना करना आसान नहीं। मसलन पिछले सप्‍ताह ही मुक्‍तक समारोह को इसलिए
स्‍थगित करना पड़ा कि सामग्री कि इस अधिकता के लिए हमारा नारद तैयार नहीं था, यूँ
भी रोज पचासेक नई पोस्‍ट के लिहाज से पहले पृष्‍ट पर बना रहना एक संघर्ष हो गया है,
जनसंख्‍या तेजी से बढ़ रही है जाहिर है अहं के टकराव भी बढ़ रहे हैं। बदलाव केवल
संख्‍या का ही नहीं है विषय भी बदले हैं, विवादमूलक विषय से परहेज समाप्‍त हुआ है।

अगर पुराने चिट्ठों के पुरालेख खंगाले जाएं तो हमें विवादों को लेकर अलग दृष्टि दिखाई देती है, अब विवाद श्रृंखलाबद्ध होते जा रहे हैं तथा एक ऐसेट की तरह देखे जाते हैं। विवादों को छोड़ भी दें तो भी राजनैतिक या अन्‍य विषयों पर तीखी
चिट्ठाकारी खूब दिख रही है। अभी भी महत्‍व तो व्‍यंग्‍य विधा का खूब बना हुआ है पर इसके विषयों में भी वैविध्‍य आ रहा है। शिल्‍प के स्‍तर पर बदलावों की आहट तो और भी स्‍पष्‍ट है- आडियो, वीडियो का पठ्य से योग बढ़ रहा है जो चिट्ठाकारिता की प्रकृति पर अपनी छाप छोड़ने के लिए आतुर है।

मुक्‍तक समारोह का स्‍थगन वह पहली चुनौती है जो नए युग की चिट्ठाकारिता के सामने आई है। यूँ भी कविता अब चिट्ठाकारिता की अहम विधा नहीं रह गई है। हमारे संसाधनों की सीमितता नारद के सामने हैव्‍स और हैव नॉट्स के सृजित हो जाने की चुनौती पेश कर रही है। पहले रेटिंग की जरूरत नहीं थी पर अब उसके बिना काम नहीं चल पा रहा, शायद अभी लेवल आदि के आधार पर कई सारे (उप)मुखपृष्‍ठ बनाकर इस समस्‍या को कुछ दिन तक सुलझाया जा सकता है यानि कविताओं का नारद, आपबीती का नारद, व्‍यंग्‍य का नारद और समाचार का नारद आदि पर अंतत: नारद को इस विशाल आकार के आगे संपादकीय भूमिका में आना पड़ेगा और यकीन जानिए वही घटना प्रीफेस टू लिरीकल बैलेड्स या पल्‍लव की भूमिका बनेगी या कहें युगांतरकारी होगी।
संपादकीय विवेक के आने का मतलब होगा कुछ पोस्‍टों को अन्‍यों की तुलना में चुनना वैसे मुझे लगता है कि इस स्थिति के लिए अनुमानत: 1000 चिट्ठों की जरूरत होगी लेकिन 1 से 500 में जितना समय लगा है 500 से 1000 में शायद उसका 10% ही लगेगा यानि से आसन्‍न स्थिति है दूरस्‍‍थ नहीं। चुनौतियॉं केवल स्‍थापित संरचनाओं यानि नारद, परिचर्चा आदि के ही सामने नहीं पुराने चिट्ठाकारों के भी सामने हैं- अब हर नए चिट्ठाकार के पास पहुँच उसे शाबासी के लिए पहुँचना संभव नहीं रह पाएगा उलटे संपादकीय विवेक की कैंची (जो कम से कम शुरूआती दिनों में इन पुराने चिट्ठाकारों के हाथ में ही रहने वाली है) से घाव करने पड़ेंगे। दूसरा प्रभाव विवाद शमन भूमिका पर पड़ने वाला है। नए चिट्ठाकार जिन्‍हें विवाद सफलता की सीढ़ी दिखते हैं उन्‍हें सलाहें नागवार गुजरेंगीं और एकाध बार अंगुलियाँ जलाने के बाद वरिष्‍ठ अंगुलिया विवादों के ताप से दूर रहने लगेंगी यूँ भी संपादकीय गमों से कम ही अवकाश होगा इनके पास।

अब सवाल रहा तैयारी का, संभव है अपरिवक्‍व सोच हो मेरी पर मुझे लगता है कि हम उतना तैयार नहीं हैं। तैयारी की अकेली कवायद जो मुझे दिखी वह है नए लोगों को जोड़ने की कोशिश- श्रीश सवर्ज्ञ देख रहें हैं कुछ नए चर्चाकार भी जुड़े हैं पर माफ कीजिए जब ‘ज्ञान’ की आँधी आएगी तो ये प्रयास मोह के तंबू के समान सिद्ध होंगे।
पहली आशंका तो यह है कि चिट्ठाकारी में मात्रात्‍मक विस्‍फोट होगा शनै: शनै: होने वाला बदलाव नहीं होगा। उदाहरण के लिए हिंदी प्रचार के एक छोटे से समूह से मैं जुड़ा हूँ और हमारी पहलकदमी से अगले सत्र में यानि अगस्‍त में दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के रचनात्‍मक लेखन, हिंदी कंप्‍यूटिंग और हिंदी पत्रकारिता के विद्यार्थियों के लिए उनके कॉलेज में ही
कार्यशालाएं लगाकर हिदी ब्‍लॉग बनवाने की योजना है यानि एक-दो सप्‍ताह में 150-200 नए हिंदी ब्‍लॉग।

दूसरी ओर जरा एक अप्रैल वाले मजाक में छिपे खतरे पर विचार करें, उस पोस्‍ट की टिप्‍पणियों में ओर खुद पोस्‍ट में ही निहित है कि हम खतरे को महसूस करते हैं जब कोई साधन संपन्‍न यहाँ कब्‍जे की नीयत से आएगा तो हम अपना लाव लश्‍कर संभालेंगे तब तो लड़ लिए। मुझे लगता है कि हम अपनी नारद की अव्‍यवसायिकता के प्रण में थोड़ी लोच लानी चाहिए और नारद खुद ना सही पर एक मातहत
कंपनी लांच कर संसाधनों को जुटाना शुरू कर सकता है, अंतत: चिट्ठाकारी बाजार में घट रही परिघटना है। ‘सरस्‍वती’ की भूमिका से उसे निकल आना चाहिए और कुछ कुछ ‘हँस’ की भूमिका में आना चाहिए। ये विचार बेहद कच्‍चे और अस्‍वीकार्य हो सकते हैं पर कम से कम इतना तो रेखंकित करते ही हैं कि इन्‍हें खारिज कर इनके स्‍थान पर इनसे बेहतर विचार रखने की जरूरत है।

Monday, April 02, 2007

प्रत्‍यक्षा की रसोई और कालिखजीवी की कुरूपता

पिछले कुछ अरसे में कई हार्ड डिस्‍क क्रैश हुईं, विन्‍डोज बदलीं, रीइंस्‍टाल की, कंप्‍यूटर अपग्रेड किया, ओपेरा व एक्‍सप्‍लोरर के बीच दोलन किया, और इन सब बदलावों के बीच बहुत सा डाटा पाया-खोया पर अगर नहीं बदला तो हमारे बुकमार्क या फेवरेट की सूची के दो नाम एक लाल्‍टू और दूसरा प्रत्‍यक्षा। दोनों का ही लेखन ताजगी भरा है हालांकि खुद मेरी ही तरह यह अनियमित किस्‍म का लेखन है! लाल्‍टू घोषित तौर पर बदलाव का लेखन करते हैं प्रत्‍यक्षा ऐसी किसी घोषणा के पचड़े तक मे नही पड़तीं, एकाध बार उनके अतीतमोह आदि पर हमने टिप्‍पणी की भी है पर कुल मिलाकर ईमानदारी वह चीज है उनकी चिट्ठाकारी की विशेषता है। यह भूमिका इसलिए कि मेरे शायद अतिउत्‍साह के कारण हाल की एक चिट्ठाई हिलोर के चपेटे में वे आ गईं।
यह अति उत्‍साह उपजा दो पोस्‍टों से। एक तो मनीषा ने सुंदरता के कीड़े का विमर्श मोहल्‍ले मे प्रस्‍तुत किया दूसरा नोटपैड ने अपने चिट्ठे पर रसोई की शोषणमंडनकारी संरचना पर विचार प्रस्‍तुत किए। बाद में एक प्रतिक्रियात्‍मक पोस्‍ट निर्मलआनंद पर अभय ने प्रस्‍तुत की। थोड़ा बहुत टिप्‍पणी द्वंद्व दोनों जगह पर हुआ मुझे अपने पक्ष के लिए बाकायदा कालिखजीवी घोषित किया और इस टिप्‍पणी को अभय ने निर्मल आनंदमयता के साथ इस जगह रहने दिया। खैर ये सब आश्‍चर्यजनक नहीं और मेरा ऐसा मानने का कोई कारण नहीं कि सृजनशिल्‍पी ऐसा कर करा रहे होंगे पर विचार और व्‍यक्तिगत की रेखा को लुप्‍त करने जो जिद उन्‍होंने पाली, विचार के स्‍थान पर व्‍यक्तिगत के संवाद का केंद्र बनने का कारण वही है और यह आचार संहिंताओं से नहीं थमता, अब लीजिए यहाँ तो आचार संहिता के वकील ही ऐसा करने पर उतारू हैं।

अस्‍तु, वास्‍तविक जगत में भी जब भी मैने सुंदरता और रसोई को गैर बराबरी की संरचनाओं के रूप में देखे जाने के पक्ष में कहा है, उसे अतिवादी या उपहास योग्‍य ही माना गया है। विश्‍वविद्यालय में ‘कुरूपता के इतिहास’ का गुमटी-विमर्श पेटेंट मेरे नाम माना जाता है। हमें सदैव दिखाई दिया है कि जैसे जैसे शोषण संश्लिष्‍ट होता जाता है उसका स्‍वरूप सूक्ष्‍म होता जाता है और उसका स्‍थायित्‍व बढ़ता जाता है और
परिणति इस बात में होती है कि शोषण्‍कारी व्‍यवस्‍था इतनी संस्‍थाईकृत हो जाती है कि पीडित इसमें गौरवान्वित महसूस करना आरंभ करता है।

सौदर्य पर विचार करें। मेरी पत्‍नी कॉलेज शिक्षिका बनने से पहले दिल्‍ली एक बहुत प्रतिष्ठित स्‍कूल में शिक्षिका थीं जो एयरफोर्स वाईव्‍स ऐसोसिएशन द्वारा संचालित था और उसके कार्यक्रमों में हैरानी होती थी कि इन अधिकारियों की पत्नियाँ‍ लगभग सदैव इतनी ‘सुंदर’ क्‍यों होती हैं फिर अनुभव ने बताया कि IAS, IPS ही नहीं वरन हर किस्‍म के सामर्थ्‍यवान के पहलू में सुंदर बसता है, मनीषा ने इसकी और व्‍याख्‍या और उदाहरण पेश किए हैं कारण समझने के लिए किसी जहीनता की जरूरत नहीं है, शक्तिशाली चुनने की स्थिति में होता है और वह ‘सुंदर’ को चुनता है इस बात को पुनर्बलित करते हुए कि सौंदर्य स्‍त्रीत्‍व का वह गुण है जो जिसका मूल्‍य काफी ऊंचा है। यह समाजीकरण होते होते समाज का स्‍थाई मूल्‍य बन गया है। इसीलिए सामान्‍यत ऐसे कहा जाता सुनाई देता है कि सुंदर दिखने की इच्‍छा तो स्‍वाभाविक है। अब यूँ तो समाज महिलाओं को सत्‍ता पाने ही कितनी देता है पर जो कुछ उसके हिस्‍से में आता है उसका उनमें वितरण जिन आधारों पर होता है उनमें सबसे प्रमुख है सौंदर्य। जो लोग सौंदर्य के कथित बाहरी और आंतरिक होने की डाक्ट्रिन को प्रतिपादित करते हैं वे इस सत्‍ता संरचना का अतिक्रमण नहीं कर रहे होते वरन उलटे इसे और संश्लिष्‍ट बना रहे होते हैं, और सूक्ष्‍म और स्‍थाई।

दूसरी अपेक्षाकृत अधिक मूर्त संरचना वह है जिसका उल्‍लेख नोटपैड ने किया- यानि रसोई। पर पहले बेनाम शिल्‍पी महोदय समझें और फिर से अपने डाटा पर नजर डालें नोटपैड मेरी पत्‍नी नहीं हैं और न ही उनके अंतरजालीय व्‍यवहार पर मैं नजर गड़ाए रहता हूँ, वे जब स्‍कूली बच्‍ची थीं तब से उनसे इस और इस तरह के अन्‍य विषयों पर चर्चा होती रही है और अब इस विषय पर शोध करने के बाद हमसे कहीं अधिक समझ चुकने के बाद हमें सीधे-टेढ़े रास्‍ते से समझा देती हैं।
अस्‍तु, रसोई कार्य विभाजन का एकदम मूर्त ढांचा है, जिस प्रकार बृहत स्‍तर पर सत्‍ता का वितरण सौदर्य के आधार पर होता रहा है उसी प्रकार एक परिवार में यह सत्‍ता समेटकर रसोई तक सीमित हो जाती है इसीलिए जब एक से अधिक महिलाएं एक घर में हों तो उनका समस्‍त संघर्ष रसोई पर अधिकार को लेकर होता है और जिन परिवारिक मूल्‍यों को कई मित्र इतना पवित्र मानते हैं, उनमें भी रसोई का बंटवारा ही घर का बंटवारा माना जाता है। पहले वर्णित संश्‍लेषण और सूक्ष्‍मीकरण की प्रक्रिया से गुजरकर इसके साथ जोड़े जाते हैं संतुष्टि और गरिमा के मूल्‍य। अभय को इसमें कोई महक, सृजनशीलता...आदि दीखती है तो इसमें उन्‍हें दोष नहीं दिया जा सकता क्‍योंकि इस संरचना में विद्यमान शोषण के स्‍थायित्‍व का स्रोत यही आत्‍मसातीकरण ही तो है। फिर भी प्रत्‍यक्षा को जब यह रचनात्‍मकता की कसौटी दिखाई पड़ता है तो त्रासद तो है ही। इतना कहने के बाद भी व्‍यक्तिगत तौर पर मुझे प्रत्‍यक्षा के इस तर्क की सराहना करनी पड़ेगी कि एक पुरुष किसी स्‍त्री पसंद को शोषण की किस्‍म बताए यह (मेल शोवेनिज्‍म़) अनुचित है ठीक शायद वैसे ही जैसे सुनील दीपक की एक पोस्‍ट में बुरके को अन्‍यों द्वारा शोषण का प्रतीक बताते हुए उन्‍हें हटाने पर विवश करने को अनुचित मानने का संकेत किया गया था। रसोई हो सकता है आपको शोषण संरचना न लगती हो पर रचनात्‍मकता, गंध, संतुष्टि, गरिमा, स्‍त्रीत्‍व जैसे वायवीय तर्क मत दीजिए । और हाँ- संतोष ने पूरी बनाई, अभय ने सब्‍जी गर्म की या मसिजीवी ने सालन छौंका इनकी वर्णनयोग्‍यता ही यह तय कर देती है ये इस संरचना का अतिक्रमण नहीं, केवल पुष्टिकरण है।

Monday, March 26, 2007

विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन 2007 : छा जाओ चिट्ठाकारो

एक मित्र मिले, पत्रकार हैं हमारे अनुजवत् हैं उन्‍होंने हमें सूचना दी कि अगला विश्‍व हिंदी सम्‍मेलन न्‍यूयार्क में 13-15 जुलाई को हो रहा है और वे सरकारी प्रतिनिधि की हैसियत से उसमें भागीदारी करेंगे। सम्‍मेलन भारतीय विद्या भवन और अन्‍य कई संस्‍थाओं के सहयोग से विदेश मंत्रालय कराता है और जुगाड़-सेटिंग वगैरह वगैरह की सारी कलाबाजियॉं इसमें होती है और हम पहले से भी इससे खासे वाकिफ़ हैं लेकिन अभी इतने सिनीकल नहीं हो पाएं हैं कि कोई आशा ही न रखें।
तो भैया लोग हम तो इसे हिंदी चिट्ठाकारी के लिए सही मौके की तरह देख रहे हैं।
अमरीका और कनाडा के वे चिट्ठाकार जो 13-15 जुलाई के बीच 27वीं स्‍ट्रीट 7वाँ ऐवेन्‍यू न्‍यू यार्क पहुचने की जहमत और खर्चा उठा सकते हों (या सरकारी खर्चे का जुगाड़ कर सकते हों) कृपया करें। और जोर शोर से हिंदी चिट्ठाकारी की बात वहाँ उठाएं। हमने पिछले दिनों एक नेशनल कांफ्रेंस में हिंदी चिट्ठाकारी पर परचा पढ़ा था इसलिए काफी सामग्री इसके सिद्धांत, पहचान और भाषा वगैरह पर तैयार है और भी परिश्रम कर आपके मतलब की सामग्री आपको देने के लिए तैयार हैं। इन मित्र को तो हम खैर पूरी तरह तैयार करके भेजेंगे ही। जितने हो सकें चिट्ठाकार वहाँ रहें और संभव हो तो एकाध सत्र या परचा इस विषय पर जुटा लें, हिंदी चिट्ठाकारी के लिए अच्‍छा रहेगा। और भी योजनाएं बनाई जा सकती हैं।पत्रकार-चिट्ठाकार भी काफी सहयोग कर सकते हैं।तो अविनाश, मिर्ची सेठ, समीर भाई और अन्‍य चिट्ठाकारो गाड़ दो झंडे....