Tuesday, April 24, 2007

सागर अविनाश से नाराज हैं.....मसिजीवी क्‍या करे

नीलिमा को अपने शोध के विचार बॉंटने थे इसलिए उन्‍होंने घोषणा की, कि चिट्ठाजगत में शॉंति की आहट सुनाई दे रही है पर हमें मालूम है कि उन्‍हें मालूम है कि सब शॉंत नहीं है। वे दिखावा कर रही हैं कि सब शॉंत है और हम दिखावा कर रहे हैं कि हमें भी विश्‍वास है कि सब शाँत है। थोड़े थोड़े संकेत पाने के लिए नीचे के चित्र को देखिए-




ये बोल्‍ड अक्षरों में नारद प्रतिदावा क्‍यों ?



यूँ तो सामान्‍य सा विधिक रिवाज है पर यहॉं कुछ ज्‍यादा मुखर है। वैसे सृजन बेहतर जानें कि इस विधिक दावे की वैधता पर उनका यकीन कितना है पर अपने लिए तो ये संकेत भर है कि सब उतना ठीक नहीं।
ऐसे में अपने दिमाग में खलबली मच जाती है- अपन किसी के अग्निशमन दस्‍ते में नहीं हैं....कुछ को तो लगता होगा कि आग बुझाऊ.... छोड़ो जनाब आग लगाऊ हैं आप। हमें कोई सफाई नहीं देनी पर इतना जरूर लगता है कि इस सारे अविनाश-हिंदूबाजी-हिंदू विरोधी मसले पर अपनी एक निश्चित राय रही और उसके ही मद्देनजर हम वे कहते रहे जो हमने कहा और वह मौन भी जो हमने जहॉं भी धारण किया वह भी हमारा स्‍टैंड ही था। हम समीरजी की तरह अजातशत्रु नहीं हैं न ही हो सकते हैं। यह सब क्‍यों कहना पड़ रहा है- इसलिए कि हमें संकेत दिया गया कि अविनाश के माफीनामे वाली पोस्‍ट और उनपर बैन लगवा पाने में ‘असफलता’ में उन लोगों के नैतिक समर्थन का भी हाथ है जिन्‍होंने बैन विरोधी रवैया अपनाया। अब ये तो स्‍वीकार करना ही होगा कि हाँ हम बैन विरोधी रहे हैं, हैं।
तो बताया गया कि कुछ लोग इस असफलता से बेहद दु:खी हैं और.... जो तटस्‍थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। तो हम अपराधी भले ही हों तटस्‍थ कतई नहीं है। ये भी कहा गया कि नारद छोड़ने का मन कई लोग बना चुके हैं- ये निसंदेह अफसोसजनक है पर देर सवेर ऐसा होना तो है ही। इतने अधिक सोचने समझने लिखने वाले लोग एक साथ रहेंगे तो टकराव होंगे ही और इनकी अभिव्‍यक्ति इसी रूप में होनी तार्किक जान पड़ती है। इस सब के वावजूद.....हमें लगता है न केवल बहिष्‍कार, बैन वरन संन्‍यास, तुम्‍हारी ओर झांकूंगा भी नहीं, टिप्‍पणी नहीं करूंगा, नारद से ही चला जाऊंगा.. ये सब चिट्ठाकारी की परिघटनाएं नहीं होनी चाहिए। और अगर नाराजगी है भी तो ऐसे नाराज होऔ कि कल को फिर दोस्‍ती हो तो शर्मिंदगी न हो।
अब सवाल यह कि इस सारे मसले में मसिजीवी कहाँ हैं। ये जो चिट्ठाजगत के कितने पाकिस्‍तान खड़ा हुए उसमें उनका टोबा टेक सिंह कहाँ है। तो जबाव है कि अदीब को टीस भर मिलतीं हैं....बिन सागर चंद नाहर के चिट्ठाकारी का इतिहास वो नहीं रह जाता है जो उसे होना चाहिए... पर अविनाश को जबरिया धकेल बाहर करने की कोशिश तक से भी चिट्ठाकारी, चिट्ठाकारी नहीं रह जाती। अविनाश बहस चाहते हैं किंतु जिस अंदाज में वे ऐसा कर रहे थे वह आपत्तिजनक था जवाब भी बहुत संयत नहीं थे पर मित्रो चिट्ठाकारी का हनीमून पीरियड खत्‍म हो चुका है इसलिए टकराहट तो होगी ही, हिट्स के लिए होगी, नारद पर नियंत्रण के लिए होगी, गुटों के लिए होगी, अहम के लिए होगी। इसलिए हम किसी को नहीं मना रहे पर बस इतना कह रहे हैं कि जैसे औरंगजेब की ज्‍यादतियॉं एक शंहशाह की हकूमत की तरकीबें थीं न कि इस्‍लाम बनाम हिंदू। उसी तरह यहॉं की लड़ाइयॉं केवल ज्‍यादा जमीन घेरने की कवायद हैं उन्‍हें हिंदू विरोधी-हिंदू समर्थन की तरह न देखो- बाकी लड़ो भरसक लड़ो- पर वापसी का रास्‍ता खुला रखो। बाकी रहा नारद का प्रतिदावा- क्‍या फर्क पड़ता है, अगर नारद सिर्फ ऐग्रीगेटर है तो मोहल्‍ला पर अविनाश ही कौन खुद लिखते हैं वे भी एक प्रतिदावा कापी पेस्‍ट कर चेप देंगे मोहल्‍ले पर- लेखक खुद जिम्‍मेदार हैं हमें कुछ नहीं पता।

Monday, April 23, 2007

सावधान..... दैनिक हिंदुस्‍तान में सुधीश पचौरीजी की नजर हिंदी ब्‍लॉ्गिंग पर

हमें आशंका तो पहले ही थी। दर्ज भी कर चुके थे। और यह देर सवेर होना भी था। हुआ क्‍या....। बड़े समीक्षकों की नजर ब्‍लॉग की दुनिया पर पड़ गई है। कल के दैनिक हिंदुस्‍तान में प्रो. सुधीश पचौरी ने हिंदी के कुछ ब्‍लॉग लेखकों पर नजर डाली है। आप भी एक नजर डाल लें।



वैसे ये भी एक मोहल्‍ला विवाद ही है। पर अविनाश का मोहल्‍ला नहीं, सराए वालो का साईबर मोहल्‍ला जिसमें दिल्‍ली के वंचित वर्ग के बच्‍चों के ब्‍लॉग लिखने की एक परियोजना साईबर मो‍हल्‍ला नाम से चलाई जाती है। जिनमें से कुछ चयनित सामग्री का प्रकाशन पुस्‍तकाकार में किया जा रहा है। जिसकी समीक्षा स्‍वरूप यह लेख लिखा गया है। यूँ यह मुख्‍यधारा चिट्ठाकारी पर आधारित नहीं है पर दिशा इधर ही है। वैसे स्‍वागत किया जाना चाहिए या पता नहीं.....। सावधान ब्‍लॉगर समुदाय....बड़े समीक्षकों की नजर अच्‍छा शकुन ही हो यह जरूरी नहीं।

पूरा लेख इस नीचे की छवि पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।


Saturday, April 21, 2007

तू तक, तू तक, तू तिया....अई जमाल होए

जब कॉलेज में पढ़ते थे तो यह एक लोकप्रिय पंजाबी गीत था..तू तक, तू तक, तू तिया....अई जमाल होए। मुझे नहीं मालूम था आज भी नहीं मालूम कि इसका कोई अर्थ है कि नहीं। मुझे यह जोश में गाई निरर्थक ध्‍वनि ही लगता था। अब क्‍यों याद आई...जमाल से और इस निरर्थकता से।
पहले पूरी पृष्‍ठभूमि संक्षेप में। मनीषा ने नया ज्ञानोदय के फरवरी अंक में एक लेख लिखा इंटरनेट पर हिंदी साहित्‍य, कोई पातालफोड़ लेख नहीं है जैसा हम लोग प्रिंट की पत्रिकाओं में लिखते हें परिचयात्‍मक सा ठीक ठाक लेख है। अगले अंक में इस पर प्रतिक्रिया में श्रीमान हसन जमाल ने जो शेष नाम की पत्रिका चलाते हैं इसकी प्रतिक्रिया में बेहद भड़काउ अंदाज में कुछ कुछ मोहल्‍ले नुमा प्रतिक्रिया लिखी- अर्थ पकड़ना तो आसान नहीं पर कुल मिलाकर यह कि भरे पेट के लोगों की बिन रोटी वालों को केक खाने की सलाह है इंटरनेट पर साहित्‍य की बात। और ये भी कि पूरी नस्‍ल बरबाद कर रहा है कंप्‍यूटर और इंटरनेट....क्‍या क्‍या गिनाएं खुद अनूमान लगा लीजिए।
हम तो विश्‍वविद्यालयी हिंदीबाजों में ऐसे तर्कों से भाल रोज ही फोड़ते हैं। अब अप्रैल के अंक में हसन जमाल साहब की प्रतिक्रिया से असहमति बताते हुए तीन प्रतिक्रियाएं प्रकाशित हुई हैं- एक तो अपने रवि रतलामी जी ने संयत और मैं तो कहूँगा कि कुछ ज्‍यादा ही नरम शब्‍दों में हसन साहब को समझाने की कोशिश की है कि भाई पहले जानो समझो फिर बात कहो। बाकी दो टिप्‍पणियाँ पुणे की दीप्ति गुप्‍ता और दिल्‍ली के नीलाम्‍बुज सिंह की हैं। मुझे ये दोनों मित्र याद नहीं आ रहे पता नहीं चिट्ठाकारी में हैं कि नहीं पर इन्‍होने भी जमकर खबर ली है हसन जमाल साहब की।
मामला खत्‍म होना या समझा जाना चाहिए, पर दिक्‍कत है। और दिक्‍कत यह है कि हम पहले ही कह चुके हैं कि भई हम बड़े बुडबक इंसान हैं। मित्र लोग बिध्‍न संतोषी भी घोषित कर चुके हैं। तो भाई जहॉं लोग मान जाते हैं कि बात खत्‍म हो गई हमें लगता है कि बात तो शुरू हुई है। अब तक चिट्ठाकारी चंद सिरफिरों के खतूत भर थी इसलिए एम एस एम यानि मेन स्‍ट्रीम मीडिया या मुख्‍यधारा मीडिया उदासीन उपेक्षा से काम लेता था पर अब आवरण कथाएं आ रही हैं, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर कवरेज हो रहा है, लेख भी छप रहे हैं।
यानि सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों के जड़ दरवाजों पर खटखटाहट अब शुरू हो गई है इसलिए इन दुर्गों के किलेदार हसन जमाल साहब जैसे ही तर्कों के हथियारों से हमला करने वाले हैं। कम से कम दो तर्क तो बार बार आने वाले हैं पहला ये कि इंटरनेट चंद खाते पीते लोगों की चीज है इसका हिंदी मुख्‍यधारा से कोई सरोकार नहीं और दूसरा यह कि यह हिंदी के बहुत छोटे समुदाय की नुमाईंदगी करता है ( यानि से विध्‍न संतोषी लोग हैं) इन्‍हें मत सुनो। ऐसा नहीं जबाव हें नहीं या दिए नहीं जा सकते पर बंधु लोगों संवाद उससे ही हो सकता है जो संवाद में यकीन करता हो। हम तो अपने बीच के अविनाशों से संवाद कायम कर पाने में असफल सिद्ध हुए जो कम से कम हमारी भाषा में तो बात करते हैं- हसन जमाल का क्‍या करेंगे जो तू तक तू तक जैसे निरर्थक तर्कों से अपनी बात कहते व सिद्ध मानते हैं?

Friday, April 20, 2007

चिट्ठाकारी पर एक और लेख- आज दैनिक भास्‍कर में

आज दैनिक भास्‍कर में चिट्ठाकारी पर एक परिचयात्‍मक लेख प्रकाशित हुआ है। एक नजर डालें- कमी बेसी हो तो हमें बताएं






वैसे पूरा लेख निम्‍नवत है-


हम ब्‍लॉगिए हैं, हमारे चिट्ठे पर पधारो सा



हिंदी की चिट्ठाकारिता ने अपने पाँव अब पालने से बाहर निकाल लिए हैं और वह अब सही मायने में अपने पाँवों पर खड़ी है। सूचना तकनीक का सबसे मूर्तिमान रूप इंटरनेट है। और इंटरनेट पर हिंदी की मौजूदगी का सबसे अहम हिस्‍सा है हिंदी ब्‍लॉग जिनके लिए वहॉं चिट्ठे शब्‍द का इस्‍तेमाल होता है। ब्‍लॉग ‘बेवलॉग’ का संक्षिप्‍त रूप है जो एक व्‍यक्तिगत बेवसाईट होती है। ब्‍लॉग करने वाले ब्‍लॉगर कहलाते हैं तथा ब्‍लॉगलेखन ही ब्‍लॉगिंग कहलाता है। हिंदी में इनके लिए क्रमश: चिट्ठाकार व चिट्ठाकारिता शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया जाता है। अंग्रेजी में चिट्ठाकारी की शुरूआत 1997 में डेव वाइनर के ब्‍लॉग ‘स्क्रिप्टिंग न्‍यूज’ से हुई। जबकि हिंदी में चिट्ठाकारी की शुरूआत 2003 में हुई जब आलोक ने अपना चिट्ठा “नौ दो ग्यारह” शुरू किया फिर धीरे धीरे पद्मजा, जितेंद्र, रवि रतलामी, पंकज, अनूप, देवाशीष आदि चिट्ठाकार जुड़ते गए और कारवां बनता गया। आज हिंदी में 500 से अधिक चिट्ठे हैं जिनमें से बहुत से बेहद सक्रिय हैं।

चिट्ठाकारी हिंदी की दुनिया की एक अहम परिघटना है। ये चिट्ठे जो अकसर चिट्ठेकार ने बेहद अनौपचारिक व अनगढ़ता के साथ अपने आस- पास के विषयों पर या देश-दुनिया की घटनाओं पर लिखें होते हैं, वे सार्वजनिक दुनिया में आम भारतीय की राय की नुमाइंदगी करते हैं। इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय का मुसलमानों के अल्‍पसंख्‍यक होने को लेकर हुआ फैसला हो या राहुल गांधी के बयान या कुछ और....इनपर आम देशवासी की राय जानने का एक आसान तरीका है कि नारद ( http://narad.akshargram.com/ ) पर जाएं और देखें कि आम देशवासी जिनमें साईबर कैफे चलाने वाले सागरचंद नाहर हैं, सरकारी अफसर अनूप हैं, अध्‍यापिका घुघुती बासुती हैं, गृहिणियाँ, विद्यार्थी और तमाम काम करने वाले लोग हैं उन्‍होंने अपने चिट्ठों पर इन विषयों पर क्‍या लिखा है। ये सैकड़ों चिट्ठाकार अपने चिट्ठों पर इन विषयों पर अपनी बेबाक राय देते हैं- ये राय किसी संपादक की मेज से नहीं गुजरती, किसी सेंसर बोर्ड की कैंची का शिकार नहीं होती, एकदम खुली बिंदास राय सबके सामने सबके लिए। यही नहीं आप इस राय पर इतनी ही खुली प्रतिक्रिया तुरंत दे सकते हैं। यह राय मशवरे का एकदम लोकतांत्रिक रूप है।
चिट्ठाकारी के इसी खुलेपन के कारण इसे दुनिया भर के सबसे ताकतवर मीडिया रूप के में पहचाना जा रहा है। आज के दिन तक दुनिया में कम से कम साढ़े सात करोड़ चिट्ठे हैं (स्रोत – टैक्‍नाराटी) और ये केवल अंग्रेजी में नहीं है वरन जापानी, रूसी, फ्रेंच स्‍पेनिश में ही नहीं वरन फारसी, हिंदी, मलयालम, मराठी, बंगाली आदि दुनिया की बहुत सी भाषाओं मे चिट्ठेकारी हो रही है। दरअसल ये आम गलतफहमी है कि इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी है क्‍योंकि सच्‍चाई तो यह है कि दुनियाभर की चिट्ठासामग्री का केवल 30% ही अंग्रेजी में है। हिंदी चिट्ठाकारी ने देवनागरी लिपि को इस्‍तेमाल करने की शुरुआती दिक्‍कतों की वजह से धीमी गति से अपना सुर शुरू किया था लेकिन अब इसने भी रफ्तार पकड़ ली है।
हिंदी चिट्ठाकारी के इस द्रुत विकास का श्रेय जहाँ कुछ पुराने चिट्ठेकारों को जाता है जिन्‍होनें हिंदी में लिखने ओर पढ़ने की तमाम तकनीकी दिक्‍कतों को दूर करने में बहुत सा समय और ऊर्जा खर्च की। वहीं हिंदी चिट्ठाकारी को अपने पैरों पर खड़ा करने में नारद और अक्षरग्राम ने भी सबसे अहम भूमिका अदा की है। नारद दरअसल एक फीड एग्रीगेटर है जिसका मतलब यह है कि उपलब्‍ध हिंदी चिट्ठों पर जैसे ही कोई नई सामग्री आती है यह उसकी सूचना दर्शा देता है। इच्‍छुक चिट्ठाकार इस चिट्ठे पर जाकर टिप्‍पणियों के माध्‍यम से लेखक का उत्‍साहवर्धन करते हैं, गलतियों के विषय में सुझाव देते हैं। इससे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इसने हिंदी चिट्ठाकारों का एक जीवंत समुदाय खड़ा किया है जिसके सदस्‍य एक दूसरे का साथ देने के लिए तत्‍पर रहते हैं। नारद के अलावा इंटरनेट पर हिंदी के परवानों ने सर्वज्ञ व परिचर्चा जैसे मंच भी खड़े किए हैं जो हिंदी को इंटरनेट की समर्थ भाषा के रूप में खड़े करने की दिशा में मील का पत्‍थर हैं। सवर्ज्ञ जहाँ एक हिंदी का विकी-एनसाईक्‍लोपीडिया है जो किसी भी विषय पर हिंदी में सामग्री मुहैया कराता है वहीं परिचर्चा हिंदी में वाद- संवाद का एक मंच है।

आज न केवल बहुत से चिट्ठाकार लिख रहे हैं वरन वे लिखने के लिए दुनिया जहान के विषयों को चुन रहे हैं। कनाडा में रह रहे एकाउटेंट समीर व्‍यंग्‍य लिखना पसंद करते हैं तो इटली में बसे डाक्‍टर सुनील दीपक को कला और संस्‍कृति पर कीबोर्ड चलाना भाता है, हैदराबाद के वैज्ञानिक व कवि लाल्‍टू सामाजिक बदलाव की अलख के लिए चिट्ठाकारी करते हैं, मनीषा सरकारी कर्मचारियों के लिए ब्‍लॉग चलाती हैं जिसमें वेतन आयोग से संबंधित समाचार व अफवाहें होती हैं, साहित्यिक व पत्रकारी विषयों पर लिखने वालों की तो खैर एक लंबी कतार है हिंदी चिट्ठाकारी में। एन डी टी वी के पत्रकार अविनाश ने तो मोहल्‍ला नाम से चिट्ठा शुरू ही किया है पत्रकारों और विशेषज्ञों से लिखवाने के लिए। राजेंद्र यादव का तुलसी विरोधी लेख हाल में उन्‍होंनें मोहल्‍ले में छापा है और यदि एक बार राजेंद्रजी को मिली टिप्‍पणियों पर नजर डाल ली जाए तो सहज ही समझ आ जाता है कि चिट्ठाकारिता के बिंदासपन का क्‍या मतलब है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि समाचार, व्‍यंग्‍य, तकनीकी विषय, साहित्‍य, खेल, स्‍त्री हित के विषय आदि सभी क्षेत्रों में लेखन अब हिंदी चिट्ठाकारी में हो रहा है।
जो आजाद खयाली और आजाद तबियत इस चिट्ठाकारी की सबसे अहम खासियत है वही इसे जटिल परिघटना बना देती है। लोगों की आपसी आजादी और अहम अक्‍सर टकराते रहते हैं और नित नए विवाद चिट्ठाकारिता में खड़े होते रहते हैं। हाल की हिंदी चिट्ठाकारी में ऐसे कई विवाद खड़े हुए। हिंदू व मुसलमान पहचान के सवाल पर हुआ तीखा ‘इरफान विवाद’ फिर इंटरनेट पर पहचान के सवाल पर ‘मुखौटा विवाद’ हुआ। ‘मोहल्‍ला विवाद’, ‘बेनाम टिप्‍पणी विवाद’ अन्‍य कुछ विवाद हैं लेकिन ये सब विवाद अपनी जगह हैं और यह बात अपनी जगह कि चिट्ठाकारिता इन विवादों से मजबूत होकर उभरती रही है। यही नहीं चिट्ठाकारी ने अपनी आजाद तबियत के ही हिसाब से अपनी भाषा और मुहावरे भी खुद गड़े हैं- शिक्षित समाज की टकसाली हिंदी को चिट्ठाकारी में आभिजात्‍यपूर्ण मानकर छोड़ दिया जाता है और अखबारी भाषा को भी औपचारिकता से भरा हुआ मानकर उसमें जरूरी वदलाव किए जाते हैं और एक अनौपचारिक भदेस भाषा और अनगढ़ शैली वहॉं पसंद की जाती है जो स्‍माइलियों [:)] से होती है। आम चिट्ठाकारी जुमला यह है कि अखबार पढ़ा जाता है और चिट्ठा बांचा जाता है इसीलिए अखबार में लिखा जाता है जबकि चिट्ठे में पोस्टियाना होता है। तो भाई लोगन आप समझ सकते हैं कि हम जैसे ब्‍लॉगिए को अखबार के लिए लिखने में कितना कष्ट हुआ होगा। अगर सही में हमें बांचना चाहें तो हमारे चिट्ठे पर पधारो सा।

Thursday, April 19, 2007

बन्‍ने के वंदनवार और महाता उन्‍राओ की सूनी ऑंखें


बन्‍ने के वंदनवार


महाता उन्‍राओ की सूनी ऑंखें

ये दो अलग तस्‍वीरें हैं और इनमें यदि आपको आपस में कोई संबंध नहीं दिखाई देता तो दोष आपका नहीं क्‍योंकि अरअसल ये हैं ही अलग अलग समाचारों और सरोकारों से जुड़ी तस्‍वीरें बस हुआ इतना भर है कि आज के हिंदुस्‍तान टाईम्‍स में ये आमने सामने के पेज पर छपीं हैं और कई विसंगतियों को खुद व्‍यक्‍त करतीं हैं। कल नीरज दीवान ने निमंत्रण पत्र छापकर इस शादी नं. 1 की सूचना पोस्‍ट की थी जिसकी सजावट यहाँ हो रही है।

दूसरी ओर वे हैं जो चिंता नं. 1 होनी चाहिए पर है नहीं।

Wednesday, April 18, 2007

हमारे देसी भुट्टे और विकास मीनार से लटकी ग्रीनपीस

ग्रीनपीस की हाल के कुछ महीनों में भारत में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने की कोशिशें साफ दिखाई दे रही हैं। अभी पिछले ही दिनों में दिल्‍ली की विकास मीनार से लटक लटक कर लोगों ने एक बैनर टॉंगा और ये बैनर टंगाई का अनुष्‍ठान ही बाकायदा प्रेस को बुला बुला कर दिखाया गया। दूसरों देशों में खूब चलता होगा लेकिन इनकी आईडिया का बल्‍ब हमें तो कुछ खास नहीं रूचा। अरें भई हमारे यहॉं डेढ़ सौ की दिहाड़ी पर मजदूर दिन भर इमारतों से लटके रहते हैं कोई ध्‍यान नहीं देता....पर यहॉं ग्रीनपीस का मामला था प्रेस पहँच ही गई।




वैसे सच कहें तो हमें तो मल्‍टी नेशन एन.जी.ओ. जो हैं वे बहुराष्‍ट्रीय कंपनियों ही की तरह बहुत खतरनाक किस्‍म का कुचक्री गोरखधंधा लगता है।

इसी ग्रीनपीस की कल की एक प्रेस विज्ञप्ति ने थोड़ी आशा भी पैदा की, ये कोई हमारा अंतर्विरोध नहीं है बस इतना है कि अब इस पैंतीस की उम्र में उतने सिनीकल नहीं रह गए हैं। जिनसे सिद्धांतत: असहमति है उसके भी अच्‍छे कर्मों को धतकरम कह कर मटिया नहीं देते हैं। इस प्रेस रिलीज के अनुसार सूचना के अधिकार के मार्फत ग्रीनपीस ने केंद्रीय सूचना आयोग से अपने पक्ष में फैसला हासिल किया है जिसके कारण अब जैव प्रोद्योगिकी विभाग को बायोटैक कंपनियों के शोधों की उन सूचनाओं का खुलासा आम लोगों के सामने करना होगा जिनमें इन कंपनियों के उत्‍पादों के नुकसानदेह प्रभावों को दर्ज किया गया है। जब से हमारी मार्केट के भुट्टे वाले ने केवल अमेरिकन कार्न को हीबेचना शुरू किया है हम तो तभी से पिनके पड़े हैं अब इस खबर ने फिर से बता दिया है कि जेनेटिकली इंजीनियर्ड कार्न बेहद नुकसानदेह है। सावधान....
अंग्रेजी में पूरी प्रेस विज्ञप्ति यहां पढें

Monday, April 16, 2007

अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे -सुजाता तेवतिया

सुजाता का यह लेख आज जनसत्‍ता में आवरण कथा के रूप में छपा और जगदीशजी ने इसकी छवि भी अपलोड की लेकिन मित्रों को इसे पढ़ने में तकलीफ हो रही थी। तारणहार बने रवि रतलामीजी और उन्‍होंने लेख को यूनीकोडित कर भेजा है। प्रकाशित लेख में इस सामग्री के अतिरिक्‍त कुछ बॉक्‍स आइटम भी हैं कितु अभी तो लीजिए पेश है मुख्‍य लेख-


अंतर्जाल पर हिन्दी चिट्ठे
पूरी एक शताब्दी पीछे चर्चित रहे बालमुकुन्द गुप्त के 'शिवशंभू के चिट्ठे' अब इंटरनेट पर हिन्दी ब्लॉग बन कर धूम मचा रहे हैं। खड़ी बोली गद्य की भाषा का यह आरंभिक स्वरूप जितना रोचक और आत्मीय था, अंतर्जाल पर हिन्दी के चिट्ठे भी वैसे ही रोचक और आत्मीय शैली में अभिव्यक्ति का माध्यम बन गए हैं। अत: इसे हिन्दी की एक नई विधा माना जाए तो अनुचित न होगा। अंतरिक्ष की भांति अनन्त साइबर स्पेस पर ये हिन्दी चिट्ठे हमेशा के लिए दर्ज हो जाने वाली डायरी की तरह हैं।
'वेबलॉग' से 'ब्लॉग' बना और ब्लॉग का हिन्दी शब्द आया 'चिट्ठा' - सर्वप्रथम आलोक जी द्वारा - जो अब लगभग मानक हो चला है। यूँ तो अंग्रेजी चिट्ठाकारी अमेरिका में 1997 से प्रचलित हो चली है लेकिन हिन्दी का यह पहला 'चिट्ठा' 2 मार्च 2003 को प्रकाश में आया। इसे वास्तविक लोकप्रियता हासिल हुई रवि रतलामी के 'अभिव्यक्ति' में छपे लेख से जिसने कई नेट-प्रयोक्ताओं को हिन्दी ब्लॉग बनाने के लिए उकसाया।
कुल जमा 10 वर्ष की ब्लॉग विधा और उसमें भी हिन्दी ब्लॉग की 4 वर्ष की आयु यद्यपि किन्हीं निष्कर्षों तक पहुँचने के लिए नाकाफ़ी है तथापि यह मानने में कोई संकोच नहीं कि अंतर्जाल पर हिन्दी का प्रचार करने वाली यह सर्वाधिक महत्वपूर्ण विधा है। अंतर्जाल पर हिन्दी में मिलने वाली सामग्री का सबसे बड़ा भाग ये चिट्ठे हैं जो भविष्य में कीबोर्ड लेखन की इस अद्यतन विधा के परिष्कृत और निरंतर परिवर्तित होने का संकेत देती है।
हिन्दी के इन चिट्ठों में ताज़गी है और कोई एक सामान्य विशेषता, गुण या स्वरूप न होने पर भी इनकी अनगढ़ता और बेबाकी सभी चिट्ठों में सामान्यत: मिलती है। इस चिट्ठाजगत में न विषयों का बंघन है न नियमों की कवायद। पूरी तरह से अनौपचारिक यह विधा हर एक ब्लॉगर या चिट्ठाकार को अभिव्यक्ति की पूरी स्वतंत्रता देती है। यहाँ लोग जूतों से लेकर रसोई, बाथरूम और खान-पान से लेकर सुभाष चंद्र बोस, वर्ल्ड कप क्रिकेट, आरक्षण तक पर लिख सकते हैं और पाठक इन्हें पढ़ते भी हैं। किसी के लिए चिट्ठाकारी शौक है, किसी के लिए अपने मन की भड़ास निकालने का माध्यम तो किसी के लिए समय नष्ट करने का सर्वश्रेष्ठ साधन है। यद्यपि इन चिट्ठों का व्यावसायिक पक्ष भी है और गूगल इन चिट्ठाकारों को एडसेन्स द्वारा धन कमाने के अवसर भी देता है। पर सामान्यत: इन चिट्ठाकारों में धन कमाने की उतनी चाह नहीं जितनी लिखने और खुद को पढ़वाने की चाह है।
बैठे-ठाले का चिन्तन और शौकिया लेखन इन चिट्ठों के नाम और परिचयात्मक वाक्यों में भी झलकता है जो इन्हें निराला बनाता है - जैसे फ़ुरसतिया, निठल्ला-चिन्तन, नोटपैड, कॉफ़ी हाउस, टैमपास, नुक्ताचीनी, वाद-संवाद, गप-शप, ब्लॉगिया कहीं का, खाली-पीली, ठलुआ, मटरगश्ती, मस्ती की बस्ती।
ब्लॉगिंग का माध्यम न केवल देसी हिन्दी प्रेमियों को आकर्षित कर रहा है वरन् प्रवासी भारतीयों को भी बहुत लुभा रहा है। सबसे रोचक तो है कि हिन्दी चिट्ठों के शुरूआती दौर में सामने आने वाले बहुत से चिट्ठाकार विदेश में रह रहे भारतीय ही हैं जो अनायास ही हिन्दी ब्लॉगिंग के इतिहास के साक्षी और निर्माणकर्ता भी हो गए। जितेन्द्र चौधरी, पंकज नरूला, प्रतीक, अनुनाद, रमण कौल इन्हीं आरंभिक बलॉगरों में से हैं।
यहाँ तक कि हिन्दी के तमाम चिट्ठों को संकलित करके एक स्थान पर दिखाने वाली फ़ीड एग्रीगेटर साइट नारद.अक्षरग्राम.कॉम भी इन्हीं के प्रयासों का परिणाम है। नारद न केवल इन चिट्ठों की रोज़ की आवाजाही पर नज़र रखता है वरन् इन चिट्ठों की चर्चा करता है साथ ही साहित्यिक गतिविधियों, ब्लॉगज़ीन ; ब्लॉग मैगज़ीन व काव्य प्रतियागिताओं का भी संचालन समय-समय पर करता है। नियमितता और लोकप्रियता के आधार पर वह इन चिट्ठों की रेटिंग भी करता है।
चिट्ठाकारी की विधा के सभी पहलू बड़े दिलचस्प है जिसमें 'टिप्पणी' एक रोचक भूमिका निभाती है। जैसा कि बहुत से ब्लॉगर मानते हैं कि हिन्दी चिट्ठा लेखन छपास - छपने की इच्छा-पीड़ा का इलाज है उस दृष्टि से यहाँ छप कर न केवल न छपने के दर्द से मुक्ति मिलती है वरन् पाठकों की त्वरित प्रतिक्रियाएँ टिप्पणियों के रूप में पाकर लेखक धन्य हो जाते हैं। लेखन की किसी भी विधा और माध्यम में यह स्थिति संभव नहीं है। ये टिप्पणियाँ न केवल लेखक का उत्साहवर्धन करती है वरन् उसे निरन्तर माँजते रहने में भी कारगर साबित होती है। हालाँकि, कभी-कभी मामला 'एक दूसरे की पीठ खुजाने की तरह' टिप्पणी करने और टिप्पणी पाने वाला भी हो जाता है। ब्लॉग में टिप्पणी का महत्व बताते हुए एक जीतू का कथन है - ''टिप्पणी का बहुत महत्व है, ब्लॉग लिखने में, बकौल शुक्ला जी; रामचंद्र नहीं - अनूप शुक्ला ...बिना टिप्पणी का ब्लॉग उजड़ी माँग की तरह होता है। जिसकी जितनी टिप्पणियाँ उसके उतने सुहाग।''
एक सबसे रोचक पहलू इन चिट्ठों की भाषा और शैली है। रचनात्मकता की कई छटाएँ यहाँ देखने को मिलती है। यहाँ भाषा आभिजात्य, शुद्धता और मानक भाषा से आतंकित हुए बिना अपना स्वरूप निर्मित करती है। इस दृष्टि से ये हिन्दी चिट्ठे भाषा की नई भंगिमा लिए है। ये हिन्दी भाषा की नई प्रयोगशाला है। शब्दों की नई टकसाल हैं और टकसाल भी ऐसा जिसमें व्याकरण के नियमों की जकड़बंदी और पांडित्य का माहात्म्य नहीं है। यहाँ भाषा आम हिन्दुस्तानी की मातृभाषा है, बोलचाल की भदेस बोली है। यहाँ अंग्रेजी के हिन्दी पर्याय संस्कृत कोश में ढूँढने के बजाय खुद गढ़े जाते हैं और विद्यमान शब्दावली को इंटरनेट के अनुसार विकसित और परिष्कृत किया जा रहा है। यहाँ बात करते-करते लोग बिहारी, मैथिली, भोजपुरी, पंजाबी के शब्दों और अभिव्यक्तियों पर उतर आते हैं। चिट्ठाकार, चिट्ठाकारिता, चिट्ठा जगत, चिट्ठोन्मुक्त जैसे शब्द तो प्रचलन में है ही साथ ही आधिपत्य की तर्ज पर ब्लॉगपत्य, पोस्ट करने के लिए पोस्टियाना, टिप्पणी देने के लिए टिप्पियाना, टिप्पणी की इच्छा रखना - टिप्पेषणा आदि शब्दों का इस्तेमाल यहाँ बेरोक-टोक होता है। यहाँ कुबेरनाथ राय की पंक्तियाँ 'भाषा बहता नीर...' सही साबित होती लगती है। 'ब्लॉगित' हिन्दी जनों के 'लिंकित' मनों; एक शोध् ब्लॉग का नाम भी यह इंगित करती है कि भाषा निरन्तर प्रवाहमान है।
रोचक तथ्य यह भी है कि हिन्दी चिट्ठा जगत ने न केवल छपास पीड़ित, अनगढ़ लेखकों को आकर्षित किया है वरन् हिन्दी पत्रकारिता व मीडिया जगत से भी कई हस्तियों को लुभाया है। मोहल्ला, कस्बा, मुम्बई ब्लॉग्स ऐसे ही पत्रकारों के ब्लॉग है जो मीडिया लेखन के तयशुदा एजेंडों से मुक्त होकर स्वयं को अभिव्यक्त करते हैं। फ़िर भी, अंतर्जाल के हिन्दी चिट्ठाजगत में यह निरालापन है कि सुगढ़, सुविचारित और अनुभवी लेखन यहाँ स्तुत्य तो हैं लेकिन लोकप्रिय होने की शर्त नहीं है। बल्कि आम बातों के आम ब्लॉग, साधरण बातें, व्यंग्य और बहसें यहाँ अधिक लोकप्रिय हैं।
यद्यपि हिन्दी के जाने-माने ब्लॉग्स अभी लगभग 500 ही हैं जबकि अंग्रेजी के हज़ारों ब्लॉग्स हैं। फ़िर भी नित नए ब्लॉग्स हिन्दी में सामने आ रहे हैं और रोज़ाना नारद पर रजिस्टर हो रहे हैं। अत: आने वाले कुछेक वर्षों में यह चिट्ठा जगत अनंत विस्तार पाएगा, नारद विस्तार पाएगा या नए फ़ीड एग्रीगेटर सामने आएँगे इसमें संदेह नहीं। इस लेख का भी यही उद्देश्य समझा जाए। एकमात्र जो समस्या रह जाती है वह तकनीक का है। हिन्दी के पहले चिट्ठे पर आलोक जी ने भी यही लिखा था 'नमस्ते! क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं। यदि नहीं तो यहाँ पर देंखे।' माने यह कि कीबोर्ड पर हिन्दी लेखन और अन्य तकनीकी जानकारियाँ एक बड़ी बाधा है लोकप्रियता के रास्ते में। नारद, वर्डप्रेस, ब्लॉगस्पाट, गूगल सहित कई अन्य ब्लॉगर इस संबंध में सहायता करते हैं कि 'हिन्दी कैसे लिखें'। फ़िर भी समस्या अभी व्यापक है क्योंकि अंग्रेज़ी में लिखने वालों को यह नहीं पूछना पड़ता कि ''अंग्रेज़ी में कैसे लिखें?'' साथ ही यह भी कि हिन्दी चिट्ठाकारिता की दुनिया अभी काफ़ी सीमित है। हिन्दी चिट्ठा जगत से बाहर बहुत कम ब्लॉगरों की पहुँच है। अधिकांश केवल नारद पर दिख कर और टिप्पणी पाकर संतुष्ट हो जाते हैं। यदि हिन्दी ब्लॉगिंग की लोकप्रियता के ऊँचे प्रतिमान छूने हैं तो अधिक व्यापक होना होगा। चार वर्षीया हिन्दी चिट्ठाकारिता इस बुलंदी को छूने के लिए आरंभिक तैयारी की अवस्था से गुजर रही है।
यद्यपि विषयों की कोई प्रतिबंध या नियमावली यहाँ नहीं है तथापि कई मुद्दों पर विविधता कम ही मिलती है। फ़ैशन, फ़िटनेस, सौन्दर्य, यात्रा, पाक कला, टेकनॉलाजी, खेल से जुड़े ब्लॉग अभी नहीं के बराबर है। लेकिन इस विकासमान विधा का स्वरूप इतना शीघ्र तय नहीं किया जा सकता। निरन्तर विविधतामय लेखन का एकमात्र रास्ता है यह।
हिन्दी चिट्ठाकारिता की विधा का स्वरूप क्या होगा? यह हिन्दी के चिट्ठाकार और आने वाला समय ही तय करेंगे और इससे पहले कि मीडिया, विश्वविद्यालय, साहित्य और आलोचना के बड़े-बड़े विद्वान इसे अपनी सुगढ़ भाषा में कोई रूपाकार देने की कोशिश करें उससे पहले ही यह तय करना होगा कि अनौपचारिक लेखन की यह चिट्ठा विधा अपने स्वरूप के मूल और मुख्य गुण यानी बेबाकी, अनगढ़ता, भदेसपने और फक्कड़पने को बनाए रखे। इसे अन्य माध्यमों से अलगाने वाला मुख्य बिन्दु भी यही है जो इन हिन्दी के चिट्ठों में सूखी मिट्टी पर पड़ी फ़ुहार से उठने वाली सोंधी गंध की सी ताज़गी का एहसास दिलाता है।

Sunday, April 15, 2007

छा....गए हिंदी चिट्ठे - जनसत्‍ता की कवरेज

बहुप्रतीक्षित कवर स्‍टोरी आज आई और छाई। सुबह से कई फोन आ चुके हैं खास तौर पर गैर चिट्ठाकार हिंदी वालों के। यही तो मकसद था।


लेख के यूनीकोड‍ीकरण के प्रयास जारी हैं। तब तक इस धुधली छवि से काम चलाएं। कोई दयानिधान साफ छवि भी अपलोड करे तो अच्‍छा रहेगा हम तो 300 किलो पिक्‍सल के वेबकैम से ले रहे हैं।

Saturday, April 14, 2007

खचेढ़ू चिंतामणि - चिटठावीरता का स्‍थाई भाव : चिट्ठोत्‍साह



अरे चाचा ई...ई का कर रहे हो। हमने खचेढ़ू चाचा को खाट की अदवायन को कसते देखा तो हमारे मुँह से बरबस निकला। हमारी हालत वैसे ही हो गई थी जैसे अवैध दुकान पर सील लगते देख मोटे लाला की होती है। मुसलमान को तरक्‍की करते देख मुलायम की होती है, दलित को तरक्‍की करते देख मायावती की होती है। मतलब हर उस सही काम को देखकर उस व्‍यक्ति की होती है जिसकी दुकानदारी उस गलत की ही वजह से चल रही होती है। अब दो दो पोस्‍ट लिखकर खचेढ़ू चाचा के ढीली अदवायन का ब्रांड सेट किए थे। पहले बताया कि ढीली अदवायन जोर के आईडिया बुलाने का मूल मंत्र है। फिर बताया कि ढीली अदवायन पर रखे कंप्‍यूटर तक में चिट्ठाशास्‍त्र के सूत्र रचने की कूवत आ जाती है। अब ये हमारे चाचा उसी ढीली अदवायन को कसे जा रहे हैं... हमारी तो दुकान बढ़ा दी बैठे बैठे। हमने कहा चाचा ऐसे किसी की रोजी को कसना ठीक नहीं बताओं क्‍या बात है- हम समझा लेंगे परमोद भैया को कि कुत्‍ता गू रहने दें गाय का शुद्ध गोबर ही ठीक है आपके लैपटॉप का सहारा बनने के लिए, और कहो तो दर्जनभर उपले खरीदकर रखवा देता हूँ। वे हँसकर बोले क्‍या बच्‍चे इस गढ़ी मेंडू गॉंव में हम किसी परमोद के परभाव में नहीं आते वो तो हम आज हम उत्‍साह में थे इसलिए सोचा इस ससुरी अदवायन को हाथ लगा दें।
उत्‍साह....उत्‍साह, यही तो है चिंतामणि का अगला निबंध। अब हम भी उत्‍साह में भर गए। हमने कहा अरे अदवायन छोडि़ए लैपटॉप टिकाइए और इस उत्‍साह नाम के मनोविकार का विवेचन कीजिए इस अमर्त्‍य चिट्ठालोक की दुनिया में। यानि हे आचार्य खचेढ़ू चाचा लिखिए अपना अगला निबंध हम आपके साथ हैं। बस खचेढ़ू चाचा शुरू हो गए.. पेश है-

उत्‍साह बोले तो दिन में तीन पोस्‍ट, तेईस टिप्‍पणी (दूसरों के चिट्ठों पर), स्‍टेटकाउंटर 24 X 7 खुला। असल दुनिया में जिसे बिफरना कहते हैं चिट्ठाजगत में उसे ही उत्‍साह कहा जाता है। ओर बिफरा हुआ सांड जब गढ़ी मेंडू के यमुना खादर में हांडता है तो वह गाय ही नहीं भैंस, भैंसे, बैल ओर तो और कभी कभी दूसरे सांड पर ही सवार होने की कोशिश करता देखा गया है। इसी प्रकार उत्‍साह वह (दु)साहसपूर्ण आनन्‍द की उमंग है जिसमें एक चिटृठाकार आंखें ओर अंगुलियों की थकान, बैंडविथ और बिजली के खर्च, बीबी और बच्‍चों की नाराजगी..... कुल जमा दुनिया की हर फिकर से अविचलित रह कर बस चिट्ठाकारी करता है, वह तय मानकर चलता है कि उसकी अगली पोस्‍ट अकेले 1500 हिंट लेकर आएगी। शकुलजी (ये नहीं वो...रामचंदर सकुल) पहले ही बता गए हैं कि वीर जिसका स्‍थाई भाव उत्‍साह है वह केवल युद्ध में ही नहीं तुषार मंडित अभ्रभेदी अगम्‍य पर्वतों की चढ़ाई, ध्रुव प्रदेश या सहारा के रेगिस्‍तान का सफर, क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश इत्‍यादि भी वीरता के कर्म हैं। इनमें जिन आनन्‍दपूर्ण तत्‍परता के साथ लोग प्रवृत्‍त हुए हैं वह उत्‍साह ही है।
ध्‍यान से देखें शुक्‍लजी पहले ही बता गए हैं कि चिट्ठाकारी करना अरे वही....... 'क्रूर बर्बर जातियों के बीच अज्ञात घोर जंगलों में प्रवेश ' भी इसमें शामिल है। यहाँ जिस आनंदपूर्ण तत्‍परता से गदा भांजते हैं, संहार करते हैं, ब्‍लॉग बैन करवाते हैं, दूसरे को नीचा दिखाते हैं, जहर उगलते हैं यह कमाल की चिट्ठावीरता है और यह तत्‍परता ही चिट्ठोत्‍साह है।

Friday, April 13, 2007

टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का कर्बला क्‍यों है

टिप्‍पणी चिंतन के प्रत्‍येक पुरोधा ने बताया कि परस्‍पर पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है, एक दूसरे को बढ़ावा देना है। देखा जाए तो भला काम है। पर इसी किस्‍म का एक और काम है जो इसी तरह एक दूसरे की पीठ खुजाना है, उधार चुकाना है और भला काम है पर दिक्‍कत है कि अधिक कसाले काम है और कुछ ज्‍यादा सृजनात्‍मकता की मॉंग करता है और वह है परस्‍पर लिंकन। यानि लिंक देना और लिंक लेना। वैसे विवादों से यह सधता होगा पर फिलहाल हम उस पर बात नहीं कर रहे हैं। हम तो इस सवाल पर मगजमारी कर रहे हैं कि ये टैक्‍नोराटी जो इन लिंकन-प्रतिलिंकन की चाल पर नजर रखता है उससे मूल्‍यांकन करता है वो भला इतना हिंदी विरोधी क्‍यों है। एकाध बिरले को छोड़ दें तो अधिकतर चिट्ठों के परिचय में कोयले से भरी मॉंग की तरह सजा होता है - नॉट इन टॉप 100000।


यानि हिंदी चिट्ठे चोटी के 100000 चिट्ठों में भी शुमार नहीं होते। ऐसा क्‍यों भई... कोई तो बताए।
अब उदाहरण के लिए चिटृठा चर्चा पर विचार करें जो अंतत: एक चिट्ठा ही है। एक बेहद लोकप्रिय चिट्ठा है खूब पढ़ा जाता है और खूब लिखा जाता है। अब तक 340 पोस्‍ट लिखी जा चुकी हैं। यदि टैक्‍नोराटी की ही भाषा में बात करें तो यह बहुत से हिंदी चिट्ठाकारों के ब्‍लॉग रोल में भी है। और लिंक- अब क्‍या कहें यह तो है ही लिंक (आऊटवर्ड) देने के लिए और इनवर्ड लिंक भी मिलते ही हैं। लेकिन यदि टैक्‍नोराटी जाकर झांकें तो मिलता है ये-





अब कोई टेकीज में से हमें बताए कि कैसे इतना लोकप्रिय चिट्ठा चर्चा 4 लिंक दिखा पा रहा है ( वैसे नीचे खुद ही 664 लिंक बताता है) और रैंक 10,38,416 जबकि मुझ जैसे कुनाम ब्‍लॉगर तक का रैंक डेढ़-पौने दो लाख के लपेटे में है। पर इसका मतलब ये नहीं कि टैक्‍नोराटी की जरूरत नहीं है। है और बिल्‍कुल है। हमें चाहिंए कि परस्‍पर रुचि के विषयों पर लिखें और यही नहीं वरन बाहर के लोगों की रुचि के विषयों पर ध्‍यान दें ताकि ये जो टैक्‍नोराटी हिंदी ब्‍लॉगिंग का करबला बना हुआ है वहाँ कुछ सुधार हो। वैसे एक मजेदार पोस्‍ट इस लिहाज से मानसजी क‍ि यह पोस्‍ट है जिसमें उन्‍होंनें हर चिट्ठे को गिना दिया है जिससे शायद सबका टैक्‍नोराटी हित सधता हो (शायद इसलिए कि मेरे लिंको की जो सूची टैक्‍नोराटी पर थी उसमें तो इसका उल्‍लेख पता नही क्‍यों नहीं था) या फिर टेक्‍नोराटी फेवरेट एकसचेंज के इस कार्यक्रम पर विचार करें।