Tuesday, July 31, 2007

फंतासिया नजर शहर पर

शहर को समझना यूँ ही काफी जटिल काम है, कई लोग इसमें खप गए और खपेंगे, हमारी भला क्या बिसात। इसलिए हम जब शहर पर नजर डालते हैं तो कतई राजी नहीं होते कि शहर को अर्बन प्लानरों की नजर से देखें हम तो ठेठ अपनी नजर डालते हैं। इसलिए जब शिवम ने इमारतों वाले शहर के विषय में लिखा कि आत्‍महत्‍या का मसला - सातवें माले से कूद पड़ना- खुदकशी नहीं है ये तो शहर का मिजाज है- किसी शहरी को लग सकता है कि शहर चपटा हो गया है और वह ऊंचाई के आयाम को बिल्‍कुल भूलकर चलता हुआ आगे जा सकता है। ये शहर से बेतरतीबी के लुप्‍त हो जाने की फंतासी है।


यह शहर में जंगल खोजना ही नहीं। ये शहर में बावड़ी खोज लेना भी है जो अंधेरे के हिलोरते जल तक ले जाते हैं

शहर में अंधेरा जल बनता है तो केवल बावड़ी की तरह ठहरा हुआ ही नहीं होता वरन बहुधा वह एक ल‍हराता समुद्र भी होता है- प्रकाश-स्‍तंभों से भरा हुआ।

और काल यहॉं खुद ठहरता है नाप-तौल कर।


Sunday, July 29, 2007

आइए आज अपने प्‍यारे अंतर्जाल पर ही सवाल उठाएं

अंतर्जाल पर विचार एक तरह से खुद अपने रवैए पर विचार है ये आत्‍मालोचन ही है। आत्‍मालोचन एक ऐसा शुद्धि अनुष्‍ठान है जो हम नियमित करते रहे हैं लेकिन क्‍या करें कमजोर व्‍यकित हैं, एक कमी को पहचान भर पाते हैं, दूर पता नही कर पाते हैं कि नहीं, पर पचास और कमियॉं तब तक अर्जित कर बैठते हैं।

अस्‍तु, पिछले कुछ महीनों में हमारी अंतर्जाल से दोस्‍ती इतनी ज्‍यादा हुई है कि हमें विश्‍वास सा होने लगा है कि ये बात अपने आप में ही इस बात का प्रमाण है कि ये चीज़ यानि इंटरनेट सिर्फ अच्‍छा अच्‍छा नही हो सकता- तो क्‍यों न इसकी कमियों पर विचार किया जाए- और विचार का मतलब सिर्फ इतना नहीं कि भई समय बहुत खाता है- पैसा लगता है वगैरह वरन ये भी कि इअस माध्‍यम की मुलभूत प्रकृति में क्‍या लोचा अपन को दिखाई देता है।

अंतर्जाल में लाख अच्‍छाइयॉं हों पर ऐसा नही कि इसमें केवल हसनजमाली परेशानियॉं ही है और भी होंगी। एक तो हमें साफ साफ दिखाई देती है और वह है कि ये ऐसा माध्‍यम है जो सूचनाओं को भयानक शातिरता से ज्ञान बनाकर पेश करता है, कम से कम मुझे तो साफ ऐसा ही दिखाई देता है। सूचनाएं जिस आलोचनात्‍मक विवेक की भट्टी में पककर ज्ञान का दर्जा हासिल करती हैं वह इंटरनेट के माध्यम में से सिरे से गायब है- और ऐसा नहीं कि ये अनायास हो गया काम भर है, कम से कम हमें तो अब यह मानने का मन करता है कि ऐसा शातिरता से सप्रयोजन किया जा रहा है मसलन जिस तीव्रता से किसी छोटे मोटे विषय पर गूगल से की गई छोटी सी मांग बिजली की फुरती से लाखों सुचनाओं को आप पर फेंकती है, उससे खुद अपने विवेक के खो जाने का भय होता है। ये अनंत सुचनाओं का स्वामी होना या अनंत सुचनाओं तक पहुँच होने का अहसास होना एक छद्म किस्‍म का आत्‍मविश्‍वास प्रयोक्‍ता में भरता है कि हम सब जानते हैं या जान सकते हैं, आभासी दुनिया से वास्‍तविक दुनिया में आ पसरा ये छद्म आत्‍मविश्‍वास भयावह है।

एक अन्य बात जो हमें इस माध्‍यम में परेशान करती है वह है, असमानताओं को बेहद सुविधाजनक तरीके से नजरअंदाज करने की प्रवृत्ति। आर्थिक व सामाजिक को जाने भी दें तो भी कम से कम डिजीटल डिवाइड जैसी असमानता तो विचार क्षेत्र में होनी ही चाहिए पर शायद है नहीं। अगले युग की पूंजी सूचना है इसका अहसास कर चुके लोग पहला काम ये करना चाहते हैं कि अधिकाधिक सूचना को अपने नाम कर लेना चाहते हैं पर इस क्रम में ऐसे अनेकानेक लोग तैयार हो रहे हैं जिनकी पहुँच आर्थिक, सामाजिक, भाषिक कारणों इन सूचनाओं तक उतनी निर्बाध नहीं है जितनी कुछ अन्‍य की है। ये माध्‍यम सूचना समाज में भी सूचना सर्वहाराओं को तैयार करने में अहम भूमिका अदा कर रहा है और जाने अनजाने हम इस दुष्‍कृत्‍य में हम इसके मोहरे बन रहे हैं।

ऊपर की बाते हैं और भी होंगी (इसी बात को लें कि इस विषय पर इंटरनेट पर अच्‍छे शोधपत्र खोजने की कोशिश के कुछ खास नतीजे नहीं निकले) पर चूंकि विकास यूअर्न नहीं लेता इसलिए रास्‍ता तो इस माध्‍यम कोस्‍वीकार करने से ही निकलेगा- भाषाई रूप से विविध अंतर्जाल इस दिशा में एक सही कदम हो सकता है शायद।

Saturday, July 28, 2007

वही उपन्‍यास- एक बार फिर

हिंदी पढाना इस मायने में मजेदार है कि आप बीकाम, पढ़ाए या बीए या फिर बीए आनर्स, घुमा-फिराकर आपको वही पढ़ाना होता है। एकाध उपन्‍यास, सूर, तुलसी...। अब हम कितना भी खम ठोंककर कहें कि हिंदी का साहित्‍य महान रचनाओं से भरा पड़ा है पर सच्‍चाई बिल्‍कुल अलग है। मसलन उपन्‍यास को लें- हमेशा की तरह सत्र के शुरू में मैं सुनिश्‍िचत करता हूँ कि जो उपन्‍यास पढ़ाने के लिए मिले उसे पढ़ लूं, भले ही पहले कितनी ही बार पढ़ रखा हो। इस बार द्वितीय बर्ष आनर्स में गोदान पढ़ाना है इसलिए आजकल गोदान पढ़ा जा रहा है- पहले कई बार पढ़ा है, हमारे बीए के पाठ्यक्रम में था, एमए के पाठ्यक्रम में था, एमफिल में था, यूपीएससी में था और भी न जाने कहॉं कहॉं है। स्‍वाभाविक सिनिसिज्‍म के साथ पाठ्यक्रम निर्माताओं को कोसते हैं पर जानते हैं कि वे करें भी तो क्‍या। हिंदी में पाठ्यक्रम लायक उपन्‍यास हैं ही कितने ?

मुझे पता है इस कथन को व्‍यक्‍त करने के जोखिम। आप शायद दस बीस या शायद चालीस-पचास रचनाएं सुझाने की जल्‍दी में होंगे पर जरा रुकें- पहले समढ लें कि बीए, बीकॉम पास/आनर्स, बीए आनर्स, एमए आदि में कुल मिलाकर उपन्‍यास वाली कक्षाओं की संख्‍या 12-15 बन जाती है यानि कुल मिलाकर 20-30 उपन्‍यासों की जरूरत पड़ेगी और पाठ्यपुस्‍तक श्रेणी के लिए आप जानते हैं
कि बिल्‍कुल नया, बहुत पुराना, गैर प्रसिद्ध, विवादित, भाषा में एक भी गाली वाला, स्‍त्री, दलित, अल्‍पसंख्‍यकों के प्रति किसी भी दुर्भव के शब्‍दों वाला, बहुत कठिन, बहुत आसान, गैर प्रासंगिक, बहुत पतला, बहुत मोटा उपन्‍यास नहीं लगाया जा सकता :)))) अब बचा क्‍या। हर रचना इस मापदंड पर खरी उतरेगी तो उस पर खोटी। एकाध उपन्‍यास सब तरह से सही मिल भी जाए तो 20-30 कहॉं से मिलें। मिल भी जाएं तो वो पहले ही इस या उस जगह के पाठ्यक्रम में होंगे और पाठ्यक्रम निर्माता बेचारे 'अमौलिक' करार दे दिए जाएंगे।



कहने की आवश्‍यकता नहीं कि इन मापदंडों की तो फिर भी अवहेलना हो जाए तो कोई बात नहीं पर अर्थव्‍यवस्‍था की नहीं हो सकती- आखिर वह बेस स्‍ट्रकचर है भई- इसलिए उपन्‍यास ऐसे प्रकाशक का होना चाहिए जिसमें कोई दम हो। तो इस सारे प्रकरण का परिणाम ये है कि वही गोदान, आपका बंटी, रंगभूमि आदि आदि।


कितना अच्‍छा हो साल के शुरू में विद्यार्थियों के साथ बैठकर ये तय करने का अख्तियार हमें हो कि हम कौन सा उपन्‍यास पढ़ाएंगे- परीक्षा में उपन्‍यास सामान्‍यत: विद्यार्थी की आलोचना क्षमता की परख हों मसलन- पढें हुए किसी उपन्‍यास के आधार पर समाज व साहित्‍य के संबंध पर अपने विचार व्‍यक्‍त करें- खैर बेकार की खामख्‍‍याली है... पाठ्यक्रम से नहीं आने वाली जो नवीनता लानी है खुद ही शिक्षण पद्धति से ही लानी होगी। ठीक है...फिर पढ़ते हैं वही गोदान... फिर से।



Friday, July 27, 2007

अब सम्‍मान नहीं उमड़ता तो क्‍या करें- मोल लाएं

मास्‍टर हैं और इस प्रजाति के जीव अक्‍सर 'सम्‍मानीय' कैटेगरी में बाई डिफाल्‍ट माने जाते हैं। दसेक साल से बच्‍चों की हर फेयरवेल में गुरू गोविंद दोनों खड़े.... सुनता रहा हूँ। कोई असर नहीं हुआ होगा ये कहना तो कठिन है पर इससे चिढ ज्‍यादा होती है। अभी सुनीलजी ने बताया कि बेचारा डाक्‍टर मेडिकल कॉलेज के जमाने से ही 'सोबर' होने के लिए विवश है। मुझे याद है कि एक दोस्‍त मौलाना आजाद मेडिकल कॉलेज में प्रवेश लेने वाले साल में अपने फेस्टिवल वाले दिन सिर्फ इसलिए खुश था कि टीशर्ट व जींस पहन कर कॉलेज आ सके' - तब इन्‍हें कॉलेज सॉबर ड्रेस में शुमार नहीं करता- हम खुद ही टीचिंग प्रेक्टिस में सॉबर कपड़े पहनकर जाने के लिए अभिशप्‍त थे अपने टीचिंग स्‍कूल में, ये अगल बात है कि लड़कियों की गत और बुरी थी जिन्‍हें साड़ी पहननी पड़ती थी- जिसकी अधिकांश को आदत नहीं थी- कुछ बेचारी बैग में भरकर लाती थीं और एनसीसी की वरदी की तरह कॉलेज से पहनकर निकलती थीं- ये सब क्‍यों था, इसलिए कि शिक्षक एक 'सम्‍मानित' वर्ग है जिसे इस सम्‍मान जैसा व्‍यवहार भी करना चाहिए हु..ह.ह तेल लेने गया सम्‍मान जिसकी वजह से हम अपने पसंदीदा छोल कुलचे जो नई सड़क पर एक खोमचे वाला बेचता है खान में झिझकते हैं क्‍योंकि कॉलेज के अधिकांश विद्यार्थी चांदनी चौक ही रहते हैं- देखेंगे तो उनके सम्‍मान बोध को झटका न लग जाए।

दूसरे पक्ष की हालत और खराब है- आपका मास्‍टर कितना ही लंपट, डाक्‍टर कितना भी ढक्‍कन क्‍यों न हो आप उसका सम्‍मान करो, क्‍यों भई। उससे भी मुश्किल ये कि कैसे करें- सम्‍मान कोई साधुवाद की टिप्पणी तो है नहीं कि कापी कर के रख ली कंट्रोल वी और हो गया सम्‍मान, ऐसा नहीं होता सम्‍मान- वो तो उपजना चाहिए-   अब देखो न अमित को अपनी राष्‍ट्रपति का सम्‍मान करने का झोले भर भर सुझाव देश परदेस सब जगह से दिया गया- यूँ ही अमित से किसी का भी सम्‍मान करने की अपेक्षा ही सिरे से गलत है :) पर उसे छोडों किसी से भी ये कहना कि अमुक का सम्‍मान करना ही पड़ेगा- ये तो नहीं चलेगा। अमित तो सिर्फ कार्टून बना रहे हैं हम साफ साफ बिना स्‍माईली कह रहे हैं कि प्रतिभा ताई के लिए हमारे मन में कोई अतिरिक्‍त सम्‍मान न‍हीं है- हमें एक बार भी नहीं लगा कि व्‍यक्ति से निरपेक्ष हो पद का स्‍वमेव सम्‍मान किया जा सकता है, किया जाना चाहिए। हमारे पिछले स्कूल में एक मास्‍टर थे वे श्रीमान 'ठीठा सर' वे अगर प्रिसीपल रूम बंद भी हो या खुला हो पर प्रिंसीपल न हों तो भी उनकी कुर्सी की ओर देखकर प्रणाम करते थे- तर्क ये कि ये सम्‍मान व्‍यक्ति का नहीं पद का है- छोटी समझदानी के लिए माफी पर ये हम से नहीं होने का-  हमारे विद्यार्थी इसलिए हमारा अतरिक्‍त सम्‍‍मान करें क्‍योंकि हम मास्‍टर हैं ये हमें नहीं पसंद- हमसे कोई अपने देय से अधिक सम्‍मान की अपेक्षा इसलिए रखे क्‍योंकि महामहिम सोनिया गांधी को वे निरापद राष्‍ट्रपति लगती हैं- ये हमसे होने से रहा। 

ऑंचल ढके, मातृवत महिला सहज ही किसी सम्‍मान के लायक हो जाती है- मैट्रोट्रेन में दिखें तो  मैं सहज ही अपनी सीट सहर्ष छोडे जाने के लिए उन्‍हें अनुकूल पात्र समझता हूँ- स्‍त्री होने के नाते का भी सम्‍मान दे सकता हूँ पर भैया बस यहीं तक। जिस देश का राष्‍ट्रपति इस या उस नाते प्राप्‍त सम्‍मान के भरोसे रहे  वह बहुत अभागा देश होगा। पर इतने कुंद भी नहीं है कि अगर प्रतिभा सम्‍मानयोग्‍य करें तो भी नत न हों। पर अभी तो मोल लाकर सम्‍मान अपनी मुद्रा पर नही ही चेप सकते।

 

Wednesday, July 25, 2007

छापे का आदि-इरोटिक साहित्‍य और फ्रेंचेस्‍का


रविकांत व संजय ने यह आयोजन किया था जो बेहद अनौपचारिक से वातारण में हुआ, इतना कि किसी छोटी सी बात पर स्‍थापित इतिहासकार शाहिद अमीन भुनभुना सकें और लोग उनकी इस भुनभुनाहट का ज्‍यादा बुरा न मानें। अवसर था एक छोटा सी वार्ता जिसमें फ्रेंचेस्‍का ऑर्सिनी ने 'प्रिंट व प्‍लेजर' विषय पर बोला और बाद में एक छोटी सी चर्चा हुई। फ्रेंचेस्‍का हिन्‍दी की स्‍थापित विद्वान हैं, दक्षिण एशिया में प्रेम के इतिहास पर अपनी पुस्‍तक के लिए अधिक जानी जाती हैं पर उनका काम हिंदी के इतिहास पर एक अहम काम है जिसे विश्‍वविद्यालयी बिरादरी के हिंदी विभाग सहजता से नजरअंदाज करना पसंद करते हैं। पहले कैंब्रिज में थीं अब हाल में लंदन विश्‍वविद्यालय में पहुँच गई हैं।


'प्रिंट एंड प्‍लेजर' कोई काव्‍यशास्‍त्रीय व्‍याख्‍यान नहीं था, ये 19वीं सदी के उत्‍तरार्ध में शुरूआती हिदी छपाई की सामग्री के अनुशीलन पर आधारित एक शोध था और कई मायने में आंखे खोलने वाला कार्य था। पूरे विवरण की तो यहॉं आवश्‍यकता शायद नहीं पर काम की और कुछ मजेदार बातें बताई जा सकती हैं- फ्रेंचेस्‍का ने मुख्‍यधारा साहित्‍य नहीं वरन उस समय छप रहे लोकप्रिय साहित्‍य मसलन शायरी, किस्‍से, ठुमरी व अन्‍य गायकी आदि पर काम किया है और ये सब के लिए सामग्री उन्‍हें ब्रिटेन की लाइब्रेरियों से प्राप्‍त हुई जहॉं ये सारा ही साहित्‍य 'इंडियन इरोटिक' साहित्‍य श्रेणी के तहत वर्गीकृत किया गया है। मुझे ये बेहद मजेदार बात लगी क्‍योंकि इसमें ऐसा 'कुछ नहीं' था कि इसे कामकला का साहित्‍य माना जा सके।



सबसे जरूरी बात जो मुझे वर्तमान ब्‍लॉगिंग के लिए दूरगामी प्रभाव वाली लगती है वह यह है कि फ्रेंचेस्‍का के शोध का परिणाम यह कहता है कि जब कोई नया माध्‍यम आता है तो वह विद्यमान माध्‍यम के आनंद (प्‍लेजर) को ही गढ़ने की कोशिश करता है। जब छापा आया तो उसने चालू मौखिक परंपरा (खासतौर पर किस्‍सागोई, पारसी थियेटर व नौटंकी) से मिलने वाले आनंद को ही प्रिंट में देने की कोशिश की, उन्‍हें इमीटेट किया। ताकि आरंभ में लोगों को नए माध्‍यम से वहीं प्‍लेजर मिले जो पहले से विद्यमान माघ्‍यमों से मिलता है- भाषा में भी उन्‍होंने हिंदी, उर्दू, ब्रज का तथा लिपि में देवनागरी तथा फारसी लिपि दोनों का मिलाजुला इस्‍तेमाल किया। इसके ब्‍लॉगिंग निहितार्थ देखें तो यह पूरी तरह लागू होता दिखाई देता है- आरंभिक ब्‍लॉगिंग पहले से विद्यमान मीडिया रूपों यानि प्रिंट व आडियो-विज्‍युअल रूपों के प्‍लेजर को ही मुहैया कराने की कोशिश कर रही है पर जैसे जैसे ये स्‍वतंत्र रूप हासिल करती जाएगी इसका प्‍लेजर अलग होगा। और हॉं छापे के उभार के समय वाचिक साहित्‍य के पुरोधाओं ने छापे के उभार को वैसे ही कोसा था जैसे अनवर जमाल और छापे के दूसरे लोग, वर्तमान हाईपरटेक्‍स्‍ट वालों को पानी पी पी कर कोसते हैं।


Tuesday, July 24, 2007

ब्‍लॉगिंग का चरित्र एंटी-एस्‍टाब्लिशमेंट ही हो सकता है

अविनाश ने एक और चर्चा इलैक्‍ट्रानिक मीडिया और उसकी प्रकृति पर आयोजित की है जो टेलीविजन पर एक आलोचनात्‍मक नजर डालती है। वे मूलत: टीवी के व्‍यक्ति हैं, हम अब अपने को पूरी तरह ब्‍लॉगमीडिया का ही मानने लगे हैं इसलिए स्‍वाभाविक सा लगा कि हम खुद अपने माध्‍यम यानि ब्‍लॉगिंग और उस पर भी हिंदी ब्‍लॉगिंग पर विचार कर यह समझने की कोशिश करें कि इसकी प्रकृति क्‍या है और उससे ही इसकी दिशा के अनुमान की कोशिश की जाए।

हमें ये बात खूब अच्‍छे से महसूस होती है कि इंटरनेट अनिवार्यत व्‍यक्तिगत माध्‍यम है या व्‍यक्ति का व्‍यक्ति से सीधा संवाद है, अगर इसे 'पुरा‍णिक विमर्श' का बाजार माना जाए तब भी यह एक दुकानदार का एक ग्राहक से सीधा संवाद है, भले ही एक ब्‍लॉग को एक ही समय में 10 लोग आनलाईन पढ रहे हों तो भी उनमें से हर किसी के साथ ये ब्‍लॉग का व्‍यक्तिगत संवाद ही है- यही इंडीविज्‍युअलटी ही इस ब्‍लॉग माध्‍यम का यूएसपी है और यही इसे टीवी या अन्‍य माध्‍यमों से अलग बनाती है। ब्‍लॉग लेखक ही नहीं विज्ञापनदाता तक सीधे संभावित ग्राहक तक पहुँचने की गुंजाइश की ही वजह से एक एक विज्ञापन क्लिक के लिए डालरथमा दिया जा सकता है, जरा टीवी के विज्ञापनदाता से प्रति दर्शक 10 रुपए की मांग कीजिए और देखिए कैसा भड़कता है। टीवी खुल्‍लमखुल्‍ला लगा हुआ मजमा है जिसमें बल इस बात पर है कि अपना संदेश खूब तेजी से खूब सारे लोगों पर बौछारा दिया जाए, इनमें से बहुत थोड़े से लोग ही लक्ष्‍य समूह हों तो भी बहुत कुछ लोगों तक तो संदेश पहुँच ही जाएगा वैसे थोड़ा बहुत वर्गीकरण चैनलों की रुचि व उसमें भी समय के वर्गीकरण से किए जाने की कोशिश होती है (मसलन कार्टूनों या समाचार के चैनल या फिर दोपहर के कार्यक्रम ग्रहणियों को केंद्रित कर बनाए जाने से)। ब्‍लॉग मीडिया का नजरिया अलग है ये एक समय में यहॉं पाठक से व्‍यक्तिगत संवाद की उम्‍मीद पर ही संदेश दिया जाता है। पिछली ब्लॉगर बातचीत में भी यही उभरकर सामने आया था कि ब्‍लॉगिंग इसलिए आकर्षित करती है क्‍योंकि ये आपकी इंडिविज्‍युअलिटी के लिए स्‍पेस छोड़ती है, बाकी मीडिया रूपों से कहीं ज्‍यादा।


पर हमारी इंडिविजुएलिटी का कौन सा पक्ष है जो इतना कसमसाता है कि उसे कह डालने के लिए मचलते रहते हैं। और भी पक्ष होंगे पर मुझे लगता है हमारा एंठीएस्‍टेब्लिश्‍मेंटपन शायद एक एक अहम पक्ष है। समाज, सरकार या संबंध आदि में जब हम कुछ ऐसा होते देखते हैं जिसका वहॉं विरोध करने का हमारा बूता या अवसर नहीं होता तो हम उसे कह देने का, व्‍यंग्‍य में , हँसकर, चिढ़कर, रूपांतरित कर या ऐसे ही तो हम कह डालते हैं। यही कारण है कि सही ब्लॉगिंग चाहे वह अंग्रेजी में हो या बंद ईरानी समाज की फारसी में वह मूलत: एंटी एस्टिब्लिश्‍मेंट की ही होती है। प्रो एंस्‍टेब्लिश्‍मेंट ब्‍लॉगिंग, ब्‍लॉगिंग नहीं दलाली है। इसलिए राहत मिलती है जब असीमा का लिखा ब्‍लॉग तक पहुँचता है जो एक विद्रोह है पर मुझे तो उससे भी राहत मिलती है जब अभय पोलिटिकल करेक्‍टनेस के तैयार एस्‍टेब्लिश्‍मेंट के विरुद्ध लिखते हैं- और अपेक्षाओं व यथार्थ के संतुलन के सवाल खड़े करते हैं।


Monday, July 23, 2007

गूगल सर्च:बहुत है थोड़े से काम न चलाएं

यदि आप भी मेरी तरह गूगल का इस्‍तेमाल केवल किसी शब्‍द से जुड़े बेवपते की जानकारी के लिए ही करते रहे हैं तो आप केवल आइसबर्ग की टिप से ही परिचित हैं। दरअसल गूगल की सर्च सुविधा में और बहुत सी सुविधाएं शामिल हैं, कुछ का असल लाभ तो केवल अमरीकियों के ही लिए है पर बाकी हम आप सब के काम की हैं तो लीजिए हमने आपके लिए अनुवाद कर पेश किया गूगल खोज की फीचरों को ताकि आप भी हमारी तरह सिर्फ थोड़े से काम न चला रहे हों जबकि ज्‍यादा उपलब्‍ध है।

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Sunday, July 22, 2007

Alt+Shift की पलटी और ' नितांत निजी' पीड़ा

सामाजिकता की गठरी सर पर लादे लोग माफ करें इस कीबोर्डपीट ने आज जिस विषय पर लिखा उसमें किसी बृहत्‍तर समाज की पीड़ा के संधान की कोई गुंजाइश नहीं है, कतई नहीं। इसमें बक्‍सर या मोतीहारी के बिरसउ या बघीरा की गरीबी पर विचार नहीं है न ही मॉल्स या ग्‍‍लोबलाईजेशन पर। समस्‍या इतनी मेरी अपनी है कि उसमें मेरे आस पास के अपने तक शामिल नहीं। मेरा चिट्ठा है इसलिए अपनी इस नितांत निजी समस्‍या तक को लिख सकता हूँ लिख रहा हूँ। समस्‍या है कि जब मैं लिखता हूँ, टिप्पियाता हूँ या कंप्‍यूटर पर कोई भी काम करता हूँ तो दो भाषाओं के बीच अटपटा सा दोलन करता हूँ। मेरी अंगुलियॉं ये दोलन करती हैं पर अक्‍सर दिमाग ये दोलन नहीं कर पाता और यकीन जानिए उस समय मुझे ये समस्‍या दुनिया से गरीबी मिटाने से भी ज्‍यादा परेशान करती है- क्‍या करें।

थोड़ा विस्‍तार से बताता हूँ। कंप्‍यूटर का कीड़ा अपना कुछ पुराना है बहुत पहले काम कर रहे हैं इसलिए पुराने कीबोर्ड रेमिंगटन की आदत है, आईएमई का इस्‍तेमाल करता हूँ जिसमें ALT + SHIFT से टॉगल किया जाता है यानि ये मारा ALT + SHIFT और आपकी दुनिया बदल गई आप हिंदी से अंग्रेजी हो गए।
मोतीहारी से अचानक ही हम ट्राइफल्‍गर स्‍क्‍वेयर पहुँच जाते हैं या कम से कम गुड़गांव या दिल्‍ली के माल्‍स में तो पहुँच ही जाते हैं दिक्‍कत ये है कि ससुरा अपना हंडला (हंडला बोले तो दिमाग) इतनी तेजी से पलटी खा नहीं पाता और हमारी गत अक्‍सर वो ही हो जाती है जो खेतों में दिशा मैदान करने वाले की अंग्रेजी कमोड के सामने होती है- क्‍या करें-कैसे करें। थोड़ी देर में जुगाड़ कर अभ्‍यस्‍त तो हो जाते हैं पर तब तक गड़बड़ की आशंका तो रहती ही है।

सबसे दिक्‍कत वाली गत तब होती है जब थोड़ी सी देर के लिए ALT + SHIFT करते हैं। ऐसा कई बार मतलब रोजाना 10-20 बार होता है कि लॉगइन करते हैं उंेपरममअप लिखकर, नहीं समझ आया न अरे भई masijeevi को रेमिंगटन में लिखें तो ऐसे ही लिखना होता है। पूरा लिखकर देखते हैं फिर कोफ्त खाते हुए ALT + SHIFT करते हैं और फिर eflthoh लिखकर मुंडी उठाते हैं- धत्‍त तेरे की इस बार ALT + SHIFT के साथ कीबोर्ड बदल गया और लिख वही गए यानि देवनागरी का मसिजीवी पर रोमन में ये कमबख्‍त eflthoh ही होता है। अब अगर आप डूबकर लिख रहे हैं तो आपको बार बार ALT + SHIFT करना होता है और हर बार ऐसी ही भद्द पिटती है।


समस्‍या ये है कि हम त्रिशंकु हैं- हम नहीं जानते कि हम ALT + SHIFT के इस ओर हैं या उस ओर, दिक्‍कत ये भी है कि असल दुनिया में ALT + SHIFT जैसे सीधे सरल समाधान भी नहीं हैं आप कंप्‍यूटर क‍ी गिटपिट में इंटरनेट पर मोतीहारी का घीसू ला सकते हैं पर ALT + SHIFT से मोतीहारी के घीसू के घर कंप्‍यूटर पहुँच नहीं जाएगा। आप दिमाग झटककर झट से मैट्रो वॉक माल के भीतर घुस सकते हैं ऐश्‍वर्य देख व भोग सकते हैं- बेअरबैक व स्‍पैगेटी स्‍ट्रैप निहार सकते हैं और फिर वापस आ झट कक्षा में समता पर लेक्‍चर झाड़ सकते हैं ये आपके लिए ALT + SHIFT जैसा सरल है सहज है पर क्‍या इससे दुनिया भी ALT + SHIFT हो पाती है- दुनिया का सोर्स कोड हमारे पास नहीं, शोषण के प्रोग्राम कर कोई हैक नहीं- इस प्रोग्राम में आप ALT + SHIFT के किस ओर हैं आप बखूबी जानते हैं मानें या नहीं।

Saturday, July 21, 2007

दिल्‍ली शहर के लाईट हाऊस यानि पुस्तकालय

कल काकेश जी ने एक पत्र भेजकर जानना कि हिंदी किताबों के लिए कुछ अड्डे बताएं इस शहर के। हमने किताबों की एकाध दुकान का पता भेजा और वायदा किया कि पुस्‍तकालयों को लेकर एक पोस्‍ट लिखी जाएगी। दिल्‍ली में ऐसी पुस्‍तकालय व वाचनालय परंपरा विद्यमान नहीं है जिस पर गर्व किया जा सके पर फिर भी कम से कम कुछ पुस्‍तकालय हैं जिनका उल्‍लेख आवश्‍यक है। वैसे सबसे महत्‍वपूर्ण पुस्‍तकालय संस्‍थाई पुस्‍तकालय हैं मसलन जवाहरलाल नेहरूविश्‍वविद्यालय, दिल्‍ली विश्‍वविद्यालय के दोनों परिसरों के पुस्‍तकालय तथा स्‍टीफेंस, हिंदू व अन्‍य कॉलेजों के पुस्‍तकालय, केंद्रीय सचिवालय की तुलसी सदन का पुस्‍तकालय पर स्‍पष्‍ट है कि इन पुस्‍तकालयों का चरित्र सीमित पहुँच के पुस्‍तकालय हैं क्‍योंकि आप सहजता से इन तक पहुँचकर संदर्भनहींले सकते, पुस्‍तकें पढ़ने के लिए घर ले जानेकी भी सुविधा बाहरी पाठकों के लिए नहीं है।

अत: सार्वजनिक पुस्‍तकालय ही आम शहरी के लिए सर्वश्रेष्‍ठ विकल्‍प हैं और जाहिर है दिल्‍ली में सार्वजनिक पुस्‍तकालय का मतलब है- दिल्‍ली पब्लि‍क लाइब्रेरी। पुरानी दिल्‍ली रेलवे स्‍टेशन के सामने श्‍‍यामा प्रसाद मुखर्जी मार्ग पर स्थित ये पुस्‍तकालय इस मुख्‍‍य पुस्तकालय के अतिरिक्‍त अलग अलग कॉलोनियों में शाखाएं भी संचालित करता है।