साइबर पथ के होरी......विश्वास करें यह लेख सृजन शिल्पी पर नहीं है
सृजन ने इधर इंटरनेट और कानून की अपनी समझ व जानकारियों की श्रमसाध्य प्रस्तुति करना शुरू किया है। अच्छा काम है, पर किस नीयत से कर रहे हैं वे जाने...वैसे ही अविनाश हमें संशयजीवी करार दे चुके हैं। उधर सृजन ने नारद प्रकरण में नारद और मोहल्ला के द्वारा बार बार कानूनों को तोड़ने का भी हवाला दिया था और उनका यह कहना भी था कि नारद भी इस मामले में दोषी है। भई कानून क्या कहते हैं, इस पर हमें कुछ नहीं कहना... सिवाय इसके कि हम नहीं मानते कि वे जो कहते हैं सब ठीक कहते हैं। मुझे पहले साइबर अपराधी की गिरफ्तारी के अवसर पर लिखा अपना लेख याद आया। लेख 29 जून 2000 को जनसत्ता में प्रकाशित हुआ था। कटिंग थी पास में लेकिन टाईप दोबारा करना पड़ा...टाईप करने के दौरान ही लगा कि आज शायद तब से भी ज्यादा प्रासंगिक है। अब इसके प्रकाशन से किसी ससुरे न्यायधीश की बेइज्जती होती हो तो हो। लीजिए हाजिर है....और जैसा कि डिस्क्लेमर का फैशन है कह दें कि होरी होरी हैं इन्हें सृजन न माना जाए, वैसे भी लेख 7 साल पुराना है...तब हम सृजन को नहीं जानते थे।
साइबर पथ के होरी
जनसत्ता 29.06.2000
दिल्ली में भारत का पहला साइबर अपराधी पकड़ा गया और फिर दूसरा भी। पहले मामले में एक इंजीनियर ने सेना के अधिकारी के पासवर्ड – जो स्वयं उस अधिकारी ने दिया था- का उपयोग करके उसके इंटरनेट समय से लगभग 100 घंटे का उपयोग कर डाला। इतने समय की कीमत इस समय बाजार में लगभग 750 रुपए है और यह चोर बाजार में 400-500 रुपए में मिल जाता है। यह खबर पढ़ते हुए प्रेमचंद के ‘होरी’ की बांसों के सौदे में अपने भाई से पांच रुपए की बेईमानी याद आई। आज होरी का याद आना संयोग भर नहीं है। ‘गोदान’ का होरी भारतीय संवेदना के इतिहास का अहम चरित्र है। वह चूंकि सामंतवाद से पूंजीवाद के संक्रमण का सबसे बड़ा चरित्र रहा है इसलिए अब इस नए संक्रमण में जिसमें हम खड़ें हैं, होरी को याद कर लेना जरूरी जान पड़ता है। इस ‘बेचारे’ चोर इंजीनियर को पहली बार में जमानत भी न मिल पाई ओर 400-500 रुपए की हेरा फेरी में वह 20-25 दिन जेल में रह आया। अभी मुकदता चलेगा, सो अलग। दूसरा मामला साइबर भी था और अपराध भी, शायद इसीलिए अभियुक्त को पहली ही पेशी में जमानत मल गई। इस मामले में अभियुक्त ने खुद को महिला के रूप में पेश करते हुए दूर विदेश में बैठे लोगों के साथ अश्लील वार्तालाप के सत्र में अपनी खुन्नस वाली एक भद्र महिला का फोन नंबर कुछ मनचलों को इंटरनेट पर उपलब्ध करा दिया और बेचारी महिला के पास बड़ी संख्या में आपत्तिजनक फोन आने लगे। यहॉं ज्ञानवान व्यवस्था को लगा कि मामला छोटी मोटी छेड़छाड़ का है और हल्का फुल्का केस दर्ज हुआ।
गंभीरता और प्रकृति के गलत आकलन के ये मामले अलग थलग वाकयात नहीं हैं। घटनाओं, मूल्यों, अपराधों, व्यक्तियों आदि में हाल के समय में कुछ ऐसी जटिलताएं देखने में आईं हैं कि कानून, पुलिस, नैतिकता, तर्क जैसे औजार जो अब तक की व्यवस्था ने खास तौर पर होरी की मौत के बाद विकसित किए थे, इन जटिलताओं को समझने-सुलझाने में नाकाम रहे हैं हालांकि अधिकतर बौद्धिक कारीगर उन्हीं औजारों से इस कोशिश में लगे हैं जरूर। मैच फिक्सिंग, सट्टेबाजी, छिपा कैमरा, फोन टैपिंग, तहलका डॉट कॉम ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं जहां कानून असहाय दिखते हैं, अनैतिकता स्वीकार्य जान पड़ती है और नायक खलनायक की आकृतियाँ एक ही चेहरे में गड्डमड्ड जान पड़ती हैं।
सच दरअसल यह है कि इतिहास की अपनी कोई मंजिल नहीं होती। कई बार दिशा और पैटर्न जरूर होते हैं जिन्हें पकड़ना ऐतिहासिक समझदारी है। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने पूंजीवाद को जन्म दिया था वैसे ही उत्तर औद्योगिक परिदृश्य ने, जहां निर्माण क्षेत्र नहीं वरन सेवा क्षेत्र उफान पर है, उत्तर पूंजीवादी स्थितियाँ पैदा की हैं। इस स्थिति की अपनी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक विशेषताएं हैं, इसकी अपनी शब्दावली है, अपना व्याकरण और औजार हैं। पूंजीवाद ने जब सामंतवाद की जगह ली थी तो उसके भी ऐसे ही नए उपकरण थे जिन्होंने सामंतवाद के तत्संगत उपकरणों की जगह ली थी। सामंतों जमींदारों ने जमीनें बेचकर मिलों, कारखानों, कंपनियों के शंयर खरीदने शुरू कर दिए थे और रियासतों के राजाओं ने कांग्रेस क मेंबरी और लोकसभा का चुनाव लड़ने में अपना भविष्य देखा था। आज पुन: वह स्थिति आन पड़ी है जब पूंजीवादी उपकरण सामयिक स्थितियों को समझ पाने, उनकी व्याख्या करने और उनमें हस्तक्षेप कर उन्हें नियंत्रित करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं। उत्तर पूंजीवादी औजारों जैसे बाजारवाद, उत्तर आधुनिकता, फजी लॉजिक, इंटरनेट, साइबर कैफे, नेटीजनशिप आदि ने पूंजीवादी उपकरणों की जगह लेना शुरू कर दिया है।
यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और कहीं कही लगभग पूरी हो चुकी है। भारत में दौर संक्रमण का है। इस स्थिति संक्रमण की है। इस स्थिति ने संकट उन लोगों के लिए के लिए पैदा कर दिया है जो इस बदलाव को देख तो रहे हैं हालांकि देखना नही चाहते। सामंतवाद के सामंत, संक्रमण के बाद पूंजीवाद के पूंजीपति बन जाते हैं और सामंती व्यवस्था के खेतिहर बिना किसी हील हुज्जत के पूंजीवाद के औद्योगिक मजदूर बन जाते हैं। दिक्कत उस वर्ग के साथ होती है जो खुद को बदले बिना अगले युग में जाना चाहता है। वर्तमान संक्रमण के बाद की व्यवस्था में दलित, शोषित, पीडितों को अधिक मानवीय व्यवस्था मिल जाएगी, ऐसे ख्याली पुलाव पकाना व्यर्थ है। किंतु उनके अस्तित्व पर संकट नहीं है, वे बने रहेंगे- शायद उतने ही दमित, पीडित व शोषित, पर रहेंगे जरूर। सही मानी में सबसे बड़ा संकट हमारी व्यवस्था के उन सभी मध्यवर्गीय विचारवान लोगों पर है जो उत्तर पूंजीवादी स्थितियों पर पूंजीवादी मूल्यों और व्यवस्थाओं को लागू करना चाहते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्थानों (आई आई टी) के परिसरों में जहां कंप्यूटर समय की चोरी इतनी आम है कि प्रत्येक छात्र उसे अपना अधिकार समझता है, इस काम के लिए गिरुतारी और सजा जैसे कदम उठाने वालों लोगों और व्यवस्थाओं की बुद्धि पर केवल तरस खाया जा रहा होगा। इन परिसरों में गोदान न पढ़ा जाता है न पढ़ाया जाता है। पर यहां के लोग जानते हैं कि पूंजीवाद के होरी चाहे व्यक्तियों के रूप में हों या संस्थाओं के रूप में, वे ‘आप्टिकल फाइबर सूचना महामार्ग’ के निर्माण में मारे जाएंगे, जैसे कि सामंतवाद का होरी गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क बनाते हुए मरा था।









