Monday, April 30, 2007

साइबर पथ के होरी......विश्‍वास करें यह लेख सृजन शिल्‍पी पर नहीं है

सृजन ने इधर इंटरनेट और कानून की अपनी समझ व जानकारियों की श्रमसाध्‍य प्रस्‍तुति करना शुरू किया है। अच्‍छा काम है, पर किस नीयत से कर रहे हैं वे जाने...वैसे ही अविनाश हमें संशयजीवी करार दे चुके हैं। उधर सृजन ने नारद प्रकरण में नारद और मोहल्‍ला के द्वारा बार बार कानूनों को तोड़ने का भी हवाला दिया था और उनका यह कहना भी था कि नारद भी इस मामले में दोषी है। भई कानून क्‍या कहते हैं, इस पर हमें कुछ नहीं कहना... सिवाय इसके कि हम नहीं मानते कि वे जो कहते हैं सब ठीक कहते हैं। मुझे पहले साइबर अपराधी की गिरफ्तारी के अवसर पर लिखा अपना लेख याद आया। लेख 29 जून 2000 को जनसत्‍ता में प्रकाशित हुआ था। कटिंग थी पास में लेकिन टाईप दोबारा करना पड़ा...टाईप करने के दौरान ही लगा कि आज शायद तब से भी ज्‍यादा प्रासंगिक है। अब इसके प्रकाशन से किसी ससुरे न्‍यायधीश की बेइज्‍जती होती हो तो हो। लीजिए हाजिर है....और जैसा कि डिस्‍क्‍लेमर का फैशन है कह दें कि होरी होरी हैं इन्‍हें सृजन न माना जाए, वैसे भी लेख 7 साल पुराना है...तब हम सृजन को नहीं जानते थे।

साइबर पथ के होरी
जनसत्‍ता 29.06.‍2000
दिल्‍ली में भारत का पहला साइबर अपराधी पकड़ा गया और फिर दूसरा भी। पहले मामले में एक इंजीनियर ने सेना के अधिकारी के पासवर्ड – जो स्‍वयं उस अधिकारी ने दिया था- का उपयोग करके उसके इंटरनेट समय से लगभग 100 घंटे का उपयोग कर डाला। इतने समय की कीमत इस समय बाजार में लगभग 750 रुपए है और यह चोर बाजार में 400-500 रुपए में मिल जाता है। यह खबर पढ़ते हुए प्रेमचंद के ‘होरी’ की बांसों के सौदे में अपने भाई से पांच रुपए की बेईमानी याद आई। आज होरी का याद आना संयोग भर नहीं है। ‘गोदान’ का होरी भारतीय संवेदना के इतिहास का अहम चरित्र है। वह चूंकि सामंतवाद से पूंजीवाद के संक्रमण का सबसे बड़ा चरित्र रहा है इसलिए अब इस नए संक्रमण में जिसमें हम खड़ें हैं, होरी को याद कर लेना जरूरी जान पड़ता है। इस ‘बेचारे’ चोर इंजीनियर को पहली बार में जमानत भी न मिल पाई ओर 400-500 रुपए की हेरा फेरी में वह 20-25 दिन जेल में रह आया। अभी मुकदता चलेगा, सो अलग। दूसरा मामला साइबर भी था और अपराध भी, शायद इसीलिए अभियुक्‍त को पहली ही पेशी में जमानत मल गई। इस मामले में अभियुक्‍त ने खुद को महिला के रूप में पेश करते हुए दूर विदेश में बैठे लोगों के साथ अश्‍लील वार्तालाप के सत्र में अपनी खुन्‍नस वाली एक भद्र महिला का फोन नंबर कुछ मनचलों को इंटरनेट पर उपलब्‍ध करा दिया और बेचारी महिला के पास बड़ी संख्‍या में आपत्तिजनक फोन आने लगे। यहॉं ज्ञानवान व्‍यवस्‍था को लगा कि मामला छोटी मोटी छेड़छाड़ का है और हल्‍का फुल्‍का केस दर्ज हुआ।

गंभीरता और प्रकृति के गलत आकलन के ये मामले अलग थलग वाकयात नहीं हैं। घटनाओं, मूल्‍यों, अपराधों, व्‍यक्तियों आदि में हाल के समय में कुछ ऐसी जटिलताएं देखने में आईं हैं कि कानून, पुलिस, नैतिकता, तर्क जैसे औजार जो अब तक की व्‍यवस्‍था ने खास तौर पर होरी की मौत के बाद विकसित किए थे, इन जटिलताओं को समझने-सुलझाने में नाकाम रहे हैं हालांकि अधिकतर बौद्धिक कारीगर उन्‍हीं औजारों से इस कोशिश में लगे हैं जरूर। मैच फिक्सिंग, सट्टेबाजी, छिपा कैमरा, फोन टैपिंग, तहलका डॉट कॉम ऐसे ही कुछ उदाहरण हैं ज‍हां कानून असहाय दिखते हैं, अनैतिकता स्‍वीकार्य जान पड़ती है और नायक खलनायक की आकृतियाँ एक ही चेहरे में गड्डमड्ड जान पड़ती हैं।
सच दरअसल यह है कि इतिहास की अपनी कोई मंजिल नहीं होती। कई बार दिशा और पैटर्न जरूर होते हैं जिन्‍हें पकड़ना ऐतिहासिक समझदारी है। जिस प्रकार औद्योगिक क्रांति ने पूंजीवाद को जन्‍म दिया था वैसे ही उत्‍तर औद्योगिक परिदृश्‍य ने, जहां निर्माण क्षेत्र नहीं वरन सेवा क्षेत्र उफान पर है, उत्‍तर पूंजीवादी स्थितियाँ पैदा की हैं। इस स्थिति की अपनी आर्थिक, सामाजिक, राजनैतिक और वैचारिक विशेषताएं हैं, इसकी अपनी शब्‍दावली है, अपना व्‍याकरण और औजार हैं। पूंजीवाद ने जब सामंतवाद की जगह ली थी तो उसके भी ऐसे ही नए उपकरण थे जिन्‍होंने सामंतवाद के तत्‍संगत उपकरणों की जगह ली थी। सामंतों जमींदारों ने जमीनें बेचकर मिलों, कारखानों, कंपनियों के शंयर खरीदने शुरू कर दिए थे और रियासतों के राजाओं ने कांग्रेस क मेंबरी और लोकसभा का चुनाव लड़ने में अपना भविष्‍य देखा था। आज पुन: वह स्थिति आन पड़ी है जब पूंजीवादी उपकरण सामयिक स्थितियों को समझ पाने, उनकी व्‍याख्‍या करने और उनमें हस्‍तक्षेप कर उन्‍हें नियंत्रित करने में नाकाम सिद्ध हो रहे हैं। उत्‍तर पूंजीवादी औजारों जैसे बाजारवाद, उत्‍तर आधुनिकता, फजी लॉजिक, इंटरनेट, साइबर कैफे, नेटीजनशिप आदि ने पूंजीवादी उपकरणों की जगह लेना शुरू कर दिया है।
यह प्रक्रिया शुरू हो चुकी है और कहीं कही लगभग पूरी हो चुकी है। भारत में दौर संक्रमण का है। इस स्थिति संक्रमण की है। इस स्थिति ने संकट उन लोगों के लिए के लिए पैदा कर दिया है जो इस बदलाव को देख तो रहे हैं हालांकि देखना नही चाहते। सामंतवाद के सामंत, संक्रमण के बाद पूंजीवाद के पूंजीपति बन जाते हैं और सामंती व्‍यवस्‍था के खेतिहर बिना किसी हील हुज्‍जत के पूंजीवाद के औद्योगिक मजदूर बन जाते हैं। दिक्‍कत उस वर्ग के साथ होती है जो खुद को बदले बिना अगले युग में जाना चाहता है। वर्तमान संक्रमण के बाद की व्‍यवस्‍था में दलित, शोषित, पीडितों को अधिक मानवीय व्‍यवस्‍था मिल जाएगी, ऐसे ख्‍याली पुलाव पकाना व्‍यर्थ है। किंतु उनके अस्तित्‍व पर संकट नहीं है, वे बने रहेंगे- शायद उतने ही दमित, पीडित व शोषित, पर रहेंगे जरूर। सही मानी में सबसे बड़ा संकट हमारी व्‍यवस्‍था के उन सभी मध्‍यवर्गीय विचारवान लोगों पर है जो उत्‍तर पूंजीवादी स्थितियों पर पूंजीवादी मूल्‍यों और व्‍यवस्‍थाओं को लागू करना चाहते हैं।
भारतीय प्रौद्योगिकी संस्‍थानों (आई आई टी) के परिसरों में जहां कंप्‍यूटर समय की चोरी इतनी आम है कि प्रत्‍येक छात्र उसे अपना अधिकार समझता है, इस काम के लिए गिरुतारी और सजा जैसे कदम उठाने वालों लोगों और व्‍यवस्‍थाओं की बुद्धि पर केवल तरस खाया जा रहा होगा। इन परिसरों में गोदान न पढ़ा जाता है न पढ़ाया जाता है। पर यहां के लोग जानते हैं कि पूंजीवाद के होरी चाहे व्‍यक्तियों के रूप में हों या संस्‍थाओं के रूप में, वे ‘आप्टिकल फाइबर सूचना महामार्ग’ के निर्माण में मारे जाएंगे, जैसे कि सामंतवाद का होरी गांव को शहर से जोड़ने वाली सड़क बनाते हुए मरा था।

Friday, April 27, 2007

ब्‍लॉगराइनों की व्‍यथा........नारद पर बजर गिरे

हमारे पुराने घर के पड़ोस में एक मास्‍टराईन रहती थीं, अब थीं तो वह सामान्‍य गृहिणी ही पर चूंकि उनके पति प्राईमरी स्‍कूल मास्‍टर थे इसलिए उन्‍हें मास्‍टराईन की पदवी सहज ही हासिल हो गई। कस्‍बों की तो यह रीत रही ही है और लिंग बदलों के सवाल के जवाब में सालों से लिखा आता आ रहा है कि मोची- माचिन, धोबी-धोबन, डाक्‍टर- डाक्‍टरनी (डाक्‍टराइन) .... इस तर्ज पर ब्‍लॉगर पत्‍नियॉं हुईं ब्‍लॉगराइन। तो मित्रो आज की कथा ब्‍लॉगराइनों की व्‍यथा है। वे ब्‍लॉगराइनें जो खुद तो ब्‍लॉगियाती नहीं है पर चूंकि उनके पति ब्‍लॉगियाते हैं इसलिए भुगतती हैं। नोट पैड ने विवाह के शोषण पर लिखा तो डिस्‍क्‍लेमर लगाया कि उन्‍हें ही दु:खी न मान लिया जाए..और यूँ भी आजकल तो डिस्‍क्‍लेमर ‘इन थिंग’ हो गए हैं। इसलिए साफ बता दें कि ये हमारी या हमारी पत्‍नी की व्‍यथा नहीं है क्‍योंकि हमारी गत तो और बुरी है। एक ही उल्‍लू काफी होता है बरबादे गुलिस्‍तां करने को यहॉं तो सभी ब्‍लॉगर हैं....पर वो फिर कभी। आज तो शुद्ध ब्‍लॉगराइनों पर लिखा जाए।

यूँ तो ब्‍लॉगराइनें भी मनुष्‍य प्रजाति की ही प्राणी होती हैं और यह वृत्ति उन्‍होंने अपनी पसंद से नहीं चुनी होती वे इस दुनिया में धकेल दी गईं होती हैं। उनके पिताओं ने या खुद उन्‍होंने तो अच्‍छे खासे खाते पीते और जिंदा इंसानों को चुना था पर बुरा हो उस आलोक जो ये लिख मारा।



नमस्ते।
क्या आप हिन्दी देख पा रहे हैं?
यदि नहीं, तो यहाँ देखें।

हाँ भैया हम तो देख पा रहे हैं पर क्‍या तुम देख पा रहे थे कि ये लिखकर तुम कितने घरों की बरबादी का सामान लिख रहे हो। मुआ मरद सुबह से शाम तक नौकरी पीट कर आता है और घर में घुसते ही बिना कमीज उतारे, जूते रैक में रखे सीधा कंप्‍यूटर की ओर लपकता है, कंप्‍यूटर ऑन करके बाथरूम में घुसता है ताकि जब तक वापस आए कंप्‍यूटर ऑन हो जाए और फिर गिटर पिटर शुरू।
....हम तो खरीदी हुई लौंडी हो गई हैं अरे इससे तो बाहर कोई चक्‍कर वक्‍कर ही चला लेता कम से कम घर में तो हमारा होता। ओर फिर तब तो तमाम दुनिया की सहानुभूति हमारे साथ होती। अब सारी दुनिया समझती है कि कितना शरीफ आदमी है सर झुकाए मोहल्‍ले भर से गुजरता है किसी की तरफ ऑंख उठाकर देखता तक नहीं- अब कौन बताए कि देखेगा क्‍या खाक चलते चलते तक तो दिमाग नारद पर अटका होता है...मन मस्तिष्‍क ऑनलाइन होता है टिप्‍पणियॉं सोची जा रही होती हैं स्‍माइली लग रही होती हैं...हाय मॉं मेरे ही साथ ऐसा होना था। ओर यह प्रोषित पतिका विरहिणी जार जार रोती है। वह अचानक त्रिलोचन की चम्‍पा बन जाती है-


चम्‍पा काले पीले चिट्ठे नहीं चीन्‍हती...
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:
:
नारद पर बजर गिरे


इस चिट्ठा प्रेरित विरहावस्‍था का आलम यह है कि पति पर अब धमकियों का असर नहीं होता...मायके चले जाने को वह अवसर की तरह लेता है और लौटने पर उसके चिट्ठे का टैंपलेट बदला हुआ होता है...कई जुगाड़ी लिंक उसने जॉंच लिए होते हैं, उसके गूगलटॉक में कई नए चिट्ठेकार जुड़ गए होते हैं। पत्‍नी मन मसोसका अगली बार मायके न जाने की प्रतिज्ञा करती है। इस विरहावस्‍था में वह विरह की दसो दशाओं से गुजरती है।

अभिलाषा- आज जब ब्‍लॉगर आएगा तो उसे ब्‍लॉग नहीं मैं याद होंगी, या काश आज तीन घंटे बिजली न रहे।
चिन्‍ता- कहीं मुआ रास्‍ते में ही किसी साईबर कैफे में न घुस गया हो।
स्‍मृति- उसे याद आते हैं वे रात दिन....जब कोई कंप्‍यूटर न था, नारद न था...बस मैं थी और तू था।
गुणकथन – वह बहुत संवेदनशील था, प्‍यार करता था मतलब जो कुछ वह प्रोफाइल में लिखता है चिट्ठों में बताता है पहले सच में वह ऐसा था।
उद्वेग – सौतन कंप्‍यूटर के पास रखे होने के कारण ए.सी. की हवा भी लू के समान प्रतीत होती है।
प्रलाप - हाय।। इस नारद को, आलोक को, चिट्ठे को मेरी हाय लगे...नारद पर बजर गिरे
उन्‍माद – आज...आज या तो इस घर में मैं रहूँगी या ये कंप्‍यूटर....(फिर इसका मतलब समझ में आ जाता है कि कंप्‍यूटर का विरहिणी कुछ बिगाड़ नहीं पाएगी इसलिए शांत हो जाती है)
व्‍याधि – अब क्‍या होगा...इस चिंता में ब्‍लॉगराइन बिस्‍तर पकड़ लेती है- कमबख्‍त ब्‍लॉगर इस पर भी साथी बलॉगर से राय लेकर ही कुछ करने का विचार करता है।
जड़ता – अब ब्‍लॉगर के आने की घंटी बजती है, बलॉगराइन पर कोई असर नहीं होता वह सुख दुख से दूर हो गई है।
मरण- इसका वर्णन निषिद्ध है वरना ये भी संभव है।

तो हे चिट्ठाकारो।। जागो अपने अमर्त्‍य चिट्ठाजीवन में ब्‍लॉगराइन के प्रति इतने निष्‍ठुर न हो जाओ। वैसे है तो ये हमारी धूर्त ब्‍लॉगिंग ही कि ब्‍लॉगिंग के अनाचार को भी एक पोस्‍ट बना दिया जाए पर क्‍या करें आदत से मजबूर हैं।

Wednesday, April 25, 2007

बुर्के में ज्‍योतिहीन आँखें....और नेत्रहीन का वैष्‍णोंदेवी दर्शन

कॉलेज का मास्‍टर हूँ और एक मायने में छुट्टियाँ चल रही हैं- एक मायने में इसलिए कि दरअसल चल तो रहे हैं इम्तिहान, पर पढ़ाई नहीं हो रही इसलिए पढ़ाना नहीं है। इसलिए जहाँ विद्यार्थी एक यातना से गुजर रहे हैं वहीं अध्‍यापक कभी कभी जाकर इम्तिहान में ड्यूटी बजाकर आ जाते हैं यानि इनविजीलेशन। आज भी था...चौकीदारी करने गए कोई नकल ना करे...आगे पीछे से न देखे। अक्‍सर लोगों को बहुत चाट काम लगता है..तीन घंटे चुपचाप। कुछ भी बोलो तो फुसफुसाकर...एक रहस्‍यमयी यातनामयी चुप्‍पी। पर ऐसा साथी लोग कहते हैं..मेरी राय फर्क है। मेरी प्रोफाइल पर नजर डालें वर्षों से वहॉं लिखा है कि अकेले चलना मुझे पसंद है और यही तो करना होता है इस चौकीदारी में। तीन घंटे मंद-मंद चलता रहता हूँ और दिमाग मंद-तेज चलता रहता है।

आज भी वही कर रहा था। जिस कॉलेज में हूँ वहाँ काफी विद्यार्थी मुसलमान हैं जिनमें कुछ छात्राएं बुर्के में भी आती हैं, अब इस पर अलग से नजर नहीं जाती, सामान्‍य ही लगता है, गणित, विज्ञान, साहित्‍य पढ़ती बुर्के वाली छात्राएं। रसोई और सौंदर्य पर अपनी राय हम व्‍यक्‍त कर चुके हैं ऐसे में जाहिर है कि वस्‍तुनिष्‍ठ रूप से हमारी राय बुर्के के पक्ष में नहीं है पर सुनीलजी की उस राय से भी सहमत हैं कि हम उनकी आजादी की परिभाषा तय नहीं कर सकते।

खैर...जिस कमरे में चौकीदारी करनी थी वह मुख्‍य प्रवेश के निकट था तभी एक परिचित का हाथ थामे एक छात्रा जिसने बुर्का पहना था लेकिन नकाब नहीं था वह गुजरी। उसके एकाध कदम आगे निकल जाने के बाद ध्‍यान दिया कि वह दरअसल नेत्रहीन थी। मैं हतप्रभ था...नहीं ऐसा नहीं कि नेत्रहीन विद्यार्थियों या बुर्के वाली छात्राओं को पढ़ाना मेरे लिए कोई नई बात है वरन इसलिए कि एक ही छात्रा को इन दो रूपों में देखना मुझे असहज बना रहा था। जो खुद देखने में असमर्थ है...देखना क्‍या है इससे अपरिचित है वह खुद को न दिखने देने के लिए इतना सजग क्‍यों। देखना बुरा भी हो सकता है..देखने से वंचित ये कैसे सोचता होगा। ओर भी बहुत कुछ इस दोहरे वंचन पर सोचा.... पर वह छात्रा क्‍या सोचती होगी यह नहीं पता। ....और भी, ये कि नेत्रहीन के लिए खुद को संभलना ही क्‍या कम था कि बुरका भी लाद लिया। धर्म वगैरह की क्रूरता भी मन में आयी।

फिर याद आया अपना नजदीकी मित्र नरेश। नेत्रहीन है, पढ़ता-पढ़ाता-लिखता है...कम्‍यूनिस्‍ट टाईप है पर आस्तिक है हमारे उलट। नजदीकी है इसलिए बिना आशंका के कह पाते हैं कि यार एक बात बताओ ये वैष्‍णो देवी जाकर क्‍या भाड़ भूंजते हो..क्‍या ‘दर्शन’ करते हो, जिधर मर्जी मुँह करके हाथ जोड़ लो....नेत्रहीन का तो हो गया दर्शन। पर उनका धर्म नाम की सत्‍ता संरचना में विकलांगता के हाशियाकरण की अपनी समझ है...हम भी जोर नहीं देते।


आज लगा कि ये भी बुरका ही तो है।

Tuesday, April 24, 2007

सागर अविनाश से नाराज हैं.....मसिजीवी क्‍या करे

नीलिमा को अपने शोध के विचार बॉंटने थे इसलिए उन्‍होंने घोषणा की, कि चिट्ठाजगत में शॉंति की आहट सुनाई दे रही है पर हमें मालूम है कि उन्‍हें मालूम है कि सब शॉंत नहीं है। वे दिखावा कर रही हैं कि सब शॉंत है और हम दिखावा कर रहे हैं कि हमें भी विश्‍वास है कि सब शाँत है। थोड़े थोड़े संकेत पाने के लिए नीचे के चित्र को देखिए-




ये बोल्‍ड अक्षरों में नारद प्रतिदावा क्‍यों ?



यूँ तो सामान्‍य सा विधिक रिवाज है पर यहॉं कुछ ज्‍यादा मुखर है। वैसे सृजन बेहतर जानें कि इस विधिक दावे की वैधता पर उनका यकीन कितना है पर अपने लिए तो ये संकेत भर है कि सब उतना ठीक नहीं।
ऐसे में अपने दिमाग में खलबली मच जाती है- अपन किसी के अग्निशमन दस्‍ते में नहीं हैं....कुछ को तो लगता होगा कि आग बुझाऊ.... छोड़ो जनाब आग लगाऊ हैं आप। हमें कोई सफाई नहीं देनी पर इतना जरूर लगता है कि इस सारे अविनाश-हिंदूबाजी-हिंदू विरोधी मसले पर अपनी एक निश्चित राय रही और उसके ही मद्देनजर हम वे कहते रहे जो हमने कहा और वह मौन भी जो हमने जहॉं भी धारण किया वह भी हमारा स्‍टैंड ही था। हम समीरजी की तरह अजातशत्रु नहीं हैं न ही हो सकते हैं। यह सब क्‍यों कहना पड़ रहा है- इसलिए कि हमें संकेत दिया गया कि अविनाश के माफीनामे वाली पोस्‍ट और उनपर बैन लगवा पाने में ‘असफलता’ में उन लोगों के नैतिक समर्थन का भी हाथ है जिन्‍होंने बैन विरोधी रवैया अपनाया। अब ये तो स्‍वीकार करना ही होगा कि हाँ हम बैन विरोधी रहे हैं, हैं।
तो बताया गया कि कुछ लोग इस असफलता से बेहद दु:खी हैं और.... जो तटस्‍थ हैं समय लिखेगा उनका भी अपराध। तो हम अपराधी भले ही हों तटस्‍थ कतई नहीं है। ये भी कहा गया कि नारद छोड़ने का मन कई लोग बना चुके हैं- ये निसंदेह अफसोसजनक है पर देर सवेर ऐसा होना तो है ही। इतने अधिक सोचने समझने लिखने वाले लोग एक साथ रहेंगे तो टकराव होंगे ही और इनकी अभिव्‍यक्ति इसी रूप में होनी तार्किक जान पड़ती है। इस सब के वावजूद.....हमें लगता है न केवल बहिष्‍कार, बैन वरन संन्‍यास, तुम्‍हारी ओर झांकूंगा भी नहीं, टिप्‍पणी नहीं करूंगा, नारद से ही चला जाऊंगा.. ये सब चिट्ठाकारी की परिघटनाएं नहीं होनी चाहिए। और अगर नाराजगी है भी तो ऐसे नाराज होऔ कि कल को फिर दोस्‍ती हो तो शर्मिंदगी न हो।
अब सवाल यह कि इस सारे मसले में मसिजीवी कहाँ हैं। ये जो चिट्ठाजगत के कितने पाकिस्‍तान खड़ा हुए उसमें उनका टोबा टेक सिंह कहाँ है। तो जबाव है कि अदीब को टीस भर मिलतीं हैं....बिन सागर चंद नाहर के चिट्ठाकारी का इतिहास वो नहीं रह जाता है जो उसे होना चाहिए... पर अविनाश को जबरिया धकेल बाहर करने की कोशिश तक से भी चिट्ठाकारी, चिट्ठाकारी नहीं रह जाती। अविनाश बहस चाहते हैं किंतु जिस अंदाज में वे ऐसा कर रहे थे वह आपत्तिजनक था जवाब भी बहुत संयत नहीं थे पर मित्रो चिट्ठाकारी का हनीमून पीरियड खत्‍म हो चुका है इसलिए टकराहट तो होगी ही, हिट्स के लिए होगी, नारद पर नियंत्रण के लिए होगी, गुटों के लिए होगी, अहम के लिए होगी। इसलिए हम किसी को नहीं मना रहे पर बस इतना कह रहे हैं कि जैसे औरंगजेब की ज्‍यादतियॉं एक शंहशाह की हकूमत की तरकीबें थीं न कि इस्‍लाम बनाम हिंदू। उसी तरह यहॉं की लड़ाइयॉं केवल ज्‍यादा जमीन घेरने की कवायद हैं उन्‍हें हिंदू विरोधी-हिंदू समर्थन की तरह न देखो- बाकी लड़ो भरसक लड़ो- पर वापसी का रास्‍ता खुला रखो। बाकी रहा नारद का प्रतिदावा- क्‍या फर्क पड़ता है, अगर नारद सिर्फ ऐग्रीगेटर है तो मोहल्‍ला पर अविनाश ही कौन खुद लिखते हैं वे भी एक प्रतिदावा कापी पेस्‍ट कर चेप देंगे मोहल्‍ले पर- लेखक खुद जिम्‍मेदार हैं हमें कुछ नहीं पता।

Monday, April 23, 2007

सावधान..... दैनिक हिंदुस्‍तान में सुधीश पचौरीजी की नजर हिंदी ब्‍लॉ्गिंग पर

हमें आशंका तो पहले ही थी। दर्ज भी कर चुके थे। और यह देर सवेर होना भी था। हुआ क्‍या....। बड़े समीक्षकों की नजर ब्‍लॉग की दुनिया पर पड़ गई है। कल के दैनिक हिंदुस्‍तान में प्रो. सुधीश पचौरी ने हिंदी के कुछ ब्‍लॉग लेखकों पर नजर डाली है। आप भी एक नजर डाल लें।



वैसे ये भी एक मोहल्‍ला विवाद ही है। पर अविनाश का मोहल्‍ला नहीं, सराए वालो का साईबर मोहल्‍ला जिसमें दिल्‍ली के वंचित वर्ग के बच्‍चों के ब्‍लॉग लिखने की एक परियोजना साईबर मो‍हल्‍ला नाम से चलाई जाती है। जिनमें से कुछ चयनित सामग्री का प्रकाशन पुस्‍तकाकार में किया जा रहा है। जिसकी समीक्षा स्‍वरूप यह लेख लिखा गया है। यूँ यह मुख्‍यधारा चिट्ठाकारी पर आधारित नहीं है पर दिशा इधर ही है। वैसे स्‍वागत किया जाना चाहिए या पता नहीं.....। सावधान ब्‍लॉगर समुदाय....बड़े समीक्षकों की नजर अच्‍छा शकुन ही हो यह जरूरी नहीं।

पूरा लेख इस नीचे की छवि पर क्लिक करके पढ़ा जा सकता है।


Saturday, April 21, 2007

तू तक, तू तक, तू तिया....अई जमाल होए

जब कॉलेज में पढ़ते थे तो यह एक लोकप्रिय पंजाबी गीत था..तू तक, तू तक, तू तिया....अई जमाल होए। मुझे नहीं मालूम था आज भी नहीं मालूम कि इसका कोई अर्थ है कि नहीं। मुझे यह जोश में गाई निरर्थक ध्‍वनि ही लगता था। अब क्‍यों याद आई...जमाल से और इस निरर्थकता से।
पहले पूरी पृष्‍ठभूमि संक्षेप में। मनीषा ने नया ज्ञानोदय के फरवरी अंक में एक लेख लिखा इंटरनेट पर हिंदी साहित्‍य, कोई पातालफोड़ लेख नहीं है जैसा हम लोग प्रिंट की पत्रिकाओं में लिखते हें परिचयात्‍मक सा ठीक ठाक लेख है। अगले अंक में इस पर प्रतिक्रिया में श्रीमान हसन जमाल ने जो शेष नाम की पत्रिका चलाते हैं इसकी प्रतिक्रिया में बेहद भड़काउ अंदाज में कुछ कुछ मोहल्‍ले नुमा प्रतिक्रिया लिखी- अर्थ पकड़ना तो आसान नहीं पर कुल मिलाकर यह कि भरे पेट के लोगों की बिन रोटी वालों को केक खाने की सलाह है इंटरनेट पर साहित्‍य की बात। और ये भी कि पूरी नस्‍ल बरबाद कर रहा है कंप्‍यूटर और इंटरनेट....क्‍या क्‍या गिनाएं खुद अनूमान लगा लीजिए।
हम तो विश्‍वविद्यालयी हिंदीबाजों में ऐसे तर्कों से भाल रोज ही फोड़ते हैं। अब अप्रैल के अंक में हसन जमाल साहब की प्रतिक्रिया से असहमति बताते हुए तीन प्रतिक्रियाएं प्रकाशित हुई हैं- एक तो अपने रवि रतलामी जी ने संयत और मैं तो कहूँगा कि कुछ ज्‍यादा ही नरम शब्‍दों में हसन साहब को समझाने की कोशिश की है कि भाई पहले जानो समझो फिर बात कहो। बाकी दो टिप्‍पणियाँ पुणे की दीप्ति गुप्‍ता और दिल्‍ली के नीलाम्‍बुज सिंह की हैं। मुझे ये दोनों मित्र याद नहीं आ रहे पता नहीं चिट्ठाकारी में हैं कि नहीं पर इन्‍होने भी जमकर खबर ली है हसन जमाल साहब की।
मामला खत्‍म होना या समझा जाना चाहिए, पर दिक्‍कत है। और दिक्‍कत यह है कि हम पहले ही कह चुके हैं कि भई हम बड़े बुडबक इंसान हैं। मित्र लोग बिध्‍न संतोषी भी घोषित कर चुके हैं। तो भाई जहॉं लोग मान जाते हैं कि बात खत्‍म हो गई हमें लगता है कि बात तो शुरू हुई है। अब तक चिट्ठाकारी चंद सिरफिरों के खतूत भर थी इसलिए एम एस एम यानि मेन स्‍ट्रीम मीडिया या मुख्‍यधारा मीडिया उदासीन उपेक्षा से काम लेता था पर अब आवरण कथाएं आ रही हैं, इलेक्‍ट्रानिक मीडिया पर कवरेज हो रहा है, लेख भी छप रहे हैं।
यानि सत्‍ता प्रतिष्‍ठानों के जड़ दरवाजों पर खटखटाहट अब शुरू हो गई है इसलिए इन दुर्गों के किलेदार हसन जमाल साहब जैसे ही तर्कों के हथियारों से हमला करने वाले हैं। कम से कम दो तर्क तो बार बार आने वाले हैं पहला ये कि इंटरनेट चंद खाते पीते लोगों की चीज है इसका हिंदी मुख्‍यधारा से कोई सरोकार नहीं और दूसरा यह कि यह हिंदी के बहुत छोटे समुदाय की नुमाईंदगी करता है ( यानि से विध्‍न संतोषी लोग हैं) इन्‍हें मत सुनो। ऐसा नहीं जबाव हें नहीं या दिए नहीं जा सकते पर बंधु लोगों संवाद उससे ही हो सकता है जो संवाद में यकीन करता हो। हम तो अपने बीच के अविनाशों से संवाद कायम कर पाने में असफल सिद्ध हुए जो कम से कम हमारी भाषा में तो बात करते हैं- हसन जमाल का क्‍या करेंगे जो तू तक तू तक जैसे निरर्थक तर्कों से अपनी बात कहते व सिद्ध मानते हैं?

Friday, April 20, 2007

चिट्ठाकारी पर एक और लेख- आज दैनिक भास्‍कर में

आज दैनिक भास्‍कर में चिट्ठाकारी पर एक परिचयात्‍मक लेख प्रकाशित हुआ है। एक नजर डालें- कमी बेसी हो तो हमें बताएं






वैसे पूरा लेख निम्‍नवत है-


हम ब्‍लॉगिए हैं, हमारे चिट्ठे पर पधारो सा



हिंदी की चिट्ठाकारिता ने अपने पाँव अब पालने से बाहर निकाल लिए हैं और वह अब सही मायने में अपने पाँवों पर खड़ी है। सूचना तकनीक का सबसे मूर्तिमान रूप इंटरनेट है। और इंटरनेट पर हिंदी की मौजूदगी का सबसे अहम हिस्‍सा है हिंदी ब्‍लॉग जिनके लिए वहॉं चिट्ठे शब्‍द का इस्‍तेमाल होता है। ब्‍लॉग ‘बेवलॉग’ का संक्षिप्‍त रूप है जो एक व्‍यक्तिगत बेवसाईट होती है। ब्‍लॉग करने वाले ब्‍लॉगर कहलाते हैं तथा ब्‍लॉगलेखन ही ब्‍लॉगिंग कहलाता है। हिंदी में इनके लिए क्रमश: चिट्ठाकार व चिट्ठाकारिता शब्‍दों का इस्‍तेमाल किया जाता है। अंग्रेजी में चिट्ठाकारी की शुरूआत 1997 में डेव वाइनर के ब्‍लॉग ‘स्क्रिप्टिंग न्‍यूज’ से हुई। जबकि हिंदी में चिट्ठाकारी की शुरूआत 2003 में हुई जब आलोक ने अपना चिट्ठा “नौ दो ग्यारह” शुरू किया फिर धीरे धीरे पद्मजा, जितेंद्र, रवि रतलामी, पंकज, अनूप, देवाशीष आदि चिट्ठाकार जुड़ते गए और कारवां बनता गया। आज हिंदी में 500 से अधिक चिट्ठे हैं जिनमें से बहुत से बेहद सक्रिय हैं।

चिट्ठाकारी हिंदी की दुनिया की एक अहम परिघटना है। ये चिट्ठे जो अकसर चिट्ठेकार ने बेहद अनौपचारिक व अनगढ़ता के साथ अपने आस- पास के विषयों पर या देश-दुनिया की घटनाओं पर लिखें होते हैं, वे सार्वजनिक दुनिया में आम भारतीय की राय की नुमाइंदगी करते हैं। इलाहाबाद उच्‍च न्‍यायालय का मुसलमानों के अल्‍पसंख्‍यक होने को लेकर हुआ फैसला हो या राहुल गांधी के बयान या कुछ और....इनपर आम देशवासी की राय जानने का एक आसान तरीका है कि नारद ( http://narad.akshargram.com/ ) पर जाएं और देखें कि आम देशवासी जिनमें साईबर कैफे चलाने वाले सागरचंद नाहर हैं, सरकारी अफसर अनूप हैं, अध्‍यापिका घुघुती बासुती हैं, गृहिणियाँ, विद्यार्थी और तमाम काम करने वाले लोग हैं उन्‍होंने अपने चिट्ठों पर इन विषयों पर क्‍या लिखा है। ये सैकड़ों चिट्ठाकार अपने चिट्ठों पर इन विषयों पर अपनी बेबाक राय देते हैं- ये राय किसी संपादक की मेज से नहीं गुजरती, किसी सेंसर बोर्ड की कैंची का शिकार नहीं होती, एकदम खुली बिंदास राय सबके सामने सबके लिए। यही नहीं आप इस राय पर इतनी ही खुली प्रतिक्रिया तुरंत दे सकते हैं। यह राय मशवरे का एकदम लोकतांत्रिक रूप है।
चिट्ठाकारी के इसी खुलेपन के कारण इसे दुनिया भर के सबसे ताकतवर मीडिया रूप के में पहचाना जा रहा है। आज के दिन तक दुनिया में कम से कम साढ़े सात करोड़ चिट्ठे हैं (स्रोत – टैक्‍नाराटी) और ये केवल अंग्रेजी में नहीं है वरन जापानी, रूसी, फ्रेंच स्‍पेनिश में ही नहीं वरन फारसी, हिंदी, मलयालम, मराठी, बंगाली आदि दुनिया की बहुत सी भाषाओं मे चिट्ठेकारी हो रही है। दरअसल ये आम गलतफहमी है कि इंटरनेट की भाषा अंग्रेजी है क्‍योंकि सच्‍चाई तो यह है कि दुनियाभर की चिट्ठासामग्री का केवल 30% ही अंग्रेजी में है। हिंदी चिट्ठाकारी ने देवनागरी लिपि को इस्‍तेमाल करने की शुरुआती दिक्‍कतों की वजह से धीमी गति से अपना सुर शुरू किया था लेकिन अब इसने भी रफ्तार पकड़ ली है।
हिंदी चिट्ठाकारी के इस द्रुत विकास का श्रेय जहाँ कुछ पुराने चिट्ठेकारों को जाता है जिन्‍होनें हिंदी में लिखने ओर पढ़ने की तमाम तकनीकी दिक्‍कतों को दूर करने में बहुत सा समय और ऊर्जा खर्च की। वहीं हिंदी चिट्ठाकारी को अपने पैरों पर खड़ा करने में नारद और अक्षरग्राम ने भी सबसे अहम भूमिका अदा की है। नारद दरअसल एक फीड एग्रीगेटर है जिसका मतलब यह है कि उपलब्‍ध हिंदी चिट्ठों पर जैसे ही कोई नई सामग्री आती है यह उसकी सूचना दर्शा देता है। इच्‍छुक चिट्ठाकार इस चिट्ठे पर जाकर टिप्‍पणियों के माध्‍यम से लेखक का उत्‍साहवर्धन करते हैं, गलतियों के विषय में सुझाव देते हैं। इससे सबसे बड़ा फायदा यह हुआ है कि इसने हिंदी चिट्ठाकारों का एक जीवंत समुदाय खड़ा किया है जिसके सदस्‍य एक दूसरे का साथ देने के लिए तत्‍पर रहते हैं। नारद के अलावा इंटरनेट पर हिंदी के परवानों ने सर्वज्ञ व परिचर्चा जैसे मंच भी खड़े किए हैं जो हिंदी को इंटरनेट की समर्थ भाषा के रूप में खड़े करने की दिशा में मील का पत्‍थर हैं। सवर्ज्ञ जहाँ एक हिंदी का विकी-एनसाईक्‍लोपीडिया है जो किसी भी विषय पर हिंदी में सामग्री मुहैया कराता है वहीं परिचर्चा हिंदी में वाद- संवाद का एक मंच है।

आज न केवल बहुत से चिट्ठाकार लिख रहे हैं वरन वे लिखने के लिए दुनिया जहान के विषयों को चुन रहे हैं। कनाडा में रह रहे एकाउटेंट समीर व्‍यंग्‍य लिखना पसंद करते हैं तो इटली में बसे डाक्‍टर सुनील दीपक को कला और संस्‍कृति पर कीबोर्ड चलाना भाता है, हैदराबाद के वैज्ञानिक व कवि लाल्‍टू सामाजिक बदलाव की अलख के लिए चिट्ठाकारी करते हैं, मनीषा सरकारी कर्मचारियों के लिए ब्‍लॉग चलाती हैं जिसमें वेतन आयोग से संबंधित समाचार व अफवाहें होती हैं, साहित्यिक व पत्रकारी विषयों पर लिखने वालों की तो खैर एक लंबी कतार है हिंदी चिट्ठाकारी में। एन डी टी वी के पत्रकार अविनाश ने तो मोहल्‍ला नाम से चिट्ठा शुरू ही किया है पत्रकारों और विशेषज्ञों से लिखवाने के लिए। राजेंद्र यादव का तुलसी विरोधी लेख हाल में उन्‍होंनें मोहल्‍ले में छापा है और यदि एक बार राजेंद्रजी को मिली टिप्‍पणियों पर नजर डाल ली जाए तो सहज ही समझ आ जाता है कि चिट्ठाकारिता के बिंदासपन का क्‍या मतलब है। कुल मिलाकर स्थिति यह है कि समाचार, व्‍यंग्‍य, तकनीकी विषय, साहित्‍य, खेल, स्‍त्री हित के विषय आदि सभी क्षेत्रों में लेखन अब हिंदी चिट्ठाकारी में हो रहा है।
जो आजाद खयाली और आजाद तबियत इस चिट्ठाकारी की सबसे अहम खासियत है वही इसे जटिल परिघटना बना देती है। लोगों की आपसी आजादी और अहम अक्‍सर टकराते रहते हैं और नित नए विवाद चिट्ठाकारिता में खड़े होते रहते हैं। हाल की हिंदी चिट्ठाकारी में ऐसे कई विवाद खड़े हुए। हिंदू व मुसलमान पहचान के सवाल पर हुआ तीखा ‘इरफान विवाद’ फिर इंटरनेट पर पहचान के सवाल पर ‘मुखौटा विवाद’ हुआ। ‘मोहल्‍ला विवाद’, ‘बेनाम टिप्‍पणी विवाद’ अन्‍य कुछ विवाद हैं लेकिन ये सब विवाद अपनी जगह हैं और यह बात अपनी जगह कि चिट्ठाकारिता इन विवादों से मजबूत होकर उभरती रही है। यही नहीं चिट्ठाकारी ने अपनी आजाद तबियत के ही हिसाब से अपनी भाषा और मुहावरे भी खुद गड़े हैं- शिक्षित समाज की टकसाली हिंदी को चिट्ठाकारी में आभिजात्‍यपूर्ण मानकर छोड़ दिया जाता है और अखबारी भाषा को भी औपचारिकता से भरा हुआ मानकर उसमें जरूरी वदलाव किए जाते हैं और एक अनौपचारिक भदेस भाषा और अनगढ़ शैली वहॉं पसंद की जाती है जो स्‍माइलियों [:)] से होती है। आम चिट्ठाकारी जुमला यह है कि अखबार पढ़ा जाता है और चिट्ठा बांचा जाता है इसीलिए अखबार में लिखा जाता है जबकि चिट्ठे में पोस्टियाना होता है। तो भाई लोगन आप समझ सकते हैं कि हम जैसे ब्‍लॉगिए को अखबार के लिए लिखने में कितना कष्ट हुआ होगा। अगर सही में हमें बांचना चाहें तो हमारे चिट्ठे पर पधारो सा।

Thursday, April 19, 2007

बन्‍ने के वंदनवार और महाता उन्‍राओ की सूनी ऑंखें